लोगों की निजता महत्वपूर्ण

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पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्सएप की नई प्राइवेट पॉलिसी के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करते हुए फेसबुक और व्हाट्सएप को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई में कहा है कि व्हाट्सएप ने अपनी नई पॉलिसी में भारत और यूरोप के देशों के लिए अलग-अलग मानक निर्धारित किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत में डेटा प्रोटेक्शन कानून बनने वाला है, लेकिन इसका इंतजार किए बिना ही व्हाट्सएप नई पॉलिसी ले कर आया है। लोगों के निजी डेटा और चैट को फेसबुक के साथ साझा किये जाने से संबंधित प्रस्तावित बदलावों के कारण अब सर्वोच्च न्यायालय ने व्हॉट्सएप को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।

निजता की रक्षा को अहम बताते हुए मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि कंपनी का भले ही बड़ा रसूख हो, लेकिन लोगों को अपनी निजता प्यारी होती है और इसकी रक्षा करना न्यायालय का कर्तव्य है। हालांकि, व्हॉट्सएप और फेसबुक का पक्ष रख रहे वकीलों ने निजी डेटा को गोपनीय रखने का भरोसा दिया। इससे पहले व्हॉट्सएप ने यह स्पष्ट किया था कि गोपनीयता नीति में परिवर्तन से दोस्तों और परिजनों से संदेश वार्ता पर कोई असर नहीं होगा। हालांकि, बिजनेस संदेशों को फेसबुक द्वारा पढ़ा जा सकता है और मार्केटिंग उद्देश्य के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। अब यह मांग हो रही है कि निजता से जुड़ी चिंताओं को हल करने तक व्हॉट्सएप को नयी नीति लागू करने से रोका जाये। निजता से समझौता होने के डर से कई यूजर्स ने अन्य प्लेटफॉर्म जैसे सिग्नल और टेलीग्राम का भी रुख कर लिया है।

चूंकि, डेटा सूचनाओं का संग्रह है, जो कंपनियों, सरकारों और राजनीतिक दलों के लिए सबसे अधिक फायदे का सौदा है। आॅनलाइन विज्ञापनों के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों से जुड़ने का यह प्रभावी जरिया भी है। डेटा की बढ़ती अहमियत के बीच निजता से जुड़े सवाल भी गंभीर होते जा रहे हैं। बीते दो दशकों में डेटा सुरक्षा के नजरिये से यूरोपीय समूह का जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) सबसे उल्लेखनीय बदलाव है। क्या निजता को मौलिक अधिकार के रूप में लागू करने का मतलब गूगल और फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ता डेटा एकत्र करना कंपनियों के लिए एक अवरोधक हो सकता है? दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में निजी डेटा की सुरक्षा के लिहाज से यह पुख्ता व्यवस्था है।

भारत में भी ऐसे प्रावधान की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि विभिन्न डिजिटल माध्यमों से जुड़े करोड़ों यूजर्स को निजी डेटा और चैट के दुरुपयोग का डर न रहे। भारतीय नागरिकों को अब अपने डिजिटल अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता है, भारत के पास कोई डेटा सुरक्षा कानून नहीं है। हालांकि उपयोगकतार्ओं द्वारा सहमति दी गई थी, यह अभी भी बहस में है कि यह कितना वैध है। दुर्भाग्य से, सरकार को व्हाट्सएप और आधार के मामले में गोपनीयता के उल्लंघन के बारे में अलग-अलग विचारों के तहत विचार करने की उम्मीद है। यह एक नागरिक के निजी रहने के अधिकार को और मजबूत करता है और राज्य के साथ किसी भी निजी पार्टियों के साथ अपनी व्यक्तिगत जानकारी या डेटा साझा नहीं करने का चयन करता है।

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