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                <title>पुस्तक से दोस्ती कीजिये वे कभी दगा नहीं देती</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/friendship-with-the-book-they-never-give-up/article-9761"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/friendship-with-the-book-they-never-give-up.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पुस्तकों को बुक-शेल्फ या अल्मारी से बाहर निकालने की चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। इस बार प्रधानमंत्री ने रेडियो पर मन की बात में पुस्तकों की चर्चा छेड़ी है। आज के युवा ने पुस्तकों को भूल कर मोबाइल को हाथ में पकड़ लिया है। उसे प्रेमचंद, शरत चंद्र, मन्मथ नाथ गुप्त, और विमल मित्र मंटो, नानक सिंह, जसवंत कमल, सुरजीत पात्र, शिव बटालवी के नाम का ज्ञान नहीं है। पुस्तकों के नाम पर वह केवल अपनी पाठ्य पुस्तकों को जानता है। उससे आगे केवल इंटरनेट की दुनियां को पहचानता है। किस्से कहानिया, उपन्यास, कविता आदि साहित्य विधाओं को नहीं पहचानता। प्रधानमंत्री ने पुस्तकों की चर्चा कर देशवासियों का ध्यान खींचा है। प्रधानमंत्री ने बिना किसी अकादमिक आयोजन के पढ़ने, और पढ़ते ही रहने की बात कही है, इस बात के लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">पुस्तकों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। अच्छी पुस्तकें न केवल ज्ञान का भंडार होती हैं अपितु एक अच्छी दोस्त भी होती हैं। आज जरुरत इस बात की है की आलमारियों में बंद पड़ी पुस्तकों को बाहर निकाल कर जिंदगी का अहम हिस्सा बनाया जाये ताकि देश और दुनियां का बेहतर ज्ञान हो सके। अच्छी पुस्तकें हमें रास्ता दिखाने के साथ-साथ हमारा मनोरंजन भी करती हैं। वह हमसे लेती कुछ भी नहीं है मगर देती ज्ञान का अपार भंडार। आज इंटरनेट का भूत युवा पीढ़ी पर सवार है। आज का युवा प्रेमचंद को नहीं जानता। महादेवी वर्मा, दिनकर, विमल चटर्जी, मन्मथनाथ गुप्त, शरत चंद्र को नहीं पहचानता।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका एकमात्र कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है। स्कूल में पुस्तकालय है मगर वहां किशोर नहीं जाता। उसे मोबाइल की लत लग गयी है। अध्यापक भी पुस्तकालय जाने को प्रेरित नहीं करता इसलिए वह किसी नामचीन लेखक को नहीं जानता। पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र थी मगर अब नहीं है। स्कूल की छोड़ो घर पर अभिभावक भी उन्हें अच्छी पुस्तकों से परिचित नहीं करवाते। युवा के लिए पाठ्यपुस्तक या कोचिंग की पुस्तकें ही सब कुछ है। कालजयी रचनाकार बाबू देवकी नंदन खत्री की पुस्तकों का ज्ञान भी नहीं है। पुस्तकें अब पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चिंतन की बात तो यह है की पुस्तकें कैसे पुस्तकालय से बाहर निकले और युवा का रुझान इनके प्रति कैसे हो यह विचारने की बात है। अगर सच्ची दोस्ती चाहिए तो किताबों को दोस्त बना लो क्योंकि वो कभी दगा नहीं देती है और ना ही झूठ के रास्ते पर चलती। लेकिन इंटरनेट के युग में व्यक्ति किताबों से काफी दूर हो गया है। पुस्तकें हमारे जीवन को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और हमेशा हमारे साथ एक सच्चे दोस्त की तरह रहती हैं, बशर्ते हमारे अंदर पढ़ने और सीखने का जज्बा हो।</p>
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                <pubDate>Wed, 03 Jul 2019 13:09:28 +0530</pubDate>
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