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                <title>Voters - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>‘मुफ्त’ में न उलझें मतदाता</title>
                                    <description><![CDATA[देश में चुनाव भले छोटा हो या बड़ा, नेता लोग मतदाताओं को तमाम जरू री बातें, मुद्दों, समस्याओं से भुलावा देकर ‘मुफ्त’ पर ला खड़ा करते हैं। अभी दिल्ली में विधानसभा चुनाव हैं जो कि 8 फरवरी को सम्पन्न हो जाएंगे। दिल्ली में अभी सबसे गंभीर समस्या प्रदूषण एवं भीड़ की है। पूरी दिल्ली दूषित […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/voters-should-not-involve-in-free/article-12943"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/voters.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">देश में चुनाव भले छोटा हो या बड़ा, नेता लोग मतदाताओं को तमाम जरू री बातें, मुद्दों, समस्याओं से भुलावा देकर ‘मुफ्त’ पर ला खड़ा करते हैं। अभी दिल्ली में विधानसभा चुनाव हैं जो कि 8 फरवरी को सम्पन्न हो जाएंगे। दिल्ली में अभी सबसे गंभीर समस्या प्रदूषण एवं भीड़ की है। पूरी दिल्ली दूषित हवा एवं आवास की कमी से जूझ रही है। लेकिन पब्लिक को मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त यात्रा आदि इतने अच्छे लग रहे हैं कि सब कुछ भूल गए। इस बात में कोई दोराय नहीं कि आम आदमी पार्टी ने लोगों को अच्छी सरकार दी है। लेकिन फिर भी क्यों मतदाता वोट के लिए सब कुछ ‘मुफ्त’ चाह रहा है? राष्ट्रीय पार्टियां यहां मतदाताओं को देश के संसाधन लुटाती हैं वहीं बिना दल के नेता या किसी पार्टी में टिकिट का जुगाड़ लगा रहे नेता भीड़ जुटाने के लिए मुफ्त भोजन, मुफ्त कपड़े, मुफ्त बर्तन, मुफ्त इलैक्ट्रानिक सामान ही नहीं बांटते बल्कि मुफ्त नशों का भी वितरण करते हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना देश का कोई सा भी राज्य देख लीजिए ‘मुफ्त’ के लिए राजनीतिक पार्टियों, नेताओं के पीछे मतदाताओं की भीड़ लगी है। इस तरह का रूझान तब और ज्यादा चिंताजनक है जब देश का शिक्षित एवं कमाने-खाने वाला वर्ग भी ‘मुफ्त’ के लिए लालायित है। सब जानते हैं कि कोई भी नेता या पार्टी कोई भी सुविधा व सामान अपने घर से नहीं देते बल्कि वह देश का धन है जो या तो सीधे लुटाया जाता है या फिर आगे-पीछे भ्रष्टाचार से एकत्रित कर उसमें से लुटाया जाता है। चुनाव के बाद फिर यही मतदाता रोज सड़क पीटता है कि उसके यहां पानी नहीं आ रहा, बिजली नहीं है, वह चैन से सो नहीं पा रहा, उसका व उसके बच्चों का गन्दी हवा में दम घुट रहा है, सरकारी कार्यालयों में बिना रिश्वत के उसका कोई काम नहीं हो रहा। चुनाव महज सरकार नहीं चुनते यह देश एवं आने वाली पीढ़ियों का पूरा भविष्य तय करते हैं। भविष्य में कितने समय तक गरीबी रहेगी, कितना भ्रष्टाचार चलेगा, आबादी की वर्षों से चली आ रही समस्याओं का कब व कैसा हल होगा यह चुनाव तय करते हैं। देशवासियों को चाहिए कि वह चुनाव के वक्त ‘मुफ्त’ के शोर से कान बंद कर यह जरूर देखें कि जिसे वह वोट देकर विधानसभा, संसद या पंचायत में भेज रहा है क्या वह उसकी, उसके क्षेत्र की समस्याओं से वाकिफ है? चुनाव से पहले क्या वह अपने क्षेत्र के लिए कुछ कर भी रहा है ? या अचानक से किसी गली से प्रकट हुआ है, नेता की सोच व उसकी छवि कैसी है? सबसे महत्वपूर्ण कि वह व्यक्ति राजनीतिक क्षेत्र में क्यों है? जब तक मतदाता अपने द्वारा चुने जा रहे नेता पर ध्यान केन्द्रित नहीं करता ‘मुफ्त’ की कोई भी वस्तु उसके व उसके जैसों का कभी कोई भला नहीं कर सकती, न ही देश व समाज को आगे ले जा सकती है।</h4>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Feb 2020 20:58:37 +0530</pubDate>
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                <title>नोटों से वोट, आज के जमाने में बस पैसा ही खुदा है</title>
                                    <description><![CDATA[हमारे लोकतंत्र की चल रही नौटंकी में इस सप्ताह यह देखने को मिला कि राजनीति सबसे अच्छा धंधा है और हमारे नेतागणों की सबसे बड़ी संपत्ति उनकी झूठ बोलने की क्षमता है। सेन्टर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार इस बार चुनावों में भारी धनराशि खर्च की जा रही है और यदि इन चुनावों पर व्यय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/bribery-to-voters/article-8686"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-04/voting-5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हमारे लोकतंत्र की चल रही नौटंकी में इस सप्ताह यह देखने को मिला कि राजनीति सबसे अच्छा धंधा है और हमारे नेतागणों की सबसे बड़ी संपत्ति उनकी झूठ बोलने की क्षमता है। सेन्टर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार इस बार चुनावों में भारी धनराशि खर्च की जा रही है और यदि इन चुनावों पर व्यय में 40 प्रतिशत की वृद्धि होकर वह 49 हजार करोड़ रूपए तक पहंच जाए तो हैरानी नहंी होनी चाहिए। यह राशि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा अपने चुनाव पर खर्च की गई राशि से अधिक है। बाहुबल से धन बल, आज पैसा खुदा है। आज जब राजनीतिक पार्टियां अपने उम्मीदवार को उसकी जीत की क्षमता के आधार पर चुनते हैं तो उसका तात्पर्य उसकी धन बल की क्षमता और चुनावों पर खर्च करने की क्षमता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक टिकटार्थी के अनुसार यह एक तरह से प्रवेश शु:ल्क है और यह पार्टी से जुड़ने का एक साधन है हालांकि मतदाताओं की पसंद इस पर निर्भर नहंी करती है। कुछ समय पूर्व बसपा की मायावती का एक स्टिंग आपरेशन सामने आया था जिसमें उन पर टिकट बेचने का आरोप लगाया गया था। यह बताता है कि सभी उम्मीदवारों के लिए समान अवसर नहीं मिलते हैं और यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का उपहास भी उड़ाता है। संसद और राज्य विधान सभाओं में करोड़पति सदस्यों की संख्या बताती है कि नेता और पार्टियां अमीर उम्मीदवारों पर विश्वास करती हैं जो चुनाव जीत सके और इसीलिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में अधिकतर अर्थात 83 प्रतिशत करोड़पति हैं क्योंकि पार्टी का टिकट मिलने से लेकर चुनाव लड़ने, मतदाताओं को रिश्वत देने, उपहार देने, विज्ञापन, कार्यकतार्ओं पर खर्च करने, भीड़ जुटाने, गाड़ियों का काफिला तैयार करने और चुनव जीतने सब पर पैसा लगता है और यदि आप दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हो तो और अधिक पैसा लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव आयोग ने अब तक 1618.78 करोड़ रूपए का माल और नकदी जब्त किया है जिसमें 399.50 करोड़ नकदी, 162.89 करोड़ रूपए की शराब और मादक द्रव्य तथा 708.54 करोड़ रूपए का सोना चांदी और अन्य सामान है। वस्तुत: प्रतिदिन लगभग 67 करोड़ रूपए मूल्य का माल और नकदी पकड़ी जा रही है। अभी पिछले सप्ताह ही तमिलनाडू में 137 करोड़ रूपए और अरूणाचल प्रदेश में 1.8 करोड़ रूपए की नकदी पकड़ी गयी है। सेन्टर फॉर मीडिया स्टडीज के अध्ययन के अनुसार चुनावों में धन बल का प्रभाव बढता जा रहा है और इसमें सबसे कुख्यात राज्य आंध्र, कर्नाटक और तमिलनाडू हैं। इस अध्ययन के अनुसार पिछले वर्ष कर्नाटक विधान सभा चुनावों में 47 प्रतिशत मतदाताओं ने पैसा लिया। इसी तरह आंध्र प्रदेश में चुनाव सबसे महंगे साबित हो रहे हैं जहां पर हजार करोड़ रूपए से अधिक खर्च होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">गुजरात में 543.84 करोड़, तमिलनाडू में 514.57 करोड़, आंध्र प्रदेश में 216.34 करोड़, पंजाब में 1.7 करोड़ और उत्तर प्रदेश में 162 करोड़ रूपए मूल्य का माल और नकदी पकड़े गए हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि तेलंगाना में 100 से अधिक लोग इसलिए धरने पर बैठे कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता उन्हें सार्वजनकि सभाओं में शामिल होने के लिए पैसा नहीं दे पाए। इससे भी हैरानी की बात यह है कि 37 प्रतिशत मतदाताओं ने स्वीकार किया है कि वे वोट के बदले पैसा लेते हैं। हाल ही में एक स्टिंग में 18 विधायकों ने स्वीकार किया कि मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसा देते हैं। इसके अलावा स्मार्ट फोन, साइकिल, प्रेशर कुकर, सोने की चेन आदि भी मतदाताओं में बांटे जाते हैं जिसके चलते आज चुनाव पैसा का पयार्य बन गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने लोक सभा उम्मीदवार के लिए व्यय की सीमा 70 लाख रूपए और विधान सभा उम्मीदवार के लिए 28 लाख रूपए निर्धारित की है किंतु यह चुनावों पर खर्च की जा रही राशि का 1/70वां भाग भी नहंी है। कुछ दिन पूर्व भी एक चुनाव आयोग ने तमिलनाडू के वेल्लोर में चुनाव रद्द किया। उसका कारण वहां धन बल का दुरूपयोग होना था और वहां एक सीमेंट के गोदाम से 12 करोड़ से अधिक की राशि पकड़ी गयी थी। 2017 में यह आरोप लगाया गया था कि शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन ने चुनाव आयोग के अधिकारियों को भारी रिश्वत देने की पेशकश की थी ताकि अन्नाद्रमुक के दो पत्तियों का चुनाव चिह्न उन्हे मिल सके। एक पूर्व चुनाव आयुक्त के अनसार लगता है आज लोग नीतियों, विचारधारा, सिद्धान्तों और कार्यक्रमों से अधिक बल पैसे को दे रहे हैं। चिंता की बात यह है कि यह एक महामारी का रूप ले रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार उम्मीदवार के लिखित आदेश के बिना किसी व्यक्ति द्वारा चुनाव प्रचार पर खार्च करने के लिए 500 रूपए का जुमार्ना किया जाएगा और यदि कोई उम्मीदवार कानून के अनुसार चुनाव व्यय का लेखा नहंी रखता तो उस पर भी 500 रूपए का जुमार्नाा किया जाएगा। कोई भी व्यक्ति 2000 से अधिक का नकद चंदा नहंी दे सकता है जबकि अनाम स्रोतों से 20 हजार रूपए तक का चंदा लिया जा सकता है। हमारे नेता स्वयं नियम बनाते हैं और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे उनका पालन करें किंतु वो उनमें खामियां छोड़ देते हैं। प्रवर्तन एजेंसियों को इस संबंध में पर्याप्त शक्तियां प्राप्त नहंी हैं और पार्टियां अपने चंदे का हिसाब नहंी रखती हैं। पिछले सप्ताह से निर्वाचन आयोग पार्टियों के विज्ञापनों और उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि पर नजर रख रहा है किंतु इस संबंध में पार्टियां मौन हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2017-18 में भाजपा को मिले कुल चंदे में से 93 प्रतिशत 20 हजार रूपए से अधिक का है जिसमें से 80 प्रतिशत अर्थात 533 करोड़ रूपए अनाम है। कांग्रेस को केवल 267 मिलियन रूपए। भाजपा, कांग्रेस और अन्य तीन राष्ट्रीय पार्टियों को मिले कुल चंदे में से 53 प्रतिशत अनाम स्रोतों से मिला है। उद्योगपतियों और व्यक्तियों ने कांग्रेस और अन्य पांच दलों की तुलना में भाजपा को 12 प्रतिशत अधिक चंदा दिया। जब पैसे की बात आती है तो सत्ता की खातिर झूठ भी बोलने लग जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद सांसद या विधायक चुनाव आयोग को अपने शपथ पत्र में घोषणा करता है कि उसने क्रमश: 70 लाख या 28 लाख व्यय की सीमा का पालन किया है और उसके बाद झूठ का चक्कर शुरू हो जाता है और फिर जो उम्मीदवार जीतता है वह अपना पैसा वसूल करने का प्रयास करता है और अगले चुनावों के लिए पैसा जमा करने लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस व्यवस्था को शासित करने वाले नियम ऐसे हैं कि चुनाव जीतने के बाद भी नीति निर्माण में विधायकों की भूमिका कम होती है और इस पर पार्टी के कुछ लोगों का नियंत्रण होता है। वस्तुत: 1943 में अंबेडकर ने एक भविष्यवाणी की थी जिसमें उन्होंने बड़े उद्योगपतियों और व्यवसाइयों से सहायता लेने के लिए गांधी और नेहरू की आलोचना की थी और लगता है आज यह हमें सताने लगा है क्योंकि पैसा आज संगठित रूप से वसूल किया जा रहा है। आज राजनीति मनी और हनी का विषय बन गया है जिसके चलते वोटों की बिक्री आॅटो मोड पर डाल दी गयी है। चुनाव प्रचार की राजनीति जारी है और लोकतंत्र की लागत बढती जा रही है इसलिए समय आ गया है कि हम ऐसे उम्मीदवारों पर भरोसा करना बंद करें जो स्वयं को ईमानदार और नैतिकता का मसीहा बताते हैं। लोकतंत्र में संप्रभुता की रक्षक जनता है इसलिए उसे राजनीति को गंदगी से मुक्त करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए अन्यथा हमें इस कटु वास्तविकता का सामना करना पड़ेगा कि पैसा खुदा है, शराब पर्याप्त है और पैसे से कुछ भी हो सकता है। मनी है तो पावर है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>पूनम आई कौशिश</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Apr 2019 19:40:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मतदान के प्रति जागरुक हों मतदाता</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व के सभी देशों में उसके नागरिकों के मन में अपने देश के प्रति असीम प्यार की भावना समाहित रहती है। यही भावना उस देश की मतबूती का आधार भी होती है। जिस देश में यह भाव समाप्त हो जाता है, उसके बारे कहा जा सकता है कि वह देश या तो मृत प्राय: है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">विश्व के सभी देशों में उसके नागरिकों के मन में अपने देश के प्रति असीम प्यार की भावना समाहित रहती है। यही भावना उस देश की मतबूती का आधार भी होती है। जिस देश में यह भाव समाप्त हो जाता है, उसके बारे कहा जा सकता है कि वह देश या तो मृत प्राय: है या समाप्त होने की ओर कदम बढ़ा चुका है। हम यह भी जानते हैं कि जो देश वर्तमान के मोहजाल में अपने स्वर्णिम अतीत को विस्मृत कर देता है, उसका अपना खुद का कोई अस्तित्व नहीं रहता। इसलिए प्रत्येक देश के नागरिक को कम से कम अपने देश के बारे में मन से जुड़ाव रखना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल के बारे में कहा जाता है कि वहां का प्रत्येक नागरिक अपने लिए तो जीता ही है, लेकिन सबसे पहले अपने देश के लिए जीता है। इजराइल में हर व्यक्ति के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि देश के हिसाब से अपने आपको तैयार करे। इजराइल का हर व्यक्ति एक सैनिक है, उसे सैनिक का पूरा प्रशिक्षण लेना भी अनिवार्य है। यह उदाहरण एक जिम्मेदार नागरिक होने का बोध कराता है। इसी प्रकार विश्व के सभी देशों में राजनीतिक नजरिया केवल देश हित की बात को ही प्राथमिकता देता हुआ दिखाई देता है। वहां देश के काम को प्राथमिकता के तौर पर लिया जाता है। अपने स्वयं के काम को बाद में स्थान दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। यहां के राजनेता मात्र जनता के प्रतिनिधि होते हैं। ऐसे में जनता को भी यह समझना चाहिए कि हम ही भारत की असली सरकार हैं। असली सरकार होने के मायने निकाले जाएं तो यह प्रमाणित होता है कि राजनेताओं से अधिक यहां जनता की जिम्मेदारियां कुछ ज्यादा ही हैं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ यही है कि जनता को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर जनता सजग और सक्रिय नहीं रही तो राजनेता देश का क्या कर सकते हैं, यह हम सभी के सामने है। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद जिस परिवर्तन की प्रतीक्षा की जा रही थी, उसके बारे में उस समय के नेताओं ने भी गंभीरता पूर्वक चिन्तन किया, लेकिन देश में कुछ राजनेता ऐसे भी हुए जो केवल दिखावे के लिए भारतीय थे, परंतु उनकी मानसिकता पूरी तरह से अंग्रेजों की नीतियों का ही समर्थन करती हुई दिखाई देती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अंग्रेजों का एक ही सिद्धांत रहा कि भारतीय समाज में फूट डालो और राज करो। वर्तमान में भारतीय राजनीति का भी कमोवेश यही चरित्र दिखाई देता है। आज भारतीय समाज में आपस में जो विरोधाभास दिखाई देता है। उसके पीछे केवल अंग्रेजों की नीतियां ही जिम्मेदार हैं। इस सबके लिए हम भी कहीं न कहीं दोषी हैं। हमने अपने अंदर की भारतीयता को समाप्त कर दिया। स्वकेन्द्रित जीवन जीने की चाहत में हमने देश हित का त्याग कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में भारतीय समाज में केवल पैसे को प्रधानता देने का व्यवहार दिखाई देता है। हमें यह बात समझना चाहिए कि केवल पैसा ही सब कुछ नहीं होता, जबकि आज केवल पैसा ही सब कुछ माना जा रहा है। इस सबके पीछे कही न कहीं हमारी शिक्षा पद्धति का भी दोष है। जहां केवल किताबी ज्ञान तो मिल जाता है, लेकिन भारतीयता क्या है, इसका बोध नहीं कराया जाता। इसको लिए एक बड़ा ही शानदार उदाहरण है, जो मेरे साथ हुआ। मैं एक बार जिज्ञासा लिए कुछ परिवारों में गया। उस परिवार के बालकों से प्राय: एक ही सवाल पूछा कि आप बड़े होकर क्या बनना चाहोगे। इसके जवाब में अधिकतर बच्चों ने मिलते जुलते उत्तर दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी ने कहा कि मैं चिकित्सक बनूंगा तो किसी ने इंजीनियर बनने की इच्छा बताई। इसके बाद मैंने पूछा कि यह बनकर क्या करोगे तो उन्होंने कहा कि मैं खूब पैसे कमाऊंगा। लेकिन एक परिवार ऐसा भी था, जहां बच्चे के उत्तर को सुनकर मेरा मन प्रफुल्लित हो गया। उस बच्चे ने कहा कि मैं पहले देश भक्त बनूंगा और बाद में कोई और। मैं कमाई भी करूंगा तो देश के लिए और इसके लिए लोगों को भी प्रेरणा दूंगा कि आप भी देश के लिए कुछ काम करें। एक छोटे से बालक का यह चिन्तन वास्तव में जिम्मेदारी का अहसास कराता है। लेकिन क्या हम केवल एक बालक के सोच के आधार पर ही मजबूत देश का ताना बाना बुन सकते हैं। कदाचित नहीं। हम सभी को यह सोचना चाहिए कि हम जो भी काम कर रहे हैं, उससे मेरे अपने देश का कितना भला हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारा देश लोकतांत्रिक है। इस नाते इस देश के लोक को ही देश बनाने की जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा। देश में होने वाले चुनावों में हमारी भूमिका क्या होना चाहिए, इसका गंभीरता से चिन्तन भी करना चाहिए। हम जैसा देश बनाना चाहते हैं, वैसे ही उम्मीदवारों को प्रतिनिधि के तौर पर चुनना हमारा नैतिक कर्तव्य है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ऐसा करना जरुरी है। मतदान करना हमारा नैतिक कर्तव्य है आप सभी अपना मतदान करें और सही सरकार चुनें ताकि देश भ्रष्टाचार रहित हो।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत देश का एक इतिहास है कि आम लोगो में से ही कुछ लोग ही अपना मतदान करते हंै? पढ़े लिखे नागरिक संपन्न लोग मतदान करना ही नहीं चाहते हैं। इनके मतदान नहीं करने से ही देश में भ्रष्टाचार का जन्म होता है ? अनपढ़ नागरिक अपना काम देहाड़ी छोड़ कर आते हैं और अपना मतदान करते हैं? हाँ यह जरुर है कि इनको नहीं पता की सही उम्मीदवार को वोट दिया है या गलत, इन्हें बस इतना पता होता है कि हम ने वोट दिया है? हमको मतदान करते समय इस बात का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि हम अपने लिए सरकार बनाने जा रहे हैं। इसलिए स्वच्छ छवि वाले और देश हित में काम करने वाली सरकार को बनाना भी हम सबका नैतिक कर्तव्य है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में राजनीति के प्रति लोगों की उदासीनता को देखते हुए देश में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाये जाने का संकल्प लिया गया है। पर क्या मात्र इस कदम से देश में मतदाताओं में कोई जागरूकता आने वाली है ? शायद नहीं क्योंकि हम भारत के लोग कभी भी किसी बात को संजीदगी से तब तक नहीं लेते हैं जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता है। आज के समय में हर व्यक्ति सरकारों को कोसते हुए मिल जायेगा, पर जब सरकार चुनने का समय आता है तो हम घरों में कैद होकर रह जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज अगर कहीं पर कोई अनियमितता है तो वह केवल इसलिए है कि हम उसके प्रति उदासीन हैं। अगर हम अपने मतदान का प्रयोग करना सीख जाएँ तो समाज से खऱाब लोगों को चुन कर आना काफी हद तक कम हो सकता है। वास्तव में आज देश के मतदाताओं के लिए मतदान अनिवार्य किया जाना चाहिए। बिना किसी ठोस कारण के कोई मतदान नहीं करे तो उसे दंड देना चाहिए और संभव हो तो उसका मताधिकार भी छीन लेना चाहिए। <strong>सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 Mar 2019 20:16:10 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मतदाताओं को जागरूक करने के लिये पंजाब में स्वीप गतिविधि लांच</title>
                                    <description><![CDATA[चंडीगढ़ (एजेंसी)। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज? पंजाब के मुख्य चुनाव अधिकारी डा. एस करुणा राजू ने स्वीप गतिविधियां (Loksabha elections Punjab) जारी कीं। ये गतिविधियां चुनाव आयोग की तरफ से जारी हिदायतों के मद्देनज? की जाएंगी, जिससे वोटरों में जागरूकता पैदा की जा सके। डा. राजू ने बुधवार को बताया कि सिस्टमैटिक वोटर एजुकेशन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p><strong>चंडीगढ़ (एजेंसी)।</strong> आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज? पंजाब के मुख्य चुनाव अधिकारी डा. एस करुणा राजू ने स्वीप गतिविधियां (Loksabha elections Punjab) जारी कीं। ये गतिविधियां चुनाव आयोग की तरफ से जारी हिदायतों के मद्देनज? की जाएंगी, जिससे वोटरों में जागरूकता पैदा की जा सके।</p>
<p>डा. राजू ने बुधवार को बताया कि सिस्टमैटिक वोटर एजुकेशन एंड वोटर पाटीर्सीपेशन (स्वीप) को शुरू करने का मकसद वोटरों को वोट की अहमीयत और आदर्श वोटिंग करने के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने बताया कि स्वीप गतिविधियां पहले भी चलाईं जातीं हैं लेकिन इस बार गैर सरकारी संगठन , छात्र , यूथ क्लबों और कई अन्य संस्थाओं की मदद से इस गतिविधि को बड़े स्तर पर चलाया जाएगा।</p>
<p>मुख्य चुनाव अधिकारी ने बताया कि इस गतिविधि से जुड़े एनजीओज , छात्रों , यूथ क्लबों और कई अन्य संस्थाएं इस कार्य के लिए पहले से स्थापित की गई संस्थाओं के साथ मिल कर वोटरों को जागरूक करने का काम करेंगी।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 23 Jan 2019 17:11:24 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2019 चुनाव: मतदाता को मुखर होना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय लोकतंत्र राजनीति की अनेक विसंगतियों एवं विषमता में एक बड़ी विसंगति यह है कि राजनेताओं की सुविधानुसार अपनी ही परिभाषा गढ़ता रहा है। अपने स्वार्थ हेतु, प्रतिष्ठा हेतु, आंकड़ों की ओट में नेतृत्व झूठा श्रेय लेता रहा और भीड़ आरती उतारती रही। भारतीय लोकतंत्र की इस बड़ी विसंगति के कारण मतदाता या आम जनता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/elections-2019-voters-must-be-vocal/article-5995"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/elections.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र राजनीति की अनेक विसंगतियों एवं विषमता में एक बड़ी विसंगति यह है कि राजनेताओं की सुविधानुसार अपनी ही परिभाषा गढ़ता रहा है। अपने स्वार्थ हेतु, प्रतिष्ठा हेतु, आंकड़ों की ओट में नेतृत्व झूठा श्रेय लेता रहा और भीड़ आरती उतारती रही। भारतीय लोकतंत्र की इस बड़ी विसंगति के कारण मतदाता या आम जनता बार-बार ठगी जाती रही है और उसे गुमराह किया जाता रहा है। यही कारण है कि न तो राजनेता का चरित्र बन सका, न जनता का और न ही राष्ट्र का चरित्र बन सका। भारतीय राजनीति में अनेक राजनेता झूठ-फरेब, धोखाधड़ी का पर्याय बने हैं। इन स्थितियों से लोकतंत्र को निजात दिलाना होगा, अन्यथा वह कमजोर होता रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनेताओं के तमाम आदर्शवाद के दावे खोखले एवं बेबुनियाद साबित हुए है। पहले राजा रानी के पेट से पैदा होता था और अब मत पेटी से पैदा होता है। सभी अपने घोषणा-पत्रों एवं लुभावने वादों में जनता को जितना ठग सकते हैं, ठगते हैं। जनता को पांच वर्षों में अमीर बना देंगे, हर हाथ को काम मिलेगा, सभी के लिए मकान होंगे, सड़कें, स्कूल-अस्पताल होंगे, बिजली और पानी होगा। जनता मीठे स्वप्न लेती रहती है। कितने ही चुनावी वादे लिये जा चुके हैं पर यह दुनिया का आठवां आश्चर्य है कि कोई भी लक्ष्य अपनी समग्रता के साथ प्राप्त नहीं हुआ। जनता को गुमराह करने का सिलसिला निरन्तर जारी है। एक बार फिर गुमराह करने का बाजार गर्म होने वाला है।</p>
<p style="text-align:justify;">2019 के आम चुनाव से पहले अंतरराष्ट्रीय मार्केट रिसर्च एजेंसी इप्सॉस ने इस संबंध में एक रोचक सर्वेक्षण किया, जिसमें शामिल 56 प्रतिशत भारतीयों ने माना कि राजनेता आमजनता को अपनी बातों से भरमा लेते हैं। इस सर्वेक्षण को भारतीय जनमानस की प्रामाणिक राय भले न माना जाए, पर इसने राजनीति में उभर रहे एक संकट की ओर जरूर संकेत किया है। जाहिर है, अब हर राजनेता अपनी बात लुभावने तरीके से कहना चाहता है। इसमें कुछ लोग जिम्मेदार हैं तो उससे कई गुना ज्यादा गैरजिम्मेदारी है। इससे आम आदमी दुविधा में पड़ जाता है कि वह किसे सही माने और किसे गलत। कई बार वे तथ्यों की जांच नहीं कर पाते और राजनेताओं के झांसे में आ जाते हैं। भारत में अभी इस क्षेत्र में गलाकाट होड़ देखने को मिल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले जहां मुद्दों पर सीधी बात होती थी, वहां अब सारा जोर दावे करने और सपने दिखाने पर है। नेतागण अपने तात्कालिक हित साधने के लिए कई ऐसी बातें कर देते हैं, जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता। यह दिशाभ्रम भले ही आज उन्हें फायदा पहुंचा रहा हो, लेकिन अंतत: इससे लोकतंत्र कमजोर ही होता है।नेतृत्व की पुरानी परिभाषा थी, सबको साथ लेकर चलना, कथनी-करनी की समानता, निर्णय लेने की क्षमता, समस्या का सही समाधान, लोगों का विश्वास, दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता। इन शब्दों को किताबों में डालकर अलमारियों में रख दिया गया है। नेतृत्व का आदर्श न पक्ष में है और न प्रतिपक्ष में। एक युग था जब सम्राट, राजा-महाराजा अपने राज्य और प्रजा की रक्षा अपनी बाजुओं की ताकत से लड़कर करते थे और इस कर्तव्य एवं आदर्श के लिए प्राण तक न्यौछावर कर देते थे। आज नारों और नोटों से लड़ाई लड़ी जा रही है, चुनाव लड़े जा रहे हैं- सत्ता प्राप्ति के लिए। जो जितना लुभावना नारा दे सके, जो जितना धन व्यय कर सके, वही आज जनता को भरमा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
विश्वसनीयता वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न बनती जा रही है। निरंतर विश्वसनीयता खोते राजनेता आज धूल में मिलती अपनी छवि के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं। सत्तालोलुपता और धूप-छांव की तरह निरंतर बदलते चरित्र के लिए आखिर और कौन जिम्मेदार हो सकता है? भारतीय राजनीतिज्ञों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह तो हमेशा ही लगते रहे हैं, संभवत: ऐसी परिस्थितियों के लिए आम जनता भी कम जिम्मेदार नहीं है। विकसित देशों में वहां के नागरिकों का सामना भी ऐसी स्थितियों से होता रहा है, लेकिन वे अपने विवेक से फैसला करते हैं कि किस चीज को सही मानकर उपयोग में लाना उनके लिए ठीक रहेगा। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में, जहां शिक्षा और जागरूकता का स्तर एक-सा नहीं है, लोग खबरों और सूचनाओं के अनेक विकल्पों के बीच दुविधा में पड़ जाते हैं और राजनेताओं के झांसे में आ जाते हैं। वर्षों की राजनीति के बाद भी लगभग सभी राजनेता और राजनीतिक दल अपना एक स्थायी चरित्र, नीति विकसित करने में न केवल असफल रहे बल्कि सत्ता में बने रहने अथवा सत्ता के नजदीक रहने के लिए हमेशा ही बिन पेंदे के लोटे बने रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">
तथाकथित राजनेता धुआँधार चुनाव प्रचार करते हुए अपने भाषणों में आमजनता को ठगने, लुभाने एवं गुमराह करने की कला का लोहा मनवाते रहे हैं। उन्होंने अपने भाषणों में केवल और केवल चुनाव जीतना ही अपना लक्ष्य रखा और अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सारे नियम, कायदे, कानून और नैतिकता इत्यादि को भी दाँव पर लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। यूँ तो राजनेताओं की कथनी व करनी में अंतर का भारतीय राजनीति में लम्बा इतिहास रहा है, देश में राजनेताओं की ऐसी छवि बनना वाकई में लोकतंत्र का दु:खद पहलू है। आज राजनेताओं की कथनी व करनी में अंतर होना भारतीय राजनीति का स्थायी चरित्र व स्याह पहलू बन गया है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वर्ष 2014 के चुनावों में राजनेताओं के झूठे वायदों व चालबाजियों का सिलसिला निश्चित ही काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा। लोकतंत्र में इन स्थितियों पर नियंत्रण की जरूरत है, इसके लिये वर्ष 2019 के आम चुनाव से पहले इसके लिये जागरूकता का माहौल निर्मित किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">
भारतीय राजनीति में झूठ-फरेब, धोखाधड़ी के बल पर सत्ता हासिल करने की स्थितियों का बने रहना चिन्ताजनक है। झूठी घोषणाएँ एवं आम जनता को गुमराह करने की त्रासद स्थितियां भारतीय लोकतंत्र के चरित्र को धुंधलाते हैं। राजनेता चाहे पक्ष के हों या विपक्ष के- चुनाव के समय नियम-कायदों की परवाह किए बिना नैतिकता को ताक पर रखकर कोई भी चुनावी वादा कर देने के लिए कुख्यात हैं, चुनाव के दौरान किए गए इनके चुनावी वादों का तो कोई हिसाब भी नहीं रख सकता और इनकी कार्यप्रणाली से उन वादों का शायद दूर-दूर तक कोई तालमेल भी नहीं होता।  इस बड़ी विसंगति से लोकतंत्र को मुक्त करने के लिये मतदाताओं को ही जागरूक होना होगा। राजनेताओं के इस कथनी व करनी में अंतर को पहचानना भारतीय आमजन को सीखना ही होगा तभी राजनेता अपनी करनी को गंभीरता से लेंगे व अपनी कथनी व करनी में भेद रखने से परहेज करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तक राजनेता साम-दाम-दंड-भेद से येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर कब्जा कर लेने को ही अपना अंतिम ध्येय मानते रहेंगे तब तक राजनीति में सुधार की कल्पना कर पाना भी मुश्किल है।हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतत: जनता ही सर्वोपरि है, उसे अपने मताधिकार का प्रयोग करने के पहले अपने विवेक एवं समझ को विकसित करना होगा और राजनेताओं की कथनी व करनी के अंतर पर पैनी निगाह रखते हुए सच्चाई की पहचान करना सीखना ही होगा, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा, तभी देश भी विकास कर सकेगा और जनता का जीवन उन्नत हो सकेगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित वर्मा</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Sep 2018 20:38:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>उप चुनावों में मतदाताओं में नहीं दिखा जोश</title>
                                    <description><![CDATA[लोक सभा हलके गुरदासपुर के लिए उप चुनावों में सिर्फ 56 फीसदी चुनाव होना काफी निराशाजनक है। आम तौर पर उप चुनावों को सताधारी पार्टी की एकतरफा जीत यकीनी माना जाता है लेकिन पिछले तर्जुबे यही कह रहे हैं कि राजनैतिक पार्टियों के साथ-साथ आम मतदाताओं में भारी उत्साह होता है। खासकर पंजाब जैसे राज्य में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/voters-do-not-see-enthusiasm-in-sub-election/article-3396"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/vote-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लोक सभा हलके गुरदासपुर के लिए उप चुनावों में सिर्फ 56 फीसदी चुनाव होना काफी निराशाजनक है। आम तौर पर उप चुनावों को सताधारी पार्टी की एकतरफा जीत यकीनी माना जाता है लेकिन पिछले तर्जुबे यही कह रहे हैं कि राजनैतिक पार्टियों के साथ-साथ आम मतदाताओं में भारी उत्साह होता है। खासकर पंजाब जैसे राज्य में मतदाताआें की लम्बी लाईनें लगती रही है। कांग्रेस व अकाली भाजपा ने चाहे चुनाव प्रचार के लिए रैलियां व जनसभाएं जरूर की लेकिन पारंपरिक रंग कहीं भी नजर नहीं आया। मतदाताओं की निराशा को समूह राजनीति के प्रसंग मेंं जरूर समझा जा सकता है। दरअसल आम मतदाता राजनीति से निराश होने के कारण ही चुनावों में खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। राज्य में सार्वजनिक मुद्दे ज्यों के त्यों हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">न तो राज्य सरकार व न ही विरोधी पार्टियां सार्वजनिक मुद्दों पर कोई स्पष्ट पहुंच बना पाई। अकाली भाजपा के लगातार दस वर्ष के शासन के बावजूद सीमावर्त्ती जिलों के लोग परेशानियों के दौर से गुजर रहे हैं। बुनियादी ढ़ाचे की तरफ किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। अभी भी लोग दरिया पार करने के लिए आज भी मोटरसाईकिल नावों में ले जाने का मजबूर हैं। युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। किसानों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ सत्ताधारी पार्टी की यह धारना बनी रहती है कि मतदाता मौके की सरकार चला रही पार्टी को देखेगा। अपनी जीत यकीनी मानकर भी चुनाव प्रचार की तरफ बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। वर्तमान सरकार भी कर्ज माफी जैसे बड़े ऐलान करने के असमंजस में पड़ी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी केन्द्र की तरफ हाथ किया जाता है तो कभी खाले खजाने की दुहाई दी जाती है। वायदे पूरे न होने के कारण आम जनता उदासीन होती जा रही है। इसी कारण ही मतदाता चुनावों को एक बोझ समझने लग जाते हैं। चाहे उप चुनाव के साथ केन्द्र या राज्य में कोई राजनैतिक बदलाव नहीं आना व न ही इससे भविष्य के किसी चुनावों की दिशा तय होनी है। फिर भी जनता की निराशा राजनैतिक में आई गिरावट को उजागर करती है। ताजा हालात यह हैं कि राजनीति में सरकार अदला-बदली महज नेताओं की अदला-बदली नहीं होनी चाहिए, ताकि पार्टियां अपने एजेंडे को लागू कर जनता में अपने आप को साबित करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Oct 2017 04:57:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रपति चुनाव :  मतदाता मतदान केंद्र के भीतर नहीं ले जा सकेंगे अपनी कलम</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में मत देने वाले सांसदों और विधायकों को मतदान केंद्र के भीतर अपनी कलम ले जाने से मना किया गया है और वे विशेष रूप से डिजाइन किए गए मार्कर से मतपत्र पर निशान लगाएंगे। हरियाणा में पिछले साल आयोजित राज्यसभा चुनावों के दौरान पैदा हुए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/voters-can-not-take-their-pen-within-the-polling-booth-for-presidential-elections/article-2334"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/election-11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> चुनाव आयोग ने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में मत देने वाले सांसदों और विधायकों को मतदान केंद्र के भीतर अपनी कलम ले जाने से मना किया गया है और वे विशेष रूप से डिजाइन किए गए मार्कर से मतपत्र पर निशान लगाएंगे। हरियाणा में पिछले साल आयोजित राज्यसभा चुनावों के दौरान पैदा हुए स्याही विवाद के बाद चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव में मतदान के लिए विशेष कलमों के इस्तेमाल का निर्णय किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने बैंगनी स्याही युक्त विशेष क्रमांक वाली कलमों की आपूर्ति की है। सोमवार के चुनाव में केवल आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए मतदान सामग्री के इस्तेमाल को सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">मतपत्र पर निशान लगाने के लिए विशेष कलम</h2>
<p style="text-align:justify;">आयोग के एक प्रवक्ता ने नए कानून के बारे में बताया कि मतदान केंद्र में प्रवेश से पहले चुनावकर्मी मतदाताओं से उनके निजी कलम ले लेंगे और मतपत्र पर निशान लगाने के लिए विशेष कलम दे देंगे। उन्होंने बताया कि मतदान केंद्र से बाहर आने पर विशेष कलम वापस ले लिया जाएगा और चुनावकर्मी निजी कलम को वापस दे देंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड से ये विशेष कलम खरीदे गए हैं। यह कंपनी आयोग को अमिट स्याही की आपूर्ति करती है। चुनाव आयोग ने पहली बार विशेष पोस्टर तैयार किए हैं, जिनमें मतदाताओं को क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह अंकित है। पार्टी के सदस्यों को किसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान के लिए किसी तरह का व्हिप या निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है, चूंकि यह गुप्त मतपत्र है। सांसदों को हरे रंग, जबकि विधायकों को गुलाबी रंग के मतपत्र दिए जाएंगे।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 16 Jul 2017 06:19:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>बूथ लेवल अधिकारी करेंगे मतदाताओं का अभिनन्दन</title>
                                    <description><![CDATA[कार्यक्रम| मतदाता सूचियों का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान 16 जनवरी को मतदाता सूचियों के आंकड़ों का होगा पोलिंग स्टेशनवार विश्लेषण मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान को लेकर कार्यक्रम hanumanGarh, SachKahoon News: निर्वाचन विभाग की ओर से 1 जनवरी 2017 को आधार मानकर शुरू किए गए मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>कार्यक्रम| मतदाता सूचियों का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>16 जनवरी को मतदाता सूचियों के आंकड़ों का होगा पोलिंग स्टेशनवार विश्लेषण</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान को लेकर कार्यक्रम</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>hanumanGarh, SachKahoon News:</strong> निर्वाचन विभाग की ओर से 1 जनवरी 2017 को आधार मानकर शुरू किए गए मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान के तहत निरन्तर आद्यतन की प्रक्रिया व राष्ट्रीय मतदाता समारोह के दौरान 25 जनवरी को मतदान केन्द्रों पर बूथ लेवल अधिकारी समारोह आयोजित कर नए मतदाताओं का अभिन्दन करेंगे। इस दौरान ग्राम स्तर पर कार्य करने वाली विभिन्न सरकारी एजेंसियों के कर्मचारी यथा एएनएम, ग्राम सेवक, पटवारी, आशा सहयोगिनी एवं स्वयं सहायता समूह के सदस्य मौजूद रहेंगे। मुख्य निर्वाचन अधिकारी अश्विनी भगत ने बताया कि संबंधित बूथ लेवल अधिकारी मतदान केन्द्र की मतदाता सूची के आंकड़ों के आधार पर चिह्नित लक्ष्यों के अनुसार प्रत्येक कर्मियों के लिए लक्ष्य निर्धारित कर मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने, नाम हटवाने आदि के लिए आवेदन पत्र उपलब्ध करवाएंगे। उक्त कर्मचारी घर-घर व्यक्तिगत सम्पर्क कर आगामी 10 फरवरी तक आवेदन पत्रों की पूर्ति करवाकर बीएलओ को उपलब्ध कराएंगे। निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी मतदान केन्द्रवार प्राप्त आवेदन पत्रों का निस्तारण करते हुए यह सुनिश्चित करेंगे कि विभिन्न लक्ष्यों के लिए आवेदनों पत्रों की संख्या के अनुसार हैल्थ चैक अप के पैरामीटर्स निर्धारित मापदण्ड के अनुसार समुचित संख्या में आवेदन पत्र प्राप्त नहीं होते हैं तो 28 फरवरी तक कर्मियों से समन्वय कर पुन: लक्ष्य निर्धारित कर आवेदन पत्र प्राप्त किए जाएं। उन्होंने बताया कि इससे पूर्व प्रत्येक निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी 16 जनवरी को अंतिम रूप से प्रकाशित मतदाता सूचियों के आंकड़ों का पोलिंग स्टेशनवार विश्लेषण करेंगे, ताकि ऐसे मतदाता केन्द्र जहां की मतदाता सूचि में लिंगानुपात जनसंख्या, मतदाता अनुपात, 18-19 आयु वर्ग के युवाओं का पंजीकरण कम है को चिन्हित कर सूचीबद्घ किया जा सके। इसके साथ-साथ जिन मतदाताओं को अभी तक मतदाता फोटो पहचान पत्र जारी नहीं किए हैं या मतदाता सूची में मतदाताओं की फोटो मुद्रित नहीं है का आंकलन कर मतदान केन्द्रवार सूची तैयार की जाएगी ताकि इन लक्ष्यों की शत-प्रतिशत पूर्ति के लिए सूक्ष्म कार्य योजना तैयार की जा सके।</p>
<p><em>संबंधित बूथ लेवल अधिकारी मतदान केन्द्र की मतदाता सूची के आंकड़ों के आधार पर चिह्नित लक्ष्यों के अनुसार प्रत्येक कर्मियों के लिए लक्ष्य निर्धारित कर मतदाता सूचियों में नाम जुड़वाने, नाम हटवाने आदि के लिए आवेदन पत्र उपलब्ध करवाएंगे। उक्त कर्मचारी घर-घर व्यक्तिगत सम्पर्क कर आगामी 10 फरवरी तक आवेदन पत्रों की पूर्ति करवाकर बीएलओ को उपलब्ध कराएंगे।</em></p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/booth-level-officials-greeted-voters/article-705</link>
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                <pubDate>Sat, 31 Dec 2016 23:01:26 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>हिलेरी व ट्रम्प में से किसे चुनेंगे मतदाता</title>
                                    <description><![CDATA[मंगलवार को जब अमेरिकी गणतंत्र के नागरिक अपने देश के 45वें राष्ट्रपति के चुनाव हेतू वोट डालने के लिए अपने घरों से निकल कर मतदान केन्द्रों की ओर जा रहे होंगे, उस वक्त उनके जहन में एक बात जरूर होगी कि वे अपने वोट के जरिये जिस व्यक्ति को अमेरिकी राष्ट्र का मुखिया बनाने जा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/whom-voters-will-choose-hillary-and-trump/article-261"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-11/trump-and-hilary.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मंगलवार को जब अमेरिकी गणतंत्र के नागरिक अपने देश के 45वें राष्ट्रपति के चुनाव हेतू वोट डालने के लिए अपने घरों से निकल कर मतदान केन्द्रों की ओर जा रहे होंगे, उस वक्त उनके जहन में एक बात जरूर होगी कि वे अपने वोट के जरिये जिस व्यक्ति को अमेरिकी राष्ट्र का मुखिया बनाने जा रहे हैं, सत्ता में आने के बाद क्या वह देश की प्रतिष्ठा, उसके सम्मान तथा सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित अमेरिकी रूतबे को कायम रख पाएगा।<br />
अमेरिकी मतदाताओं के भीतर उठने वाली ऐसी आंशका इसलिए बेजा नहीं लगती कि इस दफा दोनों प्रत्याशियों ने राष्ट्रपति पद के चुनाव को राष्ट्र की प्रतिष्ठा की बजाए, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न समझ लिया है। प्रचार अभियान के दौरान दोनों ने एक-दूसरे के विरूद्ध जिस तरह से हल्की व छिछली भाषा का प्रयोग किया, उससे राष्ट्रीय मुद्दे पूरी तरह हाशिये पर आ गए। पिछले छह माह से प्रचार अभियान में लगे दोनों प्रमुख प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन व डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक सभाओं, मीडिया साक्षात्कारों, टीवी चेनल्स तथा चुनाव से पूर्व हुई सार्वजनिक बहस के दौरान एक-दूसरे के विरूद्ध जिस तरह से व्यक्तिगत मामलों को आधार बनाकर हमला किया गया, उससे देश और दुनिया से जुडे महत्वपूर्ण मुद्दे हवा हो गये।<br />
प्रत्याशियों के व्यव्हार के अनुरूप अमेरिकी मतदाताओं का व्यवहार भी इस दफा कुछ बदला बदला सा लग रहा है। अब जबकी चुनाव में महज कुछ ही घंटे शेष हैं, पर तस्वीर अभी पूरी तरह से साफ नहीं हुई है। पिछले स΄ताह तक ट्रम्प से काफी आगे चल रही हिलेरी क्लिंटन अब अंतिम चरण में पिछड़ती हुई लग रही हैं। वांशिगटन पोस्ट के अनुसार दोनों के बीच कांटे का मुकाबला है। अखबार द्वारा करवाये गये सर्वे में 49 फीसदी मतदाता हिलेरी क्लिंटन की ओर तथा 47 प्रतिशत वोटर ट्रम्प की ओर झुके दिख रहे हैं। अखबार द्वारा करवाये गये ताजा सर्वे के अनुसार डोनाल्ड ट्रम्प महज एक अंक पीछे चल रहे हैं। हिलेरी को 46 प्रतिशत और ट्रंप को 45 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है।<br />
ऐग्जिट पोल और चुनाव सर्वे पर नजर रखने वाली रियरक्लियर पॉलिटिक्स ने हिलेरी की औसत बढ़त घटाकर 2़2 अंक कर दी है। एक पखवाड़े पूर्व तक उनकी औसत बढ़त आठ अंकों से ज्यादा थी। हालांकि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और मूडी मॉडल हिलेरी की जीत की भविष्यवाणी कर रहे है। मूडी मॉडल मतदाताओं की राय जानने का एक तरीका है, जिसमें उम्मीदवार की व्यक्तिगत योग्यता की परख किये जाने के बजाए राजनीतिक दल की उपलब्धियों और वोटरों से जुड़ाव के आधार पर अनुमान तैयार किया जाता है। मूडी मॉडल को आधार बनाकर की गई भविष्यवाणी काफी हद तक सच साबित होती रही है। अगर इसके अनुमान को सही माने तो हिलेरी को 332 व डोनाल्ड ट्रम्प को 206 इलेक्टोरल वोट मिलने का अनुमान है।<br />
अब चुनाव के अंतिम चरण में दोनों ही उम्मीदवारों को अपनी पूरी ताकत स्विंग स्टे्टस को लुभाने में झोंकनी होगी। स्विंग स्ट्ेटस वे राज्य होते हैं, जहां के मतदाता अंतिम समय तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाते हैं और वे किसी भी तरफ जा सकते हैं। ऐसे राज्यों में कोलंबिया डीसी के साथ वो 18 राज्य आते हैं, जहां पर पिछले छह चुनावों से लगातार डेमोक्रेटिक प्रत्याशियों को जीत हासिल होती रही है। इन 18 राज्यों में मिशिगन, पेन्सेल्वििनिया, विस्किोन्सिन, मिन्नसोटा, ओहियो, फ्लोरिडा, वर्जीनिया, न्यू हैंपशायर और लोवा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जहां के वोटर आखिरी वक्त चुनाव का पासा पलट देते हैं। अफ्रीका, मैक्सिको, लातिन अमेरिकी देशों से आये मतदाता भी अमेरिकी चुनाव में बड़ा उलट फेर करते रहे है। 2008 के चुनाव में बराक ओबामा को 67 फीसदी मतदाताओं ने समर्थन दिया था।<br />
भारत के नजरिये से हिलेरी व ट्रम्प में से चाहे कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हो भारत-अमेरिकी रिश्ते पूर्व की भांति ही रहेंगे। पहले बात करते हंै डोनाल्ड ट्रंप की। ईस्लाम और आतंकवाद पर खरी-खरी कहने वाले ट्रंप अपने पाक विरोधी ब्यानों के कारण लगातार सुर्खियों में रहे हैं। पाकिस्तान को पूरी दुनिया के लिए खतरनाक देश बताकर उन्होंने साफ-साफ शब्दों में पाक को चेता दिया है कि अगर वे सत्ता में आते है तो पाकिस्तान को आतंकवाद पर आधारित अपनी नीति बदलनी पडेगी। साथ ही उनका यह कहना कि अगर वो अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारत की मदद लेगे। ट्रम्प के इस ब्यान से अमेरिकी विदेश नीति के भावी स्वरूप के संकेत मिल जाते हैं।<br />
अब बात करते हैं डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की । उन्होंने अपने पार्टी ΄लेटफॉर्म (चुनावी घोषणा पत्र) में भारत को महत्वपूर्ण देश मानते हुए कहा है कि अगर वह सत्ता में आती हैं तो भारत को लंबे समय तक रणनीतिक सलाहकार बनाकर रखना चाहेंगी। साथ ही उनके घोषणा पत्र में भारत के लोकतंत्र की सरहाना करते हुए दोनों देशों के बीच रिश्ते को और मजबूत करने पर बल दिया गया है।<br />
आठ साल बाद संयुक्त राज्य अमेरिका पुन: एक ओर इतिहास निमार्ण की ओर बढ़ रहा है। आठ नंवबर को हो रहे चुनाव के बाद अब देखना यह है कि व्हाईट हाउस के दरवाजे हिलेरी क्लिंटन के लिए खुलते है अथवा डोनाल्ड ट्रम्प के लिए। लेकिन यह तय है कि इस दफा अमेरिकी मतदाता ऊहा-पोह व द्वंद्व की स्थिति में है। मतदान को एक धार्मिक कर्म की तरह समझने वाला अमेरिका का मतदाता ने इस बार वोट तो डालना ही है कि भावना के साथ वोट डालेगे न कि अपनी पंसद की सरकार बनाने के उदेश्य से । अभी भी उनकी धारणा यही है कि दोनों ही बुरे प्रत्याशियों में से उन्हें किसी एक कम बुरे का चुनाव करना है। <em>एन.के. सोमानी</em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Nov 2016 00:51:48 +0530</pubDate>
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