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                <title>farming - Sach Kahoon Hindi</title>
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                            <item>
                <title>Organic Farming : प्रकृति संतुलन का आधार- जैविक खेती</title>
                                    <description><![CDATA[Organic Farming जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/organic-farming-is-the-basis-of-nature-balance/article-59028"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/organic-farming.jpeg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>Organic Farming</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना गया है। मिट्टी में असंख्य लाभदायक जीव रहते हैं जो एक-दूसरे के पूरक होते हैं तथा पौधों की वृद्धि हेतु पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। अत: इस पद्धति में मिट्टी को स्वस्थ एवं जीवित रखते हुए प्रकृति में उपलब्ध अन्य मित्र जीवों के मध्य तालमेल रखकर खेती करनी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए खेत की आवश्यकतानुसार जुताई की जाये क्योंकि अधिक जुताई भी लाभदायक जीवों को नष्ट कर देती है। अच्छी फसल के लिए मिट्टी का स्वस्थ रहना आवश्यक है। मिट्टी की स्वस्थता से मतलब है कि उसमें जितने अधिक जीवाणु होंगे, वह मिट्टी उतनी ही स्वस्थ मानी जावेगी। ये जीवाणु फसल के अवशेष जैसे जड़, डंठल, पत्तियां, कचरे को सड़ा-गलाकर झूमस में परिवर्तित करते हैं और मिट्टी में खनिज को भी घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर फसल को उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ इन जीवों को सड़ने-गलने से भी मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। कृषि का आधार जीवांश है। जीवांश से भूमि जीवित रहती है। जीवांश से भूमि पर विपरीत असर डालने वाले कारक विघटित हो जाते हैं। वे पौधों एवं जीवों के लिए पर्याप्त मुख्य एवं अल्प पोषण तत्व उपलब्ध कराते हैं। भू-क्षरण का बचाव करते हैं, इससे जल के रिसाव व संवर्धन की क्षमता में वृद्धि होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">रासायनिक खेती के कारण अनेक स्थानों पर मिट्टी की गुणवत्ता व सजीवता तथा सूक्ष्म जीवों की संख्या में कमी आ रही है तथा भुरभुरी मिट्टी का भयावह रूप से क्षरण हुआ है। हरित क्रांति के दौरान भारत वर्ष में कृषि का विकास बहुत तेजी से हुआ है और हमारे देश के खाद्यान्नों के उत्पादन में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। आज की खेती मुख्यत: रासायनिक खादों पर ही निर्भर रहने लगी है। आधुनिक खेती से हमारी कृषि योग्य भूमि में अब अन्य तत्वों की कमी के साथ-साथ मृदा संरचना एवं स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। कृषि भूमि की उत्पादन क्षमता एवं स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों का प्रयोग भी संतुलित रूप में करने की अत्यंत आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तरल जैविक उर्वरक लाभकारी जीवाणुओं के वह उत्पाद हैं, जो लम्बी अवधि तक सक्रिय रहकर मिट्टी व हवा से मुख्यत: सूक्ष्म तत्वों का दोहन कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। प्राकृतिक संतुलन कायम रखती है जैविक खेती जिसका आधार जीवांश है। जीवांश को जलाकर नष्ट नहीं करें अन्यथा उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। प्राचीन समय में भारत की कृषि की गौरवशाली उपलब्धियों में गोवंश की अहम भूमिका रही है। पशुधन अर्थ तंत्र की धुरी थी वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है व साथ में पर्यावरण सुरक्षित रखने में सक्षम भी है। ग्रीनपीस के सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 98 प्रतिशत कृषक जैविक खाद का उपयोग करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवंश के अतिरिक्त पेड़-पौधों, पक्षी, मेंढक, उल्लू, केंचुए आदि प्राकृतिक संतुलन के साथ उत्पादन स्तर उच्च स्तर पर रखने में सहायक होेते हैं। इस धरती को लाखों पौधों की जातियो ंने संवारा है। मानव सभ्यता के इतिहास में केवल सात हजार जातियों का ही भोजन के रूप में प्रयोग होने का उल्लेख मिलता है। जिनमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, आलू सोयाबीन, गन्ना आदि प्रमुख हैं। इन प्रमुख जातियों के अतिरिक्त पौधों की अन्य जंगली किस्में भी हैं। जिन्हें विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषत: प्रगतिशील देशों में प्रयोग में लाया जाता है। इन सब पादप जन्य द्रव्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भोजन, चारा, रेशा, र्इंधन आदि की आवश्यकता मानव उपयोग के लिए सदैव बनी रहेगी। उक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए जैविक खेती प्रकृति संतुलन का आधार है। अत: हर व्यक्ति पर्यावरण प्रहरी बने।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Jun 2024 11:23:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Slehri Medicine : सलेहरी औषधि की खुशबू से महक उठी लाडवा मंडी</title>
                                    <description><![CDATA[देशी दवाइयां बनाने में होता है इसका प्रयोग || Slehri Medicine रामगोपाल, लाडवा। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी लाडवा अनाजमंडी आजकल सलैहरी औषधि (Slehri Medicine) की खुशबू से महकी हुई है। हरियाणा और पंजाब की सीमा कैथल और पटियाला के किसानों द्वारा इस औषधि की फसल तैयार की जाती है। अब इस फसल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/slehri-medicine/article-57896"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/slehri-medicine.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>देशी दवाइयां बनाने में होता है इसका प्रयोग || Slehri Medicine</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>रामगोपाल, लाडवा।</strong> हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी लाडवा अनाजमंडी आजकल सलैहरी औषधि (Slehri Medicine) की खुशबू से महकी हुई है। हरियाणा और पंजाब की सीमा कैथल और पटियाला के किसानों द्वारा इस औषधि की फसल तैयार की जाती है। अब इस फसल की बिजाई कुरुक्षेत्र जिले में भी कुछ किसानों द्वारा की जा रही है। केवल लाडवा और अमृतसर की अनाजमंडी मे सलैहरी औषधि का व्यापार होता है। किसानों द्वारा बिक्री के लिए सलैहरी औषधि लाडवा अनाजमंडी मे लाई जाती है। इसलिए लाडवा अनाज मंडी एशिया की प्रमुख अनाजमंडी में से एक है। लाडवा मंडी में इस औषधि फसल की हर वर्ष लगभग 15,000 से 20,000 बोरी किसानों द्वारा बिक्री के लिए लाई जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अभी तक मंडी में लगभग 500 से 1000 बोरी सलैहरी की आवक हुई है। इस फसल को व्यापारियों द्वारा 7200 रुपए से लेकर 8500 रुपए प्रति क्विंटल तक खरीदा जा रहा है। व्यापारियों ने बताया कि इस फसल का एशिया देशों में निर्यात किया जाता है। इस औषधि फसल का तेल निकाल कर देशी दवाइयां बनाने में प्रयोग किया जाता है और खाद्य सामग्री को लंबे समय तक ठीक रखने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>कैसी होती है सलैहरी औषधि || Slehri Medicine</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">सलैहरी औषधि हरे और भूरे रंग की खुशबूदार औषधि है और यह देखने में अजवायन जैसी लगती है। यह देसी दवाइयां बनाने और खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्रयुक्त होती है। कुछ लोग इसे हड्डियों और जोड़ों के दर्द में दवाई के रूप में प्रयोग करते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>मटर के बीज और सलैहरी की एक साथ होती है बिजाई</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">इस फसल को लेकर आए किसान अमरीक सिंह, करनैल सिंह, अमरजीत सिंह, निदान सिंह, कर्मवीर, जयपाल आदि ने बताया कि इसकी बिजाई अक्टूबर नवंबर में की जाती है। जिसमें मटर सब्जी के बीज और सलैहरी के बीज दोनों फसलों की एक साथ बिजाई की जाती है। इन फसलों की निकासी का समय 6 महीने का है। मटर सब्जी की फसल 3 महीने मे तैयार हो जाती है। आगे 3 महीने के बाद सलैहरी औषधि की फसल तैयार हो जाती हैं। इस फसल की 6 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ निकासी होती है। जिसका बाजार भाव 7200 से 8500 रुपए प्रति क्विंटल है और यह फसल लगभग 50000 से 60000 रूपए पर प्रति एकड़ तक बिक जाती है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 May 2024 10:46:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Watermelon Farming : तरबूज की मिठास ने खारियां के किसान कृष्ण कालड़ा को बनाया लखपति</title>
                                    <description><![CDATA[किसान कृष्ण कुमार ने बताया कि फसल की देखरेख, अच्छी पैदावार लेने के लिए उसने पड़ोसी राज्य के जिला फाजिल्कां से बलवंत सिंह व सुनील कुमार को 20 प्रतिशत बटाई पर रखा है, जिन्होंने कृषि विभाग रानियां से एचडीओ प्रोमिला के मार्गदर्शन में तरबूज (Watermelon Farming) की अच्छी पैदावार व गुणवता के लिए समय-समय पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/beneficial-farming-of-watermelon/article-57608"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/watermelon-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><em><strong>किसान कृष्ण कुमार ने बताया कि फसल की देखरेख, अच्छी पैदावार लेने के लिए उसने पड़ोसी राज्य के जिला फाजिल्कां से बलवंत सिंह व सुनील कुमार को 20 प्रतिशत बटाई पर रखा है, जिन्होंने कृषि विभाग रानियां से एचडीओ प्रोमिला के मार्गदर्शन में तरबूज (Watermelon Farming) की अच्छी पैदावार व गुणवता के लिए समय-समय पर जैविक खाद-उर्वरक, पानी, स्प्रै, निराई-गुड़ाई का कार्य किया। </strong></em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सुनील कुमार खारियां। </strong>ग्रीष्म ऋतु के समय में बाजार में तरबूज की बहुत ज्यादा डिमांड रहती है। ऐसे में गर्मी के मौसम में किसानों के लिए तरबूज की खेती करना काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। जो कम लागत में किसान को कुछ ही समय में लखपति बना सकती है। सरसा जिले के गांव खारियां निवासी कृष्ण कुमार कालड़ा ऐसे किसान हैं जो अल्प समय में तरबूज की खेती से लखपति बन गए।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि कृष्ण कुमार करीब दो वर्ष पूर्व तक एक बिजनेसमैन थे, जो गांव में खुद के पैट्रोल पंप का संचालन करते थे। खुद की जमीन जायदाद के चलते कृष्ण कुमार ने पैट्रोल पंप बेच कर खेती करने की मन में ठानी, लेकिन पिछले वर्षों में कपास में आई गुलाबी सुड़ी ने लाखों रुपये का घाटा पहुंचा दिया। इसके बाद कृष्ण कुमार ने कपास की खेती छोड़कर कुछ अलग करने का मन बना लिया और मात्र छह महीने में तरबूज की खेती से आठ लाख की आमदनी हासिल कर ली।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>ऐसे आया तरबूज की खेती का आईडिया || Watermelon Farming</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">कृष्ण कुमार बताते हैं कि उसके पास कृषि योग्य भूमी काफी है, जिसमें 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी पर भूमिहीन किसानों से खेती का कार्य करवाता है। पिछले साल नरमा व कपास की फसल में आई गुलाबी सुंडी से उसे लाखों का नुकसान उठाना पड़ा। जिससे समाधान के लिए कुछ किसानों एकत्रित होकर एक सामूहिक बैठक में खेती के तरीकों, खर्चों, नए प्रयोगों व नई खेती पर मंथन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उसी समय उन्हें क्षेत्र के तापमान, मिट्टी, पानी, बाजार की मांग व मौसम को ध्यान में रखते हुए तरबूज की खेती का आईडिया ध्यान में आया। जिसके बाद उसने तरबूज की खेती पर रिसर्च किया और कृषि विभाग रानियां से संपर्क कर खेती के तरीके, लगाने का उचित समय, खर्चा, आमदनी, मेहनत व मार्केट का विश्लेषण कर दो एकड़ में तरबूज की खेती करने का मन बनाया। कृष्ण कुमार के अनुसार, उसने मात्र दो लाख रूपए का रिस्क उठाकर आठ लाख रूपये की आमदनी हासिल की है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>कुछ इस तरह से तैयार होता है तरबूज  </strong></h4>
<p style="text-align:justify;">कृष्ण कुमार ने बताया कि तरबूज की खेती के लिए दोमट मिट्टी, नहर का पानी तथा गर्म मौसम की जरूरत होती है। उसने दो एकड़ में तरबूज की अच्छी पैदावार उठाने के लिए उन्नत किस्म का बीज चुना। दो एकड़ के लिए साढ़े 14 हजार रूपए खर्च कर 12,000 पौधों के बीजों को 40 दिन की क्लटीवेशन के लिए मांगेआना फार्म में रखा। दिसम्बर महीने के प्रथम सप्ताह में भूमि को सिंचाई व निराई-गुड़ाई करके तैयार किया और 4-4 फिट की मेड बनाकर उस पर प्लास्टिक की मलचिंग तथा पौधों को सर्दी से बचाने के लिए करीब 12 इंच ऊंची लॉ टनल बनाई गई, जिस पर 30 हजार रूपए खर्च आया। दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में पौधों की रोपाई करने के बाद ड्रिप के माध्यम से हर दस दिन बाद पानी व जरूरत अनुसार लिक्विड खुराक देने की प्रक्रिया जारी रही।</p>
<p style="text-align:justify;">फरवरी के अन्त में बेलों पर फूल व फल की प्रक्रिया शुरू हो गई, जो अगले 20 दिनों में शहद की मिठास से भरपूर, लाल रंग तथा वजन में लगभग 5 से 7 किलोग्राम के फल तैयार होने लगे। किसान ने बताया कि दो एकड़ में लगे तरबूज के इस खेत तैयार करने से लेकर उत्पादन तक जिसमें लेबर, किराया व मंडी की दामी भी शामिल है, करीब 2 लाख रूपए खर्च आया। उसने बताया कि दो एकड़ में लगभग 1400 क्विंटल तरबूज की पैदावार हुई जिससे मार्केट रेट के अनुसार छह महीने में लगभग 8 लाख की आमदनी हुई। हालांकि गांव के नजदीक में बड़ा बाजार या मंडी ना होने के चलते तरबूज की सप्लाई या बिक्री करना बड़ा मुश्किल है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/beneficial-farming-of-watermelon/article-57608</link>
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                <pubDate>Fri, 17 May 2024 10:03:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agriculture: आसान हुई अब कपास की खेती, ऐसे लगाएं और लाभदायक फसल पाएं</title>
                                    <description><![CDATA[Agriculture: कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण फाइबर और नकदी फसलों में से एक है। यह सूती कपड़ा उद्योग को प्राथमिक कच्चा माल सूती फाइबर प्रदान करता है। कपास भारत में छह मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष आय प्रदान करता है, जबकि चालीस से पचास मिलियन लोग कपास के व्यापार और इसके प्रसंस्करण में शामिल हैं। बता […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/now-cotton-cultivation-has-become-easier/article-56727"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/agriculture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Agriculture: कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण फाइबर और नकदी फसलों में से एक है। यह सूती कपड़ा उद्योग को प्राथमिक कच्चा माल सूती फाइबर प्रदान करता है। कपास भारत में छह मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष आय प्रदान करता है, जबकि चालीस से पचास मिलियन लोग कपास के व्यापार और इसके प्रसंस्करण में शामिल हैं। बता दें कि कपास का पौधा गर्म जलवायु में पनपता है। यह 60 डिग्री फारेनहाइट से कम तापमान को संभाल नहीं सकता है। यदि आप ठंडी जलवायु में रहते हैं, तो पौधे को घर के अंदर लगाना और मौसम गर्म होने पर इसे बाहर ले जाना सबसे अच्छा है। इस लेख के माध्यम से आपको बताया जा रहा है कि कपास का बीज बोते समय आपको किन कारकों का आकलन करना चाहिए।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/summer-vacation-will-start-from-this-day-in-all-schools-of-haryana/">Haryana School Holidays: हरियाणा के सभी स्कूलों में इस दिन से शुरू होगा ग्रीष्मकालीन अवकाश</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">कैसे लगाएं कपास? Agriculture</h3>
<p style="text-align:justify;">सफल फसल सुनिश्चित करने के लिए कपास के बीज बोने के लिए सावधानीपूर्वक तैयारी और बारीकियों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। बीज बोने से पहले, सही समय चुनना, मिट्टी को ठीक से तैयार करना और सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले कपास के बीज खरीदना महत्वपूर्ण है। यहां, हम कपास के बीज कैसे बोएं, सही मिट्टी चुनने से लेकर कटाई के समय तक फसल के रखरखाव के बारे में चरण-दर-चरण बताएंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पहला चरण | Agriculture</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में सबसे अच्छी तरह उगती है। खेत में बेहतर अंकुरण के लिए तापमान कम से कम 15 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। वानस्पतिक वृद्धि के लिए सर्वोत्तम तापमान 21 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच है, लेकिन फसल 43 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सहन कर सकती है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/prepare-matka-kulfi-at-home-to-cool-your-body-in-summers/">Kulfi For Summer: गर्मी में शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए घऱ पर ही तैयार करें मटका कुल्फी, स्वाद भी है लाजवाब</a></p>
<p style="text-align:justify;">फल लगने की अवधि के दौरान, गर्म दिन और ठंडी रातें कपास के बीजकोष और रेशे को अच्छी तरह बढ़ने में मदद करती हैं। यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगता है, जैसे उत्तर में अच्छी जल निकास वाली गहरी जलोढ़ मिट्टियाँ जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान, केंद्र में विभिन्न गहराई की काली चिकनी मिट्टियाँ और दक्षिण में काली और मिश्रित काली और लाल मिट्टियाँ। कपास को बहुत अधिक नमकीन या बहुत गीला होना पसंद नहीं है, और यह अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भूमि की बनावट और उर्वरता बीज फसलों की आवश्यकता के अनुरूप होनी चाहिए। भूमि पर कोई भी खरपतवार, स्वयंसेवी पौधे या अन्य फसल वाले पौधे नहीं हो सकते। इसे सुनिश्चित करने के लिए आप उचित खरपतवार नाशकों का उपयोग कर सकते हैं। वही फसल पिछले वर्ष नहीं उगाई जा सकी थी। यदि ऐसा है, तो खेत में जल्दी पानी डालें और पिछले सीजन में अपने आप उग आए बीजों को सूखने दें। उपजाऊ मिट्टी और पानी के निकास के रास्ते वाली भूमि चुनें। कपास के पौधों को उगाने के लिए सबसे अच्छी स्थितियाँ बिना पाले के विकास की लंबी अवधि (लगभग 175 से 225 दिन) मानी गई है।</p>
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<p style="text-align:justify;">बीज अंकुरित होने और बीजकोष बनने के बीच कपास को कम से कम 500 मिमी पानी की आवश्यकता होती है। इसके लिए ठोस, गर्म और नम बीज क्यारियों की आवश्यकता होती है जो अच्छी तरह से तैयार की गई हों। जब आप पौधारोपण करते हैं, तो आपको मिट्टी के तापमान और अगले महीने के मौसम के पूवार्नुमान को ध्यान में रखना होगा। बीज बोने से पहले उन पर फफूंदनाशी डालने से पौध रोगों को दूर रखने में मदद मिलती है। कवकनाशी या कोई अन्य कृषि रसायन डालने से पहले, कपास की फसल की व्यापक बीमारी का निदान करना आवश्यक है। इससे आपको सही मात्रा और प्रकार के कवकनाशी डालने में मदद मिलेगी और आपके क्षेत्र में कृषि रसायनों के अधिक उपयोग को रोका जा सकेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ध्यान रखने योग्य | Agriculture</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के बीज बोते समय इस बात का ध्यान रखें कि आप बहुत अधिक गीली, बहुत ठंडी, बहुत कठोर या बहुत अधिक रसायनों वाली मिट्टी में बहुत गहराई में न बोएं। अंकुरों और जड़ों को चोट लगने से बचाने के लिए लेबल पर बताए अनुसार शाकनाशी का उपयोग करना महत्वपूर्ण है। उर्वरकों का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि बीज और पौधों को नुकसान न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले कि आप बाहर कपास लगाएं, आपको यह सुनिश्चित करने के लिए मिट्टी थर्मामीटर का उपयोग करना चाहिए कि मिट्टी कम से कम 60 डिग्री एफ गर्म हो। और अगले तीन दिनों तक हर सुबह इसे जांचें। एक बार जब तापमान इस सीमा में रहता है, तो आप मिट्टी का काम कर सकते हैं और लगभग एक इंच खाद डाल सकते हैं। खाद पौधों के लिए नाइट्रोजन, पोटेशियम और सूक्ष्म खनिज जैसे पोषक तत्व प्राप्त करने का एक शानदार तरीका है जिनकी उन्हें अच्छी तरह से वृद्धि करने के लिए आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कपास बोने के लिए दूरी ऐसी होनी चाहिए कि कपास के बीज एक इंच गहरे और तीन-तीन के समूह में चार इंच की दूरी पर हों। फिर मिट्टी को ढककर दबा दें। लगभग दो सप्ताह में, बीज उगने लगेंगे। आदर्श परिस्थितियों में, वे एक सप्ताह के भीतर बढ़ने लगेंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कपास के बीज अंकुरण के लिए बीजों का चयन</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के बीजों के गुण उनकी वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समान विकास पाने के लिए आपको अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का उपयोग करना चाहिए। ताजे बीजों का ही प्रयोग करना चाहिए। पुराने बीजों का उपयोग न करें जिन्हें एक वर्ष से अधिक समय से संग्रहित किया गया हो क्योंकि उनके बढ़ने की संभावना कम होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीजों की गुणवत्ता जांचने के लिए साफ किए गए बीजों को दोगुनी मात्रा में पानी में 3 घंटे के लिए भिगो दें। बीजों को छाया में तब तक सुखाएं जब तक वे पहले जैसे सूखे न हो जाएं और फिर उन्हें वापस पानी में डाल दें। मृत बीज पानी के ऊपर तैरेंगे और बह जायेंगे। सभी अच्छे बीज सींकर्स की तली में डूब जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बीज भारी होने पर कपास के अंकुरण की प्रक्रिया और पौधे की मजबूती बेहतर होगी। अच्छे, मोटे बीज अपेक्षाकृत बड़े भ्रूण के कारण होते हैं, जिसमें बहुत सारा भोजन भंडार होता है और भोजन को अच्छी तरह से इधर-उधर ले जाता है, जिससे अंकुर बड़े हो जाते हैं। Agriculture</p>
<h3 style="text-align:justify;">कपास के बीज का स्थान</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के बीजों को ढीली, समृद्ध मिट्टी वाली जगह पर रोपें जहाँ पौधों को हर दिन कम से कम 4 या 5 घंटे सीधी धूप मिले। इसे गमले में उगाया जा सकता है, लेकिन गमला कम से कम 36 इंच गहरा होना चाहिए। पौधे लगाने से पहले, मिट्टी में एक इंच खाद डालने से मदद मिलती है। यह आपको कपास में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने में मदद करेगा। जब आप बहुत जल्दी बीज बोते हैं, तो उन्हें बढ़ने में अधिक समय लगता है। कुछ देर तक तापमान 60डिग्री एफ से ऊपर रहने तक प्रतीक्षा करें। जब तापमान 60 डिग्री एफ से ऊपर हो तो कपास को बीज से फूल बनने में 65 से 75 दिन लगते हैं। फूल खिलने के बाद बीज की फली तैयार होने में 50 दिन और लगते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जड़ वृद्धि का रखें ख्याल</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के पौधे की वृद्धि में जड़ वृद्धि सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जबकि यह अंकुरित हो रहा है और अंकुर के रूप में स्थापित हो रहा है। जब बीजपत्र बाहर आते हैं, तब तक मुख्य जड़ 10 इंच तक गहरी हो सकती है और जड़ प्रणाली के बढ़ने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण समय है। ठंडी मिट्टी, अंकुर रोग, कम मिट्टी पीएच, पानी का तनाव, हार्डपैन और शाकनाशी क्षति से जड़ों की वृद्धि और पौधों का विकास धीमा हो जाता है। हालाँकि, सावधानीपूर्वक फसल प्रबंधन से इनमें से अधिकांश तनावों को कम किया जा सकता है। पौधे की जड़ें पानी और पोषक तत्व लेती हैं जो पौधे के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। कोई भी चीज जो कपास के पौधे के जीवन के शुरूआती चरण में जड़ों को बढ़ने से रोकती है, उत्पादन के मौसम को निराशाजनक बना सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब मिट्टी गर्म और गीली होती है तो कपास सबसे तेजी से बढ़ती है। नीचे कम तापमान और मिट्टी में पर्याप्त पानी की कमी चयापचय प्रक्रियाओं को धीमा कर सकती है और बीजों के बढ़ने को कठिन बना सकती है। भौतिक बाधाएँ, जैसे पपड़ी बनना, बीजों के अंकुरण को धीमा नहीं करती हैं, लेकिन वे हाइपोकोटिल्स को बाहर आने से रोक सकती हैं। इसके कारण हाइपोकोटिल्स मोटे हो जाते हैं और इस स्थिति को बड़ी शैंक या मोटी टांगों वाली कपास कहा जाता है, जिससे अंकुर कम मजबूत हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, पौधों को बढ़ने और उत्पादन के लिए पानी की आवश्यकता होती है। जब सभी बीजकोष खुल जाएं और फूली हुई गेंदों की तरह दिखने लगें, तो कपास का पौधा तोड़ने के लिए तैयार है। ऐसा रोपण के लगभग 4 महीने बाद होता है। कपास के पौधे सूख जाएंगे और बीजकोषों के टूटने से ठीक पहले उनकी पत्तियां अपने आप गिर जाएंगी। पौधों से कपास चुनते समय सुनिश्चित करें कि आप दस्ताने पहनें ताकि आपके हाथ कटें नहीं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/now-cotton-cultivation-has-become-easier/article-56727</link>
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                <pubDate>Wed, 24 Apr 2024 11:50:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>PUSA-44 : किसान वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष पंजाब सरकार ने भू-जल बचाव और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए धान की पूसा-44 (PUSA-44) किस्म पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस साल पुन: इस बीज के बाजार में उतरने की चर्चा है। चर्चा यह है कि एक एक शैलर संगठन किसानों को इस प्रतिबंधित धान को लगाने की अपील भी कर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/pusa-44/article-56672"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/paddy-rice.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गत वर्ष पंजाब सरकार ने भू-जल बचाव और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए धान की पूसा-44 (PUSA-44) किस्म पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस साल पुन: इस बीज के बाजार में उतरने की चर्चा है। चर्चा यह है कि एक एक शैलर संगठन किसानों को इस प्रतिबंधित धान को लगाने की अपील भी कर रहा है, हालांकि संगठन के एक वरिष्ठ नेता ने इस आरोप से इनकार किया है। दरअसल, पंजाब ने धान के लिए पानी की लागत कम करने के लिए पूसा-44 पर प्रतिबंध लगा दिया था। धान की इस किस्म की पराली भी अधिक बनती थी और फसल तैयार होने में अधिक समय लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि पीआर-126, पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 1692 केवल 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसी तरह गेहूं की बिजाई करने के लिए किसानों को अधिक समय मिलता है। किसान खाली खेतों में गेहूं से पहले सब्जियां या कोई अन्य फसल भी लगा सकते हैं। यह जरूरी है कि किसान पर्यावरण की बेहतरी के लिए वैज्ञानिक और तार्किक निर्णय लें ताकि खेती से मुनाफा बढ़ाया जा सके और वहां वायु प्रदूषण से भी बचा जा सके। शैलर मालिकों को भी पर्यावरण के पक्ष में मुहिम शुरु करनी चाहिए। बेहतर होगा, यदि सरकार द्वारा धान की प्रमाणित किस्मों के बारे में किसानों को अधिक जानकारी देने के लिए एक प्रचार अभियान की शुरुआत हो।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Apr 2024 10:06:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Moong Ki Kheti : बेहतर उत्पादन के लिए कतारों में करें बिजाई</title>
                                    <description><![CDATA[– Moong Ki Kheti – दालों की बढ़ती मांग व आयात खर्च को देखते हुए दलहनी फसलों की खेती को महत्व तथा उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। मूंग की खेती ग्रीष्म व खरीफ दोनों मौसम में होती है। हरियाणा प्रदेश में धान गेहूं के क्षेत्रों में अधिकांशतया ग्रीष्मकालीन मूंग की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/moong-ki-kheti/article-56032"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/moong-crop.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>– Moong Ki Kheti –</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">दालों की बढ़ती मांग व आयात खर्च को देखते हुए दलहनी फसलों की खेती को महत्व तथा उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। मूंग की खेती ग्रीष्म व खरीफ दोनों मौसम में होती है। हरियाणा प्रदेश में धान गेहूं के क्षेत्रों में अधिकांशतया ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती (Moong Ki Kheti) होती है, जबकि दक्षिण पश्चिम क्षेत्रों में अधिकांशतया वर्षाकालीन मूंग की खेती होती है। कम समय में पकने व भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने में सहायक होने के कारण मूंग की खेती की संसाधन संरक्षण में अहम भूमिका होगी। गौरतलब है कि भारत में दलहनी फसलों की खेती 236.3 लाख हैक्टेयर में होती है, जबकि हरियाणा में इन फसलों की खेती 1.75 लाख हैक्टेयर में होती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>कतारों में इतना रखें फासला</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">बीज की मात्रा व बिजाई का तरीका वर्षाकालीन मूंग की एक एकड़ में बिजाई के लिये 6 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। बिजाई कतारों में करें। कतारों का फासला 30-45 सें.मी. (1-1.5 फुट) तथा पौधों में 10 सें.मी. रखें। जीवाणु खादों से बीज उपचार के साथ-साथ बिजाई के समय 8 कि.ग्रा. नाईट्रोजन (17.5 कि.ग्रा. यूरिया) व 16 कि.ग्रा. फास्फोरस (35 कि.ग्रा. डी एपी) प्रति एकड़ के हिसाब से डालें।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>निराई गोड़ाई और सिंचाई</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">वर्षाकालीन मूंग की फसल में वैशाखी मूंग की तुलना में अधिक खरपतवार उगते हैं। खरपतवारों की रोकथाम के लिये दो बार निराई गोड़ाई करनी चाहिये। पहली निराई 20-25 दिन बाद तथा दूसरी 30-35 दिन बाद करनी चाहिये। वर्षाकालीन मूंग में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु लम्बे समय तक वर्षा ना होने की स्थिति में फसल की सिंचाई करें।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>उपचारित बीज का करें प्रयोग, इस समय में बोएं</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">हालांकि धान रोपाई से पहले खेत में जो किसान मूंग की फसल लेना चाहते हैं, उनको गेहूं कटाई के तुरंत बाद ही मूंग की बिजाई कर देनी चाहिए। जबकि वर्षाकालीन मंूग के लिए जुलाई के पहले सप्ताह में बिजाई का उपयुक्त समय रहता है। जीवाणु खादों से बीज का उपचार मूंग की पैदावार बढ़ाने के लिये बीज का राइजोटीका व फास्फोटीका से उपचार करना चाहिए। एक एकड़ के लिये 50-50 मि.ली. राइजोटीका तथा फास्फोटीका की आवश्यकता होती है। टीकों के प्रयोग के लिये एक कप पानी में 50 ग्राम गुड़ घोलकर बीज पर मिलाएं तथा इसके पश्चात टीका का घोल बीज पर लगाएं। बीजों को हाथ से अच्छी तरह मिला लें तथा बिजाई से पहले छाया में सुखा लें।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>हानिकारक कीड़ों की रोकथाम</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">मूंग की फसल में बालों वाली सूण्डी, पत्ती छेदक, हरा तेला और सफेद मक्खी हानि पहुंचाते हैं। बीमारियां व रोकथाम पत्तों के धब्बों का रोग, पत्तों का जीवाणु रोग, जड़ गलन रोग तथा पीला मोजैक मूंग फसल की प्रमुख बीमारियां हैं। पत्तों के धब्बों व जीवाणु रोग की रोकथाम के लिये कॉपर आॅक्सीक्लाराईड 600-800 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। जड़ गलन की रोकथाम के लिए बिजाई से पहले बीज का 4 ग्राम थाइरम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से सूखा बीज उपचार करें। पीला मोजैक की रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्में उगाएं। सफेद मक्खी इस रोग को फैलाती है। रोगी पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>मूंग की उन्नत किस्में</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वर्षाकालीन मूंग की किस्में 60-70 दिन में पक जाती हैं तथा अच्छी पैदावार देने में सक्षम हैं। प्रमुख उन्नत किस्मों में मुस्कान (एम एच 96-1), सत्या, एम एच 421, एम एच 318 शामिल हैं।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-रमेश कुमार, अशोक ढिल्लों एवं जयलाल यादव कृषि विज्ञान केन्द्र, महेन्द्रगढ़ (एचऐयू)।</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/moong-ki-kheti/article-56032</link>
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                <pubDate>Fri, 05 Apr 2024 10:35:01 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Agriculture : 20 वर्षों से सब्जी उत्पादन से जुड़कर प्रतिवर्ष लाखों का उठा रहा मुनाफा</title>
                                    <description><![CDATA[सब्जियां उगाकर मालामाल हुआ डबवाली का किसान जसपाल || Vegetable Farming अनिल गोरीवाला। जहां किसान जमीन से पैदावार लेने के लिए अनेक प्रकार की पेस्टिसाइड का प्रयोग कर आमदनी वसूल करने में लगा है। वहीं, डबवाली का किसान जसपाल सिंह प्रति एकड़ भूमि से लाखों रुपए की वार्षिक आमदनी ले रहा है। किसान जसपाल सिंह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/dabwali-farmer-jaspal-get-benefit-by-vegetable-farming/article-55754"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-03/vegetable-farming.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>सब्जियां उगाकर मालामाल हुआ डबवाली का किसान जसपाल || Vegetable Farming</strong></h3>
<div style="text-align:justify;"><strong>अनिल गोरीवाला।</strong> जहां किसान जमीन से पैदावार लेने के लिए अनेक प्रकार की पेस्टिसाइड का प्रयोग कर आमदनी वसूल करने में लगा है। वहीं, डबवाली का किसान जसपाल सिंह प्रति एकड़ भूमि से लाखों रुपए की वार्षिक आमदनी ले रहा है। किसान जसपाल सिंह पिछले 20 वर्षों से अपने 6 एकड़ जमीन में सब्जियां बोकर (Vegetable farming) हर तीन माह की अंतराल पर लाखों रुपए की पैदावार उठा रहा है। इतना ही नहीं, इस किसान की प्रेरणा से आस-पास के किसानों ने भी अपने खेतों को सब्जी का हब बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">किसान जसपाल सिंह के अनुसार खेत में सब्जी बोने का कार्य किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। अनुमान है कि डबवाली सब्जी मंडी में 25 प्रतिशत तक सब्जियां इसी क्षेत्र से पहुंच रही हैं। क्षेत्र के किसानों को सब्जी बेचने के लिए अन्य मंडी की तरफ रुख नही करना पड़ता, अपितु किसानों का सब्जी विक्रेताओं से पहले ही अनुबंध हो जाता है। किसान जसपाल सिंह द्वारा 6 एकड़ जमींन में चप्पन कद्दू, गोभी, टमाटर, पेठा, तोरी, तरबूज की काश्त की गई है। किसान ने बताया कि सब्जी बोने की तकनीक कोई मुश्किल नहीं है, परन्तु इसमें खेत की बुआई, निराई, गुडाई का कार्य सही समय पर होना नितांत आवश्यक है।</div>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>वैरायटी: -</strong></h3>
<div style="text-align:justify;">जसपाल सिंह द्वारा पिछले 12 वर्षों से गोभी की मन्नेर किस्म की काश्त की जा रही है। वर्तमान में 1 एकड़ में मन्नेर किस्म का उत्पादन सवा लाख रुपए तक हुआ है। इस गोभी किस्म का समय गर्मी के मौसम में 3 माह व सर्दी के मौसम में ढाई माह है। इस अवधि में गोभी पूरी तरह से तैयार हो जाती है। यह किस्म जून से शुरू होकर अप्रैल तक बोई जाती है। जिसका बाजार का भाव 40 रुपए प्रति किलो तक संभावित रहता है। सब्जी के पौधों पर मौसम का प्रभाव अवश्य दिखाई देता है, इसलिए पौधे की समयानुसार देखभाल जरूरी है।</div>
<div style="text-align:justify;">तोरी की सत्या व अनिता नामक कम्पनी की किस्म की पैदावार से किसान जसपाल सिंह प्रति एकड़ ढाई लाख की पैदावार ले रहा है। जिसका बाजारी भाव 15 रुपए से लेकर 60 रुपए प्रति किलो से हिसाब मिल जाता है। यह दोनों किस्म जनवरी से जून तक गर्मियों में तैयार हो जाती है। बैंगन की चूं-चूं माइको नामक वैरायटी भी अच्छी पैदावार के लिए कारगर है। प्रति एकड़ में प्रति वर्ष डेढ़ लाख रुपए की आमदन हो रही है।</div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>पनीरी लगाने की विधि</strong></h4>
<div style="text-align:justify;">खेत को समतल कर उसमें तव्वियां व कल्टीवेटर से जमींन को तैयार कर इसमें मेढ़ बना लें। हाथों से पनीरी को रोपित किया जाता है। मेंढों में पौधों की वृद्वि के अनुसार सिंचाई की जाती है।</div>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/dabwali-farmer-jaspal-get-benefit-by-vegetable-farming/article-55754</link>
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                <pubDate>Fri, 29 Mar 2024 10:31:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परम्परागत खेती छोड़ अपनाई बागवानी, अब दूसरों को रोजगार दे रहे श्याम सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[सोनीपत के प्रगतिशील किसान ने खेती के प्रति बदली सोच | Horticulture Farming चण्डीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)। खेती घाटे का सौदा नहीं है, बल्कि यदि समय के साथ बदलाव किया जाए तो कृषि में आय बढ़ सकती है। सरकारी प्रोत्साहन के फलस्वरूप प्रदेश के किसान नजरिया बदलकर परंपरागत खेती की जगह बागवानी को अपनाएं तो अच्छा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/progressive-farmer-of-sonipat-changed-his-thinking-towards-farming/article-55281"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/horticulture-farming.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">सोनीपत के प्रगतिशील किसान ने खेती के प्रति बदली सोच | Horticulture Farming</h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>चण्डीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> खेती घाटे का सौदा नहीं है, बल्कि यदि समय के साथ बदलाव किया जाए तो कृषि में आय बढ़ सकती है। सरकारी प्रोत्साहन के फलस्वरूप प्रदेश के किसान नजरिया बदलकर परंपरागत खेती की जगह बागवानी को अपनाएं तो अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। बागवानी से किसान अपने उत्पादों को प्रोडेक्ट के रूप में प्रस्तुत कर किसान उत्पादक समूह (एफपीओ) बनाकर खुद भी मार्केटिंग कर सकते हैं। Horticulture Farming</p>
<p style="text-align:justify;">नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में हरियाणा मंडप में ऐसे किसानों की स्टॉल हैं, जिन्होंने राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ लेते हुए औषधीय पौधों से हर्बल प्रोडेक्ट तैयार कर बदलाव की कहानी के नायक बने हैं। खेती से खुद के साथ दूसरों को रोजगार की सोच के साथ आगे बढ़ रहे सोनीपत के एमपी माजरा निवासी श्याम सिंह ने बागवानी से अपने ही प्रोडेक्ट तैयार किए हैं। हरियाणा मंडप की स्टॉल पर उन लोगों की अधिक भीड़ देखी जा रही है जो हर्बल प्रोडेक्ट खरीदने में रूचि रखते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आंवला से मिला खेती को प्रोत्साहन | Horticulture Farming</h3>
<p style="text-align:justify;">किसान श्याम सिंह ने बताया कि उनके पास 18 एकड़ जमीन है। उन्होंने सबसे पहले आंवला 2 एकड में लगाया और उसके बाद आवला की खेती के बीच में ही हल्दी, सरसों, मूंगफली व सौंफ की खेती करने लगे। बागवानी में बड़ा बदलाव 2014 के बाद आया जब उन्होंने आंवला से अलग-अलग प्रोडेक्ट बनाने शुरू किये और अब वे 5 एकड़ में आंवला की खेती कर रहे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">35 से अधिक हर्बल प्रोडेक्ट कर रहे तैयार, 17 लोगों को दिया रोजगार</h3>
<p style="text-align:justify;">श्याम सिंह ने बताया कि उनके यहां आंवला, बेलगिरी, सौंफ, धनिया, मोरिका, सरसों, गुलाब की खेती करने के साथ इनके हर्बल प्रोडेक्ट भी तैयार किए जा रहे है। शुरू में उनके पास आंवला के कुछ प्रोडेक्ट तैयार होते थे लेकिन अब वे 35 प्रकार के प्रोडेक्ट तैयार कर रहें हैं जिनमें आंवला कैंडी, आंवला अचार, लड्डू, मुरब्बा, बर्फी, पाउडर, जूस, गुलाब से गुलाबजल व गुलकंद प्रमुख हैं। उन्होंने बताया कि अब उनके यहां 17 लोगों को रोजगार मिला हुआ है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">खेत में ही आउटलेट, वहीं पहुंच रहे खरीददार | Horticulture Farming</h3>
<p style="text-align:justify;">श्याम सिंह के अनुसार पहले बागवानी विभाग ने उन्हें आंवला प्रोडेक्ट बनाने के लिए 11 लाख रुपए के प्रोजेक्ट में 40 प्रतिशत की सब्सिडी उपलब्ध करवाई थी। इसके बाद उन्होंने प्रोजेक्ट को बड़ा करने के लिए एमएसएमई योजना के अंतर्गत भी लोन लिया। उन्होंने बताया कि परंपरागत खेती की अपेक्षा बागवानी और हर्बल में उन्हें तीन गुना अधिक मुनाफा हो रहा है। हालांकि मार्केटिंग की आरंभ में कुछ समस्या आती है। उन्होंने खुद अपने खेत में आउटलेट बनाया हुआ है, जहां लोग उन द्वारा निर्मित प्रोडेक्ट खरीदने पहुंचते है। श्याम सिंह कई जिलों में अपने प्रोडेक्ट सप्लाई करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">परंपरागत खेती की बजाय बागवानी में फायदा है, लेकिन किसान को अपनी सोच बदलनी होगी और जब वह बागवानी में कदम बढ़ाएगा तब उसे अपने प्रोडेक्ट बनाने की भी ललक पैदा होगी। जब सोच बदले तभी सवेरा आएगा। अब तो किसान हरियाणा सरकार की एफपीओ योजना लाभ उठाते हुए अपने समूह बनाकर उत्पादों की मार्केटिंग भी कर सकते हैं जिससे उनकी आमदनी बढ़ेगी।<br />
<strong>                                                                                              – श्याम सिंह, प्रगतिशील किसान।</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Trident Group: ट्राइडेंट फाउंडेशन ने बरनाला गांव के हाई स्कूल में बनवाए नये शौचालय" href="http://10.0.0.122:1245/trident-foundation-build-new-toilets-in-the-high-school-of-barnala-village/">Trident Group: ट्राइडेंट फाउंडेशन ने बरनाला गांव के हाई स्कूल में बनवाए नये शौचालय</a></p>
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                                                            <category>कृषि</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/progressive-farmer-of-sonipat-changed-his-thinking-towards-farming/article-55281</link>
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                <pubDate>Sun, 26 Nov 2023 16:29:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Sangrur: गेहूं की जगह की फूलों की खेती, अच्छे मुनाफे की थी उम्मीद, अचानक कुदरत के कहर ने सब कुछ किया तबाह</title>
                                    <description><![CDATA[संगरूर। पिछले दिनों जहां आसमान से बरसी आपदा ने किसानों की फसल को चौपट कर दिया, वहीं नई फसल उगाने वाले किसानों के चूल्हे भी जलते नजर आ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक संगरूर के गिदरियानी गांव में किसान 150 से 200 एकड़ में फूलों की खेती करते हैं, लेकिन अब ओलावृष्टि से उनकी फसल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/flowers-were-cultivated-in-place-of-wheat-there-was-hope-of-good-profit-suddenly-natures-havoc-destroyed-everything/article-45563"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-04/sangrur.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>संगरूर।</strong> पिछले दिनों जहां आसमान से बरसी आपदा ने किसानों की फसल को चौपट कर दिया, वहीं नई फसल उगाने वाले किसानों के चूल्हे भी जलते नजर आ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक संगरूर के गिदरियानी गांव में किसान 150 से 200 एकड़ में फूलों की खेती करते हैं, लेकिन अब ओलावृष्टि से उनकी फसल बर्बाद हो गई है। ये किसान अमेरिका, हॉलैंड और जर्मनी में 300 से 500 किलो बीज बेचते थे। किसानों का कहना है कि अभी भी सिर पर बादल छाए हुए हैं। बरस गया बादल का पानी उन्हें रात को नींद भी नहीं आती। जिन खेतों में खुशी चेहरे पर दिख रही थी, अब उनका खेतों में जाने का मन नहीं कर रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अब वे सरकार से मुआवजा देने की गुहार लगा रहे हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">किसानों का कहना है कि कुछ दिन पहले लोग खेतों में तस्वीरें लेने जाया करते थे क्योंकि जहां तक ​​नजर जाती पूरी जमीन रंग-बिरंगे फूलों से ढकी रहती थी। किसान भी खुश थे कि अच्छी फसल होने से इस बार अच्छा मुनाफा होगा लेकिन 30 मार्च को आसमान से आई ओलावृष्टि ने सपनों को चकनाचूर कर दिया। अब वे सरकार से मुआवजा देने की गुहार लगा रहे हैं।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Apr 2023 15:07:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिकों की सलाह से बनाएं खेती को लाभ का सौदा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत का किसान आज दोहरी मार का शिकार हो रहा है। एक, जनसंख्या वृद्धि के कारण घट रही खेती की जमीन और दूसरा मौसम की मार। घटती जमीन के अनुपात में खेती की लागत कम नहीं होती। लागत अधिक, आमदनी कम और ऊपर से मौसम की मार ने किसान को काफी पीछे धकेल दिया है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/make-farming-a-profitable-deal-with-the-advice-of-scientists/article-45467"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-04/farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत का किसान आज दोहरी मार का शिकार हो रहा है। एक, जनसंख्या वृद्धि के कारण घट रही खेती की जमीन और दूसरा मौसम की मार। घटती जमीन के अनुपात में खेती की लागत कम नहीं होती। लागत अधिक, आमदनी कम और ऊपर से मौसम की मार ने किसान को काफी पीछे धकेल दिया है। मौसम प्रकृति के हाथ में है। (Farming) किसान केवल लागत कम करने के बारे में ही सोच सकता है। इसके लिए किसान को कृषि वैज्ञानिकों का सहारा लेना पड़ेगा। परंपरागत खेती की बजाए विविधीकरण की ओर बढ़ना होगा ताकि विपरीत मौसम के अनुकुल भी फसल ली जा सके। उच्च गुणवत्ता के बीज, उत्तम क्वालिटी की खाद, कीटनाशक, सिंचाई के साधन व कृषि उपकरणों आदि पर लागत हर वर्ष बढ़ रही है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="भारत का भविष्य: समाचार रिपोर्टर | News Reporter Kaise Bane" href="http://10.0.0.122:1245/news-reporter-kaise-bane/">भारत का भविष्य: समाचार रिपोर्टर | News Reporter Kaise Bane</a></p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में इन बढ़ती लागतों को कैसे कम किया जाए, ये भी एक चुनौती है। इन सबसे निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सलाह बहुत जरूरी है। अनावश्यक सिंचाई, खाद और अनावश्यक कीटनाशकों के प्रयोग से बचने के लिए वैज्ञानिकों की सलाह ही एकमात्र विकल्प है। मिट्टी की सही जांच हो, जब तक मिट्टी की सही जांच नहीं होगी तब तक किसान अनावश्यक लागत बढ़ाता रहेगा। मिट्टी की सही जांच के बाद ही उचित मात्रा में खाद व कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। इससे अनावश्यक खर्चों से बचा जा सकेगा। जिस प्रकार कोई व्यापारी अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए दिमाग का इस्तेमाल करता है, अपने व्यापार के बारे में गहन अध्ययन करता है, जानकारी लेता है उसी के अनुरूप किसान को भी खेती के संबंध में अपनी पुरात्तन विचारधारा को बदलना होगा, अध्ययन करना होगा और कृषि वैज्ञानिकों से जानकारियां लेनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके द्वारा लगाए जाने वाले सेमीनारों में भाग लेना होगा। सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी रखनी होगी। कृषि लागत को घटाने और अधिक पैदावार लेने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। किसान को कृषि व्यवसाय के साथ-साथ कृषि से संबंधित अन्य व्यवसायों को भी अपनाना होगा जैसे पशुपालन, डेयरी, मधु-मक्खी पालन, मशरूम, रेशम कीट उत्पादन इत्यादि। इन सभी उपायों पर अमल में लाकर ही खेती को लाभ का सौदा बनाया जा सकता है।</p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/make-farming-a-profitable-deal-with-the-advice-of-scientists/article-45467</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2023 14:56:07 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>गुरुकुल पैटर्न पर मथुरा व बुंदेलखंड में बनेंगे प्राकृतिक खेती के मॉडल</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तरप्रदेश के कई मंत्रियों ने किया गुरुकुल कुरुक्षेत्र का भ्रमण कुरुक्षेत्र(सच कहूँ/देवीलाल बारना)। गुरुकुल कुरुक्षेत्र के प्राकृतिक कृषि (Natural Farming) फार्म की तर्ज पर अब पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी कृषि विभाग अपने रिसर्च सेंटर और कृषि विज्ञान केन्द्र की जमीनों पर प्राकृतिक खेती करेगा। इसमें सुभाष पालेकर प्राकृतिक कृषि तकनीक पर आधारित देशी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/natural-farming-models-will-be-made-in-mathura-and-bundelkhand-on-gurukul-pattern/article-38405"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-09/natural-farming.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>उत्तरप्रदेश के कई मंत्रियों ने किया गुरुकुल कुरुक्षेत्र का भ्रमण</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>कुरुक्षेत्र(सच कहूँ/देवीलाल बारना)।</strong> गुरुकुल कुरुक्षेत्र के प्राकृतिक कृषि (Natural Farming) फार्म की तर्ज पर अब पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी कृषि विभाग अपने रिसर्च सेंटर और कृषि विज्ञान केन्द्र की जमीनों पर प्राकृतिक खेती करेगा। इसमें सुभाष पालेकर प्राकृतिक कृषि तकनीक पर आधारित देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से जीवामृत व घनजीवामृत निर्माण से लेकर बहुफसल तकनीक से फसलें उगाई जाएंगी और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग देकर प्रदेश के किसानों को खेती की इस पारम्परिक तकनीक से जोड़ा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसको लेकर उत्तरप्रदेश के कृषि, शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही, गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग मंत्री लक्ष्मी नारायण चैधरी, राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार दिनेश प्रताप सिंह, कृषि राज्यमंत्री बलदेव सिंह गुरुकुल कुरुक्षेत्र में प्राकृतिक खेती के मॉडल का अवलोकन करने पहुंचे। गुरुकुल में पहुंचने पर हरियाणा के शिक्षामंत्री कंवरपाल गुज्जर ने भव्य स्वागत किया।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>उत्तर प्रदेश में 47 स्थानों को किया गया चिन्हित</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">कृषि मंत्री शाही ने कहा कि वर्ष 2018 में गुरुकुल कुरुक्षेत्र का दौरा करने के बाद से लगातार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी लगातार कृषि विभाग के आला अधिकारियों को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रहे हंै जिसके तहत बुंदेलखंड में नमामि गंगे परियोजना के तहत अब प्राकृतिक खेती की जाएगी। इसके लिए 47 स्थानों को चिन्हित किया गया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>बरसात के बाद भी गन्ना खड़ा देख हुए अचंभित</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">गुरुकुल फार्म का दौरा करने के उपरान्त उन्होंने कहा कि पिछले दिनों हुई लगातार बरसात से उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी गन्ना और 50 फीसदी धान की फसल गिरकर खराब हुई है मगर गुरुकुल के फार्म पर गन्ना और धान की फसल मजबूती से खड़ी है और उनमें पानी भी नहीं है, इससे स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक खेती किसानों के लिए कितनी कारगर साबित हो सकती है। उन्होंने गुरुकुल प्रबंधक समिति से आग्रह किया कि यूपी के किसानों को प्राकृतिक खेती की तथ्यपरक जानकारी देने के लिए डॉ. हरिओम और डॉ. बलजीत सहारण की दो-दो दिन की कार्यशालाओं का आयोजन यूपी में अलग-अलग स्थानों पर करवाए।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>गुरुकुल में प्रशिक्षण लेंगे कृषि वैज्ञानिक</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा कृषि मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश कृषि विभाग व वन विभाग के कृषि वैज्ञानिकों, अधिकारी और कर्मचारियों को गुरुकुल के ट्रेनिंग सेंटर में भेजकर पूरी ट्रेनिंग दिलवाई जाएगी ताकि वे मास्टर ट्रेनर के रूप में सीधे किसानों से मिलकर उन्हें प्राकृतिक खेती से जोड़ सकें। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती को लेकर धरातल पर कार्य करने की जरूरत है।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Sep 2022 08:50:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>पौना एकड़ भूमि से लाखों कमा रहा किसान फूल कुमार</title>
                                    <description><![CDATA[सच कहूँ स्पेशल: जहरमुक्त प्राकृतिक खेती को अपनाकर लिखी कामयाबी की इबारत, खेत में लहलहा रहे फल, सब्जियों, औषधियों और मसालों के पौधे अगर आप इस खेत में आएंगे तो आपको किसी घने हरे-भरे जंगल सा नजारा दिखेगा। फल, सब्जियां, औषधीय पौधे, मसाले आदि के हरे भरे शानदार पेड़ों को देखकर आप अद्भुत सुकून और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/farmer-phool-kumar-earning-lakhs-from-quarter-acre-land-by-organic-farming/article-33965"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/farmer.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><strong>सच कहूँ स्पेशल: जहरमुक्त प्राकृतिक खेती को अपनाकर लिखी कामयाबी की इबारत, खेत में लहलहा रहे फल, सब्जियों, औषधियों और मसालों के पौधे</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">अगर आप इस खेत में आएंगे तो आपको किसी घने हरे-भरे जंगल सा नजारा दिखेगा। फल, सब्जियां, औषधीय पौधे, मसाले आदि के हरे भरे शानदार पेड़ों को देखकर आप अद्भुत सुकून और खुशी से भर जाएंगे। हैरानी की बात ये है कि इस खेत में किसी भी तरह का रासायनिक खाद या पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं किया गया है। खेती के इस मॉडल को अपनाकर वे सिर्फ एक एकड़ भूमि से ही सालाना लाखों रुपये की आमदन ले रहे हैं। जी हाँ, सच कहूँ बता रहा है रोहतक जिले में महम तहसील के गाँव भैणी मातो के किसान फूल कुमार के खेत की। जिन्होंने प्राकृतिक खेती से कामयाबी की नई इबारत लिखी है। आइए जानते हैं उनकी सफलता के सफर के बारे में …..</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>राजीव दीक्षित और पद्मश्री सुभाष पालेकर से प्रभावित होकर बढ़ाया कदम</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">फूल कुमार बताते हैं कि 2009 में टेलीविजन देखते वक्त उन्होंने राजीव दीक्षित का व्याख्यान सुना था। वे प्राकृतिक खेती के बारे में बता रहे थे। तब मन में पहली बार ऐसे करने के बारे में ख्याल आया। इसके बाद मैंने काफी क्षेत्र में ये खेती शुरू कर दी थी। हालांकि उस दौरान जानकारी के अभाव में मुझे काफी नुक्सान भी हुआ। लेकिन धीरे-धीरे मैंने इस खेती के बारे में सीखा। इसके बाद मार्च 2017 में वे महाराष्टÑ में विदर्भ क्षेत्र के गाँव बेलोरा निवासी पद्मश्री सुभाष पालेकर के शिविर में गए।</p>
<p style="text-align:justify;">शिविर में पालेकर जी ने बताया कि एक एकड़ भूमि में ही प्राकृतिक खेती की मदद से 6 से 12 लाख रुपये तक की कमाई करना संभव है। शुरू में तो मुझे उनकी इस बात पर बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ। इस पर पालेकर ने कहा कि आप हमारे यहां महाराष्टÑ में आइए और हमारे मॉडल को देखिए और जो इस मॉडल पर शिद्दत से काम कर रहे हैं वो आमदनी ले रहे हैं। ये पूरा मामला कड़ी मेहनत का है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>ऐसे हुई शुरूआत</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">फूल कुमार के मुताबिक अगस्त 2017 से उन्होंने बीजारोपण के साथ प्राकृतिक खेती की शुरूआत की। उन्होंने अपनी पौना एकड़ जमीन में सबसे पहले नीम्बू का मॉडल लगाया। इसके तहत 24 बाई 24 पर नीम्बू के पौधे लगाए। हर दो नीम्बू के बीच एक अनार है। इसके साथ ही अन्य पौधे भी लगाए। इसके बाद अमरूद और सेब मॉडल लगाए। आज उनके खेत में नीम्बू, अनार, केला, अमरूद, मौसमी, पपीता, आंवला, जामुन, सेब, किन्नू, आडू, अंजीर, कटहल, आम, चीकू, लिसोडा, अनासपति, खजूर और नारियल के पेड़ लहलहा रहे हैं। पहले साल ही इस किसान ने अपने खेत से 90 हजार रुपये की आमदन प्राप्त कर ली थी। इसके बाद दूसरे साल एक लाख 40 हजार रुपये आमदन हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">तीसरे साल दो लाख से दो लाख 40 हजार के बीच रही। इस तरह साल-दर-साल आय में लगातार इजाफा हो रहा है। अब महीने के अंतिम रविवार को उनके खेती मॉडल को देखने के लिए भारी संख्या में किसान पहुंचते हैं और प्राकृतिक खेती की बारिकियों से अवगत होते हैं। फूल कुमार ने ये एक दिन ही इसके लिए निश्चित किया है ताकि उनकी खेती के कार्य में बाधा न आए। वे बताते हैं कि उनके द्वारा उत्पादित ज्यादातर फल-सब्जियां तो खेत से ही बिक जाती है और बाकी को मंडी भेजा जाता है, जहां आर्गेनिक होने के चलते हाथों बिकती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>पंच स्तरीय मॉडल बना वरदान</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">फूल कुमार ने अपने खेत में पंचस्तरीय मॉडल लगाया हुआ है। इस मॉडल के मुताबिक एक एकड़ में 54 नीम्बू, 133 अनार, 170 केले, 420 सहजन और 420 काली मिर्च के पेड़ लगते हैं। इसके बाद हर दो पौधों के बीच में 820 अंगूर की बेल लगती हैं। इसके साथ ही हर दो पौधों के बीच में मिर्च, टमाटर, हल्दी, अदरक और मौसमी सब्जियां लगाई जाती हैं। इस खेती की सफलता के पीछे आच्छादन का बड़ा रोल है। इसमें जितना कास्ट आच्छादन मिलता है, वो काट-काट कर इसमें बिछाते हैं। उन्होंने कहा कि खेत का पत्ता भी बाहर नहीं जाने देते। सिर्फ फल-सब्जियों को खेत से बाहर निकालते हैं। उन्होंने बताया कि पत्तों से जमीन का कार्बन बढ़ता है और जितना ये बढ़ेगा, उतनी की खेत से आमदन बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि पूरे मॉडल के विकसित होने पर पालेकर जी ने एक एकड़ से औसतन छह से 12 लाख रुपये तक की कमाई बताई है, लेकिन मेरा मानना है कि ये आमदन इससे भी अधिक होगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>प्राकृतिक खाद और पेस्टिसाइड का इस्तेमाल</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">फूल कुमार बताते हैं कि उन्होंने अपने खेत में किसी भी रासायनिक खाद या पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं किया है। बल्कि उन्होंने पौधों की अच्छी बढ़वार और बीमारियों से बचाव के लिए जरूरत पड़ने पर जीवामृत, घन जीवामृत और प्राकृतिक पेस्टिसाइड का इस्तेमाल किया, जो उन्होंने स्वयं तैयार किए। उनका मानना है कि अगर हर किसान जहर मुक्त खेती को प्राथमिकता दे तो आमजन अनेक असाध्य बीमारियों का शिकार होने से बच सकता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>कड़ी मेहनत से ही कामयाबी संभव</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">फूल कुमार बताते हैं कि किसानों को इस तकनीक की सही जानकारी लेकर ही खेती करनी चाहिए। क्योंकि प्राकृतिक खेती के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, बिना इसके अच्छी कमाई संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी और वे स्वयं खेती को पूरा वक्त देते हैं। जरूरत पड़ने पर मजदूरों की मदद भी ली जाती है। खेती में इतना काम होता है कि आपको एक काम को छोड़कर दूसरा काम करना पड़ता है, यानि प्रतिदिन जरूरी काम को छोड़कर अति जरूरी काम करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि खेती में किसी दिन कोई काम नहीं होता, इसमें जितना काम आदमी करेगा, उतनी ही इनकम भी बढ़ेगी।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-जसविंद्र इन्सां</strong></p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 May 2022 11:56:10 +0530</pubDate>
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