मानव स्वास्थ्य पर जल प्रदूषण का खतरा

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Increasing Pollution in Rivers

जल प्रदूषण से पूरी दुनिया चिंतित और आहत है। मानव स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल का होना नितांत आवश्यक है। यह सब मानव को मालूम होते हुए भी जल को बिना सोचे-विचारे हमारे जल-स्रोतों में ऐसे पदार्थ मिला रहा है जिसके मिलने से जल प्रदूषित हो रहा है। जल हमें नदी, तालाब, कुएं, झील आदि से प्राप्त हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण आदि ने हमारे जल स्रोतों को प्रदूषित किया है जिसका ज्वलंत प्रमाण है कि हमारी पवित्र पावन गंगा नदी जिसका जल कई वर्षों तक रखने पर भी स्वच्छ व निर्मल रहता था लेकिन आज यही पावन नदी गंगा क्या कई नदियाँ व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। वायु प्रदूषण तो सबने सुना और देखा है मगर जल प्रदूषण भी किसी महामारी से कम नहीं है। जल प्रदूषण से अभिप्राय जल निकायों जैसे कि, झीलों, नदियों, समुद्रों और भूजल के जल के संदूषित होने से है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जल की गुणवत्ता बदतर होती जा रही है जिससे भारी प्रदूषण के शिकार इलाकों में आर्थिक संभावनाओं पर बुरा असर पड़ेगा।  रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि जल की खराब गुणवत्ता एक ऐसा संकट है जिससे मानवता और पर्यावरण के लिए खतरा पैदा हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ क्षेत्रों में नदियों और झीलों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें आग लगने से धुंआ निकल रहा है। भारत के बेंगलुरू महानगर की बेल्लनडुर झील का जिक्र किया गया है जहां से छह मील दूर स्थित इमारतों में भी राख देखी गई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार कीटाणुओं, सीवर, रसायनों और प्लास्टिक के मिश्रण से नदियों, झीलों और जलाशयों में आॅक्सीजन खत्म हो रही है और पानी जहर में तब्दील हो रहा है।

प्रदूषित जल का सबसे भयंकर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार- सम्पूर्ण विश्व में प्रतिवर्ष एक करोड़ पचास लाख व्यक्ति प्रदूषित जल के कारण मृत्यु के शिकार हो जाते हैं तथा पांच लाख बच्चे मर जाते हैं। भारत में प्रति लाख लगभग 360 व्यक्तिओं की मृत्यु हो जाती है और अस्पतालों में भर्ती होने वाले रोगियों में से 50 फसदी रोगी ऐसे होते हैं जिनके रोग का करण प्रदूषित जल होता है। अविकसित देशों की स्थिति और भी बुरी है। यहां 80 प्रतिशत रोगों की जड़ प्रदूषित जल है। समुद्रों में होने वाले परमाणु परीक्षण से जल में नाभिकीय कण मिलते हैं जो कि समुद्री जीवों व वनस्पतियों को नष्ट करते हैं और समुद्र के पर्यावरण सन्तुलन को बिगाड़ देते हैं। प्रदूषित जल पीने से मानव में हैजा, पेचिस, क्षय, उदर सम्बन्धी आदि रोग उपन्न होते हैं।

जल में कारखानों से मिलने वाले अवशिष्ट पदार्थ, गर्म जल, जल स्रोत को दूषित करने के साथ-साथ वहाँ के वातावरण को भी गर्म करते हैं जिससे वहाँ की वनस्पति व जन्तुओं की संख्या कम होगी और जलीय पर्यावरण असन्तुलित हो जायेगा। स्वच्छ जल जो कि सभी सजीवों को अति आवश्यक मात्रा में चाहिए, इसकी कमी हो जायेगी। आज आवश्यकता है कि कारखानों व औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थों के निष्पादन की समुचित व्यवस्था के साथ-साथ इन अवशिष्ट पदार्थों को निष्पादन से पूर्व दोषरहित किया जाना चाहिए। नदी या अन्य किसी जल स्रोत में अवशिष्ट बहाना या डालना गैरकानूनी घोषित कर प्रभावी कानून कदम उठाने चाहिए। पानी में जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए रासायनिक पदार्थ, जैसे ब्लीचिंग पाउडर आदि का प्रयोग करना चाहिए। अन्तर्राष्टÑीय स्तर पर समुद्रों में किये जा रहे परमाणु परीक्षणों पर रोक लगानी चाहिए। समाज में जल प्रदूषण के खतरे के प्रति चेतना उत्पन्न करनी चाहिए।

 

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