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                <title>छोटी सोच के बड़े मसीहा</title>
                                    <description><![CDATA[कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभिन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति, धर्म, स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही हैं, पर कहते हैं न कि ‘हाथी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभिन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति, धर्म, स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही हैं, पर कहते हैं न कि ‘हाथी के दांत दिखाने के कुछ और, खाने के कुछ और ही होते हैं।’ उसी तरह हम पूरी दुनिया को दिखाते कुछ और हैं और वास्तविक सच्चाई कुछ और ही होती है।<br />
हमारे समाज में जाति एंव धर्म के नाम पर बहुत पहले से ही लड़ाईयां होती आ रही हैं और कभी-कभी उम्मीद भी कम ही लगती है कि ये लड़ाई कभी खत्म हो पाएंगी। लेकिन इन सबके बीच भी जो एक बड़ा भेदभाव आज भी दिख रहा है, वे है प्रादेशिक आधार पर किया जाने वाला भेदभाव। समाज का बड़ा और पढ़ा-लिखा तबका आज भी इस भेदभाव को करने में पीछे नहीं है।<br />
पूर्वोत्तर के राज्यों से आने वाले लोगों को समाज में आज भी नेपाली या चीनी कहकर बुलाया जाता है, जबकि उनकी नागरिकता भी इसी देश की होती है और उनकी देशभक्ति भी इसी देश के प्रति ही होती है। देशभक्ति के मामले में तो कई बार इनकी देशभक्ति तथाकथित देशभक्तों से ज्यादा ही देखने को मिल जाती है। पूर्वोत्तर राज्यों पर चीन अपनी नजर गड़ाए किस तरह बैठा रहता है, ये बात किसी से छुपी नहीं है, केन्द्र सरकार की अधिकांश योजनाओं से अछूते रहने वाले ये लोग फिर भी अपने देश के प्रति देशभक्ति रखते, और शायद ही देश की कभी सार्वजनिक रुप से बुराई करते हैं। लेकिन उत्तर भारत समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो राह चलते अपने देश की अन्य देशों से तुलना कर देश की कमियों की बौछार बताने लगता हैं। भेदभाव का सामना सिर्फ पूर्वोत्तर भारत के लोग ही नहीं करते, बल्कि इस भेदभाव का सामना दक्षिण के राज्यों को भी करना पड़ता है और अगर आप बिहार से या बंगाल से हैं, तो कुछ जगह तो बकायदा आपके लिए स्लोगन भी बनाकर रखे जाते हैं, जिसके जरिए आपको नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है।<br />
इस तरह का भेदभाव अगर समाज का अशिक्षित वर्ग करे, तो एकबार को दु:ख भी कम होता है, क्योंकि समझा जा सकता है कि शिक्षा के अभाव में वे ऐसा बोल रहे हैं, लेकिन जब यही भेदभावपूर्ण बातें उच्च शिक्षित और बौद्धिक वर्ग के लोग करते हैं, तो बुरा लगता है। देश का भविष्य कहे जाने वाले युवा भी भेदभाव करने के मामले में पीछे नहीं है, बल्कि वे तो इस मामले में इन तथाकथित बौद्धिक वर्ग से कुछ ज्यादा ही आगे हैं। क्योंकि दोस्तों के बीच होने वाले मजाक और लड़ाई में कई बार ये लोग क्षेत्रीय पहचान को आधार बनाकर एक-दूसरे का मजाक बनाने लगते हैं।<br />
कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि क्षेत्रीय भेदभाव को कम करने का प्रयास किया जा रहा है और ये भी कह दिया जाता है कि ये प्रयास बहुत हद तक सफल भी हुए हैं, लेकिन फिर क्यों हर बार अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर के लोगों को यह कहना पड़ता और साबित करना पड़ता है कि वे नेपाली और चीनी नहीं है। आखिर क्यों हर बार एक बिहारी को संकोच होता है ये बताने में की, वे बिहार से है?<br />
देश भले ही चांद पर पहुंच जाए, लेकिन क्षेत्रीय भेदभाव की सोच अभी तक जमीन से ऊपर उठने का नाम नहीं ले रही। हालांकि समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो भेदभाव से परे समानता का व्यवहार करते हैं। इसीलिए सबको एक ही तराजू में तोलना भी उचित नहीं होगा, लेकिन देश क्या करे, जब भेदभाव करने वालों का पलड़ा, न करने वालों पर भारी पड़ जाए? समाज की इस सोच में एकाएक बदलाव आना सम्भव नहीं है और न ही किसी एक व्यक्ति से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि वह बदलाव ला देगा। इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर पहले अपनी सोच को अगर बदला जाए, तो धीरे-धीरे समाज में भी बदलाव आ ही जाएगा और जब तक समाज में ये व्यापक बदलाव नहीं आता, तब तक देश सही मायनों में पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक नहीं हो पाएगा। <em>सुप्रिया सिंह</em></p>
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                <pubDate>Mon, 19 Dec 2016 00:22:41 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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