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                <title>Initiative to curb the business of rental kakh - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>कर्नाटक में राजनीतिक उथल-पुथल</title>
                                    <description><![CDATA[आखिर कई दिनों की ड्रामेबाजी के बाद कर्नाटक की जेडीएस कांग्रेस सरकार गिर ही गई। इस घटना चक्कर से एक बार फिर संसदीय प्रणाली की संख्या की ताकत पर उंगली उठी है। किसी देश या राज्य के लिए राजनीतिक स्थिरता सबसे बड़ी शर्त होती है। 13 महीनों के बाद सरकार का टूटना राज्य के लोगों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/initiative-to-curb-the-business-of-rental-kakh-3/article-10079"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/initiative-ts-of-rental-kakh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आखिर कई दिनों की ड्रामेबाजी के बाद कर्नाटक की जेडीएस कांग्रेस सरकार गिर ही गई। इस घटना चक्कर से एक बार फिर संसदीय प्रणाली की संख्या की ताकत पर उंगली उठी है। किसी देश या राज्य के लिए राजनीतिक स्थिरता सबसे बड़ी शर्त होती है। 13 महीनों के बाद सरकार का टूटना राज्य के लोगों के लिए काफी बड़ा झटका है। यह बात लगभग तय है कि राज्य में येदीयुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनाएगी। यदि इससे उलट मध्यकालीन चुनाव होते हैं तो इसका जनता पर बड़ा आर्थिक बोझ बढेÞगा। कर्नाटक के इस घटना चक्कर को मीडिया ने अधिकतर ‘नाटक’ का नाम दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में बागी विधायकों ने लालच में आकर लोकतंत्र को तमाशा बना दिया है। पूरी बात तो नई सरकार बनने के बाद सामने आएगी परंतु यह जरूर स्पष्ट है कि जेडीएस-कांग्रेस सरकार के खिलाफ कोई बड़ी लोक लहर नहीं थी। केवल विधायकों में कुर्सी मोह ही सरकार को ले डूबी। वैसे भी दो वर्षांे तक लोग सरकार के प्रदर्शन को देखकर परखते हैं कुछ कांग्रेसी विधायक मुख्य मंत्री कांग्रेस का होने की मांग कर रहे थे। ऐसे विधायकों का उद्देश्य भी सत्तासुख हासिल करना था। बागी इतने चालाक हैं कि दल बदली विरोधी कानून के बावजूद उलट फेर में वह कामयाब हो गए हैं। भाजपा पर लगाए जा रहे आरोपों में कितनी सच्चाई है इस संबंधी तो फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया जा परंतु यह जरूर स्पष्ट है कि हर विधायक ही अब मंत्री बनना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब सहित कई राज्यों में पिछले समय में मंत्रियों की संख्या 15 फीसदी तय होने के कारण मुख्य संसदीय सचिवों की चोरमोरी के साथ सत्ताधारी पार्टी के चहेते की एडजस्टमेंट की गई। सबसे हैरानी वाला कारनामा तो दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने किया जब मंत्री बनने से रह गए सभी के सभी विधायकों को मुख्य सांसदीय सचिव बना दिया गया। कुर्सी का लालच भारतीय राजनीति के साथ ऐसा जुड़ गया है कि पलों में वफादारी बदल जाती है। राजनीति व्यापार बन कर रह गई है। जहां से लाभ मिलता दिखता वहीं विश्वास बेच दिया। कुछ भी हो कर्नाटक का राजनीतिक संकट राजनीति पर एक बदनुमा दाग है। सरकार शब्द जनता की सेवा के लिए कम व केवल नि:शुल्क की सुविधाएं हासिल करने का दूसरा नाम बन गया है। बिना किसी मुद्दे से सरकार तोड़ने वाले विधायकों को उन मतदाताओं को जवाब देना होगा, जिन्होंने उनको चुन कर सदन में भेजा था। बुद्धिजीवी यह भी सोचने के लिए मजबूर हैं कि सांसदीय प्रणाली के विकल्प पर विचार होना चाहिए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jul 2019 21:26:13 +0530</pubDate>
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                <title>मौत की इमारतें और लापरवाह प्रशासन</title>
                                    <description><![CDATA[हिमाचल में सोलन स्थित कुमारहट्टी में और मुंबई के डोंगरी इलाके में इमारत गिरने से कई लोगों के मरने की घटना ने फिर एक बार सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिये हैं। दो चार दिन के हो-हल्ले और शोर शराबे के बाद जिन्दगी पुरानी पटरी पर चलने लगी है। देश में प्रतिदिन जर्जर इमारतों के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/initiative-to-curb-the-business-of-rental-kakh-2/article-10078"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/initiative-to-curb-the-business-of-rental-kakh-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिमाचल में सोलन स्थित कुमारहट्टी में और मुंबई के डोंगरी इलाके में इमारत गिरने से कई लोगों के मरने की घटना ने फिर एक बार सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिये हैं। दो चार दिन के हो-हल्ले और शोर शराबे के बाद जिन्दगी पुरानी पटरी पर चलने लगी है। देश में प्रतिदिन जर्जर इमारतों के ढहने के मर्मान्तक हादसे हो रहे और लोगों को मौत नसीब हो रही है। लापरवाही से इमारतें कब्रगाह बनती जा रही हैं। यदि भवनों की कमजोर बुनियाद की समय रहते पड़ताल कर ली जाती तो ये हादसे टाले जा सकते थे। हिमाचल में सोलन स्थित कुमारहट्टी में पहाड़ पर बेतरतीब बनी चार मंजिला इमारत के गिरने से असम राइफल्स के तेरह जवानों समेत 14 लोगों की मौत की जवाबदेही तो तय करनी ही होगी। इमारत में बने ढाबे में जलपान के लिए रुके जवानों को क्या पता था कि उनका विश्राम मौत का सबब बन जायेगा। बरसात में बहुमंजिले भवन तब गिरते हैं जब कुदरत के व्यवहार में उन्सानी हस्तक्षेप की हद हो जाती है। जाहिर है भरभरा कर गिरी इमारत की बुनियाद कमजोर थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मूसलाधार बारिश से जूझने के बाद देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के डोंगरी में बीते मंगलवार को एक चार मंजिला इमारत ढह गई। इस हादसे में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब तक यह आंकड़ा 14 पहुंच चुका है। बिल्डिंग 100 साल पुरानी थी। संकरी गली में बनी इस इमारत के नीचे दुकानें बनी थीं, जबकि इसकी ऊपरी मंजिलों पर परिवार रह रहे थे। स्थानीय लोगों ने बताया कि लगभग छह परिवार इस इमारत में रह रहे थे। इमारत का आधा हिस्सा जर्जर था, जिसके गिरने की आशंका पहले से ही थी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे आसपास के लोगों में गुस्सा भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्टूबर 2017 को तमिलनाडु में बस स्टंैड की छत गिरने से तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम के 8 कर्मचारियों की दर्दनाक मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए थे। घटना के समय यह कर्मचारी बस स्टैंड के आरामगृह में सो रहे थे। अभागे कर्मचारियों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि यह इमारत उनके लिए मौत का सबब बनेगी। ऐसी नींद सोये कि सदा के लिए सो गए। दीवाली के दूसरे दिन यह हादसा घटित हुआ इस हादसे में कई बहनों के भाई मारे गए अभागी बहनें भैयादूज पर अपने भाईयों को टीका भी नहीं लगा सकी। हादसे में कई बच्चे अनाथ हो गए। ऐसे हादसे बहुत ही पीड़ादायक होते हैं। कहते हंै कि यह इमारत काफी पुरानी हो चुकी थी। इससे पहले भी ऐसा ही मामला घटित हो चुका है यह दूसरा मामला है। लापरवाही करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए तो आने वाले समय में इन हादसों को रोका जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">2016 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स परिसर में निमार्णाधीन बर्न ओपीडी के बेसमैंट की मिट्टी गिरने से दो मजदूरों की मौत हो गई थी। सोलन या मुंबई यह कोई पहला हादसा नहीं है इससे पहले देश में हजारों ऐसे दर्दनाक हादसे घटित हो चुके हैं। 2016 में गोवा के कनाकोना शहर में फिर एक निमार्णाधीन इमारत गिरने से 7 लोगों की मौत हो गई थी और 40 से अधिक इमारत के भीतर दबे हुए जिन्हें काफी मशक्कत के बाद बाहर निकाला जा सका था। वर्ष 2013 में महाराष्ट्र के ठाणे में सात मंजिला इमारत ढहने से 75 लोगों की असामयिक मौत और 60 के घायल होने के लिए कौन जिम्मेवार है? 2013 में हिमाचल प्रदेश के मण्डी में भी एक इमारत के ढह जाने से एक भिखारी महिला दब गई थी जिसे पुलिस व प्रशासन की मदद से चार दिन बाद मलबे के ढेर से जिन्दा निकाल दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">सोलन और मुंबई की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि बीती घटनाओं से न तो सरकार ने सबक सीखा और न ही लोगों ने। यह हादसा नहीं हत्या है। पिछले कई सालों से ऐसे दर्दनाक हादसे हो रहे हैं लोग इमारतों में जमींदोज हो रहे हैं। कहते हैं कि पिछली घटनाओं से सबक लेकर आने वाले भविष्य को सुरक्षित करना बुद्धिमता होती है। मगर न तो लोग हादसों से सबक सीखते हैं और न ही प्रशासन जब हादसा हो जाता है तब सरकार व प्रशासन सक्रिय हो जाते हंै उसके बाद फिर वही परिपाटी चलती रहती है। आखिर कितने हादसों के बाद प्रशासन अपनी जिम्मेवारी निभायेगा इस प्रश्न का जवाब सरकार को देना होगा। इमारतों का निर्माण करने वाले ठेकेदारों को सजा ए मौत देनी चाहिए जो इन हादसों के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेवार हंै। जो चंद चांदी के सिक्कों की चाहत के लिए लोगों की जिन्दगियां ले रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ा संज्ञान लेना चाहिए जो मानव की जान लेने से भी नहीें हिचकचाते। केन्द्र सरकार को इन हादसों के संदर्भ में छानबीन करवानी चाहिए तथा दोषियों को सजा देनी होगी। समय रहते इन घटनाओं को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने होगें ताकि भविष्य में ऐसी दर्दनाक हादसों पर विराम लग सके। एक एक नागरिक की जिंदगी मूल्यवान है।</p>
<p><strong><em>संतोष कुमार भार्गव</em></strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 24 Jul 2019 21:23:23 +0530</pubDate>
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                <title>किराए की कोख के कारोबार पर अंकुश की पहल</title>
                                    <description><![CDATA[सूचना तकनीक के बाद भारत में प्रजनन का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किराए पर कोख दिए जाने का धंधा भी शामिल है। चिकित्सा पर्यटन के साथ-साथ विदेशी पर्यटक अब भारत प्रसूति पर्यटन के लिए भी बड़ी संख्या में आने लगे हैं। भारतीय उद्योग महासंघ के एक अघ्ययन के मुताबिक भारत में किराए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/initiative-to-curb-the-business-of-rental-kakh/article-10077"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/initiative-to-curb-the-business-of-rental-kakh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सूचना तकनीक के बाद भारत में प्रजनन का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किराए पर कोख दिए जाने का धंधा भी शामिल है। चिकित्सा पर्यटन के साथ-साथ विदेशी पर्यटक अब भारत प्रसूति पर्यटन के लिए भी बड़ी संख्या में आने लगे हैं। भारतीय उद्योग महासंघ के एक अघ्ययन के मुताबिक भारत में किराए की कोख का कारोबार प्रति वर्ष 50 करोड़ का है, जिसके 2020 तक दो अरब तक पहुंचने की उम्मीद है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुजरात के आनंद में यह व्यवसाय सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है। लेकिन यह धंधा अंतत: प्रकृति की प्रतिरूप महिला की कोख पर टिका है, ठीक उसी तरह, जिस तरह, उदारवादी अर्थव्यस्था प्रकृति की खनिज संपदाओं के दोहन पर टिकी है। इस धंधे की भारी कीमत उन महिलाओं को चुकानी पड़ रही है, जिन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए हर हाल में धन की जरूरत है। अब सरकार कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की दृष्टि से किराए की कोख नियमन विधेयक-2019 (द सरोगेसी रेगुलेशन बिल) ला रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभा में प्रस्तुत किए विधेयक में व्यावसायिक दृश्टि से किराए की कोख लेकर बच्चा पैदा करने के उपाय को गैरकानूनी ठहराया गया है। इसका उल्लंघन करने पर 10 साल के कारावास की सजा और 10 लाख रुपए के जुर्माना का प्रावधान किया गया है। इस गोरखधंधे पर अकुंश लगाने की यह उचित पहल है। इस कानून से उन्हें परेशानी है, जिन्होने स्त्री की आर्थिक कमजोरी को वस्तु में ढालकर उसकी कोख को बाजार के हवाले कर दिया है। वे यह भी दलील दे रहे हैं कि कठोर कानून से विदेशी मुद्रा का अगमन रुक जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">बीते कुछ वर्शों में भारत किराए की कोख का नाभिकेंद्र हो गया है। नतीजतन किराए पर कोख देने वाली माताओं का शारीरिक और आर्थिक शोषण हो रहा है। गुजरात के आनंद में यह कारोबार सबसे ज्यादा होता है। दरअसल भारत में अमेरिका व यूरोपीय देशों की तुलना में खर्च सात गुना कम है। साफ है, अंधाधुंध व्यवसाईकरण के चलते लाचार मां की कोख का दुरुपयोग हो रहा है। इसीलिए विधि आयोग ने अपनी 228वीं रिपोर्ट में कानून बनाकर इस व्यापार पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। गोया, स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने लोकसभा में इस बिल को पेश किया। इसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सरोगेसी बोर्ड बनेंगे। सरोगेसी मां चाहने वाले दंपति की नजदीकी रिश्तेदार होनी चाहिए। ऐसी मां की उम्र 25 से 35 वर्ष होने के साथ उसका अपना एक बच्चा भी होना चाहिए। सिर्फ एक बार ही कोई महिला सरोगेट मां बन सकेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बावजूद इस कानून में कई खामियां होने के साथ यह अप्राकृतिक है। सरोगेसी मां बनने के लिए महिला को इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया से गुजरना होता है। इसके लिये जैविक माता-पिता के शुक्राणु और अण्डाणु को परखनली में निशेचित करने के बाद जब भू्रण पनप जाता है, तब उसे किराए की कोख में प्रत्यारोपित किया जाता है। गर्माधान का यही एक मात्र उपाय है। इसका शरीर पर विपरीत असर पड़ता है, इसके गर्भपात हो जाने की 80 फीसदी आशंका बनी रहती है। ऐसी 90 प्रतिशत प्रसूति शल्य क्रिया के जरिए होती है। महिला की जान का संकट भी बना रहता है। इस स्थिति में कोख किराए से देने वाली महिला का न तो कोई बीमा होता है,न ही उसके पति और बच्चों की कोई गारंटी लेता है। यहां सवाल खड़ा होता है कि जैविक अभिभावक यदि जन्मे बच्चे का छोड़कर नौ, दौ, ग्यारह हो जाते हैं तो उसके पालन-पोषण की जबावदेही किसकी होगी ? यह सवाल इस विधेयक के प्रारूप में अनुत्तरित है। यदि नवजात शिशु विकलांग या ऐसी लाइलाज बीमारी के साथ पैदा होता है और अजैविक माता-पिता उसे लेने से इंकार कर देते हैं, तो उस बच्चे की जिम्मेदारी कौन लेगा ? ऐसी स्थिति में उन महिलाओं को और ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है, जो किश्तों पर कोख किराए से देती हैं। ऐसी ही सुविधाओं के चलते भारत में किराए की कोख का व्यापार वैश्विक राजधानी बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक स्वंयसेवी संगठन के अध्ययन में कुछ चौंकाने वाले नजारे भी सामने आए हैं। खासतौर से विदेशी धनवान जब किराए की कोख लेकर संतान पाने के इच्छुक होते हैं तो वे भारत आकर एक साथ कई महिलाओं को गर्भधारण करा देते हैं। इनमें से कुछ महिलाओं में यह प्रयोग सफल हो जाता है तो वह किसी एक महिला को छोड़ बाकी का गर्भपात करा देते हैं। गर्भपात कराई गई महिलाओं को कोई धन भी नहीं दिया जाता। यह सरासर अन्याय व अनैतिकता है। इसी अघ्ययन से खुलासा हुआ है कि किराए की कोख की कीमत करीब 20 लाख रुपए है। कभी-कभी इससे भी ज्यादा धनराशी दी जाती है। लेकिन इस राशि में से सरोगेसी मां को महज 3 से 5 लाख रुपए ही मिलते हैं। शेश अस्पताल और बिचैलिए चट कर जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अप्रवासी भारतीयों में सरोगेसी की मांग बहुत ज्यादा है। यदि स्त्री स्वास्थ व सुंदर होने के साथ उच्च जाति और उत्तम पारिवारिक पृष्ठभूमि से होती है तो उसे ज्यादा पैसा दिया जाता है। अप्रवासी दंपति भारत आकर किराए की कोख द्वारा बच्चा पैदा करना इसलिए भी अच्छा मानते है, क्योंकि वे मनौवैज्ञानिक स्तर पर अपने को भारत से जुड़ा पाते हैं। भारत में सरोगेसी की मांग तेजी से बढ़ रही है। क्योंकि अब फिल्म कलाकारों से लेकर अन्य लब्ध-प्रतिष्ठित लोग सरोगेसी से बच्चा चाहने लगे हैं। इनकी पत्नियां दर्द से बचने के लिए यह उपाय करती हैं। इसी कारण लैंगिक अधिकार को मानवाधिकार के हनन से जोड़ने की बहस तेज हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सिलसिले में एक सवाल यह भी है कि यदि कोख लेने के दौरान पति-पत्नि में तलाक हो जाता है तो वह बच्चा किसे दिया जाए ? बाईदवे दोनों ही बच्चा लेने से इंकार कर दें तो बच्चे के लालन-पालन की जिम्मेबारी किसकी होगी ? क्योंकि 2009 में जापान से अहमदाबाद आए एक दंपति तलाक की स्थिति से गुजर चुके हैं। ऐसे में बच्चे की जैविक मां ने उसे लेने से इनकार कर दिया। हालांकि पिता बच्ची गोद लेने को तैयार था, लेकिन हमारा कानून पुरुष को बच्ची गोद लेने की इजाजत विशेष परिस्थितियों में ही देता है। इस विधेयक में इस स्थिति को भी साफ नहीं किया गया है। हालांकि इस नए कानून के अस्तित्व में आने के बाद इस प्रकृति विरोधी कारोबार पर धिकतम अंकुश लग जाने की उम्मीद की जा सकती है। क्योंकि अब रिश्ते-नाते की महिलाओं को ही सरोगेसी मां बनने की सुविधा दी गई है।<br />
<strong><em>प्रमोद भार्गव</em></strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 24 Jul 2019 20:28:49 +0530</pubDate>
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