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                <title>statements - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>भड़काऊ बयानबाजी पर चुनाव आयोग ने लिया संज्ञान</title>
                                    <description><![CDATA[ठाकुर ने रिठाला में भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में चुनाव प्रचार के दौरान ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो… को। का नारा लगवाया था।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/election-commission-took-cognizance-of-inflammatory-statements-on/article-12796"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/election-commission-.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">अनुराग और प्रवेश को दिल्ली चुनाव प्रचार पर लगाया प्रतिबंध ( Election Commission )</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> चुनाव आयोग ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता एवं वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर और पश्चिमी दिल्ली से पार्टी के सांसद प्रवेश साहिब सिंह को दिल्ली विधानसभा चुनाव ( Election Commission ) प्रचार के दौरान दिये गये विवादित बयान को देखते हुए भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची से बाहर करने का आदेश है। आयोग का यह आदेश बुधवार को तत्काल प्रभावी हो गया और अगले आदेश तक मान्य रहेगा। ठाकुर ने रिठाला में भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में चुनाव प्रचार के दौरान ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो… को। का नारा लगवाया था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्मा ने नागरिकता संशोधन कानून(सीएए) के विरोध में शाहीन बाग में चल रहे धरना-प्रदर्शन को लेकर विवादित बयान दिया था जिसे लेकर विपक्ष ने कड़ा ऐतराज जताया था। दिल्ली कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की थी।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2020 16:39:21 +0530</pubDate>
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                <title>मंत्री और मंत्रालय के अलग-अलग बयान</title>
                                    <description><![CDATA[नोटबंदी के संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्री के बयान व मंत्रालय की रिपोर्ट अलग-अलग राय पेश कर रहे हैं। विभाग की रिपोर्ट के अनुसार नोटबन्दी के कारण साल 2016-17 में किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, जिस कारण किसान बीज नहीं खरीद सके और नोटबन्दी किसानों को बर्बाद कर गई। दूसरी तरफ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/minister-and-ministers-separate-statements/article-6679"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/m.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नोटबंदी के संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्री के बयान व मंत्रालय की रिपोर्ट अलग-अलग राय पेश कर रहे हैं। विभाग की रिपोर्ट के अनुसार नोटबन्दी के कारण साल 2016-17 में किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, जिस कारण किसान बीज नहीं खरीद सके और नोटबन्दी किसानों को बर्बाद कर गई। दूसरी तरफ मंत्री राधा मोहन सिंह ट्वीट कर दावा कर रहे हैं कि 2015-16 के मुकाबले नोटबन्दी वाले साल खाद व बीज की बिक्री ज्यादा हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">नोटबन्दी दोषपूर्ण थी या नहीं लेकिन व्यवस्था की एक बड़ी कमी जरूर सामने आई है कि आखिर मंत्री व विभाग एकजुट क्यों नहीं। इस बात को हर कोई जानता है और यह ट्रेंड बन गया है कि कोई भी मंत्री अपने विभाग की जीरो उपलब्धि को भी हीरो बनाकर पेश करता है। इसी पैंतरेबाजी में मंत्री राधा मोहन सिंह भी ‘छक्का’ लगा गए हैं लेकिन उन्होंने तकनीकी गलती यह कर दी कि वह मंत्रालय की रिपोर्ट में किसी गलती का जिक्र नहीं कर सके। इसीलिए आम आदमी दुविधा में पड़ गया कि मंत्री या मंत्रालय में से सही कौन है?</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि प्रधान देश के कृषि मंत्री या मंत्रालय द्वारा की गई गलती किसानों व देश के साथ बेइन्साफी है। मंत्री या मंत्रालय को अपना पक्ष रखने के लिए जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए था जहां तक नोटबन्दी से हुए नफे-नुक्सान का संबंध है यदि कांग्रेस के विरोध को छोड़ भी दें तो कोई भी प्रसिद्ध अर्थशास्त्री यह नहीं कह रहा कि नोटबन्दी से देश को कोई फायदा हुआ है। नि:संदेह नोटबन्दी सैद्धांतिक तौर पर सरकार का अच्छा निर्णय हो सकता है और आम जनता ने इस संबंध में बैंकों की कतारों में खड़े होकर सहयोग भी दिया था</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन नोटबन्दी का कोई फायदा नहीं दिखा। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन सहित कई बड़े अर्थशास्त्री भी नोटबन्दी के लिए उस वक्त को उपयुक्त नहीं मान रहे हैं और अब तो बैंक अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि नोटबन्दी का फैसला लम्बी-चौड़ी बैठकें करने की बजाय जल्दबाजी में लिया गया था इसीलिए केंद्रीय कृषि मंत्री नोटबन्दी को हर हाल में सरकार की उपलब्धि बताने की बजाय पहले मंत्रालय की रिपोर्ट का अध्ययन करें। यूं भी सरकार यह सिद्ध करने में कामयाब नहीं हो सकी कि नोटबन्दी कृषि के लिए वरदान थी? क्योंकि नोटबन्दी के बाद किसानों की आत्महत्याएं बडेÞ स्तर पर जारी हैं।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Nov 2018 11:04:22 +0530</pubDate>
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                <title>विवादित व घटिया बयानों की राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[देश में भड़काऊ एवं बिना सोच समझकर दिए बयानों से देश में अराजकता का माहौल निर्मित होता है। गत दिवस अमृतसर में निरंकारी भवन पर हुए हमले के बाद दुख व्यक्त करने की बजाए आम आदमी पार्टी के नेता व विधायक एचएस फूलकां ने बिना प्रमाण के घटना के पीछे आर्मी चीफ विपीन रावत का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/politics-of-disputed-and-defamatory-statements/article-6667"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/aap-mla.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में भड़काऊ एवं बिना सोच समझकर दिए बयानों से देश में अराजकता का माहौल निर्मित होता है। गत दिवस अमृतसर में निरंकारी भवन पर हुए हमले के बाद दुख व्यक्त करने की बजाए आम आदमी पार्टी के नेता व विधायक एचएस फूलकां ने बिना प्रमाण के घटना के पीछे आर्मी चीफ विपीन रावत का हाथ होने का बयान देकर राजनीति करनी शुरू कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले भी जब जस्टिस रंजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट तैयार हो रही थी, तो बेअदबी कांड के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने पर उन्होंने इस्तीफा देने की बात कही थी, जिसके बाद वह फिर मुकर गए थे। इसके अलावा बलजीत दादूवाल नाम का सिख धर्म का कथित प्रचारक बात-बात पर डेरा सच्चा सौदा का नाम उछाल देता है, जिसका उद्देश्य भी सिख भावनाओं को भड़काकर चंदा बटोरना व सुर्खियां बटोरना मात्र है। जो भी ऐसे बयान देकर देश की एकता एवं अखंडता को खंडित करते हैं, उनकी आलोचना एवं निन्दा होना जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या नेताओं की जुबान अनजाने में फिसलती है या फिर जानबूझ कर जुबान फिसलाई जाती है। मानना है, नेताओं की जुबान फिसलना जिसे हम लोग विवादित बयान भी कहते हैं, वह जुबान जानबूझकर, चर्चा में रहने और लोगों का ध्यान आकर्षित कर खुद को टीआरपी बढ़ाने का खेल होता है। यह देखना जरूरी है कि जुबान किस नेता की फिसली है और किस मुद्दे पर फिसली है। बयान को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर रातोंरात अनजाने से नेता को भी देश की जनता जान जाती है। या जाने-पहचाने नेता का कद और बढ़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबे समय से देखा जाता रहा है, नेताओं और पार्टियों के नारे भी कम विवादित नहीं रहे हैं। अब वे चाहे तिलक-तराजू हो या फिर मंदिर वहीं बनाएंगे या फिर हवा-हवाई अच्छे दिन के नारे या जुमले हों। अब बात श्मशान से लेकर कब्रिस्तान पर आ गई है। हिन्दुस्तान की बात नहीं होती, राष्ट्रीयता की बात नहीं होती, ईमान, इंसानियत और इंसान की बात नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">गाय हो या राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान या राष्ट्र-चरित्र ये देश को जोड़ने के माध्यम हैं, इन्हें हिन्दुस्तान को बांटने का जरिया न बनाएं। ये सभी राजनय कर सकते हैं और उसके लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उनका लक्ष्य वोट है। सस्ती लोकप्रियता है। चुनावी बिसात बिछते ही या फिर वर्तमान राजनीति में जिस प्रकार से भाषा की मयार्दा टूट रही है और हमारे राजनेताओं का जो आचरण सामने आ रहा है, उसे कहीं से भी सभ्य समाज या युवा पीढ़ी के लिए आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता।</p>
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                <pubDate>Tue, 20 Nov 2018 09:08:56 +0530</pubDate>
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