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                <title>Ghee - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>घी पौष्टिकता और शक्ति का अद्भुत स्त्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[दूध प्रत्येक आयु वर्ग को पौष्टिकता प्रदान करता है। यह सारे संसार में प्रयुक्त होने वाला प्रिय पदार्थ है। इसके साथ-साथ दूध अपने हर रूप में उपयोगी है। इससे अन्य उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। जैसे- घी, पनीर, मावा, दही, छाछ, क्रीम, मक्खन इत्यादि। दूध की इसी व्यापक आवश्यकता के कारण इसका व्यवसाय विश्व […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/ghee-is-a-wonderful-source-of-strength/article-28244"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/fake-ghee.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दूध प्रत्येक आयु वर्ग को पौष्टिकता प्रदान करता है। यह सारे संसार में प्रयुक्त होने वाला प्रिय पदार्थ है। इसके साथ-साथ दूध अपने हर रूप में उपयोगी है। इससे अन्य उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। जैसे- घी, पनीर, मावा, दही, छाछ, क्रीम, मक्खन इत्यादि। दूध की इसी व्यापक आवश्यकता के कारण इसका व्यवसाय विश्व में सर्वाधिक है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">घी क्या है?</h3>
<p style="text-align:justify;">घी दूध से प्राप्त होने वाला अद्भुत रसायन है जो प्राचीन भारत के बुद्धिमान और ऋषि-मुनियों की देन है। यूरोप और पश्चिमी देशों में अंगे्रज जाति के पूर्वज दूध से केवल मक्खन बनाने की कला ही जानते थे जबकि भारत में इससे भी अधिक सूक्ष्म और पौष्टिक पदार्थ घी का आविष्कार किया गया। घी वस्तुत: दूध में निहित वसा और विटामिनों का मिश्रण है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">दूध में कितना घी</h3>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार, गाय के एक द्रोण शुद्ध दूध में से एक प्रस्थ घी निकलना चाहिए अर्थात एक सेर दूध में से एक छटांक घी निकलता है जबकि भैंस के एक द्रोण शुद्ध दूध में पांच भाग घी अधिक निकलता है अर्थात एक सेर दूध में एक छटांक और पांचवां भाग (लगभग 70 ग्राम) घी निकलेगा। भेड़ तथा बकरी के एक सेर दूध में डेढ़ छटांक (लगभग 90 ग्राम) घी निकलेगा। किसी भी दूध को मथकर उसमें निकलने वाले घी की मात्रा से दूध की शुद्धता की जांच आसानी से की जा सकती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">घी के गुण</h3>
<p style="text-align:justify;">घी दूध का पौष्टिक और ठोस रूप है। इसमें दूध की तुलना में सूक्ष्म और भारी-दोनों गुण होते हैं। गाय के दूध की भांति गाय का घी भी आयुर्वेद में अमृत का रूप माना गया है, क्योंकि यह दूध का ही सत्व होता है। घी के गुणों को अनिर्वचनीय माना गया है। घी वातावरण में शुद्धि उत्पन्न करता है। यह पर्यावरण का महान रक्षक है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का घी किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नष्ट करने में सक्षम है। यह अनेक औषधियों का आधार है, जिसमें विलीन होकर ही वे अपना प्रभाव दिखाती हैं। वास्तव में घी पुष्टि और शक्ति का अद्भुत स्त्रोत है।</p>
<p><strong>-डॉ. राजीव शर्मा</strong></p>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Nov 2021 05:00:00 +0530</pubDate>
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                <title>नकली दूध-घी और लापरवाह सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[मिलावट महापाप व मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध गत दिवस पंजाब व हरियाणा के दो समाचारों ने सबको चिंतित किया। एक खबर तो हरियाणा के जिला सिरसा से थी, जहां एक गांव में बंद पड़ी फैक्ट्री में गुप-चुप तरीके से नकली घी बनाया जा रहा था। फैक्ट्री से नकली घी बनाने वाला रसायन भी बरामद […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h2>मिलावट महापाप व मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध</h2>
<p style="text-align:justify;">गत दिवस पंजाब व हरियाणा के दो समाचारों ने सबको चिंतित किया। एक खबर तो हरियाणा के जिला सिरसा से थी, जहां एक गांव में बंद पड़ी फैक्ट्री में गुप-चुप तरीके से नकली घी बनाया जा रहा था। फैक्ट्री से नकली घी बनाने वाला रसायन भी बरामद हुआ। इसी तरह पंजाब के जिला अमृतसर में भी नकली घी के एक लाख से अधिक डिब्बे बरामद हुए। सर्दी में लोग बड़े चाव से देसी घी की पंजीरी व पिन्नीयों का खूब मजा लेते हैं और कहते हैं कि देशी घी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है लेकिन वह नहीं जानते कि वे जहर खा रहे हैं। मिलावट महापाप व मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध है, लेकिन यह विडंबना है कि लोगों को कैंसर जैसे रोगों की तरफ धकेलने वाले मिलावटखोरों के खिलाफ सरकारों व विपक्ष में कोई गंभीरता ही नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">कोई भी सरकारी विभाग लोगों को नकली वस्तुओं के प्रयोग से बचने के लिए कोई सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं करता। सरकार कैंसर अस्पताल बनाने, कैंसर रोगियों को इलाज में छूट देने की घोषणाएं तो करती हैं किंतु मिलावटखोरों की जड़ पर काम नहीं करती। पंजाब हरियाणा शुद्ध खान-पान जैसे दूध, घी के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन आज दोनों राज्य मिलावट के कारण कैंसर रोगियों से ग्रस्त हैं।</p>
<h2>1980 के दशक में 2 हजार दुधारू पशु होते थे अब वहां बहुत मुश्किल से 500 पशु भी नहीं।</h2>
<p style="text-align:justify;">कैंसर के लक्ष्णों की पहचान करने के लिए जागरूक तो किया जा रहा है लेकिन इसके कारणों को खत्म करने की कहीं चर्चा तक नहीं हो रही। यह आज कोई नई बात नहीं है, यह तो सालों से ही चलता आ रहा है। दोषी कानूनी शिकंजे से बच निकलते हैं। मिलावटखोरी को खत्म करने के लिए सरकार के पास न कोई नीति है, न प्रोग्राम व न ही कोई प्रस्ताव है। मिलावटखोरी होती क्यों है?, इस बात को समझने के लिए सरकारों की इच्छा ही नहीं है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्स अथॉरिटी आॅफ इंडिया के अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि देश में बिकने वाला 65 प्रतिशत से अधिक दूध मिलावटी है। जिन गांवों में 1980 के दशक में 2 हजार दुधारू पशु होते थे अब वहां बहुत मुश्किल से 500 पशु भी नहीं।</p>
<h2>जब तक पशु पालन का धंधा सफल नहीं होगा तब तक मिलावटखोरी को रोकना असंभव</h2>
<p style="text-align:justify;">आबादी इन गांवों की दो गुणा से ज्यादा बढ़ गई है। इन हालातों में लोगों को शुद्ध दूध मिल जाए, यह संभव नहीं। सरकारों व विपक्षी पार्टियों के लिए यह कोई मुद्दा नहीं। लोग चुपचाप जहर पी रहे हैं। भारतीय समाज इतना जागरूक नहीं हुआ कि मिलावटखोरी रोकने के लिए लोग धरने दें। लोगों की यही सोच मिलावटखोरी को राजनैतिक मुद्दा नहीं बनने देती। साथ ही राजनेताओं को कहां फुर्सत है कि वह रैलियों में भीड़ इकट्ठी करें, बैठकें करने जैसे कार्यों को छोड़कर लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करें। हैरानीजनक बात यह भी है कि बाजार में जरूरत अनुसार दूध नहीं मिल पाता, फिर भी विवाह शादियों में कैटरज जितना चाहो दूध का प्रबंध कर लेते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब-हरियाणा जैसे राज्य में दुधारू पशुओं की संख्या में गिरावट आई है व बचे दूध की खरीद निजी कंपनियां कर रही हंै। घरों में 5-7 पशु रखने वाले लोग घाटा झेलने के बाद इस धंधे को छोड़ चुके हैं या छोड़ रहे हैं। शुद्ध दूध की लागत बढ़ रही है, जब तक पशु पालन का धंधा सफल नहीं होगा तब तक मिलावटखोरी को रोकना असंभव है।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Jan 2019 19:36:02 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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