Success Story: गुब्बारे बेचने से लेकर टायर कंपनी के मालिक बनने तक

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गुब्बारे बेचने से लेकर टायर कंपनी के मालिक बनने तक

Success Story: अक्सर समाचार पत्र में एक बड़ा-सा विज्ञापन होता है कि एक अभूतपूर्व शक्तिशाली व्यक्ति एक मोटे मजबूत टायर को दोनों हाथों पर उठाए दिखाई देता है। यही मप्पिलाई का बनाया हुआ टायर है, जो भारतीय सड़कों को रौंदता चलता है। मप्पिलाई इस बात के जीते-जागते उदाहरण हैं कि यदि व्यक्ति चाहे तो अपनी सूझबूझ, अध्यवसाय और निष्ठा से कुछ भी कर सकता है और श्रेष्ठतम उद्योपतियों की श्रेणी में आ सकता है। Success Story

किसी जमाने में मैम्मेन मप्पिलाई के पिता एक बैंक के साथ-साथ एक अखबार के भी मालिक थे, लेकिन उनकी सारी संपत्ति तत्कालीन त्रावणकोर रियासत ने जब्त कर ली थी। उन्हें गिरफ्तार करके दो साल तक जेल में रखा गया। उस वक्त मैम्मेन मप्पिलाई मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ रहे थे। अपने पिता के बाद मानो मैम्मेन मप्पिलाई के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट गया। ऐसे मुश्किल वक्त में हालात ऐसे हो गए कि उन्हें सेंट थॉमस हॉल के फर्श पर सोना पड़ा। मप्पिलाई ने जैसे-तैसे संघर्ष के साथ अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने गुब्बारे बनाना और बेचना शुरू कर दिया। Success Story

1952 में मप्पिलाई को पता चला कि एक विदेशी कंपनी भारत में एक रिट्रेडिंग प्लांट को ट्रेड रबर की आपूर्ति कर रही है। रिट्रेडिंग का मतलब पुराने टायरों को पुन: नया जैसा बनाना है। मप्पिलाई ने सोचा कि वह भी यह काम कर सकते हैं। इसके बाद मप्पिलाई ने गुब्बारे बेचकर जो भी पैसा कमाया था, उसे इस व्यवसाय में लगा दिया। उन्होंने बिजनेस करने के लिए एक बड़ा जोखिम लिया, लेकिन उन्हें इसमें जबरदस्त सफलता मिली। दिलचस्प बात यह है कि एमआरएफ एकमात्र भारतीय कंपनी थी, जो ट्रेड रबर का निर्माण कर रही थी और उस समय इस क्षेत्र की अन्य सभी कंपनियां विदेशी थीं।

महज चार साल के अंदर एमआरएफ की बाजार हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने इसके चलते भारत छोड़ दिया। मैम्मेन मप्पिलाई यहीं नहीं रुके और उन्होंने टायर निर्माण व्यवसाय में उतरने का फैसला भी किया। 1961 में उन्होंने टायर बनाने के लिए एक फैक्ट्री शुरू की। हालांकि, कंपनी तकनीकी रूप से इतनी मजबूत नहीं थी कि टायर बना सके और इसीलिए एमआरएफ ने अमेरिकी कंपनी मैन्सफील्ड टायर एंड रबर कंपनी के साथ पार्टनरशिप की। इसी साल कंपनी मद्रास स्टॉक एक्सचेंज में अपना आईपीओ भी लेकर आई। 1963 तक एमआरएफ एक जाना-माना नाम बन गया। विज्ञापन के लिए कंपनी ने अन्य तरीकों के अलावा क्रिकेट के बल्ले को भी निशाना बनाया। सचिन तेंदुलकर से लेकर विराट कोहली तक प्रसिद्ध हस्तियां कंपनी की ब्रांड एंबेसडर बन गईं और एमआरएफ धीरे-धीरे लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया। Success Story

आज की तारीख में टायर इंडस्ट्रीज में एमआरएफ एक बड़ा नाम बन चुका है। कंपनी का मार्केट कैप 454.66 बिलियन यानी 45,466 करोड़ रुपए है। एमआरएफ के एक शेयर की कीमत 1,07,384 रुपए है। यह भारतीय शेयर बाजार का संभवत: सबसे महंगा स्टॉक है। 1990 में कंपनी के एक शेयर की कीमत 332 रुपए थी।                                                                                                                        देवेन्द्रराज सुथार,स्वतंत्र एवं युवा लेखक

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