सतगुरू जी ने शिष्य की सच्ची अर्ज स्वीकार की

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बहन ईशर कौर सुचान (सरसा) से पूजनीय शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज की अपार रहमत का वर्णन करती हुई बताती हैं कि सन् 1958 की बात है। मेरे ससुराल वालों ने अपनी सारी जमीन जो गांव सुचान (सरसा) के एरिया में पड़ती थी, को बेचकर यूपी (उत्तर प्रदेश) में खरीदने का निर्णय लिया। लेकिन मैंने इस बात का बहुत विरोध किया। मैंने अपने परिवार में सभी को अपनी राय देते हुए कहा कि हम सभी ने पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज से नाम-शब्द लिया हुआ है और हम डेरा सच्चा सौदा के साथ जुडेÞे हुए हैं। डेरा अपने गांव से केवल 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पर हम अपने सतगुरू जी के दर्शन करते हैं, सत्संग सुनते हैं। उत्तर प्रदेश में हम अपने सतगुरू जी के दर्शन कैसे कर पाएंगे?
मेरा ससुर, पति तथा जेठ कोई भी मेरी बात से सहमत नहीं था। उनके इस फैसले से मेरा मन अत्यंत दु:खी हुआ। मैंने अपने पति को मनाने की पूरी-पूरी कोशिश की कि हम यूपी नहीं जाएंगे, क्योंकि उत्तर प्रदेश यहां से बहुत ही दूर है। मेरे मन में बार-बार यही बात आती कि अगर वहां जमीन ले ली तो हम अपने सतगुरू से बहुत दूर हो जाएंगे। लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुुनी।
आखिर मेरे ससुराल वालों ने अपनी सारी जमीन बेच दी और यूपी में काशीपुर और कालागढ़ के पास जमीन खरीद ली। मेरे ससुराल के सभी आदमी अपनी जमीन की संभाल व काश्त के लिए यूपी में चले गए। सभी औरतें तथा बच्चे अभी सुचान (सरसा) में ही ठहरे हुए थे। जब परिवार के किसी सदस्य ने भी मेरी बात न सुनी तो मैंने अपने सतगुरू पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज के चरणों में अर्ज करने का फैसला लिया। मैं अपने गांव के भक्त वैद्य गोबिन्द राम जी तथा उनकी पत्नी शांति देवी के साथ अर्ज करने के लिए डेरा सच्चा सौदा सरसा में पहुंच गई। जब हम लोग डेरा सच्चा सौदा सरसा में पहुंचे तो उस समय पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज डेरे में बने एक चौबारे के आगे मूढ़े पर विराजमान थे।
मैं और बहन शांति, वैद्य जी के साथ पूजनीय शहनशाह जी के चरणों में पहुंच गए। वहां दो-तीन भक्त पूजनीय शहनशाह जी की हजूृरी में पहले से ही बैठे हुए थे। हम सभी ने पूजनीय शहनशाह जी चरणों में नारा बोला और बैठ गए। जब मैंने सतगुरू जी के दर्शन किए तो वैराग्य में आ गई और सुबक-सुबक कर रोने लगी। हालांकि मैंने शहनशाह जी के आगे कोई अर्ज भी नहीं की थी, परंतु फिर भी अंतर्यामी सतगुरू जी ने फरमाया, ह्यह्यपुट्टर! तुझे यहां से कोई हिला नहीं सकता। वो वापिस आ जाएंगे। पुट्टर, उम्र बहुत लम्बी है।
तू तीसरी बॉडी (पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां) के भी दर्शन करेगी। रोने से बात नहीं बनती। तू फिक्र न कर।ह्णह्ण सर्व-समर्थ सतगुरू जी से उपरोक्त वचन सुनकर मुझे हौंसला हो गया। मुझे इस बात की अत्यंत खुशी हुई कि मेरे सतगुरू जी ने मेरी अरदास स्वीकार कर ली है। मेरी आत्मा खुशी से झूम उठी। उस दिन हम लोग पूजनीय शहनशाह जी से आज्ञा लेकर वापिस लौट आए। सतगुरू जी की ऐसी रहमत हुुई कि मेरे ससुर परिवार को वह जमीन बेचनी पड़ी, जो उन्होंने यूपी में जाकर खरीदी थी। हमारा सारा परिवार वापिस सुचान मंडी में लौट आया।
मेरे ससुराल वालों ने फिर से सुचान मंडी में जमीन खरीद ली। इस प्रकार अंतर्यामी सतगुरू जी ने मेरी इच्छा पूरी की। जब हमारा परिवार यूपी से वापिस आया तो मैं अपने सतगुरू पूजनीय शहनशाह शाह मस्ताना जी महाराज जी का धन्यवाद करने के लिए डेरा सच्चा सौदा दरबार में गई और पूजनीय शहनशाह जी को सारी बात बताई कि सार्इं जी! आप जी के वचन सच हो गए हैं। पूजनीय शहनशाह जी बहुत खुश हुए और वचन फरमाए, ह्यह्यअगर इन्सान का हृदय सच्चा हो और पुकार जायज हो तो सतगुरू उसे जरूर मंजूर करता है।ह्णह्ण सतगुरू जी के वचन अटल होते हैं, जैसा कि उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट होता है।

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