आंखों के रास्ते शरीर में फैलता है मैलिग्नेंट ट्यूमर-कोरोइडल मेलेनोमा

Choroidal Melanoma Tumor

दुर्लभ और जानलेवा है यह ट्यूमर, यह बीमारी परिवार में एक सदस्य से दूसरे को होने की सम्भावना

गुरुग्राम(संजय कुमार मेहरा)। मैलिग्नेंट ट्यूमर-कोरोइडल मेलेनोमा। यह आंख का कैंसर है। यह रेयर कैंसर है। वैसे तो यह पूरी दुनिया में 10 लाख लोगों में से 5-7 लोगों में पाया जाता है, लेकिन इससे पीड़ित व्यक्ति की जान जा सकती है। अगर आंख से बाहर इसका फैलाव होता है तो उपचार से बाहर ही बात हो जाती है। इस कैंसर की पारिवारिक हिस्ट्री है। यानी यह ज्यादातर उन्हें होता है, जिनके परिवार में पहले किसी को हुआ हो।
विदेशों के साथ अब भारत में भी इसके केस आ रहे हैं। चिकित्सक बताते हैं कि इसकी कोई रोकथाम भी नहीं की जा सकती। इस कैंसर का पता लगने पर जल्द से जल्द उपचार हो जाना चाहिए। अगर उपचार में देरी होती है तो फिर यह चिकित्सा जगत से बाहर की बात हो जाती है। इसका उपचार सबसे ऊंचे स्तर पर है। आंख के इस कैंसर का एक बार उपचार होने पर 50 प्रतिशत केसों में इसके 20-25 साल तक दोबारा से फैलने का भी खतरा बना रहता है। अगर ट्यूमर छोटा होता है तो उसका उपचार जल्द संभव है। कई केसों में आंख भी निकालनी पड़ती है।

31 साल की महिला की आंख में पाया गया यह कैंसर | Choroidal Melanoma Tumor 

फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट गुरुग्राम में डॉक्टरों की टीम ने 31 साल की एक महिला में यह कैंसर पाया। मैलिग्नेंट ट्यूमर-कोरोइडल मेलेनोमा से पीड़ित 31 वर्षीय महिला की बायीं आंख में यह कैंसर था, जिसकी यहां सफलतापूर्वक सर्जरी करके बड़ी उपलब्धि हासिल की गई है। फोर्टिस इंस्टीट्यूट में आॅप्थैलमोलॉजी विभाग की निदेशक एवं एचओडी डा. अनीता सेठी बताती हैं कि कोरोइडल मेलेनोमा एक दुर्लभ किस्म का कैंसर है, लेकिन यह मामूली होने पर भी शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है। इसलिए इसका तत्काल इलाज करना जरूरी होता है।
ट्यूमर की लोकेशन आंख के अंदर होने की वजह से यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण था। हमारी प्राथमिकता इस ट्यूमर को निकालने के साथ-साथ मरीज की नजर सुरक्षित रखने की थी। मरीज को प्लाक ब्रेकीथेरेपी दी गई जो कि खास किस्म का रेटिनल आइ ट्यूमर उपचार है। यह पहला मामला है, जबकि दिल्ली-एनसीआर के किसी प्राइवेट अस्पताल में इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया। सर्जरी के 5 दिनों के बाद ही मरीज को अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

मरीज को छह महीने से धुंधला दिखाई दे रहा था

चिकित्सकों के अनुसार अस्पताल में भर्ती कराए जाने के समय महिला मरीज को पिछले छह महीनों से बायीं आंख में धुंधला दिखायी देने की शिकायत थी। हालांकि उनकी दायीं आंख में नॉर्मल विजन (6/6) थी, लेकिन बायीं आंख में विजन घटकर 6/18 रह गई थी। मेडिकल जांच से पता चला कि इस आंख में उन्हें आरंभिक-1ए स्टेज का कैंसर था। जिसकी वजह से उनकी आंख में 6-7 डिस्क डायमीटर का घाव बन चुका था, जो कि मैक्यूला की तरफ बढ़ रहा था।
ट्यूमर उनकी आॅप्टिक नर्व के नजदीक था और साथ ही रेटिना के बाकी हिस्से को रेडिएशन एक्सपोजर से बचाना था। इसलिए मरीज के इलाज के लिए प्लाक ब्रेकीथेरेपी का विकल्प चुना गया। इस तकनीक में एक छोटे आकार की सिल्वर-कवर्ड डिस्क-शेप डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है। यह तरीका काफी कारगर साबित हुआ, क्योंकि इससे मरीज की दृष्टि को सुरक्षित किया जा सका। साथ ही आॅप्टिक नर्व के नजदीक स्थित ट्यूमर को भी हटाने में कामयाबी मिली।

इस प्रक्रिया से किया उपचार

डा. अनीता सेठी बताती हैं कि मरीज के उपचार में रेडियोएक्टिव वेस्ट से तैयार स्वदेशी नॉच्ड रूथेनियम 106 प्लाक का इस्तेमाल किया। इस जटिल प्रक्रिया के तहत रेडियोएक्टिव प्लाक को आंख के अंदर ट्यूमर के ठीक ऊपर रखा। आमतौर पर यह जनरल एनेस्थीसिया देकर किया जाता है। इस प्लाक से बीटा रेडिएशन निकलता है जो आसपास के टिश्यूज को प्रभावित किए बगैर ही कैंसर कोशिकाओं पर हमला करता है। दूसरा तरीका यह होता है कि सर्जरी कर आंख के प्रभावित हिस्से या पूरी आंख को निकाला जाता है। इस प्रक्रिया का फायदा यह है कि इससे मरीज की नजर को बचाया जा सकता है। एक अन्य वैकल्पिक इलाज इन्युक्लिएशन भी है, जिसमें आंख को निकाला जाता है। इससे न सिर्फ मरीज की दृष्टि पूरी तरह से चली जाती है, बल्कि सर्जरी के बाद मरीज का चेहरा भी खराब लगता है। यहां प्लाक ब्रेकीथेरेपी को इसलिए चुना, ताकि न सिर्फ ट्यूमर को कारगर तरीके से हटाकर इस युवती की आंखों की दृष्टि को बचाया जा सके। इलाज पूरा होने के बाद मरीज का चेहरा भी न बिगड़े।

दो चरणों में की गई प्लाक ब्रेकीथेरेपी | Choroidal Melanoma Tumor 

डॉ. सेठी ने बताया कि प्लाक ब्रेकीथेरेपी को दो चरणों में किया जाता है। पहली सर्जरी में प्लाक इंसर्शन किया जाता है। अगली सर्जरी में इस प्लाक को हटाया जाता है। प्लाक कितनी देर तक ट्यूमर के संपर्क में रहेगा। यह डोसीमीट्री (विज्ञान जिसके अनुसार, माप और गणना के आधार पर अवधि तय की जाती है) से निर्धारित होता है। डोसीमीट्री को रेडिएशन फिजिसिस्ट द्वारा ट्यूमर के आकार और प्लाक की रेडियोएक्टिविटी के आधार पर किया जाता है। इस मामले में हमने नॉच्ड रूथेनियम 106 प्लाक का इस्तेमाल किया। दोनों प्रक्रियाओं को करीब 75 घंटों में पूरा किया गया।
Choroidal Melanoma Tumor
महिला मरीज की आंख, जिससे मैलिग्नेंट ट्यूमर-कोरोइडल मेलेनोमा की सर्जरी की गई।
-डा. अनीता सेठी

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