Uttarkashi Tunnel Successful Rescue…जब देवदूत बनकर आए रैट माइनर्स!

Uttarkashi Tunnel Successful Rescue
...जब देवदूत बनकर आए रैट माइनर्स

Uttarkashi Tunnel Successful Rescue: कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता? एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो… यह कहावत सकारात्मक दृष्टिकोण के लिए अपने आप में बिल्कुल सटीक साबित हो रही है। उत्तरकाशी के सिलकयारा सुरंग में 17 दिनों से फंसे श्रमिकों को बचाने के लिए रेट माइनर्स ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। रैट माइनर्स ने तो आसमान में नहीं बल्कि पाताल की तरफ छेद करके दिखा दिया कि उनके हाथों में आज भी वह दम है, जो कोई भी मशीन नहीं कर सकती। हालांकि रैट माइनस बिना किसी अधिकृत ट्रेनिंग के अपनी पारंपरिक विधि से चूहों की तरह खुदाई करते हैं। पर वास्तव में रैट माइनर्स ने जिस हौसले के साथ काम किया, उनको सैल्यूट बनता है।

वही इस ऑपरेशन के सबसे बड़े हीरो कहे जा सकते हैं। रैट माइनिंग का आइडिया भी किसी और ने नहीं बल्कि राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले माइनिंग इंजीनियर सनद कुमार जैन ने दिया था। उनके इस देसी आइडिया ने 41 श्रमिकों की जान बचा दी।उत्तरकाशी सुरंग हादसे के बाद सफल ऑपरेशन अंजाम दिया जा चुका है। सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। पर यदि वास्तव में किसी को इसका श्रेय मिलना चाहिए तो वह रैट माइनर्स को मिलना चाहिए व आईडिया देने वाले इंजीनियर को। इस सफल ऑपरेशन के बाद श्रेय लेने वालों की भी होड़ लग जाएगी। राजनीति भी पीछे नहीं रहेगी। Uttarkashi Tunnel Successful Rescue

पर यह तो पूरे देश ने लाइव देखा है कि 17 दिनों तक सुरंग में फंसे रहे मजदूर तक पहुंचने का काम किसने किया? सिर्फ एक ही जवाब होगा की रैट माइनर्स ने। उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग में 17 दिन से फंसे 41 श्रमिकों के लिए फरिश्ते बनकर आए रैट माइनर्स की हर तरफ प्रशंसा हो रही है। जब स्वदेशी व विदेशी मशीनों ने काम करना बंद कर दिया, तब यही रेट माइनर्स ने मौके पर पहुंचकर अपने हाथों से मैन्युअल तौर पर खुदाई कर रास्ता बनाने का काम किया। मंगलवार दोपहर बाद सुरंग के उस छोर तक पाइप डाला जा चुका था, जहां सभी 41 मजदूर फंसे हुए थे। इस मनुवल खुदाई के बाद ही एनडीआरएफ की टीम मजदूरों का रेस्क्यू करने के लिए सुरंग अंदर जा सकी। एनडीआरएफ की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद पूरा प्रशासनिक अमला व सरकार हरकत में आ गया।

मजदूरों के परिजनों को मौके पर मौजूद रहने के लिए कहा गया। वहीं मजदूरों के स्वास्थ्य पर नजर बनाए रखने के लिए 41 एम्बुलेंस सुरंग के बाहर तैनात कर दी गई। इसके अलावा यदि किसी मजदूर को एयरलिफ्ट करना पड़े तो उसके लिए भी वायु सेवा का चिनूक हेलीकॉप्टर स्टैंडबाई पर रखा गया था। जैसे ही एक-एक कर मजदूरों को बाहर निकला गया, तुरंत सुरंग के बाहर ही बनाए गए अस्पताल में पहले उनका मेडिकल चेकअप किया गया। इसके बाद एंबुलेंस के माध्यम से तुरंत अस्पताल में ले जाया गया। सुरंग में खुदाई पूरी हो चुकी थी। तब 800 मिलीमीटर मोटा पाइप भी डाला जा चुका था। रैट माइनर्स ने जब अपना खुदाई का काम पूरा किया तो एनडीआरएफ की टीम भी तुरंत अंदर पहुंची व एक-एक कर सभी श्रमिकों को इसी पाइप की जरिये ही बाहर निकाला गया।

ज्ञात रहे कि दीपावली के दिन सुरंग में सुरंग का मलबा दरकने से 41 मजदूर फंस गए थे। इन मजदूरों को निकालने के लिए इतने दिनों से तेजी से ऑपरेशन चलाया जा रहा था। अमेरिका से बुलाई ऑगर मशीन से ड्रिलिंग भी की जा रही थी,पर आखिर वक्त में मशीन के ब्लेड टूटने से खुदाई का काम रोकना पड़ा था। लेकिन आखिरी की 10 मीटर की खुदाई रैट-माइनर्स ने ही पूरी की। उनकी वजह से ही मजदूरों तक पहुंचना संभव हो पाया। इस रेस्क्यू अभियान के दौरान यह साबित हो गया है कि जहां पर वैज्ञानिक तकनीक काम नहीं करती वहां हमारी पारंपरिक तकनीक आज भी काम करती है। हालांकि इस तकनीक पर भारत में पूर्ण रूप से रोक लगी हुई है। इस पर खुदाई करने गैर कानूनी है।

क्योंकि रैट माइनर्स अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर कोयला निकालने का काम करते हैं। ऐसे लोग किसी चाव काम नहीं करते बल्कि अपना पेट पालने के लिए पेट के बाल चलकर चूहों की तरह खुदाई करते हैं। वो भी किसी मशीन से नहीं बल्कि हाथों से ही। बहुत गरीब सबके के इन मजदूरों का खनन का काम करने वाले मजबूरी से फायदा उठाते हैं। तभी भारत सरकार ने रैट माइनिंग पर रोक लगाई हुई है। जिन्होंने 17 दिन बाद सुरंग की अंधेरी जिंदगी में फसे मजदूरों को नई संजीवनी देने का काम किया। ऐसे मजदूरों की तरफ भी सरकारों को ध्यान देना चाहिए। ऐसे मजदूरों को विशेष तकनीक से लैस कर सुविधा प्रदान करनी चाहिए ताकि वह भी अपनी आजीविका कमाकर अपने बच्चों का पेट भर सकें।

डॉ. संदीप सिंहमार, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार।

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