अगर आप ये काम कर लो तो प्रभु के दर्श-दीदार संभव: पूज्य गुरु जी

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अगर आप ये काम कर लो तो प्रभु के दर्श-दीदार संभव: पूज्य गुरु जी

सरसा। सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि जीवात्मा जब अपने सतगुरु, पीरो-मुर्शिद के दर्श-दीदार पा लेती है, तो वो तड़पती हुई पुकारती है कि हे मेरे सतगुरु! तू जहां है, वहां निजधाम है। मेरे लिए स्वर्ग, जन्नत, सचखंड, अनामी सब बौने हैं क्योंकि मेरे लिए तू ही सब कुछ है। तेरा दर्श-दीदार अरबों-खरबों को एक पल में तार सकता है, मुर्दों में जिंदगी डाल सकता है। तेरा दर्श-दीदार आवागमन के चक्कर को खत्म कर सकता है। हे मेरे रहबर सार्इं! मुझे सिर्फ तेरा दर्श-दीदार चाहिए।

पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि जब जीवात्मा तड़पती हुई अपने मुर्शिदे-कामिल से पुकार करती है तो उस सतगुरु, मौला को दर्श-दीदार देने पड़ते हैं। चाहे जीव कितनी भी दूर क्यों न हो, वो मालिक उसे अंत:करण में दर्श-दीदार देते हैं। दया-मेहर, रहमत से नवाजते हैं और अंदर-बाहर खुशियों का आलम छा जाता है। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि सतगुरु के दर्शन के लिए आत्मा तड़पती है लेकिन उन्हीं की तड़प पूरी होती है जो ताउम्र वचनों पर अमल करने की कसम ही नहीं खाते बल्कि प्रीत निभाते हैं। वो चलते चले जाते हैं और कहते हैं कि मालिक तू जाने, तेरा काम जाने। हमने तेरा पल्ला पकड़ा है। चकोर कभी नहीं कहती कि चंदा! तू क्यों नहीं आता। चकोर तो उड़ती चली जाती है।

उसी तरह मेरे सार्इं! यह तड़प है कि तू दर्श-दीदार जरूर दे। सुमिरन, भक्ति-इबादत करेंगे, सेवा करेंगे, नेक-भले काम करेंगे। तू दर्श-दीदार जरूर देगा। मुझे तुझ पर विश्वास है। तू दोनों जहां का दाता है और कभी किसी को नहीं तड़पाता।
पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि जीवात्मा कहती है कि हे मेरे दाता! तेरे मुबारक चरण जहां पड़े, ऐसा हो कि मैं वहां पलकें बिछा दूं। तेरे चरण-कमल उन पलकों पर रखे जाएं, नीचे न पड़ें। मैं तेरी याद में इतना तड़पूं कि तू मेरी आंखों में समा जाए। मैं आंखें बंद करूं तो तू नजर आए और आंखें खोलूं तो भी तू नजर आए। अगर जीवात्मा अमल करे, विश्वास करे तो मालिक अंदर-बाहर कमी नहीं छोड़ते।

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