इंटरनेट एक्सेस जीने के हक जैसा तो फिर पाबंदी क्यो?

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Internet Ban: इंटरनेट बंद का दर्दनाक साइड इफेक्ट

संविधान के अनुच्छेद 19 में लोगों का मौलिक अधिकार है इंटरनेट | Hisar

Internet Access: हरियाणा में वर्तमान में किसी भी प्रकार का ऐसा आंदोलन नहीं है, जिसकी वजह से पब्लिक इमरजेंसी/पब्लिक सेफ्टी एक्ट का बहाना बनाकर इंटरनेट बंद करने की जरूरत पड़े। महज सीआईडी रिपोर्ट के आधार पर मोबाइल इंटरनेट बंद करना लोगों का गला घोंटने के समान है। सरकार को यदि संभावित किसान आंदोलन के कारण अफवाहों का डर है तो सोशल मीडिया के स्पेशल प्लेटफार्म व्हाट्सएप, फेसबुक,ट्विटर आदि बंद कर देना चाहिए। 7 जिलों में संपूर्ण तौर पर मोबाईल/डोंगल इंटरनेट पर पाबंदी लगाना उचित कदम नहीं है।

जम्मू-कश्मीर के इंटरनेट बंद करने के सरकार के केंद्र सरकार के फैसले पर देश की माननीय सर्वोच्च अदालत भी यह टिप्पणी दे चुकी है कि ‘स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जैसी जरूरी सेवाओं वाले संस्थानों में इंटरनेट बहाल होना चाहिए’। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ‘अलग-अलग विचारों को दबाने के हथकंडे के तौर पर धारा-144 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता’। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कश्मीर में इंटरनेट पर 5 महीने 4 दिन से जारी रोक और वहां लागू धारा-144 पर यह बड़ा फैसला सुनाया था। Hisar

पर इस फैसले को को पूरे देश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत लोगों का मौलिक अधिकार है। यानी यह जीने के हक जैसा ही जरूरी है। इंटरनेट को अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं किया जा सकता। तब यह फैसला जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने सुनाया था। वास्तव में आज के डिजिटल युग में इंटरनेट जीने के अधिकार जैसा ही है, इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता। ऐसे भी वर्तमान में हरियाणा के किसी भी जिले में ऐसा आंदोलन नहीं चल रहा जिसके कारण पब्लिक इमरजेंसी लागू करनी पड़े। इंटरनेट बंद के फैसले पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।

इंटरनेट के जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकार है। इंटरनेट के जरिए कारोबार करने के अधिकार को भी अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है। स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जैसी जरूरी सेवाओं वाले संस्थानों में इंटरनेट बहाल किया जाना चाहिए। आजादी पर बंदिशें लगाने के लिए या अलग-अलग विचारों को दबाने के हथकंडे के तौर पर धारा 144 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि मजिस्ट्रेट को निषेधाज्ञा लागू करते समय दिमाग का इस्तेमाल और अनुपात के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। धारा 144 को हिंसा भड़कने का अंदेशा और सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुंचने के खतरे जैसे इमरजेंसी हालात पर ही लागू करना चाहिए।

सिर्फ असहमति इसे लगाने का आधार नहीं हो सकता। लोगों को असहमति जताने का हक है।’भाषण की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। प्रेस की आजादी बहुमूल्य और अटूट अधिकार है। इंटरनेट और कम्युनिकेशन पर पाबंदी का प्रेस की आजादी पर असर पड़ता है।’ ‘किसी भी तरह की स्वतंत्रता पर तभी रोक लगाई जा सकती है, जब कोई विकल्प न हो और सभी प्रासंगिक कारणों की ठीक से जांच कर ली जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने टिप्पणी में यह भी कहा था कि यह कोर्ट की जिम्मेदारी है कि देश के सभी नागरिकों को बराबर अधिकार और सुरक्षा तय करे, लेकिन ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता और सुरक्षा के मुद्दे पर हमेशा टकराव रहेगा।’ इंटरनेट एक्सेस के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार मौलिक अधिकार या अनुच्छेद 19 का जिक्र किया है। Hisar

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में एक फैसले में कहा था कि इंटरनेट एक्सेस नागरिकों का हक है। वहीं, केरल हाईकोर्ट ने सितंबर 2019 में 18 साल की छात्रा की याचिका पर कहा था कि इंटरनेट एक्सेस मौलिक अधिकार है। इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने से जनता के जीवनयापन पर असर पड़ता है। इसके साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचता है। बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं प्रभावित होती हैं। इन सभी कारणों को देखते हुए इंटरनेट बंद नहीं करना चाहिए बल्कि स्पेशल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को स्थगित करना चाहिए ताकि अफवाहें फैलाने पर रोक लगाई जा सके। फिर भी यदि इंटरनेट बंद करने जैसी नौबत आ जाती है तो इंटरनेट स्पीड कम कर देनी चाहिए। इंटरनेट बंद करना किसी भी समस्या का स्थाई समाधान नहीं हो सकता।

ज्ञात रहे कि किसानों के दिल्ली कूच करने के आह्वान मात्र से ही हरियाणा सरकार ने सीआईडी की रिपोर्ट को आधार बनाकर हिसार, फतेहाबाद, सिरसा, जींद, कैथल, अंबाला व कुरुक्षेत्र में 11 फरवरी सुबह 6:00 बजे से लेकर 13 फरवरी रात 11:59 बजे तक इंटरनेट सेवाएं स्थगित कर दी है। इस तरह से अचानक मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद करने से जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है, क्योंकि वर्तमान में अधिकतर काम डिजिटल माध्यम से ही होते हैं। ऐसी स्थिति में अफवाहें रूके या ना रूके बल्कि डिजिटल दुनिया के काम जरूर रुक गए हैं। सरकार को अपने इस फैसले पर जरूर पुनर्विचार करना चाहिए। Hisar

डॉ. संदीप सिंहमार, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार।

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