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                <title>बढ़ता जा रहा है ब्रेन ट्यूमर का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[बाल मुकुन्द ओझा अगर सुबह तेज सिरदर्द से नींद खुल रही हैं। धीरे-धीरे कान से सुनने की क्षमता या आंखों से भेंगा दिखने की शिकायत अथवा रोशनी घट रही हैं। धीरे-धीरे प्रमुख अंग का सुन्न पड़ना अर्थात लकवे के लक्षण लगें तो आपको तुरंत सावधान हो जाना चाहिए। ये दिक्कतें ब्रेन ट्यूमर की हो सकती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/increases-the-ri-of-brain-tumor/article-4030"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/brain.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बाल मुकुन्द ओझा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">अगर सुबह तेज सिरदर्द से नींद खुल रही हैं। धीरे-धीरे कान से सुनने की क्षमता या आंखों से भेंगा दिखने की शिकायत अथवा रोशनी घट रही हैं। धीरे-धीरे प्रमुख अंग का सुन्न पड़ना अर्थात लकवे के लक्षण लगें तो आपको तुरंत सावधान हो जाना चाहिए। ये दिक्कतें ब्रेन ट्यूमर की हो सकती हैं। जर्मन ब्रेन ट्यूमर एसोसिएशन द्वारा ब्रेन ट्यूमर के रोगियों की समस्याओं की ओर विश्व का ध्यान केंद्रित करने तथा उनकी समस्याओं के समाधान के लिए 2000 ई. से प्रतिवर्ष विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस 8 जून को मनाने की शुरूआत हुई। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व भर में हर दिन एक लाख में से दस लोग ब्रेन ट्यूमर के कारण मरते हैं। ब्रेन ट्यूमर जिसे मस्तिष्क कैंसर भी कहा जाता है एक खतरनाक रोग है। यदि समय रहते इसका इलाज नहीं कराया गया तो यह जानलेवा साबित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिमाग की संचालकता को देखकर ही मानव शरीर का अंदाजा हो जाता है लेकिन बिगड़ते लाइफस्टाइल को देखते हुए ब्रेन ट्यूमर का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है। ब्रेन ट्यूमर में मष्तिष्क में गांठ बन जाती है जिससे हमारे शरीर का कोई भी हिस्सा प्रभावित हो सकता है। यह गांठ अगर दायीं तरफ स्थित है तो किसी व्यक्ति का बायीं तरफ का हिस्सा या अंग प्रभावित होता है और यह बायीं तरफ है तो यह दायीं तरफ के हिस्से पर असर डालती है।हालांकि अब तक ब्रेन ट्यूमर के कारणों का सही-सही पता नहीं चल पाया है लेकिन अगर कभी-कभी मिरगी के दौरे के समान दौरा पड़ता हो या बेहोशी आती हो, सिर में असहनीय दर्द होता हो, हाथ-पैरों में ऐंठन हो, ज्यादा कमजोरी का अहसास हो, सुबह के समय सिर में अक्सर दर्द होता हो, दृष्टि का अचानक कम होना या कलर ब्लांइडनेस आदि हो तो ब्रेन ट्यूमर हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ मामलों में रेडिएशन और फोन पर लंबे समय तक बात करने से रेडियो फ्रीक्वेंसी के कारण ब्रेन पर असर पड़ता हैं, पुष्टि हुई हैं। दो प्रकार के ट्यूमर होते हैं-पहला कैंसरस और दूसरा नान कैंसरस। हर ट्यूमर कैंसरस नहीं होता है।<br />
विश्व में मस्तिष्क संबंधी रोगों के बढ़ने के साथ ही हर साल 2,500 से भी ज्यादा भारतीय बच्चे मस्तिष्क मेरु-द्रव्य (सीएसएफ) के जरिए फैलने वाले एक घातक मस्तिष्क ट्यूमर से पीड़ित हो जाते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक, भारत में हर साल 40,000-50,000 व्यक्तियों में मस्तिष्क कैंसर का मूल्यांकन किया जाता है। इनमें से 20 प्रतिशत बच्चे होते हैं। एक साल पहले यह आंकड़ा पांच प्रतिशत के आसपास था। ब्रेन ट्यूमर फाउंडेशन आॅफ इंडिया के मुताबिक, ल्यूकेमिया के बाद मस्तिष्क ट्यूमर बच्चों में दूसरा सबसे आम कैंसर है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रेन ट्यूमर की पहचान करना मुश्किल नहीं हैं। ब्रेन में ट्यूमर का आकार, स्थान और प्रकार अर्थात लक्षणों के आधार पर इसे आसानी से पहचाना जा सकता हैं। इसे पुख्ता करने के लिए योग्य न्यूरोसर्जन से परामर्श, सीटी स्केन तथा एमआरआई की मदद ली जा सकती हैं। यहीं नहीं समय पर उचित इलाज से मरीज इस मर्ज से मुक्ति पा सकता हैं, पूरी तरह स्वस्थ भी हो सकता हैं। ब्रेन ट्यूमर के मामले में सबसे बड़ी परेशानी यह है कि शुरूआती दिनों में आसानी से इसका पता नहीं लगता। आधे मरीज साल भर बाद ही जान पाते हैं कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है। 10 से 15 प्रतिशत मरीजों को पांच साल बाद इसका पता चलता है। लगभग इतने ही मरीज 10 साल बीत जाने के बाद समझ पाते हैं कि वे इस गंभीर बीमारी की चपेट में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार विटामिन-सी मस्तिष्क कैंसर के मरीजों के ट्यूमर को तेजी से खत्म कर सकता है। ब्रेन ट्यूमर से बचाव के बहुत रास्ते ज्ञात नहीं हैं, फिर भी खानपान में रसायनों से जितना बच सकें, बेहतर है। ज्यादा जागने की आदत न बनाएं। नर्वस सिस्टम को परेशानियों से बचाए रखने के लिए भरपूर नींद जरूरी है। विटामिनों और पौष्टिकता से भरपूर आहार लें। विटामिन-सी, विटामिन-के और विटामिन-ई वाले खाद्य पदार्थों पर विशेष ध्यान दें। जंकफूड या डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों से दूरी बनाएं। पानी भरपूर पिएं। ये ही बचाव के रास्ते है जिनका अनुसरण कर हम इस भीषण रोग से अपना बचाव कर सकते है।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 Jun 2018 10:34:58 +0530</pubDate>
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                <title>सबसे बड़ा खतरा है प्लास्टिक प्रदूषण</title>
                                    <description><![CDATA[प्रति वर्ष दुनिया में 100 से ज्यादा देशों के लोगों द्वारा 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरूआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया था। इस अभियान की शुरूआत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-biggest-ri-is-plastic-pollution/article-3953"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/polluction.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रति वर्ष दुनिया में 100 से ज्यादा देशों के लोगों द्वारा 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरूआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया था। इस अभियान की शुरूआत लोगों के बीच में पर्यावरण के मुद्दों के बारे में वैश्विक जागरुकता लाने के साथ ही पर्यावरण के लिए सकारात्मक कदम उठाने के लिए की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजकल पर्यावरण एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिसके बारे में सभी को जागरुक होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस अभियान का मुख्य उद्देश्य लोगों के सामने पर्यावरण के मुद्दों का वास्तविक चेहरा देना और उन्हें विश्वभर में पर्यावरण के अनुकूल विकास को सक्रिय प्रतिनिधि बनाने के लिए सशक्त करना था। हमारे पर्यावरण की स्थिति प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के कारण दिन प्रति दिन गिरती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत दिनो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो पर अपने मन की बात कार्यक्रम के 44वें संस्करण में विश्व पर्यावरण दिवस के बारे में बताते हुए कहा कि इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन भारत में हो रहा है। हमे प्रकृति में हो रहे नकारात्मक बदलाव को रोकने की जिम्मेदारी लेनी है। इस आयोजन के माध्यम से भारत का मकसद दुनिया को यह संदेश देना है कि पर्यावरण दिवस पर पेड़ लगाने जैसे सांकेतिक काम करने के बजाए इसे प्रदूषण फैलाने वाली लोगों की सामान्य आदतों में बदलाव से जोड़ कर एक बड़ा जन आन्दोलन बनाना है। इस दौरान प्रधानमंत्री ने जनता से प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करने का अनुरोध भी किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि इस वर्ष भारत आधिकारिक तौर पर विश्व पर्यावरण दिवस की मेजबानी करके गौरवान्वित महसूस कर रहा है। यह भारत के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि है और यह इस बात का परिचायक है कि जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में विश्व में भारत के बढ़ते नेतृत्व को भी स्वीकृति मिल रही है। प्रधानमंत्री ने कहा जब भीषण गर्मी होती है, बाढ़ आती है, बारिश नही थमती है, असहनीय ठंड पड़ती है तो हर कोई विशेषज्ञ बन करके ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन की बातें करता है, लेकिन बातें करने से बात बनती है क्या? प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना, प्रकृति की रक्षा करना, यह हमारा सहज स्वभाव होना चाहिए, हमारे संस्कारों में होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार विश्व पर्यावरण दिवस पर की थीम है प्लास्टिक प्रदूषण को हराना (बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन)। इस थीम के भाव को इसके महत्व को समझते हुए हम सब को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि हम घटिया पॉलीथीन व प्लास्टिक का इस्तेमाल नही करेगें। हम प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने का प्रयास करेंगें, क्योंकि इससे हमारी प्रकृति पर, वन्य जीवन पर और हमारे स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। हमें प्रकृति के साथ सदभाव के साथ जुड़ कर रहना है। इस पर्यावरण दिवस पर हम सब इस बारे में सोचें कि हम अपनी धरती को स्वच्छ और हरित बनाने के लिए क्या कर सकते हैं ? किस तरह इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं ? क्या नया कर सकते हैं ?</p>
<p style="text-align:justify;">अब समय आ गया है कि हम पौधारोपण पर ध्यान केंद्रित करें। सिर्फ पौधारोपण करने से कुछ नहीं होगा जब तक हम यह सुनिश्चित नहीं कर लेते कि हम उस पौधे के पेड़ बनने तक उसकी देखभाल करेंगें। विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के दूसरे तरीकों सहित बाढ़ से बचाने, सौर स्रोतों के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन, नये जल निकासी तंत्र का विकास करना, जंगल प्रबंधन पर ध्यान देना, ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव घटाना, भूमि पर पेड़ लगाने व बायो-ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देने के को प्रोत्साहित करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सम्मेलन का उद्देश्य सभी देशों के लोगों को एक साथ लाकर जलवायु परिवर्तन के साथ मुकाबला करने और जंगलों के प्रबन्ध को सुधारना है। प्रकृति द्वारा उपहार स्वरुप दिये गये वास्तविक रुप में पृथ्वी को बचाने के लिये आयोजित इस उत्सव में सभी आयु वर्ग के लोगों को सक्रियता से शामिल करना होगा। तेजी से बढ़ते शहरीकरण व लगातार काटे जा रहे पड़ो के कारण बिगड़ते पर्यावरण संतुलन पर रोक लगानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">आज दुनिया में सबसे ज्यादा पर्यावरण को नुकसान प्लास्टिक पहुंचा रहा है। प्लास्टिक से बनी पॉलीथीन की थैलियों को खाने से प्रतिवर्ष लाखों पशु मौत के मुंह में समा जाते हैं। पहले लोग पॉलीथीन की थैलियों का प्रयोग नहीं करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लोग बाजार से सामान खरीदने जाते तो घर से कपड़े या जूट से बना थैला साथ लेकर जाते थे। दूकानो पर भी पॉलीथीन की थैली के स्थान पर कागज से बने थैलो, ठंूगो में सामान डालकर दिया जाता था। ग्रामीण घरो में महिलाओं द्वारा अमूमन घर के रद्दी कागजो को एकत्रित कर उनकी लुगदी से घरों में दैनिक उपयोग में काम आने वाले बर्तन बनाये जाते थे। घर में कागज से बनाये गये बर्तनो में दैनिक उपयोग का सामान रखा जाता था जिनसे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता था।</p>
<p style="text-align:justify;">पुराने समय में पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिये पेड़ लगाने पर सबसे अधिक जोर रहता था। पेड़ों की रक्षा करने के लिये बड़े बुजुर्ग बच्चों को उनसे सम्बन्धित किस्से-कहानियां सुनाये करते थे। पेड़ों को देवताओं के समान दर्जा दिया जाता था ताकि उन्हे कटने से बचाया जा सके। बड़-पीपल जैसे छायादार पेड़ो को काटने से रोकने के लिये उनकी देवताओं के रूप में पूजा की जाती रही है। इसी कारण आज भी लोग बड़ व पीपल का पेड़ नहीं काटते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तुलसी का पौधा पर्यावरण के लिये सबसे अधिक उपयोगी माना गया है, इसलिये लोगों द्वारा तुलसी का पौधा मन्दिरों व घर-घर में लगाया जाता है। पहले के समय में गांवों में कुआं बनाते समय कुंए के पास एक छायादार पेड़ देवता के नाम पर लगाया जाता था जिसे काटना वर्जित था। उसका उद्देश्य गर्मी में उस कुयें पर पानी पीने आने वाला राहगीर कुछ देर पेड़ की शीतल छाया में विश्राम कर सकें। पहले लोगों ने पर्यावरण को बचाने के लिये नदी को मॉ का दर्जा दिया तो तालाब, कुआ, बावड़ी, जोहड़ को धार्मिक रिती-रिवाजों से जोड़ कर विभिन्न शुभ कार्यों में उनकी पूजा करने लगे। ऐसा करने का मकसद एक ही था कि लोग धार्मिक मान्यता के चलते उनमें गन्दगी डाल कर उन्हे प्रदूषित नहीं करें। बंगाल में तो आज भी दैनिक उपयोग में प्लास्टिक के बजाय मिट्टी से बने बर्तनो का अधिक उपयोग होता है। इससे पर्यावरण भी नहीं बिगड़ता है व साथ ही मिट्टी के बर्तन बनाने से लोगो को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिलता है। मिट्टी से बने बर्तनो को उपयोग के बाद मिट्टी में डाल देने से कुछ समय में पुन: मिट्टी बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि प्लास्टिक से बना सामान जल्दी नष्ट नहीं होता है जिससे उत्पन्न प्रदूषण का खामियाजा पशु, पक्षी, मनुष्य सहित पूरी पृथ्वी को उठाना पड़ता है। प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में 500 अरब प्लास्टिक बैगों का उपयोग किया जाता है। हर वर्ष कम से कम 800 टन प्लास्टिक महासागरों में पहुंचता है, जो प्रति मिनट एक कूड़े से भरे ट्रक के बराबर है। हमारे द्वारा उत्पन्न किए गए कुल कचरे में 10 प्रतिशत योगदान प्लास्टिक के कचरे का होता है। दुनिया के सबसे अधिक 14 प्रदूषित शहर भारत के हैं। हमारे देश के शहरों का वातावरण तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है। हमें उसे और अधिक प्रदूषित होने से बचाने के लिये प्रयास करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हमे विश्व पर्यावरण दिवस पर आमजन को भागीदार बना कर उन्हे इस बात का अहसास करवाना होगा कि बिगड़ते पर्यावरण असंतुलन का खामियाजा हमे व हमारी आने वाली पीढि?ों को उठाना पड़ेगा। इसलिये हमें अभी से पर्यावरण को लेकर सतर्क व सजग होने की जरूरत है। हमें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में तेजी से काम करना होगा तभी हम बिगड़ते पर्यावरण असंतुलन को संतुलित कर पायेगें। पर्यावरण के गिरते स्तर के वास्तविक कारण के बारे में लोगो को जागरुक करने के लिये एक नये संकल्प के साथ यह उत्सव मनाया जावे तभी विश्व पर्यावरण दिवस मनाना सार्थक होगा।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 Jun 2018 15:27:48 +0530</pubDate>
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                <title>कृपया खुद के रिस्क पर करें हवाई सफर</title>
                                    <description><![CDATA[नए विमानन नियम, नई सहूलियते, आधुनिक तामझाम, यात्रा में सुगमता की गारंटी और भी कई तमाम हवाई कागजी बातें उस समय धरी की धरी रह जाती हैं जब ΄लेन उड़ने से पहले अपनी अव्यवस्था ब्यां कर देता है। उदाहरण दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सपाट रनवे पर आमने-सामने एक साथ दो विमानों का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/please-make-yourself-at-ri-of-flight/article-682"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/plan-slip.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नए विमानन नियम, नई सहूलियते, आधुनिक तामझाम, यात्रा में सुगमता की गारंटी और भी कई तमाम हवाई कागजी बातें उस समय धरी की धरी रह जाती हैं जब ΄लेन उड़ने से पहले अपनी अव्यवस्था ब्यां कर देता है। उदाहरण दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सपाट रनवे पर आमने-सामने एक साथ दो विमानों का आ जाना। इसे एटीएस की गलती कहें या विमानन कंपनियों की तकनीकी नाकामी, या फिर पायलटों की लापरवाही! इसे घोर लापरवाही ही कही जाएगी।<br />
28 दिसंबर को देश में दो बड़े विमान हादसे होते-होते बचे। एक दिल्ली और दूसरा गोवा में। दोनों घटनाओं ने हवाई यात्रा सुरक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है। विमानन कंपनियां इस समय सवालों के घेरे में हैं और होनी भी चाहिए। गोवा और दिल्ली में एक ही दिन दो बड़ी विमान घटनाएं हो सकती थीं। गोवा में जिस तरह से विमान लैंडिंग के दौरान अपना संतुलन खोकर धरती पर गिरा और हादसा होने से बचा उसे कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे। अंदर बैठे यात्रियों ने बाहर निकलकर बताया कि जब विमान रनवे पर फिसल रहा था तो धड़ाम-धड़ाम की तेज आवाजें उन्हें सुनाई दे रही थी। विमान तेजी से अचानक मुड़ा और आगे की तरफ तेज आवाज करता हुआ एकदम झुक गया। थोड़ी देर के लिए सभी यात्रियों की सांसे थम सी गईं।<br />
विमान का लैंडिंग गियर जिस तरह से क्षतिग्रस्त हुआ है उससे हादसा होने की परिकल्पना की जा सकती हैं। लैंडिंग गियर पूरी तरह से चकनाचूर हो गया है। जेट एयरवेज के इस विमान में 161 यात्री यात्रा कर रहे थे। घटना के वक्त थोड़ी देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। विमान में सवार कू्र मेंबर यात्रियों को छोड़ खुद की जान बचाने के लिए तेजी से उतरते दिखाई दिए। इसी के चलते आपाधापी में 12 यात्री जख्मी हो गए।<br />
सवाल उठता है कि यात्रियों की सुरक्षा आखिर कौन करेगा? दोनों घटनाओं में विमानन कंपनियों की नाकामी प्रत्यक्ष रूप से सामने आ रही है। उनकी तकनीक में अव्यवस्था की तस्वीर सामने आई है। हालांकि यह गलती न विमानन कंपनी स्वीकार करेंगी और न ही सरकारी तंत्र! जिस तरह से विमान का अगला हिस्सा रनवे को पार करता हुआ दूसरी तरफ जाकर जमीन को छूआ उससे प्रतीत हो रहा है कि इसमें सिर्फ पायलट की गलती रही होगी। विमान के अंदर लोग दहशत में आ गये क्योंकि उस वक्त जोरदार झटका लगा। घटना की प्रारंभिक जांच करते हुए प्रशासन ने फिलहाल दोनों पायलटों के लाइसेंस अस्थायी रूप रद्द कर दिए हैं। सवाल उठता है कि क्या यह सब करने से हादसों को रोकने का हल निकल जाएगा। शायद नहीं! घटना की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए, दोषी कर्मचारियों को सख्त सजा देनी चाहिए।<br />
हरियाणा का चरखी विमान हादसा शायद ही कोई भूल पाए! उस हादसे को भारत में अब तक के सबसे बड़े हवाई हादसे में गिना जाता है। घटना को याद करते रूहें कांप उठती हैं। एटीसी से जुड़ा हुआ भारत में अबतक का सबसे बड़ा हवाई हादसा है। दिल्ली में चरखी हादसे की पुनरावृति होते-होते बची। दो विमान आमन-सामने टक्कर खाने से बच गए। बताने की जरूरत नहीं है कि अगर टक्कर हो जाती तो क्या होता? दिल्ली की तरह 12 नवंबर, 1996 में चरखी दादरी में दो विमानों में मिड एयर कलिजन हुआ। एक विमान सऊदी अरब का था तो दूसरा कजाखिस्तान का। उस हादसे में दोनों विमानों में सवार सभी 349 यात्रियों में से कोई जिंदा नहीं बचा।<br />
दिल्ली-गोवा की इन दोनों घटनाओं ने विमान यात्रियों की आशंकाओं में बढ़ोतरी की। क्योंकि हाल ही में विमान संबंधी हादसों की भयावह घटनाएं घटी हैं। पिछले स΄ताह ही रूस का एक विमान समुद्र में समा गया था। यात्रियों में हवाई सफर को लेकर डर है। इन ताजा घटनाओं ने डर में और बढोतरी कर दी है। तकनीकी नाकामी से विमान दुर्घटनाएं होती रही हैं। अब विमानन कंपनियों द्वारा सुरक्षा संबंधी लापरवाही और अशांत क्षेत्रों के ऊपर से उड़ान भरने को लेकर नए सवाल खड़े होने लगे हैं। आखिर कैसे हो सुगम हवाई यात्रा। हालांकि उक्त घटनाओं पर केंद्र सरकार ने नाराजगी जाहिर की है। सख्त जांच के आदेश पारित किए हैं। अगर पायलटों की गलती सामने आती है तो प्रशासन को ऐसे सभी पायलटों को अयोग्य कर देना चाहिए जो यात्रा के दौरान लापरवाही दिखाते हैं। क्योंकि उनकी थोड़ी सी चूक कई लोगों की जान ले सकती है।<br />
पूर्व की घटनाओं को देखें तो एयर इंडिया पहले भी कई बार विमान हादसों की शिकार हो चुकी है। खराब मौसम, पायलट की चूक या फिर कोई टेक्निकल समस्या से अब तक हवाई हादसों में अनगिनत यात्रियों ने अपनी जान गंवाई है। जनवरी 1978 में पहली बार एयर इंडिया का विमान अरब सागर में क्रैश हुआ था। उस विमान में 213 यात्री सफर कर रहे थे, जिनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित हुआ। विमान में सवार सभी लोग मारे गए। इसके बाद 21 जून 1982 को एयर इंडिया का एक और विमान मुंबई एयरपोर्ट पर क्रैश हुआ। विमान में सवार 111 लोगों में से 17 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना में प्रत्यक्ष रूप से पायलटों की गलती सामने आई। जांच में पाया गया कि पायलट की गलती से ये हादसा हुआ।<br />
भारत के सभी रनवे और विमानों को आधुनिक करने की जरूरत है। दक्ष पायलटों को ही विमान उड़ाने की इजाजत होनी चाहिए। विमानों का रखरखाव ठीक से हो और इनकी समय पर जांच करनी चाहिए। ताकि यात्री भयमुक्त होकर विमानों में सफर कर सकें। दरअसल पूर्व में हुए कई विमान हादसों ने यात्रियों के दिलों में भय पैदा कर दिया है। दो साल पहले गायब हुए एक विदेशी जहाज का आज तक पता नहीं चल सका। वहीं कुछ दिन पहले रूस का एक विमान समुद्र में समा गया। उस जहाज में सवार सभी यात्रियों की जलसमाधी बन गई। <em>रमेश ठाकुर</em></p>
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                <pubDate>Fri, 30 Dec 2016 05:10:14 +0530</pubDate>
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