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                <title>Elders - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>कोरोना ने बुजुर्गों को दिए गहरे जख्म : अपने छोड़ गए और बहू-बेटों का भी सहा सितम</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। कोरोना सर्वाधिक दंश बुजुर्गों ने झेला। ये दावा किया है एक रिपोर्ट में। जिसके मुताबिक कोविड-19 के कारण लगभग 20.8 प्रतिशत वृद्धों ने अपने परिवार के सदस्यों या मित्रों को खोया है। उनमें से ज्यादातर मानते हैं कि यदि बेहतर चिकित्सा और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा मजबूत होता तो उनके अपनों की जान बच […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/corona-gave-most-sorrow-to-elders/article-24466"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-06/elders.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> कोरोना सर्वाधिक दंश बुजुर्गों ने झेला। ये दावा किया है एक रिपोर्ट में। जिसके मुताबिक कोविड-19 के कारण लगभग 20.8 प्रतिशत वृद्धों ने अपने परिवार के सदस्यों या मित्रों को खोया है। उनमें से ज्यादातर मानते हैं कि यदि बेहतर चिकित्सा और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा मजबूत होता तो उनके अपनों की जान बच सकती थी। देशभर में 3,526 बुजुर्गों पर सर्वेक्षण के बाद ये रिपोर्ट तैयार की गई थी।</p>
<h4><strong>3,526 लोगों पर किया सर्वेक्षण </strong></h4>
<p style="text-align:justify;">‘हेल्पएज इंडिया’ ने छह शहरों के सर्वेक्षण ‘‘द साइलेंट टारमेंटर : कोविड-19 एंड द एल्डरली’’ के नतीजों को जारी किया। दरअसल मुंबई दिल्ली, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता में 3,526 लोगों पर सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण में शामिल 20.8% लोगों ने या तो अपने परिवार के सदस्यों या दोस्तों को कोविड संक्रमण के चलते खो दिया। जब इन लोगों से पूछा गया कि मरने वालों को बचाने के लिए और क्या किया जा सकता था, 50.8% ने बेहतर चिकित्सा और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को, 44.4 फीसद ने टीकों की उपलब्धता और 38.7 फीसद ने समय पर दवाएं और टीके की उपलब्धता के बारे में कहा।</p>
<p style="text-align:justify;">लगभग 42.1 फीसद लोगों को कोरोना से संक्रमित होने पर अस्पताल में भर्ती होने की सबसे अधिक चिंता थी। 34.2 फीसद लोग अकेलापन होने से चिंतित थे। एक और बड़ी चिंता इन बुजुर्गों की दूसरों पर बढ़ती वित्तीय निर्भरता थी। सर्वेक्षण में शामिल 41.1% लोग अपने परिवार के सदस्यों पर निर्भर थे।</p>
<h4><strong>आय को बेहद किया प्रभावित </strong></h4>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में सामने आया कि 52.2 फीसद बुजुर्गों ने कहा कि कोविड ने बुजुर्गों की आय को बेहद प्रभावित किया। नौकरी छूटना (34.9%) और परिवार के सदस्यों के वेतन में कटौती (30.2%) इसके मुख्य कारण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वृद्धों के लिए महामारी के दौरान अपना स्वास्थ्य ठीक रखना मुश्किल हो गया। इनमें से 52.4% जोड़ों के दर्द से पीड़ित थे जबकि 44.9% को चलने में परेशानी थी, 24.4% की आँखों में दिक्कत थी और 13.8% की यादाश्त कमजोर थी या कॉन्संट्रेशन की कमी से जूझ रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में ये भी पता चला कि 58.2% वृद्धों को पता था कि एक टीका विकसित किया गया है जबकि 41.8% इससे पूरी तरह अनभिज्ञ थे। जागरूक लोगों में से 78.7% वृद्धों ने महसूस किया कि टीकाकरण वास्तव में महत्वपूर्ण था। इसमें पता चला कि 66.6% को कोविड के टीके की कम से कम एक खुराक मिली थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लगभग 43.1% वृद्धों ने कहा कि समाज में वृद्धों के साथ दु‌र्व्यवहार हो रहा है। 15.6% ने कहा कि वे दु‌र्व्यवहार के शिकार हुए। 62.1% ने महसूस किया कि कोरोना के दौरान, दु‌र्व्यवहार का खतरा बढ़ गया है। इस दौरान एक चिंताजनक पहले ये भी देखने को मिला कि दु‌र्व्यवहार करने वाले बेटे (43.8%) और पुत्रवधू (27.8%) थी, जबकि 14.2% ने कहा कि उनकी बेटियों ने उनसे दुर्व्यवहार किया।</p>
<p style="text-align:justify;">मिशन हेड-एजकेयर, हेल्पएज इंडिया के डॉ. इम्तियाज अहमद ने बताया कि हमें कोरोना की दूसरी लहर में बुजुर्गों से दुर्व्यवहार, मारपीट और विवादों से जुड़ी हमारी एल्डर हेल्पलाइन पर 1,000 से ज्यादा काल आर्इं, जो पहली लहर के मुकाबले 18 फीसदी ज्यादा है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Jun 2021 09:56:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्यार और सम्मान के हकदार हैं बुजुर्ग</title>
                                    <description><![CDATA[बुजुर्गों के प्रति बढ़ते दुर्व्यवहार व अन्याय के प्रति लोगों को जागरुक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस का आयोजन किया जाता है। 14 दिसंबर 1990 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह निर्णय लिया था कि प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को बुजुर्गों के सम्मान तथा उनकी सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/elders-are-entitled-to-love-and-respect/article-10555"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-09/elders.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बुजुर्गों के प्रति बढ़ते दुर्व्यवहार व अन्याय के प्रति लोगों को जागरुक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस का आयोजन किया जाता है। 14 दिसंबर 1990 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह निर्णय लिया था कि प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को बुजुर्गों के सम्मान तथा उनकी सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस का आयोजन किया जाए। सर्वप्रथम 1 अक्टूबर 1991 को इस दिवस का आयोजन किया गया, तत्पश्चात पिछले 28 सालों से यह दिवस विश्व के अनेक देशों में आयोजित किया जाता है। इस दिवस के आयोजन का एकमात्र लक्ष्य यह है कि लोगों को बड़े-बुजुर्गों के आदर और देखभाल के लिए प्रेरित किया जाए।।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में औद्योगीकरण और नगरीकरण के विस्तार के साथ परिवार के मूल स्वरुप में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं। वहीं, बदलते सामाजिक परिवेश में संयुक्त परिवारों का विखंडन बड़ी तेजी से एकल परिवार के रुप में हुआ है। अब गिने-चुने परिवारों में ही संयुक्त परिवार की अवधारणा देखने को मिलती है। शहरों में एकल परिवार का ही बोलबाला है, जबकि सामाजीकरण की इस प्रक्रिया से अब गांव भी अछूते नहीं रहे। हालांकि, विघटित संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था के एकल स्वरुप ने आधुनिक और परंपरागत;दोनों पीढ़ियों को समान रुप से प्रभावित किया है। एक तरफ जहां, आज की कथित आधुनिक पीढ़ी परंपरागत पालन-पोषण, बुजुर्ग सदस्यों के प्यार-दुलार तथा सामाजिक मूल्यों-संस्कारों से दूर होती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ एकल परिवारिक व्यवस्था ने बुजुर्गों को एकाकी जीवन जीने को विवश किया है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>तिरस्कृत जीवन बिता रहे बुजुर्ग :</strong> देश में बुजुर्गों का एक बड़ा तबका या तो अपने घरों में तिरस्कृत व उपेक्षित जीवन जी रहा है या वृद्धाश्रमों में अपनी शेष जिंदगी बेबसी के साये में बिताने को मजबूर है। इस बीच, समाज में बुजुर्गों पर होने वाले मानसिक और शारीरिक अत्याचार के बढ़ते मामलों की तेजी ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। परिजनों से लगातार मिलती उपेक्षा, निरादर भाव तथा सौतेले व्यवहार ने वृद्धों को काफी कमजोर किया है। बुजुर्ग जिस सम्मान के हकदार हैं, वह उन्हें नसीब नहीं हो पा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही उनकी पीड़ा की मूल वजह है। दरअसल, देश में जन्म दर में कमी आने तथा जीवन-प्रत्याशा में वृद्धि की वजह से देश में वृद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन दूसरी तरफ गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा व समुचित देखभाल के अभाव तथा परिजनों के दुत्कार की वजह से देश में बुजुर्गों की स्थिति बेहद दयनीय हो गई है। भारत इस वक्त दुनिया का सबसे युवा देश है। देश में युवाओं की तादाद 65 फीसद है। लेकिन, बीते दिनों अमेरिका के ‘जनसंख्या संदर्भ ब्यूरो’ द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2050 तक आज का युवा भारत तब ‘बूढ़ा’ हो जाएगा। उस समय देश में पैंसठ साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 3 गुणी तक बढ़ जाएगी। सवाल यह है कि क्या तब हम अपनी ‘वृद्ध जनसंख्या’ की समुचित देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था कर पाएंगे?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सहनी पड़ती हैं यातनाएं:</strong> चैरीटेबल संस्था ‘हैल्पएज इंडिया’ द्वारा कुछ समय पहले देश के 23 शहरों में कराए गए सर्वेक्षण के बाद जो नतीजे सामने आए हैं, वे भी चौंकाने वाले हैं। शोध के मुताबिक, भारतीय घरों में कई तरीकों से बुजुर्गों को प्रताड़ित किया जा रहा है। इनमें परिजनों द्वारा अपमान, गाली-गलौच, उपेक्षा, आर्थिक शोषण तथा शारीरिक उत्पीड़न जैसे अमानवीय तरीके प्रमुखता से शामिल हैं। यह सब देखकर लगता है कि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिहाज से भारतीय समाज दिन-ब-दिन असंवेदनशील होता जा रहा है। रिपोर्ट में यह बात भी उभरकर सामने आई है कि सताए गए 82 फीसदी बुजुर्ग अपने साथ हुए बुरे बर्ताव की शिकायत दर्ज ही नहीं कराते हैं। वे इन मामलों को पारिवारिक मानकर छोड़ देते हैं या भविष्य की असुरक्षा को सोचकर भूल जाना पसंद करते हैं। हालांकि, जिस गति से देश में बुजुर्गों के मान-सम्मान में कमी आई है, वह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के अवमूल्यन को परिलक्षित करती है!</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बड़ों के महत्व से अंजान वर्तमान पीढ़ी</strong>: भारतीय संस्कृति में बड़ों का सम्मान और आदर करना आदर्श संस्कार रहा है, लेकिन उपभोक्तावाद, भौतिकवाद और पाश्चात्य संस्कृति को आत्मसात करने में हम इतने मशगूल हैं कि हमें ‘अपनों’ की फिक्र ही नहीं है। आज हम उन्हीं को सम्मान दे रहे हैं, जिससे हमें कुछ लाभ की उम्मीद होती है। जबकि घर के सदस्यों का सम्मान लाभ-हानि के सिद्धांत से परे है। बुजुर्ग भले ही आर्थिक रुप से अनुत्पादक होते हैं, किंतु परिवार को उचित दिशा दिखाने में उनकी महत्ती भूमिका होती है। कुछ दशक पूर्व तक घर के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा बच्चों को सुनाई जाने वाली पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियां तथा जातक कथाएं बच्चों को मनोरंजन कराने के साथ ही, उन्हें समझदार और संस्कारी बनाने में मदद करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">बचपन में बच्चों को मिले सामाजिक आदर्श, मूल्य व नैतिकता से ही सभ्य समाज के निर्माण पर बल मिलता था। लेकिन, आज परिस्थितियां बदल गयी हैं। विडंबना है कि जब बच्चे को दादा-दादी की गोद की जरुरत होती है, तब वे शहर के किसी ‘किड्स प्ले स्कूल’ में रो रहे होते हैं। बच्चे कुछ और बड़े होते हैं तो, उन्हें दादी-नानी से कहानियां सुनने के अवसर देने के बजाय उसके हाथों में अभिभावकों द्वारा वीडियो गेम, मोबाइल फोन आदि थमा दिए जाते हैं। नयी पीढ़ी का परंपरा, संस्कार व सामाजिक मूल्यों से दूर होने का एक बड़ा कारण बुजुर्गों की अवहेलना है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कानून की जरूरत क्यों :</strong> भारत में वृद्धों की सेवा और उनकी रक्षा के लिए कई कानून और नियम बनाए गए हैं। केंद्र सरकार ने भारत में वरिष्ठ नागरिकों के आरोग्यता और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1999 में वृद्ध सदस्यों के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार की है। इस नीति का उद्देश्य व्यक्तियों को स्वयं के लिए तथा उनके पति या पत्नी के बुढ़ापे के लिए व्यवस्था करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसमें परिवारों को अपने परिवार के वृद्ध सदस्यों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित करने का भी प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही, 2007 में ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक’ संसद में पारित किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है। हमारा समाज किस दिशा की ओर जा रहा है, विचार करने की जरुरत है, क्योंकि इससे दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि नैतिक जिम्मेदारी समझने की बजाय बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा के लिए हमें कानून बनाने पड़ रहे हैं!घर के बुजुर्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी महज सरकारी दायित्व मानकर अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना अनुचित है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>समझनी होगी जिम्मेदारी</strong> : बुजुर्गावस्था, मानव जीवन की संवेदनशील अवस्था है। बुजुर्ग, प्यार और सम्मान के मोहताज होते हैं। बुजुर्गों की भावनाओं का सम्मान करना परिजनों का दायित्व है। आखिर हमें भी कभी उम्र की उस दहलीज पर कदम रखना है, लिहाजा इस दर्द को हमें समझना होगा। बुजुर्गों को समय पर भोजन, दवा, शौच सुविधाएं तथा कुछ पल घर के सदस्य उनके साथ समय गुजारने को मिलें, तो प्यार व सम्मान के भूखे बुजुर्गों की पीड़ा को निश्चित रुप से कम किया जा सकता है। बढ़ती उम्र के साथ, जब तमाम तरह के रोगों से शरीर जीर्ण होने लगता है तथा शारीरिक और मानसिक थकान जीवनशैली पर हावी हो जाती है, तब वारिसों का उनके प्रति असहयोग व अनादर की भावना कितना उचित है? यह सोचने की जरुरत है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>सुधीर कुमार</em></strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Sep 2019 21:13:38 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>लोकतंत्र सिर्फ बड़ों का खेल नहीं है</title>
                                    <description><![CDATA[लोकतंत्र (Democracy is not just a game of elders) का मतलब केवल चुनाव सरकार के गठन या शासन से नहीं है लोकतंत्र की परिभाषा इससे व्यापक है जिसमें राज्य समाज और परिवार सहित हर प्रकार के समूह पर सामूहिक निर्णय का सिद्धांत लागू होता है। केवल राज्य के स्तर पर लोकतंत्र के लागू होने से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/democracy-is-not-just-a-game-of-elders/article-6861"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/vote-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लोकतंत्र<strong> (Democracy is not just a game of elders)</strong> का मतलब केवल चुनाव सरकार के गठन या शासन से नहीं है लोकतंत्र की परिभाषा इससे व्यापक है जिसमें राज्य समाज और परिवार सहित हर प्रकार के समूह पर सामूहिक निर्णय का सिद्धांत लागू होता है। केवल राज्य के स्तर पर लोकतंत्र के लागू होने से हम लोकतान्त्रिक नहीं हो जायेंगें इसे सामाज के अन्य संगठनों पर लागू करना भी उतना ही जरूरी है। इस सम्बन्ध में डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी चेताया था कि भारत सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र न रहे बल्कि यह सामाजिक लोकतंत्र का भी विकास करे। सहभागिता लोकतंत्र का मूल तत्त्व है लेकिन हमारे यहां इसे मतदान तक ही सीमित कर दिया गया है, चुनाव के दौरान हम अपने प्रतिनिधियों को चुनते तो हैं लेकिन इसके बाद अपना नियंत्रण खो देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां चुनाव और मतदान का आधार भी लोगों के वास्तविक जीवन से जुड़े मुद्दे नहीं होते हैं बल्कि यहां मुख्य रूप से ऐसे भावनात्मक और प्रतिगामी मुद्दे हावी होते हैं जिनका लोकतान्त्रिक मूल्यों से कोई मेल नहीं होता अलबत्ता कई मामलों में तो ये न्याय समानता और बंधुत्व जैसे हमारे संविधान के बुनियादी मूल्यों की धजियां उड़ाते दिखाई पड़ते हैं। शायद लोकतंत्र कि अपनी इसी समझ के कारण हम इसे बच्चों का खेल नहीं समझते हैं। भारतीय संविधान सभी बच्चों को कुछ खास अधिकार प्रदान करता है जिसके तहत बच्चों को सही ढंग से पालन पोषण आजादी इज्जत के साथ बराबरी अवसर व सुविधाएं पाने का अधिकार है। हालांकि 18 साल की उम्र से पहले वे वोट नहीं डाल सकते हैं लेकिन इससे एक नागरिक के तौर पर उनकी महत्वता कम नहीं हो जाती है हमारा संविधान बच्चों को वे सारे अधिकार भी देता है जो भारत का नागरिक होने के नाते किसी भी बालिग स्त्री पुरुष को दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समाज के तौर पर हमारे बीच यह समझ जरूरी है कि हम बच्चों को भी एक ऐसी स्वंतंत्र इकाई के तौर पर स्वीकार करें जिनकी खुद सोच सकते हैं उनकी अपनी एक राय हो सकती है वे निर्णय भी ले सकते हैं और किसी भी विषय पर अपनी उम्र के हिसाब से उनका अपना स्वतंत्र मूल्यांकन भी हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कनवेंशन सीआरसी में भी बच्चे की सोच का सम्मान करने और उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने की बात की गयी है। लेकिन दुर्भाग्य से हम बच्चों के सोचने विचारने और उनकी खुद को अभिव्यक्त करने कि उनकी क्षमता को लेकर हम जागरूक नहीं हैं इसके बदले हम इस बात पर यकीन करते हैं कि बच्चों में इतनी क्षमता नहीं होती है कि वे अपने बारे में सोच सकें या खुद की राय बना सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">हम चाहते हैं कि बच्चे हमारे द्वारा निर्धारित किये गये सांचे के अनुसार ढल जायें, परिवार और समाज में उनकी अभियक्ति को लेकर हम निरंकुश हैं और कभी कभी इससे असुरक्षित भी महसूस करते हैं। जबकि हकीकत ये है कि हर बच्चे का अपना एक खास व्यक्तित्व होता है और कई बार उनकी मौलिकता हमें एक नयी दिशा दे सकती है। यदि हम बच्चों के विचरों नजरिये और मैलिकता पर यकीन करेंगें तो इससे हमारी दुनिया ज्यादा बेहतर होगी। बच्चे को हमेशा से ही बड़ों का आदर करने कि सीख दी जाती है लेकिन इस सीख को रिवर्स करके बड़ों को इसे खुद पर भी लागू करने कि जरूरत है बड़ो को भी बच्चों के साथ उतने ही आदर सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिये जितना कि वे खुद के लिये बच्चों से उम्मीद करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बाल सहभागिता का अर्थ है बच्चों से सम्बंधित मसलों और निर्।ायों में बच्चों को शामिल करना यह एक प्रक्रिया है जिसमें बच्चों को जरूरी जानकारी देनाए उनके विचारों को अहमियत देना उन्हें इसे व्यक्त करने का मौका देनाए उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुननाए और उन्हें प्रभावित करने वाले निर्णयों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल करना है। दुर्भाग्य से हमारे समाज में बच्चों की सोच के लिये कोई मूल्य है इसलिये हमारे जैसे देशों में बाल सहभागिता को लेकर लोगों की सोच में बदलाव से करने की जरूरत है जिससे यह कवायद महज महज दिखावटी और कागजी बनकर ना रह जाये।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें यह समझना होगा कि अगर बच्चों को मौका मिले तो वे खुद को अपनी पूरी स्वाभिकता और सरलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। उनकी यह मौलाकिता बहुमूल्य है जो हमारी इस दुनिया को और खूबसरत बना सकती है। बच्चे भले ही वोटर ना हों लेकिन वे इस मुल्क के वर्तमान बाशिंदे जरूर हैं उन्हें इसी नजरिये से देखने की जरूरत है। लोकतंत्र को लेकर हम बड़ों की समझ भले ही ही सीमित हो लेकिन वास्तव में इसका दायरा इतना व्यापक है कि इसमें इसमें परिवार स्कूल बच्चे और समाज के सभी संगठन शामिल है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>जावेद अनीस</strong></p>
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                <pubDate>Sat, 08 Dec 2018 08:27:23 +0530</pubDate>
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