<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/messiah/tag-1026" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Messiah - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/1026/rss</link>
                <description>Messiah RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह का राजनीति के विराट संसार में प्रवेश तब हुआ जब मोहनदास करमचंद गांधी ब्रिटिश पंजे से भारत को मुक्त कराने की जंग लड़ रहे थे। 1930 में गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान चरण सिंह ने हिंडन नदी पर नमक बनाकर उनका समर्थन किया। उन्होंने गांधी जी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/farmers-messiah-chaudhary-charan-singh/article-3827"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-05/charan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह का राजनीति के विराट संसार में प्रवेश तब हुआ जब मोहनदास करमचंद गांधी ब्रिटिश पंजे से भारत को मुक्त कराने की जंग लड़ रहे थे। 1930 में गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान चरण सिंह ने हिंडन नदी पर नमक बनाकर उनका समर्थन किया। उन्होंने गांधी जी के साथ जेल की यात्रा की। दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद, हापूड़, मेरठ, मवाना और बुलंदशहर के आसपास क्रांति का बीज रोपा। गुप्त संगठन खड़ा कर ब्रितानी हुकूमत को चुनौती दी।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे खौफजदा ब्रितानी ताकत उन्हें गोली मारने का फरमान सुनाया। लेकिन उनके इंकलाबी तेवर कमजोर नहीं पड़े। उन्होंने भारत माता की सेवा में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का संकल्प ठान लिया। उन्होंने डटकर ब्रितानी हुकुमत की चुनौतियों का आंलिगन किया। जनता के बीच सभा करते हुए एक दिन पकड़ लिए गए। राजबंदी के रुप में डेढ़ वर्ष की सजा हुई। किंतु इस सजा कालखंड का भी उन्होंने सदुपयोग किया। जेल में रहकर ‘शिष्टाचार’ नामक ग्रंथ की रचना की जो भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचार के विविध पहलूओं पर प्रकाश डालती है। चरण सिंह की अंग्रेजी भाषा पर गजब की पकड़ थी। उन्होंने ‘अबॉलिशन आॅफ जमींदारी’ ‘लिजेंड प्रोपराइटरशिप’ और ‘इंडिया पॉवरर्टी एंड इट्स सॉल्यूशन’ नामक पुस्तकों का लेखन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के उपरांत वे किसानों के ताकतवर नेता बनकर उभरे और भारत के किसानों ने उनमें एक मसीहा की छवि देखी। उनकी छवि एक गंवई व्यक्ति की थी जो सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखता था। 1952 में उन्हें डा. संर्पूणानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में राजस्व तथा कृषि विभाग का उत्तरदायित्व संभालने का मौका मिला। इस उत्तरदायित्व का भली प्रकार निर्वहन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके द्वारा तैयार किया जमींदारी उन्मूलन विधेयक कल्याणकारी सिद्धांत की अवधारणा पर आधारित था। इस विधेयक के बदौलत ही 1 जुलाई 1952 को उत्तर प्रदेश में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को उनका अधिकार मिला। लेखपाल पद के सृजन का श्रेय भी चौधरी चरण सिंह को ही जाता है। किसानों के इस मसीहा ने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया। 1960 में भूमि हदबंदी कानून को लागू कराने में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।</p>
<p style="text-align:justify;">आसमान छूती लोकप्रियता के दम पर वे 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने समाज व अर्थव्यवस्था के गुणसूत्र को बदलने का मन बना लिया। उन्होंने किसानों, मजदूरों और हाशिए पर खड़े लोगों की समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण फैसले लिए। कुटीर उद्योग के विकास की नीतियां बनायी। सामाजिक समानता की स्थापना के लिए परंपरागत मूल्यों और मान्यताओं को हथियार बनाने के बजाए उस पर ही हमला बोला।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने एक शासकीय आदेश पारित किया कि ‘जो संस्थाएं किसी जाति विशेष के नाम से चल रही हैं, उनका शासकीय अनुदान बंद कर दिया जाएगा।’ इसका असर यह हुआ कि कॉलेजों के नाम के आगे से जातिसूचक शब्द हटा लिए गए। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से विरोधी उनके खिलाफ मुखर होने लगे। उन पर जातिवादी, दलित और अल्पसंख्यक विरोधी होने के आरोप चस्पा किया जाने लगा। 17 अप्रैल 1968 को वे मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिए लेकिन जनमानस के नायक बने रहे। किसानों में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्यावधि चुनाव में वह ‘किसान राजा’ के नारे के साथ मैदान में उतरे और विरोधियों पर शानदार जीत अर्जित की। 17 फरवरी 1970 को वे पुन: मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कृषि में आमूलचूल परिवर्तन का रोडमैप तैयार किया। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए उर्वरकों से बिक्री कर हटा ली। सीलिंग से प्राप्त भूमि को गरीबों में वितरित किया। उनका मानना था कि ‘गरीबी से बचकर समृद्धि की ओर बढ़ने का एकमात्र मार्ग गांव और खेतों से होकर गुजरता है। गांवों के विकास की चिंता उन्हें बराबर कचोटती थी। इसीलिए उन्होंने आजादी के बाद ही 1949 में गांव और शहर के आधार पर आरक्षण की मांग उठायी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनका कहना था कि चूंकि गांव शिक्षा और आर्थिक तौर पर शहरों से पिछड़े हैं इसलिए गांवों को सेवाओं में 50 फीसद आरक्षण मिलना चाहिए। चरण सिंह अपनी योग्यता और लोकप्रियता के दम पर केंद्र सरकार में गृहमंत्री बने। पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को उनका हक दिलाने के लिए मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वे वित्तमंत्री और उपप्रधानमंत्री बने और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की। 28 जुलाई, 1979 को वे देश के प्रधानमंत्री बने।</p>
<p style="text-align:justify;">तब उन्होंने कहा था कि ‘देश के नेताओं को याद रखना चाहिए कि इससे अधिक देशभक्तिपूर्ण उद्देश्य नहीं हो सकता कि वे यह सुनिश्चित करें कि कोई भी बच्चा भूखे पेट नहीं सोएगा, किसी भी परिवार को अपने अगले दिन की रोटी की चिंता नहीं होगी तथा कुपोषण के कारण किसी भी भारतीय के भविष्य और उसकी क्षमताओं के विकास को अवरुद्ध नहीं होने दिया जाएगा।’ किंतु देश का दुर्भाग्य कि उन्हें यह सपना पूरा करने का मौका नहीं मिला। वह प्रधानमंत्री के पद पर कुछ ही दिन रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">इंदिरा गांधी ने बिना बताए ही उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। दरअसल इसका कारण यह रहा कि इंदिरा गांधी पर जनता पार्टी की सरकार ने कई मुकदमें लगा रखे थे। वह चाहती थी कि चौधरी साहब समर्थन के एवज में उन मुकदमों को हटाने का भरोसा दें। लेकिन चौधरी साहब को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने सौदेबाजी को खूंटी पर टांग प्रधानमंत्री पद को ठोकर लगाना बेहतर समझा।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपनी ईमानदार और सिद्धांतवादी राजनेता की छवि को खंडित नहीं होने दिया। चौधरी साहब देश व समाज के प्रति संवेदनशील थे। उनमें राष्ट्रभक्ति व समाजभक्ति थी। वे एक राजनेता से कहीं ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता थे। देश के राजनीतिक दलों और राजनेताओं को उनके राजनीतिक आदर्शों और जनसरोकारों से सीख लेनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन दुर्भाग्य है कि उनके नाम की माला जपने वाले और उनके बताए रास्ते पर चलने का दंभ भरने वाले उनके द्वारा स्थापित कसौटी पर खरे नहीं हैं। वे चौधरी साहब के आदर्शों की बात तो जरुर करते हैं लेकिन उनके सिद्धांतों को ताक पर रखकर जाति, धर्म अगड़ा-पिछड़ा, सवर्ण-दलित का वितंडा खड़ाकर सत्ता हथियाने का व्यूह रचते हैं। देर-सबेर उन्हें समझना होगा कि वे चौधरी साहब के सपनों के साथ छल कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-अरविंद जयतिलक</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/farmers-messiah-chaudhary-charan-singh/article-3827</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/farmers-messiah-chaudhary-charan-singh/article-3827</guid>
                <pubDate>Tue, 29 May 2018 07:19:21 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-05/charan.jpg"                         length="45710"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छोटी सोच के बड़े मसीहा</title>
                                    <description><![CDATA[कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभिन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति, धर्म, स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही हैं, पर कहते हैं न कि ‘हाथी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभिन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति, धर्म, स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही हैं, पर कहते हैं न कि ‘हाथी के दांत दिखाने के कुछ और, खाने के कुछ और ही होते हैं।’ उसी तरह हम पूरी दुनिया को दिखाते कुछ और हैं और वास्तविक सच्चाई कुछ और ही होती है।<br />
हमारे समाज में जाति एंव धर्म के नाम पर बहुत पहले से ही लड़ाईयां होती आ रही हैं और कभी-कभी उम्मीद भी कम ही लगती है कि ये लड़ाई कभी खत्म हो पाएंगी। लेकिन इन सबके बीच भी जो एक बड़ा भेदभाव आज भी दिख रहा है, वे है प्रादेशिक आधार पर किया जाने वाला भेदभाव। समाज का बड़ा और पढ़ा-लिखा तबका आज भी इस भेदभाव को करने में पीछे नहीं है।<br />
पूर्वोत्तर के राज्यों से आने वाले लोगों को समाज में आज भी नेपाली या चीनी कहकर बुलाया जाता है, जबकि उनकी नागरिकता भी इसी देश की होती है और उनकी देशभक्ति भी इसी देश के प्रति ही होती है। देशभक्ति के मामले में तो कई बार इनकी देशभक्ति तथाकथित देशभक्तों से ज्यादा ही देखने को मिल जाती है। पूर्वोत्तर राज्यों पर चीन अपनी नजर गड़ाए किस तरह बैठा रहता है, ये बात किसी से छुपी नहीं है, केन्द्र सरकार की अधिकांश योजनाओं से अछूते रहने वाले ये लोग फिर भी अपने देश के प्रति देशभक्ति रखते, और शायद ही देश की कभी सार्वजनिक रुप से बुराई करते हैं। लेकिन उत्तर भारत समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो राह चलते अपने देश की अन्य देशों से तुलना कर देश की कमियों की बौछार बताने लगता हैं। भेदभाव का सामना सिर्फ पूर्वोत्तर भारत के लोग ही नहीं करते, बल्कि इस भेदभाव का सामना दक्षिण के राज्यों को भी करना पड़ता है और अगर आप बिहार से या बंगाल से हैं, तो कुछ जगह तो बकायदा आपके लिए स्लोगन भी बनाकर रखे जाते हैं, जिसके जरिए आपको नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है।<br />
इस तरह का भेदभाव अगर समाज का अशिक्षित वर्ग करे, तो एकबार को दु:ख भी कम होता है, क्योंकि समझा जा सकता है कि शिक्षा के अभाव में वे ऐसा बोल रहे हैं, लेकिन जब यही भेदभावपूर्ण बातें उच्च शिक्षित और बौद्धिक वर्ग के लोग करते हैं, तो बुरा लगता है। देश का भविष्य कहे जाने वाले युवा भी भेदभाव करने के मामले में पीछे नहीं है, बल्कि वे तो इस मामले में इन तथाकथित बौद्धिक वर्ग से कुछ ज्यादा ही आगे हैं। क्योंकि दोस्तों के बीच होने वाले मजाक और लड़ाई में कई बार ये लोग क्षेत्रीय पहचान को आधार बनाकर एक-दूसरे का मजाक बनाने लगते हैं।<br />
कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि क्षेत्रीय भेदभाव को कम करने का प्रयास किया जा रहा है और ये भी कह दिया जाता है कि ये प्रयास बहुत हद तक सफल भी हुए हैं, लेकिन फिर क्यों हर बार अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर के लोगों को यह कहना पड़ता और साबित करना पड़ता है कि वे नेपाली और चीनी नहीं है। आखिर क्यों हर बार एक बिहारी को संकोच होता है ये बताने में की, वे बिहार से है?<br />
देश भले ही चांद पर पहुंच जाए, लेकिन क्षेत्रीय भेदभाव की सोच अभी तक जमीन से ऊपर उठने का नाम नहीं ले रही। हालांकि समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो भेदभाव से परे समानता का व्यवहार करते हैं। इसीलिए सबको एक ही तराजू में तोलना भी उचित नहीं होगा, लेकिन देश क्या करे, जब भेदभाव करने वालों का पलड़ा, न करने वालों पर भारी पड़ जाए? समाज की इस सोच में एकाएक बदलाव आना सम्भव नहीं है और न ही किसी एक व्यक्ति से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि वह बदलाव ला देगा। इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर पहले अपनी सोच को अगर बदला जाए, तो धीरे-धीरे समाज में भी बदलाव आ ही जाएगा और जब तक समाज में ये व्यापक बदलाव नहीं आता, तब तक देश सही मायनों में पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक नहीं हो पाएगा। <em>सुप्रिया सिंह</em></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/little-thinking-big-messiah/article-558</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/little-thinking-big-messiah/article-558</guid>
                <pubDate>Mon, 19 Dec 2016 00:22:41 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        