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                <title>Politicians - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>शाह सतनाम जी धाम में नामचर्चा में पहुंचे राजनेता</title>
                                    <description><![CDATA[सच-कहूँ के साथ बातचीत कर रखे अपने विचार सरसा। शाह सतनाम जी धाम सरसा में हुई नामचर्चा में पंजाब विधानसभा से चुनाव लड़ रहे भाजपा के उम्मीदवार(Politicians) पहुंचे। इस दौरान उन्होंने सच कहूँ के साथ बातचीत करते अपने विचार पेश किए। विधानसभा हलका धूरी से भाजपा के उम्मीदवार रणदीप सिंह दयोल ने कहा कि वह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/politicians-reached-in-naamcharcha-in-shah-satnam-ji-dham/article-30603"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-02/politicians.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>सच-कहूँ के साथ बातचीत कर रखे अपने विचार</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा।</strong> शाह सतनाम जी धाम सरसा में हुई नामचर्चा में पंजाब विधानसभा से चुनाव लड़ रहे भाजपा के उम्मीदवार(Politicians) पहुंचे। इस दौरान उन्होंने सच कहूँ के साथ बातचीत करते अपने विचार पेश किए। विधानसभा हलका धूरी से भाजपा के उम्मीदवार रणदीप सिंह दयोल ने कहा कि वह शुरू से डेरा सच्चा सौदा आते रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह डेरा सच्चा सौदा की ओर से चलाए जा रहे मानवता भलाई के 138 कार्यों से बहुत प्रभावित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि वह डेरा सच्चा सौदा के दर्शन करने आए हैं। उन्होंने कहा कि यदि जनता उनको सेवा का मौका देती है तो वह रोजगार लाने और नशों के खात्मे पर सबसे पहले ध्यान देंगे। इसके साथ ही राज्य की कानून व्यवस्था बिगड़ चुकी है। उसे सुधारने का काम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पंजाब में डबल इंजन वाली सरकार की जरूरत है। राज्य आर्थिक पक्ष से दूसरे राज्यों से बहुत ही पिछड़ता जा रहा है। इसे बचाने के लिए भाजपा को मौका देने की जरूरत है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">बरनाला से भाजपा अच्छी लीड के साथ जीतेगी : धीरज कुमार</h4>
<p style="text-align:justify;">विधान सभा हलका बरनाला से भाजपा के उम्मीदवार(Politicians) धीरज कुमार ने कहा कि डेरा सच्चा सौदा सिरसा पहुंचकर उनको बहुत खुशी हुई। यहां का अनुशासन और प्यार देखकर वह बहुत ही ज्यादा प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि बरनाला विकास पक्ष से बहुत ही पिछड़ा हुआ है। मौजूदा विधायक ने बरनाला के विकास के बारे में कभी सोचा ही नहीं और लोगों को धोखा दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा विधायक ने शहना रोड पर टोल प्लाजा को हटवाने के नाम पर फर्जी धरना दिया और बाद में सौदेबाजी कर उठा लिया गया, जिससे लोगों को कोई न्याय नहीं मिला। उन्होंने बरनाला के लोगों के मिल रहे साथ का हवाला देते अच्छी लीड के साथ जीत प्राप्त करने का दावा किया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">डेरा सच्चा सौदा आता रहता हूँ : राजेश पठेला</h4>
<p style="text-align:justify;">विधान सभा हलका श्री मुक्तसर साहब से राजेश पठेला ने कहा कि वह लम्बे समय से डेरा सच्चा सौदा आ रहे हैं और आशीर्वाद ले रहे हैं। डेरा सच्चा सौदा की ओर से किए जा रहे मानवता भलाई कार्य लोगों के लिए आदर्श बन रहे हैं। इन भलाई कार्यों से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। उन्होंने कहा कि श्री मुक्तसर साहब समस्याओं के साथ घिरा हुआ है। आजादी को 70 साल हो गए परन्तु लोगों को पीने वाला शुद्ध पानी मुहैया नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि यहां से जो भी उम्मीदवार जीत कर जाते हैं। उन्होंने इन समस्याओं की तरफ ध्यान ही नहीं दिया यदि जनता मुझे मौका देती है तो पीने वाले पानी और निकासी की समस्या का हल सबसे पहले किया जाएगा और हलके में रह कर विकास करवाया जाएगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">बेअदबी की घटनाओं के पीछे राजनीतिक चाल: गौरव कक्कड़</h4>
<p style="text-align:justify;">विधान सभा हलका फरीदकोट से भाजपा के उम्मीदवार गौरव कक्कड़ ने कहा कि मैं डेरा सच्चा सौदा के साथ बचपन से ही जुड़ा हुआ हूँ। मैं सलाबपुरा सत्संग सुनता रहा हूँ। डेरा सच्चा सौदा की तरफ से किये जा रहे मानवता भलाई के कार्यांे के चलते बहुत जरूरतमंद लोगों को फायदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि पंजाब में हुई बेअदबी की घटनाएं बहुत ही निंदनीय हैं। इन घटनाओं के पीछे बड़ी राजनीतिक चाल है। अब तक इन घटनाओं की जांच के नाम पर बहुत से बेकसूरों पर अत्याचार किया गया है, जो कि राजनीति से प्रेरित है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हमारी सरकार आती है तो राजनीति से ऊपर उठकर बेअदबी के असली दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि फरीदकोट हलके को अकाली दल और कांग्रेस ने हमेशा लूटा और नशा बांटा है। झूठे वायदे कर सरकार बनाई थी, जिसकी अब पोल खुल चुकी है और लोग इनको घरों में नहीं घुसने दे रहे। उन्होंने कहा कि यदि हमारी सरकार बनती है तो केंद्र से बड़े पैकेज लाकर फरीदकोट में इंडस्ट्री लगाई जाएगी, जिससे बेरोजगारी की समस्या जल्दी हल कर देंगे।</p>
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                <pubDate>Sun, 06 Feb 2022 22:01:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>भाषा की मर्यादा खोते राजनेता&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने है की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/politicians-losing-the-dignity-of-language/article-12962"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/dignity-of-language.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने है की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने दायरे को क्यों भूल जात हैं? वैसे देखें तो देश में राजनेता न केवल आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपितु राजनीति का अर्थ ही नेतृत्व करना होता। फिर ऐसे में राजनेताओं की देश के मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"><strong>सोनम लववंशी</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">ततत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर दृष्टि डालें तो राजनीतिक सरगर्मी उफान पर है। सियासत के सुरमा जिक्र तो लोक कल्याण और समावेशी विकासों का करते है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के बदलते भारत की राजनीति भी करवटें बदल रही है। विपक्ष तो विपक्ष सत्ता पक्ष भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कब राजनीति की नैतिकी और सिद्धांतों को धत्ता बता दे। यह पता ही नहीं चलता। ऐसे में अभिव्यक्ति के नाम पर अनर्गल बयानबाजी ने राजनीति की शुचिता आदि को तार-तार कर दिया हैं। बोल के लब आजाद है तेरे पंक्ति का शोर आजकल राजनैतिक आबोहवा में काफी गुंजित हो रहा… ऐसे में मालूम तो यही पड़ता कि जब मशहूर शायर फैज अहमद फैज ने इन पंक्तियों को लिखा होगा तो शायद ही कभी ये सोचा होगा कि देश के राजनेता उनकी इस पंक्ति के सहारे शब्दों की सारी मर्यादा लांघ जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अमर्यादित भाषा के वायरस से पीड़ित हो चुका है। जो उसके लिए बहुत बड़ी विडंबना वाली बात है। राजनीति का अर्थ यह तो कतई नहीं होता कि सियासतदां एक-दूसरे के निजी जीवन पर आक्षेप करने लग जाएं। राजनीति सदियों से हमारे समाज का अंग रही है। फिर हमारे सियासत के सूरमा लोकतंत्र के भीतर राजनीति के सिद्धांतों को तिलांजलि क्यों दे रहें। आज जिस दौर में भारतीय राजनीति में भाषा की गिरावट अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच गयी है। राजनेताओं के बोल बिगड़ते जा रहे हैं। उन्हें दूसरे राजनीतिक दल के नेताओं को बुरा बोलने में कोई बुराई नजर नहीं आती है। फिर सवालों की एक लंबी फेहरिस्त उत्पन्न होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या उसके उत्तर हमारे लोकतांत्रिक पहरुओं के पास हैं? पहला सवाल अभिव्यक्ति की आजादी ये तो नहीं कहती कि आप किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के मान को भंग करें? फिर आखिर ऐसा क्यों होता है? राजनीति निजी दुश्मनी अदा करने का कोई अखाड़ा भी नहीं। फिर अमर्यादित होने का क्या निहितार्थ? जब संवैधानिक व्यवस्था में राजनीति का जन्म देश को सुचारू रूप से आगे ले जाने के लिए हुआ। फिर मूल उद्देश्य को क्यों बिसार देते है राजनीति के सिपहसालार? इसके अलावा जब भाषा हमारे सामाजिक परिवेश का स्तर तय करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाषा हमारी सोच का पैमाना होती है। तो राष्ट्रीय पार्टियों के सरीखे नेता बदजुबानी करके समाज और वैश्विक परिदृश्य को क्या यह दिखाना चाहते हैं कि हम तो जुबानी रूप से असभ्य हैं ही, इससे ही भारत भूमि के बारे में अंदाजा लगा लीजिए? अगर ऐसे कुछ विचार हमारे नेताओं के हैं तो उन्हें अपने बारे में न सोचकर एक मर्तबा देश की संस्कृति और परम्परा की तो सुध लेनी चाहिए खुले मंचों पर अमर्यादित बयानबाजी करने से, क्योंकि यह हमारे देश की छवि को निकृष्ट करने का कार्य करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना है यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने दायरे को क्यों भूल जाते है? वैसे देखें तो देश में राजनेता न केवल आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपितु राजनीति का अर्थ ही नेतृत्व करना होता। फिर ऐसे में राजनेताओं की देश के मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर उस दायित्व को वे क्यों भूल जाते है? यह समझ से परे है। एक मिनट के लिए राजनीति को दरकिनार करके बात करते हैं। छोटे बड़े का मान-सम्मान करना तो हमारी पुरातन संस्कृति का हिस्सा सदैव रहा है। फिर लोक जीवन में तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। लेकिन हमारे देश के नेताओं को पता नहीं किसकी नजर लग गई है, कि वे एक-दूसरे पर बदजुबानी करने से बाज नहीं आते। इक्कीसवीं सदी में यह वायरस और तेजी से बढ़ रहा, जो काफी चिंताजनक है। आज दूसरे दल के नेताओं के प्रति सम्मान समाप्त हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक राजनीतिक बदजुबानी की बानगी पेश करते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष जब देश के प्रधानसेवक को डंडे से मारने की धमकी दे दे, तो यह समझा जा सकता है कि देश किस दिशा में बढ़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो कुर्सी का खेल मुगलई दौर का होता जा रहा। बनिस्बत अंतर इतना है, तब तलवार का बोलबाला था और आज संवैधानिक लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक बदजुबानी का।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक बात स्पष्ट हो। राजनेताओं के बोल बिगड़ने का यह मसला कोई नया नहीं है। देश की आम सड़कों से लेकर चुनावी सभाओं तक राजनेताओं के बोल असंयमित होते जा रहे हैं। राजनेता अब चुनावी वादों से चुनाव जीतने की बजाय विपक्षी दल पर अभद्र टिप्पणी के जरिये चुनावी रण फतह करने की राह में आगे बढ़ रहे हैं और उनके इन सपनों को साकार करने में हर मीडिया बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। टीवी और सोशल मीडिया इस दुष्प्रचारक का न सिर्फ गवाह बना है, बल्कि इसके विस्तार में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ा सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा। सवाल उसके हो जाने के बाद के रिएक्शन का है । डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि ‘‘लोकराज, लोकलाज से चलता है।’’ आज प्रखर समाजवादी नेता के विचारों को उन्हीं के खेवनहार डुबो रहे यह बड़े ताज्जुब की बात है। यहां अतीत के पन्नो में जाकर देखें तो सन 1964 में लोकसभा में आचार्य कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि- जवाहरलाल कहते हैं कि चीन ने जो हमारी जमीन छीनी है, वहां कुछ पैदा नहीं होता था। जवाहरलाल के सिर पर भी बाल नहीं तो क्या उनकी गर्दन काट लें?</p>
<p style="text-align:justify;">अगर यहीं से राजनीति में बदजुबानी के युग की शुरूआत मान लें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगा। ये सिलसिला आज तक चला आ रहा है। पहले समाजवादी पार्टी पर ही आरोप लगते थे कि उनकी भाषा मर्यादित नहीं है , लेकिन वर्तमान समय की बात करें तो हर राजनीतिक दल ने भाषा की सारी मर्यादा को पार कर दिया है। देश की सेना से लेकर देश के प्रधानसेवक तक पर असभ्य टिप्पणियां की जाने लगी हैं। महिलाओं के प्रति तो मर्यादा की सारी सीमाओं को नेता पहले से ही पार करते आएं हैं, लेकिन अफसोस कि उन्हें इसमें न ही कोई बुराई नजर आती और न ही माफी मांगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अगर इक्कीसवीं सदी में राजनेता अपनी राह से भटक गए हैं। तो उन्हें सही राह दिखाने का काम अवाम को उठाना होगा। उन्हें याद दिलाना होगा, कि लोकतंत्र में जुबानी तीर का कोई औचित्य नहीं, बल्कि देश की भलाई का कार्य करना होगा। इसके अलावा अगर चुनाव आयोग शक्ति से ऐसे नेताओं से पेश आएं जो राजनैतिक बदजुबानी करते हैं। उनके चुनावी भविष्य पर विराम आदि लगाने जैसी कुछ व्यवस्था करें तो शायद अमर्यादित बोल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम आने बन्द हो जाएं।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Feb 2020 21:09:00 +0530</pubDate>
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                <title>आसान नहीं आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं पर नकेल</title>
                                    <description><![CDATA[पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह बेहद महत्वपूर्ण है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के राजनेताओं पर नकेल कसने के उद्देश्य से निर्वाचन आयोग ने हलफनामे का नया प्रारूप जारी कर दिया है। हालांकि पिछले अनुभवों को देखें तो ऐसा लगता नहीं है कि राजनीतिक दलों को इससे कोई फर्क पड़ता है। क्योंकि अब से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/not-easy-to-crack-on-criminal-background-politicians/article-6333"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/not-easy-to-crack-on-criminal-background-politicians-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह बेहद महत्वपूर्ण है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के राजनेताओं पर नकेल कसने के उद्देश्य से निर्वाचन आयोग ने हलफनामे का नया प्रारूप जारी कर दिया है। हालांकि पिछले अनुभवों को देखें तो ऐसा लगता नहीं है कि राजनीतिक दलों को इससे कोई फर्क पड़ता है। क्योंकि अब से पहले न जाने कितने दागियों के दाग-धब्बे धोकर पार्टियों ने उन्हें पवित्र घोषित किया और जनता ने इस पर मुहर लगाकर उन्हें संसद भेज दिया है। कई नियम ऐसे हैं, जो पहले से लागू हैं, लेकिन हर चुनाव में हर राजनीतिक दल उनकी धज्जियां उड़ाता है। अलबत्ता इस बार थोड़ा काम बढ़ गया है। प्रत्याशी को न केवल यह बताना होगा कि उसके खिलाफ कितने मामले अदालत में चल रहे हैं बल्कि वोटिंग के दो दिन पहले यानी चुनाव प्रचार खत्म होने के साथ अखबारों और टीवी चैनलों में कम से कम तीन बार इससे संबंधित विज्ञापन भी प्रसारित कराने होंगे। प्रत्याशी ने ऐसा किया है इसका हलफनामा भी उसकी राजनीतिक पार्टी को देना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां मामला थोड़ा टेढ़ा है, 48 घंटे पहले अपने प्रत्याशी की कुंडली देखकर जनता का मन बदल भी सकता है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार राजनीतिक दल ऐसे नेताओं को उम्मीदवार बनाने से बचेंगे। क्योंकि अभी तक ऐसा कोई मामला फिलहाल प्रकाश में नहीं आया है कि संभावित प्रत्याशियों के खिलाफ चल रहे मामलों को राजनीतिक बताकर खत्म कर दिया गया हो। सिर्फ उत्तरप्रदेश में ऐसी खबरें आई थीं कि योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी कार्यकतार्ओं पर लगे कई मुकदमें वापस ले लिए हैं, लेकिन ताजा मामले में राजनीतिक दल बहुत अधिक सतर्क हों, ऐसा लगता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। वैसे यह आदेश पहले दिया गया था, लेकिन सिर्फ 16 राज्यों ने इसकी जानकारी दी है बाकी चुप्पी साधे हुए हैं। अभी पांच राज्यों में चुनाव हैं, ताजा-ताजा आदेश है इसलिए संभव है कि कुछ पालन हो जाए लेकिन भविष्य को लेकर यह भरोसा कम नहीं हो रहा है कि प्रत्याशी और पार्टियां अपराधिक मामलों को विज्ञापन प्रकाशित कराने के मामले में कोई न कोई रास्ता निकालने का जुगाड़ कर लेंगी।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Oct 2018 12:38:37 +0530</pubDate>
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                <title>आपराधिक प्रकृति के राजनेताओं पर लगे अंकुश</title>
                                    <description><![CDATA[देश के दागी सांसद व विधायकों के खिलाफ लंबित अपराधिक मामलों को सालभर में निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपना लिया है। अब शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि विशेष त्वरित न्यायालयों के गठन की वह स्वयं निगरानी करेगी। इस नाते न्यायालय ने 18 राज्यों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/criminal-trafficking-of-politicians/article-5980"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/editoral.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के दागी सांसद व विधायकों के खिलाफ लंबित अपराधिक मामलों को सालभर में निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपना लिया है। अब शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि विशेष त्वरित न्यायालयों के गठन की वह स्वयं निगरानी करेगी। इस नाते न्यायालय ने 18 राज्यों के मुख्य सचिवों सहित उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश देते हुए कहा है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित अपराधिक मामलों की जानकारी दें और इस बारे में शपथ-पत्र भी प्रस्तुत करें। इन अदालतों के गठन पर केंद्र सरकार के जबाव से न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की तीन सदस्यीय पीठ असंतुष्ट है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पीठ में नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ भी सदस्य हैं। अदालत की इस सख्ती से अपराधी सांसद और विधायकों की राजनीति से विदाई की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि केंद्र सरकार ने 12 विशेष अदालतों के गठन का निर्णय लेते हुए 7.8 करोड़ रुपए का आवंटन मंजूर किया हुआ है, लेकिन ये अदालतें सुचारु रूप से अपना काम शुरू नहीं कर पाई हैं। बीते तीन-चार दशकों के भीतर राजनीतिक अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। महिलाओं से बलात्कार, हत्या और उनसे छेड़छाड़ करने वाले अपराधी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लूट, डकैती और भ्रष्ट कदाचरण से जुड़े नेता भी विधानमंडलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। 2014 के आम चुनाव और वर्तमान विधानसभाओं में ही 1581 सांसद और विधायक ऐसे हैं, जो अपराधी होते हुए भी संवैधानिक प्रकिया में सर्वोच्च हिस्सेदार हैं। यह कोई कल्पित अवधारणा नहीं, बल्कि इन जनप्रतिनिधियों ने स्वयं ही अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा प्रत्याशी के रूप में निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत किए शपथ-पत्रों में किया है। साफ है, राजनीति से जुड़े समुदाय की छवि और शाख संदिग्ध है। इन्हें देश के भविष्य के लिए हर हाल में उज्ज्वल होना ही चाहिए। हमारी कानूनी व्यवस्था में विरोधाभासी कानूनी प्रावधानों के चलते सजायाफ्ता मुजरिमों को आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की मांग उठती रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन सार्थक परिणाम अब तक नहीं निकल पाए हैं। यही वजह है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर अपराधी प्रवृत्ति के राजनीतिक लोग प्रभावी होते चले जा रहे हैं। वैसे भी देश का जितना बड़ा भूगोल और संसद, विधानसभाओं और पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं, उस अनुपात में प्रत्येक जिले में विशेष अदालत खोलना आसान नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें इनका ढांचा खड़ा करने के लिए अर्थ की कमी का बहाना भी करेंगी। दूसरे, हमारे यहां पुलिस हो या सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेंसी, इनकी भूमिकाएं निर्लिप्त नहीं होती हैं। साफ है, आपराधिक प्रकृति के राजनेताओं पर अंकुश लगे, तब कहीं साफ-सुथरी छवि के लोगों को राजनीति में आने के अवसर की संभावनाएं बढ़ेंगी?</p>
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                <pubDate>Tue, 18 Sep 2018 09:32:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>नेताओं की मानें तब राजनीति का तात्पर्य सरकारी सुविधाएं</title>
                                    <description><![CDATA[आखिर नाराजरकार ने विधायकों को अध्यक्ष बनाने का विधायकों को मनाने के लिए पंजाब की कांग्रेस स निर्णय लिया है। कैबिनेट ने इस संंबंध में बिल को मंजूरी दे दी है और विधानसभा में पास होने के बाद बिल कानून में बदल जाएगा। वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल जो अतिरिक्त खर्चों के सख्त विरोधी माने जाते थे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/belongs-to-politicians-then-politics-means-government-facilities/article-5542"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/panjab-sarkar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आखिर नाराजरकार ने विधायकों को अध्यक्ष बनाने का विधायकों को मनाने के लिए पंजाब की कांग्रेस स निर्णय लिया है। कैबिनेट ने इस संंबंध में बिल को मंजूरी दे दी है और विधानसभा में पास होने के बाद बिल कानून में बदल जाएगा। वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल जो अतिरिक्त खर्चों के सख्त विरोधी माने जाते थे और जिन्होंने अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल में अपना मंत्री का पद भी इसी कारण छोड़ दिया था, आज चुप या बेबस हैं। मनप्रीत इस विचारधारा के सख्त ख्लिाफ रहे हैं कि पंजाब का भला विभिन्न प्रकार की सब्सिीडी को घटाने में है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस में शामिल होने के वक्त चुनावी मैनीफैस्टो में उनकी छाप भी स्पष्ट थी। कांग्रेस ने वीआईपी कल्चर खत्म करने व खर्च घटाने का नारा दिया था लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस सरकार भी पारम्परिक रंग में लौटती नजर आई। सलाहकार व बोर्डों के अध्यक्षों को सरकारी सुविधाएं देने के लिए नए रास्ते निकाले गए। वैसे यह बात नहीं कि ऐसा केवल कांग्रेस कार्यकाल में हुआ है।पिछली अकाली-भाजपा सरकार ने मुख्य संसदीय सचिवों, अध्यक्षों व सलाहकारों की फौज खड़ी कर नए सभी विधायकों को पदों पर बिठा दिया था। कांग्रेस की भूमिका इसी कारण सवालों के घेरे में आ जाती है कि कांग्रेस ने अकाली दल के फिजूल खर्चों के खिलाफ आवाज बुलंद कर चुनावी मैनीफैस्टो में खर्च घटाने का</p>
<p style="text-align:justify;">वायदा किया था। सरकार बनाने के बाद कांग्रेस ने नींव पत्थर नहीं रखे और उद्घाटन समारोह न करने के फैसले को अमली रूप भी दिया लेकिन जब मंत्रियों की संख्या बढ़ाने की बात आई तब कांग्रेस में ऐसी हलचल हुई कि आधा दर्जन विधायक नाराज होकर बैठ गए। कई विधायक दिल्ली भी पहुंचे। मुख्यमंत्री को बार-बार कहना पड़ा कि नाराज विधायकों को कोई ओर पद दे देंगे। हैरानी की बात है कि जनता को रोजगार देने की बजाय सरकार विधायकों को पद व सरकारी सुविधाएं देने के लिए कोई न कोई कानूनी पेंच खोज रही है। राज्य में बुढ़ापा पैंशन और अन्य अदायगियां लंबित हैं। केंद्र से बार-बार वित्तीय मदद की मांग की जा रही है लेकिन इधर अर्थशास्त्रीय सिद्धांत नजर नहीं आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल न केवल पंजाब बल्कि देश की राजनीति में यह रीत बन गई है कि राजनीति का दूसरा नाम सरकारी सुविधाएं हैं। अकालियों का ‘राजनीति नहीं, सेवा’ का नारा भी खोखला साबित हुआ था, जिसका कांग्रेस ने उस वक्त कड़ा विरोध किया था। अब कांग्रेस भी उसी राह पर चल पड़ी है। पंजाब के आर्थिक हालात मजबूत सुधरते दिखाई नहीं दे रहे।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Aug 2018 08:37:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजनेताओं में नहीं रही त्याग की भावना</title>
                                    <description><![CDATA[लाल बहादुर शास्त्री देश के गृहमंत्री रहे हैं लेकिन गृहमंत्री होते हुए भी उनके पास अपना घर नहीं था। वह समय था सादगी व आम आदमी का। अमीर न होने के बावजूद वह राजनीति में कामयाब हुए व प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे। आज के जमाने में देश में करोड़ों लोगों के पास अपने घर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/politicians-do-not-have-a-feeling-of-relinquishment/article-3921"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/sc.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लाल बहादुर शास्त्री देश के गृहमंत्री रहे हैं लेकिन गृहमंत्री होते हुए भी उनके पास अपना घर नहीं था। वह समय था सादगी व आम आदमी का। अमीर न होने के बावजूद वह राजनीति में कामयाब हुए व प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे। आज के जमाने में देश में करोड़ों लोगों के पास अपने घर नहीं है। गरीब के अलावा मध्यम वर्गीय भी अपने घर के लिए बड़ी मेहनत कर रहा है। ऐसे हालातों में अगर किसी राज्य का कोई पूर्व मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद भी सरकारी बंगला न छोड़े तो हैरानी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी बंगले खाली करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सुप्रीम कोर्र्ट की दखल के बाद सरकारी बंगला खाली किया है। इसी तरह मायावती, नारायण दत्त तिवाड़ी, राजनाथ सिंह उन नेताओं में शामिल हैं, जिनको सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी बंगला खाली करने के निर्देश दिए थे। पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने सरकारी बंगले में रिहायश बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच की है। इधर पंजाब की पूर्व मुख्यमंत्री बीबी राजिन्द्र कौर भट्ठल के पास भी सरकारी रिहायश है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी रिहायश खाली न करने की समस्या सिर्फ पंजाब या उत्तर प्रदेश की ही नहीं बल्कि लगभग संसद सदस्यों से लेकर देश भर में है। इस घटना चक्कर ने राजनीति के नकारात्मक पहलू को भी उजागर किया है। राजनेता सत्ता को सेवा की बजाए इसे अपना अधिकार समझने लगे हैं। सरकारी बंगले जनता की खून-पसीने की कमाई से ही बनते हैं। जनता के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। राजनीति में कभी त्याग भावना नहीं होती थी। नेता कुछ अपनी जेब से देकर भी जनता की सेवा करते थे लेकिन अब चलन हो गया है कि, जितना मिलता है ले लो।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने अच्छी पहल पेश की है। उन्होंने मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह द्वारा सरकारी रिहायश की पेशकश को यह कहकर स्वीकार नहीं किया था कि इस संबंधी कोई नियम नहीं है। वैसे भी आज के बहुत से राजनेता बहुत अमीर हैं, जिनके पास जमीन-जायदादें होने के साथ-साथ फैक्ट्रियां भी हैं। राजनीति में गरीब तो कोई-कोेई नेता ही रहा है, व न ही गरीब राजनीति में कामयाब होने का सपना देख सकता है। फिर भी अगर कोई राजनीति में अपनी जिम्मेवारी निभाता है तो तय समय के बाद उसे सरकारी रिहायश खाली कर नियमों का सम्मान करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 Jun 2018 08:09:42 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बोफोर्स डील: 31 साल बाद नेताओं के रोल पर नया खुलासा</title>
                                    <description><![CDATA[बोफोर्स केस की दोबारा जांच | Bofors Deal नई दिल्ली: रिपब्लिक टीवी ने बोफोर्स केस (Bofors Deal) के 31 साल बाद एक खुलासा किया है। अपनी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी में उन्होंने बोफोर्स केस के स्वीडन के चीफ इन्वेस्टिगेटर स्टेन लिंडस्टॉर्म के टेप रिलीज किए हैं। चीफ इन्वेस्टिगेटर ने बोफोर्स डील में नेताओं के रोल के बारे में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/bofors-deal-new-revelations-of-politicians/article-2551"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/bofors-deal.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:justify;">बोफोर्स केस की दोबारा जांच | Bofors Deal</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong> रिपब्लिक टीवी ने बोफोर्स केस <strong>(Bofors Deal)</strong> के 31 साल बाद एक खुलासा किया है। अपनी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी में उन्होंने बोफोर्स केस के स्वीडन के चीफ इन्वेस्टिगेटर स्टेन लिंडस्टॉर्म के टेप रिलीज किए हैं। चीफ इन्वेस्टिगेटर ने बोफोर्स डील में नेताओं के रोल के बारे में बताया है। सीबीआई ने 14 जुलाई को कहा था कि सुप्रीम कोर्ट या केंद्र सरकार ऑर्डर दे वह तभी बोफोर्स केस की दोबारा जांच करेगी। इससे पहले 13 जुलाई को सीबीआई के डायरेक्टर आलोक कुमार वर्मा संसद की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) से जुड़ी सब-कमेटी के सामने पेश हुए थे। जिसने उन्हें यह केस दोबारा खोलने की सलाह दी थी।  डिफेंस से संबंधित इस सब-कमेटी के प्रेसिडेंट बीजू जनता दल के सांसद भर्तृहरि मेहताब हैं।</p>
<h1 style="text-align:justify;">क्या था बोफोर्स कांड? | Bofors Deal</h1>
<ul style="text-align:justify;">
<li style="text-align:justify;">भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हासिल करने के लिए 80 लाख डालर (करीब 51.5 करोड़ रुपए) की दलाली चुकाई थी।</li>
<li style="text-align:justify;">उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, पीएम राजीव गांधी थे।</li>
<li style="text-align:justify;">स्वीडन के रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया।</li>
<li style="text-align:justify;">बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स कांड के नाम से जाना जाता हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताए जाने वाले इटली के कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोची ने इस मामले में बिचौलिए की भूमिका अदा की।</li>
<li style="text-align:justify;">दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला।</li>
<li style="text-align:justify;">कुल 410 बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डॉलर (करीब 8380 करोड़ रुपए) का था।</li>
<li style="text-align:justify;">चित्रा सुब्रमण्यम इंडियन जर्नलिस्ट हैं। उन्होंने बोफोर्स-इंडिया होवित्जर डील (बोफोर्स कांड) का खुलासा किया था।</li>
<li style="text-align:justify;">वे रिपब्लिक टीवी के साथ काम कर रही हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">चित्रा को जर्नलिज्म के लिए बीडी गोयनका और चमेली देवी अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली हाईकोर्ट ने बोफोर्स केस की जांच बंद करने का ऑर्डर दिया था, तब सीबीआई सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं गई? इस पर उन्होंने कहा कि सीबीआई ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का भी मन बना लिया था, लेकिन उस वक्त की यूपीए सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/bofors-deal-new-revelations-of-politicians/article-2551</link>
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                <pubDate>Sun, 23 Jul 2017 02:08:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेईमानों को ‘राजनीतिक कवर’ दे रहे कुछ नेता</title>
                                    <description><![CDATA[नोटबंदी मुद्दा : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष पर बोला तीखा हमला, देश के आमजन को सराहा Varanasi: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं पर ‘पाकिस्तान की तरह’ रणनीति अख्तियार करने और बेईमानों को बचाने के लिए ‘राजनीतिक कवर’ देने का आरोप लगाया। मोदी ने वीरवार को अपने ससंदीय […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/dishonest-political-cover-to-give-politicians/article-620"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/huge-modi.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li><strong>नोटबंदी मुद्दा : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष पर बोला तीखा हमला, देश के आमजन को सराहा</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>Varanasi: </strong>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं पर ‘पाकिस्तान की तरह’ रणनीति अख्तियार करने और बेईमानों को बचाने के लिए ‘राजनीतिक कवर’ देने का आरोप लगाया। मोदी ने वीरवार को अपने ससंदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के स्वतंत्रता भवन सभागार में आयोजित संस्कृति महोत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान घुसपैठियों को भेजने के लिए सीमा पर फायरिंग शुरु कर देता है। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमारी सेना उधर बिजी हो जाती है और आतंकवादी लपककर घुस जाते हैं। पाक सेना घुसपैठियों को ‘कवर’ देती है। ठीक इसी तरह बेईमानों को बचाने के लिए अपने देश में ‘राजनीतिक कवर’ दिया जा रहा है।’ उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि जेबकतरा जैसे ही पाकेट मारता है, उसके साथ के लोग पुलिस को बरगलाने के लिए दूसरी तरफ चोर-चोर का शोर मचाते हैं। पुलिस का ध्यान भटकते ही जेबकतरा निकल जाता है। बेइमानों को बचाने के लिए न जाने कैसी कैसी तरकीब अपनाई जा रही हैं।<br />
मोदी ने कहा, ‘मैंने सोचा नहीं था कि कुछ राजनेता और कुछ राजनीतिक दल बेईमानों के साथ खड़े हो जाएंगे।’ उन्होंने कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि मोदी जी ने इतना बडा निर्णय ले लिया, उनको अनुमान ही नहीं था कि इसमें काफी दिक्कतें आएंगी। उनका कहना था कि दिक्कतों का अनुमान तो था लेकिन एक चीज का आभास नहीं था कि कुछ लोग बेईमानों की तरफ से खड़े हो जाएंगे।<br />
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बगैर कटाक्ष किया, ‘एक युवा नेता अभी भाषण सीख रहे हैं। जबसे उन्होंने बोलना शुरु किया, तबसे मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि 2009 के पहले पता ही नहीं चलता था कि इस पैकेट में क्या-क्या है। अब पता चल रहा है। अच्छा किया उन्होंने बोलना शुरु कर दिया देश भूकम्प से बच गया।’<br />
उन्होंने कहा कि ‘युवा नेता’ कहते हैं कि जिस देश में 60 फीसदी अनपढ़ हो, वहां मोदी जी कैशलेस व्यवस्था कैसे लागू कर पाएंगे। उन्होंने सवाल किया कि 60 फीसदी अनपढ़ की बात करके गांधी किसका रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहे हैं। देश में सर्वाधिक समय तक शासन नहीं के परिवार ने किया है तो अनपढ़ों की संख्या इतनी कैसे रह गई।<br />
मोदी ने कहा कि देश में बड़ा सफाई अभियान चल रहा है। गंदगी का ढेर हो गया है। गंदगी के ढेर के पास से गुजरने पर दुर्गन्ध आती है। एक सीमा में दुर्गन्ध महसूस होती है लेकिन जब उसकी सफाई शुरू होती है तो वह इतनी फैलती है कि वहां से गुजरना मुश्किल हो जाता है। आजकल तरह-तरह की गंध महसूस हो रही है। मैंने गंध की सफाई का बीड़ा उठाया है। ‘भोले बाबा’ की धरती का आशीर्वाद हमारे साथ है। जनता का विश्वास मिल रहा है। गंदगी की सफाई तो होकर रहेगी।</p>
<p>मनमोहन पीएम और वित्त मंत्री रहे फिर भी आधी आबादी गरीब क्यों?<br />
मोदी ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 1970 से देश की अर्थव्यवस्था की कोर टीम में थे। डॉ. सिंह का कहना है कि जिस देश में 50 फीसदी लोग गरीब हों वहां कैशलेस व्यवस्था के लिए नई टेक्नोलॉजी कैसे लाई जा सकती है। डॉ. मनमोहन सिंह को बताना चाहिए कि 10 साल वह प्रधानमंत्री थे, देश के वित्तमंत्री थे फिर भी आधी आबादी गरीब कैसे रह गई। इसी तरह पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने कह दिया 50 फीसदी गाँव में बिजली ही नहीं है। पीएम ने व्यंग्य किया, ‘क्या बिजली का तार हमने काट दिया। क्या खंभा हमने उखाड़ दिया। भाई मेरे, हमें बताइये कि आपने यह रिपोर्ट कार्ड किसका पेश किया है। देश में 60 साल से अधिक शासन आपकी पार्टी का था, तो यह सब कैसे रह गया।’</p>
<p><strong>कालाधन फिर से न पनपे, करें सहयोग</strong><br />
प्रधानमंत्री ने कहा कि नोटबंदी के बाद जनता ने बड़ी तकलीफ झेली है। तकलीफ के बावजूद देश ईमानदारी की ओर चल पड़ा है। आठ-आठ घंटे कतार में खडेÞ होकर भी आम जनता ऊफ तक नहीं कर रही, क्योंकि वे भ्रष्टाचार को समूल नष्ट होते देखना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि राजनेताओं को समझना चाहिए कि लोग अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि देश की भलाई के लिए कतार में खड़े हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम में किसी का ‘काला मन’ खुल रहा है तो किसी का ‘कालाधन’ खुल रहा है। उन्हें विश्वास है कि देश सोने की तरह तप कर निकलेगा। मोदी ने नौजवानों से आग्रह किया कि कालाधन की सफाई तो हो रही है लेकिन यह फिर से न पनपे इसमें वे सहयोग करें। <em>Agency</em></p>
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                <pubDate>Thu, 22 Dec 2016 21:35:31 +0530</pubDate>
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