स्वास्थ्य प्रबंध बनाम कैबिनेट विस्तार

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Cabinet Expansion

विगत सात वर्षों में केंद्र की एनडीए सरकार में पहली बार कैबिनेट में बड़ा बदलाव किया है, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री सहित सरकार के स्तंभ कहे जाने वाले तीन मंत्रियों की छुट्टी की गई। यह पहली बार है जब स्वास्थ्य क्षेत्र में इतना बड़ा निर्णय लिया गया है। कोरोना महामारी में सरकार की छवि को नुक्सान पहुंचा है, जिसके लिए जिम्मेदार मंत्रियों को हटाया गया है। यह भी हो सकता है कि सरकार ने तीसरी लहर से पहले ठोस रणनीति बनाने के साथ-साथ अपने राजनीतिक सम्मान को जो ठेस पहुंची है, उससे उभरने के लिए यह कदम उठाया हो। कुछ भी हो, महामारी इस बड़े बदलाव की धुरी समझी जा सकती है लेकिन यह सोचने वाली बात है कि क्या यह राजनीतिक निर्णय देश में किसी स्वास्थ्य संस्कृति को पैदा करने का माहौल बनाएगा।

यह भी बड़ा सवाल है कि कोरोना के अलावा घातक बीमारियों से बचाव के लिए कोई मुहिम नहीं चल रही। आज मधुमेह, दिल का दौरा, कैंसर, लीवर खराब होने सहित बहुत सी बीमारियां हैं, जो पिछले दो दशकों से कहर ढहा रही हैं। इन बीमारियों से होने वाली मौतों की गिनती कोरोना के कारण हुई मौतों से भी कहीं ज्यादा है। करोड़ों लोग हैं जो कैंसर को लेकर जागरूक नहीं हैं। ऐसे मरीज वर्षों तक कैंसर ग्रस्त होने के बावजूद उपचार तो क्या टेस्ट करवाने की भी नहीं सोचते। यदि कोरोना महामारी की तीसरी लहर भी कोई बड़ा नुक्सान किए बिना गुजर जाती है तब भी देश में स्वास्थ्य संबंधी हालात बेहतर नहीं हैं। लोगों में स्वस्थ रहने के प्रति कोई मुहिम सफल नहीं हो सकी।

भले ही भारत आयुष्मान योजना से 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा की सुविधा मिलने लगी, लेकिन सरकारी अस्पतालों की दशा को सुधारने के लिए कोई बड़े कदम नहीं उठाए गए। फिलहाल स्वास्थ्य नीतियों के संबंध में बीमारी होने के बाद उपचार तक सीमित है, जबकि इस बात की विशेष आवश्यकता है कि लोग बीमारी होने से बचने के लिए विचार करें। दिल, गुर्दे, लीवर जैसी बीमारियों से जागरूक होकर भी बचा जा सकता है, जिसको लेकर अभी बहुत कुछ करना बाकी है। राजनीतिक निर्णयों की अपनी भूमिका है लेकिन देश को सही अर्थों में स्वस्थ बनाने के लिए तत्काल व्यवहारिक निर्णय लेने की आवश्यकता है। सरकारों की सफलता जनता की तंदरुस्ती के साथ है।

 

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