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                <title>बजट महज खानापूर्ति न हो</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्र की एनडीए सरकार अंतिम वर्ष का अंतरिम बजट पेश करेगी। किसान, शहरी व मध्यम वर्ग से लेकर मजदूर तक सरकार से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बढ़ रही महंगाई, घट रहा रोजगार, धीमी गति से चल रहे उद्योग इत्यादि ऐसे मुद्दे हैं जिससे देश की आर्थिकता में बाधा उत्पन्न हुई है। दरअसल सरकारों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">केंद्र की एनडीए सरकार अंतिम वर्ष का अंतरिम बजट पेश करेगी। किसान, शहरी व मध्यम वर्ग से लेकर मजदूर तक सरकार से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बढ़ रही महंगाई, घट रहा रोजगार, धीमी गति से चल रहे उद्योग इत्यादि ऐसे मुद्दे हैं जिससे देश की आर्थिकता में बाधा उत्पन्न हुई है। दरअसल सरकारों का बजट पेश करने का एक फैशन बन गया कि न कोई नया टैक्स लगाओ और न ही पुराने टैक्स बढ़ाओ। सरकार अपनी पूरी ऊर्जा टैक्स वृद्धि के बाद विरोध से बचने पर लगा देती है, जिस कारण सरकार आंकड़ों के हेरफेर से जनता व विपक्ष को उलझाना चाहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले चार वर्षों में किसानों, मजदूर व गरीबों के लिए कोई राहत नहीं मिली, जिससे सीधा जनता को लाभ हो दूसरी तरफ बजट से आगे-पीछे ऐसे फैसले लिए जाते, जो सरकार की अपनी नीतियों के खिलाफ होते हैं। ताजा निर्णय उच्च वर्ग के पिछड़ों को आरक्षण का है, जिसमें 8 लाख से कम वार्षिक आमदन वाले व्यक्ति को पिछड़ा माना गया है। इस हिसाब से 5-7 लाख की आमदन वाले कर्मचारी को आमदन कर के दायरे से बाहर करना चाहिए। सरकार का अपना निर्णय ही इस बार मुश्किल बन सकता है। एक देश में दो नियम नहीं चल सकते। कर्मचारी वर्ग को बढ़ रही महंगाई के बावजूद आमदन कर में कोई राहत नहीं मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार मामूली सी राहत घुमा-फिरा कर देती है। तीन लाख के करीब प्रति माह वेतन और भत्ते लेने वाले सांसदों द्वारा वेतन में वृद्धि की मांग की जा रही है, तो 40-50 हजार रुपए लेने वाले कर्मचारी के वेतन में टैक्स कटौती क्यों? जहां तक कृषि का संबंध है, सरकार ही यह बात कहती है कि कृषि लागत खर्च बढ़ रहे हैं। कृषि मामलों पर मंथन करने के लिए बनाई गई समितियों पर अरबों रुपए खर्च होते हैं और यह खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद किसानों को कोई राहत नहीं मिली। सरकार अपने ही चुनावी मैनीफैस्टो में स्वामीनाथन आयोग की सिफारशें लागू करने का वायदा करती है फिर खुद ही हल्फिया बयान देकर असमर्थता व्यक्त करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जनता पिस रही है। राजनैतिक नेताओं की जायदाद दिनों दिन बढ़ रही हैं। उद्योग संबंधी नीतियां भी खत्म होने की कगार पर हैं। रोजगार के नाम पर अमीर वर्ग के लोग कर्जे ले रहे हैं, दूसरी तरफ बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है। कर्ज लेकर विदेश फरार होने का सिलसिला जारी है, जिससे देश में आर्थिक संकट गहरा गया है। बजट महज खानापूर्ति बनकर न रह जाए, इसीलिए लोग हितैषी, अर्थ शास्त्रीय व स्पष्ट नजरिए की जरूरत है। सरकार बजट से देश के विकास की तस्वीर खींच सकती है। देश का पैसा लूटने वालों पर लगाम कसी जाए और किसानों, मजदूरों, गरीबों को भीख की नहीं, बल्कि सहायता की जरूरत है। बजट में सरकार को जिम्मेवारी का एहसास होना चाहिए।</p>
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                <pubDate>Wed, 30 Jan 2019 20:02:57 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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