Farmers Protest: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : किसान और सरकार

मर्यादित हो आंदोलन, देश की साख को न पहुँचे नुकसान | Farmers Protest

Farmers Protest: भारत के संविधान में हर किसी को अपनी बात कहने का हक प्रदान किया गया है। इसे संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया गया है। लोकतंत्र एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनमें से किसी पर भी आँच आने पर दूसरा अपने आप ही विलुप्ति की कगार पर पहुँच जाता हैं। जिस तरह भारत के नागरिकों को अपनी बात कहने का हक है ठीक उसी प्रकार पत्रकारिता के संबंध में अधिकार एवं उत्तरदायित्व में संतुलन करना आवश्यक है। इसी प्रकार घृणा-संवाद एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मध्य अंतर को समझना भी बहुत आवश्यक है।

मज़बूत लोकतंत्र के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उसकी सीमा का तय होना भी आवश्यक है। इन दोनों में पूरकता के संबंध को स्वीकार करते हुए बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्र लगातार प्रगति के रास्ते पर अग्रसर हो सके। समाज समावेशी बने एवं विश्व में भारतीय संविधान जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा हेतु प्रसिद्ध है, की गरिमा बरकरार बनी रहे। इस अभिव्यक्ति की आजादी की कार्यपालिका के साथ-साथ देश की जनता को भी मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। ब्रिटिश हुकूमत की बेड़ियों से मुक्त होने के बाद भी भारत देश में आंदोलन, धरने-प्रदर्शन, सरकारी निर्णयों का विरोध चलता रहा है ,जो वर्तमान में भी जारी है। देश की राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन होते आए हैं।

कई बार ऐसे भी आंदोलन होते हैं, जिसमें देश की साथ विदेशी मीडिया की नजरों में गिर जाती है। पूर्व में हुए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का आंदोलन एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन गया था। इसी प्रकार योग गुरु बाबा रामदेव ने भी दिल्ली में जनता के सहयोग से आंदोलन किया था। दिल्ली में 378 दिन तक चलने वाला किसान आंदोलन इंटरनेशनल स्तर पर मुद्दा बना था। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी जिसके तहत देश की राजधानी दिल्ली में ऐसे आंदोलन हुए। पर आंदोलन करने वालों को सिर्फ इतना जरूर सोचना चाहिए कि उनके देश के शक्ति बोध को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। शक्ति बोध ही नहीं सौंदर्य बोध का भी ख्याल रखना चाहिए। Farmers Protest

जिन मांगों को लेकर किसानों ने दिल्ली में पहले आंदोलन चलाया था। उन्हें मांगों में कुछ और मांगों को शामिल करते हुए अब एक बार दोबारा फिर दिल्ली कूच का ऐलान किया गया है। पंजाब के किसानों ने दिल्ली जाने के लिए हरियाणा के रास्तों को चुना। पर पिछले तीन दिनों से हरियाणा की धरती जंग की धरती की तरह बनी हुई है। इन किसानों को रोकने के लिए एक तरफ जहां केंद्रीय सुरक्षा बलों की 64 कंपनियों को तैनात किया गया है। वहीं पंजाब से जुड़ने वाले सभी बॉर्डर को सील भी किया गया है। हरियाणा सरकार ने बॉर्डर पर नुकीली कीलें, कंटीले टार,कांकरिया के बैरिकेट्स, मिट्टी से भरे कंटेनर, घग्गर नदी की खुदाई व राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी एक तरफ खुदाई कर किसानों को दिल्ली जाने से रोकने का इंतजाम किया है।

इस दौरान आंदोलन पर जाने वाले किसान परेशान हो या ना हो लेकिन प्रदेश की जनता जरूर परेशान नजर आ रही है। अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बेकसूर जनता सरकार व आंदोलनरत किसानों के बीच चक्की के दो पाटों की तरह पीस रही है। खास बात यह है कि पंजाब के किसान अपनी मांगों के लिए जाना दिल्ली चाहते हैं, लेकिन इन्हें रोकना हरियाणा सरकार चाहती है। इसी वजह से हरियाणा व पंजाब सरकार के बीच भी तकरार हुई है। इतना ही नहीं भविष्य में हरियाणा में पंजाब के लोगों के बीच भाईचारा भी बिगड़ सकता है। हालांकि हरियाणा के किसान व किसान संगठन पंजाब के किसानों का वेलकम करने के लिए तैयार हैं।

कुछ भी हो वर्तमान हालातों के बीच फिलहाल पंजाब व हरियाणा के किसानों का हरियाणा सरकार के साथ सीधा टकराव बना हुआ है। किसान व सरकार अपनी-अपनी जिद्द पर कायम है। किसान हर हाल में दिल्ली जाना चाहते हैं,पर हरियाणा सरकार किसी भी सूरत में रास्ता नहीं देना चाहती। इन बातों के बीच नुकसान होना तय है। पर ऐसा हुआ तो उसका दाग भी हरियाणा पर लगेगा। किसी नुकसान के बाद दिल्ली जाने देने से अच्छा किसानों को रास्ता दिया जाना बेहतर हो सकता है। यहां किसानों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, क्योंकि भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की बात तो कही गई है, लेकिन मर्यादा में रहकर। मर्यादा का उल्लंघन आंदोलनकारियों को भी नहीं करना चाहिए।

विश्व के अधिकांश देशों द्वारा अपने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है, परंतु ऐसे भी बहुत से देश हैं, जिन्होंने इससे दूरी बना कर रखी है। इस संबंध में अगर भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न सिर्फ अधिकार है बल्कि भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता भी रही है, जिसे भारत के धार्मिक ग्रंथों, साहित्य, उपन्यासों आदि में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अभिव्यक्ति के स्वरूपों की बात की जाए तो इसमें किताब, चित्रकला, नृत्य, नाटक, फिल्म निर्माण तथा वर्तमान में सोशल मीडिया को सम्मिलित किया जाता है। इसी प्रकार स्वतंत्र अभिव्यक्ति की भारतीय परंपरा को किसी भी प्रकार से हानि पहुँचने से बचाने हेतु भारतीय संविधान

निर्माताओं द्वारा इसे कानूनी वैधता प्रदान करते हुए मूल अधिकारों का हिस्सा बनाया गया तथा अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सभी प्रकार की स्वतंत्रताओं में प्रथम स्थान प्रदान किया गया। किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष नहीं है, इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन हैं। भारत की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता पर खतरे की स्थिति में, वैदेशिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव की स्थिति, न्यायालय की अवमानना की स्थिति में इस अधिकार को बाधित किया जा सकता है। भारत के सभी नागरिकों को विचार करने, भाषण देने और अपने व अन्य व्यक्तियों के विचारों के प्रचार की स्वतंत्रता प्राप्त है। प्रेस एवं पत्रकारिता भी विचारों के प्रचार का एक साधन ही है,इसलिए अनुच्छेद 19 में प्रेस की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है, पर आज के वर्तमान दौर में प्रेस की स्वतंत्रता भी खतरे में नजर आ रही है। Farmers Protest

डॉ. संदीप सिंहमार, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार।

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