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                <title>Parliamentary - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>भारतीय संसदीय परंपरा को समृद्ध करने वाले सोमनाथ</title>
                                    <description><![CDATA[देश के वामपंथी राजनीति के पुरोधा एवं शिखर स्तंभ सोमनाथ चटर्जी का निधन संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है।13 अगस्त सुबह,कोलकाता के एक अस्पताल में उन्होंने 89 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। उन्होंने संसदीय प्रणाली के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक लोकसभाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया।वे 2004 से 2009 बीच […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/somnath-enriches-indian-parliamentary-tradition/article-5378"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/somnath-enriches.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के वामपंथी राजनीति के पुरोधा एवं शिखर स्तंभ सोमनाथ चटर्जी का निधन संपूर्ण राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है।13 अगस्त सुबह,कोलकाता के एक अस्पताल में उन्होंने 89 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस ली। उन्होंने संसदीय प्रणाली के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक लोकसभाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया।वे 2004 से 2009 बीच लोकसभाध्यक्ष पद पर रहे।इस दौरान उन्होंने “स्पीकर”अर्थात लोकसभाध्यक्ष पद को भी नवीन गरिमाओं से युक्त किया।पेशे से वकील सोमनाथ चटर्जी ने 1968 में राजनीति शुरू की। मात्र 3 साल बाद ही 1971 में लोकसभा के सदस्य बन गये।इस दौरान वे निर्दलीय जीते थे,हालांकि उन्हें सीपीएम का समर्थन प्राप्त था।भारत के संसदीय इतिहास में उन्हें 10 बार सांसद बनने का गौरव हासिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">1971 से शुरू हुई संसदीय पारी 2009 तक चली।इसमें से 1984 अपवाद है,जब उन्हें पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हार का सामना करना पड़ा।वर्ष 2004 में 14 वीं लोकसभा में वे 10 वीं बार निर्वाचित हुए।साल 1989 से 2004 तक वे लोकसभा में सीपीआईएम के नेता भी रहे।उन्होंने 35 सालों तक एक सांसद के रुप में देश की सेवा की।इसके लिए उन्हें साल 1996 में उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से नवाजा गया।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभाध्यक्ष के रूप में एक नए इतिहास का सृजन: 4 जून 2004 को 14 वीं लोकसभा के अध्यक्ष के रुप में श्री सोमनाथ चटर्जी का सर्वसहमति से निर्वाचन से सदन में एक इतिहास रच गया।लोकसभा अध्यक्ष के रुप में सोमनाथ चटर्जी का निर्वाचन प्रस्ताव तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने रखा,जिसे तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अनुमोदित किया।इस लोकसभा के 17 अन्य दलों ने भी सोमनाथ चटर्जी का नाम प्रस्तावित किया,जिसका समर्थन अन्य दलों के नेताओं द्वारा किया गया।इसके बाद वह निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी पैसों से सांसदों के चायपानी पर रोक: बतौर स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने सरकारी पैसों से सांसदों के चाय पानी पर रोक लगा दी थी।सोमनाथ चटर्जी ने ही दबाव डाला था कि अगर कोई सांसद विदेशी दौरे पर जाता है,और उसके साथ उसके परिवार वाले जाते हैं,तो परिवार वालों का खर्चा सांसदों को ही वहन करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पीकर सोमनाथ चटर्जी और संसद तथा न्यायपालिका आमने-सामने: भारत में संसदीय व्यवस्था ब्रिटेन से ग्रहण किया गया है,परंतु भारतीय संसद ब्रिटिश संसद के तरह सर्वशक्तिमान नहीं है।यहाँ स्वतंत्र न्यायपालिका विद्यमान है,परंतु न्यायिक संप्रभुता की भी स्थिति नहीं है।ऐसे में भारतीय संविधान संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता के सिद्धांतों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करता है।यही कारण है कि लोकसभाध्यक्ष के रूप में सोमनाथ चटर्जी ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधायी कार्यों में हस्तक्षेप को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस को भी स्वीकार करने से इंकार कर दिया था।उसी समय जब झारखंड विधानसभा में बहुमत परीक्षण के दौरान सदन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कैमरे लगाने के निर्देश दिए,तब भी सोमनाथ चटर्जी ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया कि न्यायपालिका अपने कार्यक्षेत्र से आगे जाकर विधायी कार्यों में हस्तक्षेप कर रही है।अंतत: उन्होंने विधायी कार्यों में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर देश के सभी विधानसभाध्यक्षों की बैठक भी बुलाई।यही वह समय था,जब संसद और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने थी तथा देश ने “लोकसभाध्यक्ष” को वास्तव में विधायिका के अभिभावक के रूप में भी देखा।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभाध्यक्ष की जिम्मेदारी को सही मायने में दलगत राजनीति से ऊपर रखा: सैंद्धांतिक तौर पर मनमोहन सिंह की अगुवाई में जब भारत सरकार ने अमेरिका से परमाणु समझौता किया ,तो ये वक्त सोमनाथ चटर्जी के जीवन में सियासी उथल पुथल का था।एक तरफ सोमनाथ चटर्जी के ऊपर दलगत राजनीति से तटस्थ होकर लोकसभाध्यक्ष की भूमिका के निर्वहन की जिम्मेदारी थी,तो दूसरी ओर उनकी पार्टी सीपीआई(एम) परमाणु समझौते का विरोध करते हुए सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सोमनाथ चटर्जी से भी लोकसभाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया।लेकिन सोमनाथ चटर्जी ,जो सिद्धांत के पक्के थे,उन्होंने पार्टी जिम्मेदारी की तुलना में संवैधानिक जिम्मेदारी को महत्व दिया तथा स्पीकर पद से इस्तीफा नहीं दिया।22 जुलाई 2008 को विश्वास मत के दौरान किए गए लोकसभा के संचालन के लिए उनको देश के विभिन्न नागरिकों तथा विदेशों से काफी सराहना मिली।लेकिन इस घटनाक्रम से नाराज सीपीईसी(एम) ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।इस घटनाक्रम से दुखी सोमनाथ चटर्जी के आंसुओं को संपूर्ण देश ने लोकसभा में देखा था।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभाध्यक्ष के रुप में अन्य महत्वपूर्ण कार्य: सितंबर 2006 में सोमनाथ चटर्जी को अबुजा,नाइजीरिया में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ का अध्यक्ष चुना गया।उनके नेतृत्व तथा समर्थ दिशा निर्देश में भारत ने सितंबर ,2007 के दौरान नई दिल्ली में 53 वें सीपीए सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेजबानी की,जिसमें 52 देशों को विविध क्षेत्रों में भारत की उपलब्धियों से अवगत कराया। लोकसभाध्यक्ष के रूप में व्यापक मीडिया कवरेज प्रदान करने हेतु सोमनाथ चटर्जी के प्रयासों से ही जुलाई 2006 से 24 घंटे का लोकसभा चैनल शुरू किया गया।उनके लोकसभाध्यक्ष पद पर रहते हुए उनकी पहल पर ही भारत की लोकतांत्रिक विरासत पर अत्याधुनिक संसदीय संग्रहालय की स्थापना की गई।14 अगस्त 2006 को इस संग्रहालय का उदघाटन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया गया।यह संग्रहालय जनता के दर्शन के लिए खुला है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोमनाथ चटर्जी ने कामगार वर्ग तथा वंचित वर्ग के लोगों के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाकर उनके हितों के लिए आवाज बुलंद करने का कोई अवसर नहीं गंवाया।सोमनाथ चटर्जी का वाद-विवाद कौशल ,राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की स्पष्ट समझ,भाषा के ऊपर पकड़ और जिस नम्रता के साथ वो सदन में अपना दृष्टिकोण रखते थे,उसे सुनने के लिए पूरा सदन एकाग्रचित्त होकर सुनता था।सोमनाथ चटर्जी ने भले ही 2009 में सक्रिय राजनीति से अलविदा कह दिया था और 2018 में हम सबों को अलविदा कह दिया,लेकिन उनके वे अमूल्य सिद्धांत सदैव जीवंत रहेंगे,जिन्होंने भारतीय संसदीय परंपरा को कई नवीन आयामों से विभूषित किया।</p>
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                <pubDate>Tue, 14 Aug 2018 10:53:15 +0530</pubDate>
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                <title>निराश करती संसदीय कार्यवाहियां</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/parliamentary-proceedings-disappoints/article-557"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/parliament.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इसी माह देश में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के जन्म दिवस के अवसर पर सुशासन दिवस मनाया जाएगा। चूंकि एक सांसद के रूप में अटल जी का आचरण अविस्मरणीय है लेकिन जिस तरह गत दिनों संसद के शीतकालीन सत्र में जो कुछ हुआ वह अटल जी को जरूर निराश करेगा। गत दिनों शीतकालीन सत्र का समापन हो गया, लेकिन संसद के दोनों सदनों की कार्यवाहियां हंगामें की भेंट चढ़ी, जोकि एक गंभीर चिंता का विषय है।<br />
अगर 16वीं लोकसभा के गठन के बाद से संसद के अभी तक के सभी सत्रों पर नजर डाली जाए, तो यह शीतकालीन सत्र सर्वाधिक निराश करने वाला साबित हुआ। 16 नवम्बर से 16 दिसम्बर तक चलने वाले इस सत्र में लोकसभा ने महज 15 फीसदी तो राज्यसभा ने केवल 18 फीसदी काम किया। संसद की उत्पादकता का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि इस बार केवल 2 विधेयक ही पारित हो सके जबकि 8 विधेयकों को प्रस्तुत किया गया था। संसद ने नोटबंदी से उभरी तमाम समस्यायों पर कोई चर्चा नहीं की, जम्मू-कश्मीर में आये दिन शहीद हो रहे जवानों पर कोई प्रश्न नहीं खड़ा हुआ, यदि हंगामा हुआ तो सिर्फ इस बात को लेकर कि मोदी संसद में क्यों नहीं बोलते और नोटबंदी पर चर्चा नियम 184 के तहत हो या नियम 193 के तहत।<br />
दरअसल नियम 184 के तहत चर्चा के पश्चात मतदान होता है, जिससे सरकार के प्रति संसद का मिजाज स्पष्ट होता है और सरकार को घेरने का मौका भी मिल जाता है जबकि नियम 193 में सिर्फ चर्चा ही होती है मतदान नहीं। चर्चा किस नियम के अंतर्गत हो इस पर अंतिम निर्णय स्पीकर का ही होता है, परन्तु बहुमत के चलते अप्रत्यक्ष रूप से सरकार निर्णय करने में अपनी भूमिका रखती है। संसद के शीतकालीन सत्र में जो भी हुआ उसका जिम्मेदार आखिरकार कौन है? चाहे उंगलियां विपक्ष पर खड़ी हों या सरकार पर लेकिन अंतत: इससे देश की जनता ही प्रभावित होती है. सरकार पर देश चलाने का जिम्मा होता है और विपक्ष पर पहरेदारी का, देश लाइन में लगा है, नोटबंदी से समस्या विकराल होती चली गयी लेकिन सरकार और विपक्ष चर्चा के लिए किसी सर्वमान्य हल पर ही नहीं पहुंच पाए। संसद के इस रवैय्ये से लालकृष्ण अडवानी भी असहमत दिखे और उन्होंने कहा कि यदि आज अटल जी संसद में होते तो वह काफी निराश होते।<br />
दरअसल सवाल यह है कि सत्र-दर-सत्र मजबूत हो रही हंगामे की परिपाटी को कैसे तोड़ा जाए? कैसे संसद को जवाबदेह और किसके लिए जवाबदेह बनाया जाए? संसदीय शासन प्रणाली में सरकार संसद के लिए जवाबदेह होती है, संसद प्रश्न और प्रस्ताव के जरिये उस पर नियंत्रण रखती है लेकिन संसद में विपक्ष और सरकार के अहं का टकराव चरम पर है, जिसका परिणाम सिर्फ और सिर्फ हंगामे के रूप में सामने आता है।<br />
संविधान का अनुच्छेद 122 संसद को न्यायिक समीक्षा से उन्मुक्ति प्रदान करता है। भारत में न्यायिक सक्रियता आज जिस चरम पर है वह कार्यपालिका की निष्क्रियता का ही परिणाम है और अब विधायिका जिस निष्क्रियता पर उतारू है उससे तो यही लगता है कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कहीं न्यायपालिका को संसदीय आचरण पर भी हस्तक्षेप न करना पड़े। क्योंकि यदि संसद में हंगामे की परिपाटी नहीं टूटी तो यह जनतांत्रिक मूल्यों की हत्या होगी और जब संसद ही असंवैधानिक व्यवहार पर उतारू हो जाए तो जनता के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता क्योंकि वह सिर्फ लोकसभा के सदस्यों को चुनने तक ही अपनी भूमिका रखती है। ऐसे में बड़ा सवाल खड़ा होता है कि कैसे इस परिपाटी को बदला जाए।<br />
इस सन्दर्भ में बीजद सांसद बैजयन्त पांडा ने एक आलेख के जरिये संसदीय नियमों में परिवर्तन का सुझाव दिया था। उनके सुझाव बेहद प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। पांडा के अनुसार हमारी संसदीय व्यवस्था में कुछ नियम बहुत ही अस्पष्ट प्रतीत होते हैं। यदि स्पीकर की शक्तियों में वृद्धि कर दी जाए व सांसदों द्वारा हंगामे की स्थिति में दंड सम्बन्धी प्रावधान कठोर किये जाएं, तो हंगामे की परिपाटी को तोड़ा जा सकता है। दरअसल स्पीकर को यह शक्ति स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए कि वह हंगामा करने की स्थिति में किसी सदस्य को अनिश्चित कालीन समय के लिए सदन से निलंबित कर सके। और दंड की यह परिपाटी मजबूत की जाए ताकि सदन में अनुशासन स्थापित किया जा सके।<br />
दरअसल हमारी संसदीय व्यवस्था ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली से प्रभावित है और आज भी हमारी संसद उन संसदीय नियमों का पालन कर रही है जिन्हें खुद ब्रिटेन की संसद समाप्त कर चुकी है। आज नियम 184 के तहत चर्चा को लेकर जो गतिरोध देखने को मिल रहा है, वह नया नहीं हैं पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में भी ऐसा ही गतिरोध पैदा होता था। चूंकि संसद अपनी प्रक्रियायों के लिए नियम स्वयं बनाती है, इसलिए संसदीय नियमावली में संसद को संसोधन करके स्पष्ट करना चाहिए कि किन मामलों में नियम 184 के तहत चर्चा होगी। या ऐसा भी हो सकता है कि यदि 150 सांसद स्पीकर को लिखित रूप में आवेदन करें, तो उसे नियम 184 के तहत चर्चा कराने के लिए बाध्य होना पड़े। यदि 150 सांसदों के आवेदन सम्बन्धी बाध्यता को लागू कर दिया जाता है तो गतिरोध की स्थिति उत्पन्न ही नहीं होगी। और तमाम ऐसी प्रक्रियाएं जो कार्यवाहियों में बाधक बनती हैं उन्हें स्पष्ट करना चाहिए।<br />
संसदीय अनुशासन हीनता जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की छवि खराब करती है वहीं यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक सिद्ध होती है। संसद कानून बनाकर समाज को भिन्न रूपों में प्रभावित करती है। जिसका सकारात्मक प्रभाव देश की जीडीपी पर पड़ता है। दरअसल विधायन प्रक्रिया से समाज का प्रत्येक वर्ग लाभान्वित होता है। सामान्यत: संसद की कार्यवाहियों का मौद्रिक आंकलन ही किया जाता है लेकिन हम कई ऐसे कदमों का आंकलन नहीं कर पाते जो किसी न किसी रूप में देश के लिए लाभकारी सिद्ध होते। गत शीतकालीन सत्र में जो भी हुआ उसे एक चुनौतीपूर्ण स्थिति मानकर सभी दलों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि इस तरह का असंवैधानिक और असंसदीय आचरण लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए बहुत घातक सिद्ध होगा। यह देश के छवि और व्यवस्था दोनों के लिए ही चुनोतिपूर्ण है।<br />
पार्थ उपाध्याय</p>
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                <pubDate>Mon, 19 Dec 2016 00:19:43 +0530</pubDate>
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