जलवायु परिवर्तन और श्रम-उत्पादकता

Climate Change
ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन (Climate change) के कारण भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में इस सदी के अंत तक श्रम उत्पादकता में 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इससे गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं में वृद्धि हो सकती है और खाद्य सुरक्षा,सकल घरेलू उत्पाद और राष्ट्रीय आय जैसे विभिन्न आयाम प्रभावित हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन से श्रमिकों को महफूज रखने और उनकी कार्य-क्षमता बरकरार रखने के लिए जलवायु परिवर्तन का खतरा कम करने तथा अनुकूलन नीतियों पर ठोस कार्रवाई करने की आवश्यकता है।
जलवायु परिवर्तन किसी देश के अर्थतंत्र को गहराई से प्रभावित कर सकता है। इससे एक तरफ नौकरियों में कमी आ सकती है तो दूसरी तरफ इससे विभिन्न कार्यों में संलग्न श्रमिकों की श्रम-उत्पादकता भी प्रभावित हो सकती है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च तापमान और बढ़ा हुआ वायु प्रदूषण श्रमिकों को अपना काम करने की क्षमता को प्रभावित करता है। इससे उनका कौशल और काम के घंटे भी सीमित हो सकते हैं। श्रमिकों की उत्पादकता इस रूप में भी प्रभावित हो सकती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली चरम मौसमी घटनाएं उनके रोजगार को छीन सकती है,क्योंकि ऐसी स्थिति में उनका काम पर संभव नहीं हो पाता है।
दरअसल तापमान का बढ़ता व घटता स्तर दोनों ही श्रमिकों के स्वास्थ्य और कार्य-क्षमता को प्रभावित करता है। ग्लोबल वार्मिंग के रूप में होने वाली अतिरिक्त गर्मी काम के दौरान और उसके बाद श्रमिकों को जोखिम में डाल सकती है। ऐसी ही मुश्किलों का सामना अन्य कठोर मौसमी दशाओं में भी किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर काम करने वाला एक श्रमिक अपनी कार्य-क्षमता का 50 प्रतिशत तक खो देता है। अनुमान है कि उच्च तापमान से 2030 तक दुनियाभर में कुल कामकाजी घंटों में ढाई प्रतिशत,जबकि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 2400 बिलियन डॉलर की कमी हो सकती है। ग्लोबल वार्मिंग से कृषि व निर्माण सेक्टर के श्रमिक सर्वाधिक प्रभावित होंगे। 2030 तक इन दोनों क्षेत्रों में कुल कामकाजी घंटों में क्रमश: 60 और 19 प्रतिशत की कमी देखी जा सकती है।
जलवायु परिवर्तन के कारण श्रम उत्पादकता में होने वाली कमी से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में श्रमिकों की मांग में कमी हो सकती है और गरीबी,बेरोजगारी की समस्या बढ़ सकती है और खाद्य सुरक्षा का संकट गहरा सकता है। अत: जलवायु परिवर्तन से श्रम उत्पादकता को बरकरार रखने के इंतजामात करने होंगे। इस बाबत श्रमिकों को जागरूक किया जा सकता है। साथ ही पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन का खतरा कम करने की दिशा में अपने प्रयत्न जारी रखने होंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here