विशेष : रेडियो की स्वर्णिम यात्रा और वर्तमान सन्दर्भ

Radio
Radio

भारत में रेडियो प्रसारण के शुरूआती प्रयास बहुत सफल नहीं रहे। कुछ उत्साही आपरेटरों ने 20 अगस्त 1921 को अनधिकृत रूप से बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और लाहौर से प्रसारण किया पर वे उसे आगे न ले जा सके। निजी ट्रासमीटरों के द्वारा 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने प्रसारण आरम्भ किया गया पर उसने तीन वर्ष में ही दम तोड़ दिया। 1927 में स्थापित रेडियो क्लब बाम्बे भी 1930 में आखिरी सांस ले कर मौन हो गया। 1936 में ‘इम्पीरियल रेडियो आफ इंडिया’ की शुरूआत हुई जो आजादी के बाद आल इंडिया रेडियो के नाम से विख्यात हुआ। 1957 को आल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर आकाशवाणी कर दिया गया।

प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

रेडियो ने भी कभी निराश नहीं किया

सुनहरी और खट्टी-मिट्ठी स्मृतियों को सहेजे रेडियो अपनी जीवन यात्रा का शतक पूरा करने को है। पूरी दुनिया में रेडियो ने श्रोता वर्ग से जो सम्मान और प्यार हासिल किया वह अन्य किसी माध्यम को न मिला और न कभी मिल सकेगा। विविध इंद्रधनुषी कार्यक्रमों के द्वारा रेडियो ने न केवल मनोरंजन जागरूकता और शिक्षा संस्कार के वितान को समुज्ज्वल किया, बल्कि राष्ट्रीय एकता-अखण्डता के ध्वज को भी थामे रखा। सुदूर दक्षिण के तमिल, कन्नड, मलयालम भाषी जन हों या उत्तर का कश्मीरी, डोंगरी, हिमाचली समुदाय। हरियाणवी, राजस्थानी भाषा के चित्ताकर्षक रंग हों या ब्रज, बुंदेली, बघेली और अवधी बोलियों की मधुमय मृदुल रसधार। पूर्वोत्तर की मिजो, नागा, त्रिपुरा, असम की क्षेत्रीय भाषायी समुद्धि हो या मराठी, गुजराती, पंजाबी की मधुर वाणी। सभी को रेडियो ने स्वर दिए और विस्तार एवं संरक्षण का रेशमी फलक भी। हिन्दी के राष्ट्रीय प्रसारणों को सम्पूर्ण देश ने सुना और गुना तथा सृजन के सुवासित सुमन पल्लवित-पुष्पित किए। रेडियो ने जन-जन का बाहें फैलाकर स्वागत किया। भारत में तो रेडियो परिवार के सदस्य की तरह रहा और है। आज की पीढ़ी के पास भले ही इलेक्ट्रनिक गैजैट के रूप में मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा के तमाम संसाधन एवं विकल्प मौजूद हों पर वह संतुष्ट नहीं है। लेकिन पूर्व पीढ़ी के पास केवल रेडियो था और आत्मीय संतुष्टि भी। रेडियो ने भी कभी निराश नहीं किया।

कला, साहित्य, संगीत का प्रसारक

खेत की मेड़ पर विराजे रेडियो अपने कृषि कार्यक्रमों से खेत जोतते और फसल काटते किसान को निरन्तर खेती के नवीन तौर-तरीके सिखाते रहे। पनघट पर गगरियों में जल भरतीं युवतियां और कुएं की जगत पर मधुर गीत बिखेरता रेडियो अपना-सा ही जान पड़ता। विरह की अग्नि में जलती कामिनी को रेडियो के गीत मिलन की आस बंधाते। नीम तले चबूतरे पर बैठी पंचायतों के बीच भी वह रस बरसाता रहा। विद्यार्थियों का तो संगी ऐसा कि मेज पर रेडियो बजता रहता और उधर कागज पर कलम चलती रहती। बूढ़े बुजुर्ग के समाचार सुनते समय किसी की क्या हिम्मत की स्टेशन बदल दें। रेडियो एकाकीपन का साथी था तो ज्ञान का खजाना भी। कला, साहित्य, संगीत का प्रसारक था तो कृषि, ज्ञान, विज्ञान के नित नवीन शोधों का संचारक भी। रेडियो पर संकट के बादल छाये पर उसने अपनी प्रकृति और जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। श्रोता कभी बहका पर कहीं टिक न सका, संतुष्टि ना पा सका और लौट कर रेडियो की शरण ली ज्यों जहाज को पंछी उड़ि जहाज पर आयो।

1936 में ‘इम्पीरियल रेडियो आफ इंडिया’ की शुरूआत हुई

भारत में रेडियो प्रसारण के शुरूआती प्रयास बहुत सफल नहीं रहे। कुछ उत्साही आपरेटरों ने 20 अगस्त 1921 को अनधिकृत रूप से बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और लाहौर से प्रसारण किया पर वे उसे आगे न ले जा सके। निजी ट्रासमीटरों के द्वारा 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने प्रसारण आरम्भ किया गया पर उसने तीन वर्ष में ही दम तोड़ दिया। 1927 में स्थापित रेडियो क्लब बाम्बे भी 1930 में आखिरी सांस ले कर मौन हो गया। 1936 में ‘इम्पीरियल रेडियो आफ इंडिया’ की शुरूआत हुई जो आजादी के बाद आल इंडिया रेडियो के नाम से विख्यात हुआ। 1957 को आल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर आकाशवाणी कर दिया गया। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के अपने ध्येय वाक्य के साथ आकाशवाणी 27 भाषाओं में शैक्षिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक, खेलकूद, युवा, बाल एवं महिला तथा कृषि एवं पर्यावरण सम्बंधी प्रस्तुतियों से सम्पूर्ण देश को एकता के सूत्र में पिरोते हुए सुवासित परिवेश निर्मित कर रही है। साथ ही शेष विश्व को भारतीय संस्कृति और साहित्य से परिचित भी करा रही है। 2 अक्टूबर 1957 को स्थापित विविध भारती ने 1967 से व्यावसायिक रेडियो प्रसारण शुरू कर नये युग में प्रवेश किया। आजादी के समय भारत में केवल 6 रेडियो स्टेशन थे जिनके कार्यक्रमों की पहुंच केवल 11 प्रतिशत आबादी तक ही थी। पर आज भारत में 250 से अधिक रेडियो स्टेशन 99 प्रतिशत आबादी से आत्मीय रिश्ता जोड़े हुए हैं। रेडियो ने विभिन्न तरंग आवृत्तियों पर प्रसारण किया, जिसे श्रोता मीडियम वेब, शार्ट वेब के रूप में जानते हैं। बड़ी इमारतों, पहाड़ों के अवरोधों से मुक्त मीडियम वेव देशी प्रसारण है, जो पूरे भारत के अलावा पड़ोसी देशों में भी सुना जा सकता है। पर शार्ट वेब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक क्षेत्रफल पर ध्वनि की उच्च गुणवत्ता के साथ भारतीय प्रस्तुतियों को सुन आनन्द लिया जा सकता है।

सार्वजनिक बहस को अपने सोच के केंद्र में रखा

सत्तर के दशक में टेलीविजन के आने से लगा कि रेडियो की असमय मौत हो जायेगी पर सभी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हुई और रेडियो कहीं अधिक प्रखर एवं प्रभावी होकर प्रकट हुआ। रेडियो का श्रोता वर्ग बजाय छिटकने के और अधिक जुड़ा। इसी बीच एएम चैनल आया पर प्रभावित नहीं कर पाया और काल के गाल में समा गया। लेकिन 23 जुलाई 1977 को चेन्नै में एफएम चैनल ने आते ही ध्वनि की उच्च गुणवत्ता एवं कार्यक्रमों की विविधता के बल पर धूम मचा दी और देश भर में छा गया। 1993 में निजी एफएम चैनल आने से श्रोताओं की पौ बारह हो गई। और अब तो जमाना है डिजिटल रेडियो का। मोबाइल पर सवार होकर रेडियो श्रोताओं की जेब में समा गया। बड़े आकार और नाब घुमाने वाले रेडियो तो अतीत के चित्र हो गये। रेडियो ने उद्घोषकों एवं समाचार वाचकों मैल्वेल डिमैला, देवकीनंदन पांड, अमीन सयानी, सुरेश सरैया और जसदेव सिंह को नायक बना दिया। उनकी आवाज ही पहचान बन गई। रेडियो ने अपनी यात्रा के प्रारम्भ से ही समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार, जन-जागरूकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक बहस को अपने सोच के केंद्र में रखा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘मन की बात’ ने रेडियो के फलक को विस्तार दिया है। पूर्व महासचिव वान की मून का कथन आज भी प्रासंगिक है, ‘रेडियो हमारा मनोरंजन करता है। हमें शिक्षित करता है। हमें सूचनाओं और जानकारियों से लैस करता है और सारी दुनिया में लोकतांत्रिक बदलावों को प्रोत्साहित करता है।’ रेडियो और आदमी का यह प्रेम पगा रिश्ता नित नवल आयाम स्थापित करते हुए सरस यात्रा पर सतत् गतिमान रहेगा ऐसा ही विश्वास है।

वैश्विक स्तर पर जन जागरूकता के लिए दिवस मनाने की परम्परा रही है, जिस पर लक्ष्य और विषय निर्धारित कर आयोजन किये जाते हैं। पर रेडियो के पास अपना कोई दिवस न था। तो इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से 20 अक्टूबर 2010 को स्पेनिश रेडियो अकादमी के अनुरोध पर स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में रेडियो को समर्पित विश्व दिवस मनाने हेतु सदस्य देशों का ध्यानाकर्षण किया। जिसे स्वीकार कर संयुक्त राष्ट्र संध के शैक्षणिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आम सभा में 3 नवम्बर 2011 को घोषित किया कि प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जायेगा। उल्लेखनीय है कि 13 फरवरी को ही संयुक्त राष्ट्र की रेडियो यूएनओ की वर्षगांठ भी होती है, क्योंकि 1946 को इसी दिन वहां रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था। और तब पहली बार 13 फरवरी 2012 को यह विश्व रेडियो दिवस उमंग-उत्साह पूर्वक पूरी दुनिया में मनाते हुए रेडियो के सफरनामे को याद किया गया। इस आयोजन में विश्व की प्रमुख प्रसारक कंपनियों को बुलाया गया था। जिसमें 44 भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी एवं पुरानी कंपनी रेडियो रूस भी शामिल हुई। वर्ष 2012 और 13 में कार्यक्रम की कोई थीम नहीं रही पर उसके बाद प्रत्येक वर्ष कोई एक मुख्य विषय तय कर उसी थीम पर विश्व में कार्यक्रम सम्पन्न किए जाते रहे हैं। लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण (2014), युवा और रेडियो (2015), संघर्ष और आपातकाल के समय रेडियो (2016), रेडियो इज यू (2017), रेडियो और खेल (2018), संवाद, सहिष्णुता और शांति (2019) के वैश्विक आयोजन के चर्चा विषय निश्चित थे। विश्व के सभी देशों के रेडियो प्रसारकों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही है।

सबसे पहले अमेरिका में चुनावी सर्वे कराया गया था, जब अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने इस विधा को अपनाया था, जिन्हें ओपिनियन पोल सर्वे का जनक माना जाता है। चुनाव उपरांत उन्होंने पाया कि उनके द्वारा एकत्रित किए गए सैंपल तथा चुनाव परिणामों में ज्यादा अंतर नहीं था। उनका यह तरीका काफी विख्यात हुआ और इससे प्रभावित होकर ब्रिटेन तथा फ्रांस ने भी इसे अपनाया और बहुत बड़े स्तर पर ब्रिटेन में 1937 जबकि फ्रांस में 1938 में ओपिनियन पोल सर्वे कराए गए। इन देशों में भी ओपिनियन पोल के नतीजे बिल्कुल सटीक साबित हुए थे। जर्मनी, डेनमार्क, बेल्जियम तथा आयरलैंड में जहां चुनाव पूर्व सर्वे करने की पूरी छूट दी गई है, वहीं चीन, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको इत्यादि कुछ देशों में इसकी छूट तो दी गई है किन्तु कुछ शर्तों के साथ।

अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।