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                <title>widespread impact on the country - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>देश पर व्यापक असर डालता है लंबा चुनाव कार्यक्रम</title>
                                    <description><![CDATA[अब तक की सबसे लंबी चुनाव प्रक्रिया ने आम आदमी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। लंबा चुनाव कार्यक्रम होने से आम आदमी के जीवन पर बड़ा असर पड़ता है। आम आदमी के साथ ही साथ कारोबारी और उद्योग जगत पर भी लंबा असर डालता है। जानकारों के मुताबिक बहुत लंबा चुनाव अभियान थकाऊ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/widespread-impact-on-the-country/article-9129"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-05/untitled-15-5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अब तक की सबसे लंबी चुनाव प्रक्रिया ने आम आदमी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। लंबा चुनाव कार्यक्रम होने से आम आदमी के जीवन पर बड़ा असर पड़ता है। आम आदमी के साथ ही साथ कारोबारी और उद्योग जगत पर भी लंबा असर डालता है। जानकारों के मुताबिक बहुत लंबा चुनाव अभियान थकाऊ और उबाऊ हो जाता है। आखिरी चरण आते-आते तक मूल मुद्दे तो लुप्त हो जाते हैं और व्यर्थ की रस्साखींच प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। आरोप-प्रत्यारोप भी नीतिगत न होकर व्यक्तिगत स्तर पर आ जाते हैं। खिलाड़ी भावना की जगह शत्रुता का भाव दिखाई देने लगता है। विभिन्न दलों ने अपने जो घोषणापत्र मतदान के पहले जारी किये थे उनमें किये गये वायदे उनके नेताओं को ही याद नहीं रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी वजह भी यही है कि लम्बे चुनाव अभियान के चलते राजनीतिक दलों और उसके नेताओं की जमीनी पकड़ और विश्वसनीयता में जबरदस्त कमी आई है। बेहतर हो इस चुनाव के बाद चुनाव आयोग इस बारे में विचार करते हुए चुनाव कार्यकम को संक्षिप्त करने की कार्ययोजना बनाये। इसके अलावा एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर भी राष्ट्रीय विमर्श शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि हर समय चुनाव की वजह से देश का वातावारण लगातार विषाक्त होता जा रहा है। विकास परियोजनाओं में विलम्ब के साथ ही संवेदनशील मुद्दों पर अनिर्णय की स्थिति का एक कारण भी चुनाव ही हैं वरना राम जन्मभूमि जैसा विवाद कभी का सुलझ गया होता।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबा चुनाव कार्यक्रम होने से राजनीतिक गुंडों को अधिक शरारत पैदा करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए अब अधिक समय मिल रहा है। अभियान कटु और अधिक तीखे हो गए हैं। यदि इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे विशाल आबादी वाले देश एक ही दिन में अपना चुनाव पूरा कर सकते हैं, तो भारत अपनी दुर्जेय चुनाव मशीनरी के साथ चुनावी प्रक्रिया को छोटा क्यों नहीं कर सकता है? पिछले कुछ वर्षों में समग्र चुनाव खर्च में भारी वृद्धि के बावजूद, सामान्य अर्थव्यवस्था को बाजार में धन की अचानक आपूर्ति में वृद्धि से लाभ ही होता है। आर्थिक गतिविघियां तेज हो जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कई अस्थायी रोजगार अवसर पैदा हो जाते हैं। कुछ उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। हालांकि कुछ नुकसान भी होते हैं। सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता कम हो जाती है और सार्वजनिक परिवहन अधिक महंगे और दुखदाई हो जाते हैं। लंबी चुनाव प्रक्रिया से औद्योगिक उत्पादन, निर्माण और बुनियादी ढांचे और निश्चित रूप से स्कूल और कॉलेज की शिक्षा भी प्रभावित होती है। इसके अलावा केंद्र और राज्यों में उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के लिए आदर्श आचार संहिता के अमल में आने के कारण सभी विकास कार्य भी ठप होने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इंडस्ट्री, एनवायरमेंट और नगर निगमों में लाइसेंस और मंजूरियों को जारी और रिन्यू करने का काम ठप है। सबसे ज्यादा मुश्किलें सीलिंग और फायर एनओसी के जद में आईं यूनिटों को पेश आ रही है। एन्फोर्समेंट एजेंसियां उनके खिलाफ कार्रवाई में नहीं हिचक रहीं, जबकि संबंधित विभागों में कोई सुनवाई नहीं हो रही। नगर निगमों में औद्योगिक श्रेणियों के लिए प्रॉपर्टी टैक्स की दरें अचानक बढ़ गई हैं, जबकि निगम चाहकर भी इसे अभी नहीं रोक सकते। चुनाव कार्य के लिए वाहनों को जब्त किए जाने का असर जहां परिवहन सेवाओं पर पड़ेगी, वहीं बाहर से माल नहीं आने से कारोबार भी प्रभावित होगा। वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि भी हो सकती है। वाहनों की कमी होने पर लोग रेल से यात्रा तय करते हैं। वहां के स्टेशनों तक आने-जाने के लिए वाहन की आवश्यकता पड़ेगी ही। ऐसे में परेशानी बढ़ेगी। जानकार लोगों के मुताबिक इस अवधि में बाहर से आने वाले सुरक्षा बलों की तैनाती, उनके आवासन के स्थान आदि की व्यवस्था करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए ज्यादा सुविधाजनक स्कूल-कॉलेज ही होते हैं और जिला प्रशासन इस कार्य के लिए इनके भवनों को अधिग्रहित करेगा। ऐसे में बच्चों का पठन-पाठन प्रभावित होगा। चुनाव को लेकर यह कार्य करना भी प्रशासन के की बाध्यता है। अधिकांश शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव में लग जाएगी और शिक्षण संस्थान में मतदान केन्द्र बनाए जाएंगे। चुनाव कार्य के लिए जिला प्रशासन बस, ट्रक, ट्रैक्टर, मैजिक, जीप आदि वाहनों को जब्त करेगा। इसका भी असर पड़ेगा। यहां से जब्त वाहन दूसरे जिलों में भी भेजे जा सकते हैं। इसके आलावा बीमारी-शादी आदि के लिए बैंक से आमजनों को ज्यादा रुपये निकालने पड़ते हैं। जबकि ऐसे लोगों पर निर्वाचन आयोग व आयकर की खास नजर रहती है। पुलिस की भी ड्यूटी चेकिंग में लगाई जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">1980 में चार दिवसीय लोकसभा मतदान देश का सबसे छोटा चुनाव था। इस तरह की लंबी चुनावी प्रक्रिया से कुछ लोग लाभान्वित होते हैं और कुछ को नुकसान भी होते हैं। यही अब नियति बन गई है। जिनका चुनाव शुरू में ही हो जाता है, उनके लिए ज्यादा समस्या नहीं है, लेकिन जिन उम्मीदवारों को बाद वाले चुनाव मे मतदान का सामना करना पड़ता है, उन्हें काफी कठिनाई होती है। एक तो उन्हें लंबे समय तक प्रचार करना पड़ता है। जिसके कारण उनका खर्च काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा उन्हें चिलचिलाती गरमी का सामना भी करना पड़ता है। सुरक्षा बलों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने और आने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अनेक की तो तबीयत ही खराब हो जाती है। उनपर सरकार का पैसा भी काफी खर्च होता है। इसलिए इस तरह की लंबी चुनावी प्रक्रिया से बचा जाना चाहिए। सच कहा जाय तो बाद वाले चरणों मे जब गर्मी का पारा काफी चढ़ जाएगा, तो मतदान का प्रतिशत भी कम हो जाएगा। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।<br />
<strong>शकील सिद्दीकी</strong></p>
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                <pubDate>Wed, 15 May 2019 20:50:09 +0530</pubDate>
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