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    शब-ए-बरात रस्म नहीं, आत्मचिंतन और आत्मसुधार की रात: डॉ. अज़मतुल्ला खान

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    Kairana: शब-ए-बरात रस्म नहीं, आत्मचिंतन और आत्मसुधार की रात: डॉ. अज़मतुल्ला खान

    कैराना (सच कहूँ न्यूज़)। Kairana: हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी शाबान माह की पंद्रहवीं रात यानी मंगलवार, 3 फरवरी 2026 को शब-ए-बरात मनाई जाएगी, जबकि इसके अगले दिन बुधवार, 4 फरवरी 2026 को रोज़ा रखा जाएगा। शब-ए-बरात को लेकर हर वर्ष समाज में अलग-अलग मत सामने आते हैं। कुछ लोग इसे रस्मों और दिखावे तक सीमित कर देते हैं, वहीं कुछ लोग इसकी धार्मिक महत्ता से ही इनकार कर देते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि इस रात को संतुलित और सही दृष्टिकोण के साथ समझा जाए। डॉ. अज़मतुल्ला खान ने कहा कि धार्मिक विद्वानों के अनुसार शब-ए-बरात की एक सीमा तक विशेषता कथनों से सिद्ध होती है। Kairana

    मान्यता है कि इस रात अल्लाह अपनी सृष्टि पर कृपा दृष्टि डालते हैं और अनेक लोगों को क्षमा प्रदान करते हैं, लेकिन अल्लाह के साथ साझेदारी की भावना, आपसी द्वेष और संबंधविच्छेद जैसे कर्मों में लिप्त लोगों को इससे वंचित बताया गया है। इसलिए इस रात की महत्ता से पूर्णतः इंकार करना उचित नहीं माना गया है। विद्वानों का यह भी स्पष्ट मत है कि जिन कार्यों का प्रमाण पैगंबर मुहम्मद (से०) के जीवन से नहीं मिलता, उन्हें अनिवार्य पूजा का रूप देना सही नहीं है। इसी कारण आतिशबाजी, अनावश्यक रोशनी, शोरगुल, विशेष भोजन को जरूरी मानना या इस रात को पूरे वर्ष के भाग्य का अंतिम निर्णय मान लेना अनुचित बताया गया है। कुरआन की सूरह दुखान में वर्णित “बरकत वाली रात” के संबंध में अधिकांश व्याख्याकारों का मत है कि इससे आशय लैलतुल कद्र है, न कि शब-ए-बरात। इसलिए यह धारणा सही नहीं मानी जाती कि इसी रात पूरे वर्ष का भाग्य निर्धारित किया जाता है।

    हालांकि, यह रात आत्मचिंतन, पश्चाताप और अल्लाह की ओर लौटने का अच्छा अवसर अवश्य मानी गई है। शब-ए-बरात की रात कब्रिस्तान जाने के विषय में भी संतुलित राय सामने आई है। कथनों में उल्लेख मिलता है कि पैगंबर मुहम्मद (से०) इस रात जन्नतुल बकी कब्रिस्तान गए थे। इसी आधार पर कब्रिस्तान जाना वैध बताया गया है, लेकिन इसे अनिवार्य समझना, भीड़ एकत्र करना या किसी विशेष विधि को आवश्यक मानना उचित नहीं है। “शब-ए-बरात आत्मसुधार और आत्ममंथन की रात है, न कि शोरगुल और प्रदर्शन की। बाइक पर सवार होकर पटाखे फोड़ना, सड़कों पर हुड़दंग मचाना और दूसरों को परेशान करना न केवल धार्मिक शिक्षाओं के विरुद्ध है, बल्कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है और धर्म की छवि भी प्रभावित होती है। पवित्र अवसर को शांति, संयम और अनुशासन के साथ मनाना चाहिए।

    विद्वानों के अनुसार शब-ए-बरात की वास्तविक भावना शांति के साथ अल्लाह की उपासना, आत्मशुद्धि, पश्चाताप और मन की दुर्भावना को दूर करने में है। यदि कोई व्यक्ति इस रात एकांत में स्वैच्छिक नमाज़ अदा करे, धार्मिक ग्रंथों (कुरआन व हदीस)का पाठ करे और अपने कर्मों पर आत्ममंथन करे, तो यह सराहनीय माना गया है, बशर्ते इसे अनिवार्य न समझा जाए। विद्वानों का कहना है कि शब-ए-बरात न तो उत्सव की रात है और न ही विवाद की। यह अपने भीतर झांकने, अल्लाह से संबंध मजबूत करने और जीवन को सही दिशा देने का अवसर है। संदेश स्पष्ट है, न अति, न अस्वीकार; बल्कि संतुलन, सादगी और सही आचरण। यदि इस रात को शोर के बजाय शांति, दिखावे के बजाय सच्चाई और रस्मों के बजाय आत्मसुधार के साथ बिताया जाए, तो यही शब-ए-बरात की वास्तविक सार्थकता मानी जाएगी। Kairana

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