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                <title>सिर्फ अपने नहीं बल्कि देश के लिए भी जीएं</title>
                                    <description><![CDATA[हरि शंकर आचार्य बीकानेर के लक्ष्मण मोदी के प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे झुग्गी-झोंपड़ियों में बीतते हैं। इस दौरान वे बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें व्यक्तित्व निर्माण के गुर सिखाते हैं। मोदी सप्ताह में एक बार इन बच्चों को अपने घर ले जाते हैं। उन्हें टीवी दिखाते हैं। कम्प्यूटर और लेपटॉप चलाना सिखाते हैं। एक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/live-not-just-for-yourself-but-for-the-country/article-4074"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/life1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>हरि शंकर आचार्य</strong></p>
<p style="text-align:justify;">बीकानेर के लक्ष्मण मोदी के प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे झुग्गी-झोंपड़ियों में बीतते हैं। इस दौरान वे बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें व्यक्तित्व निर्माण के गुर सिखाते हैं। मोदी सप्ताह में एक बार इन बच्चों को अपने घर ले जाते हैं। उन्हें टीवी दिखाते हैं। कम्प्यूटर और लेपटॉप चलाना सिखाते हैं। एक महीने में एक बार विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों और शिक्षण संस्थाओं का भ्रमण करवाते हैं। बच्चों में राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा हो सकें, इसके दृष्टिगत इन बच्चों के साथ सार्वजनिक स्थानों पर लगे अवैध पोस्टर-हॉर्डिंग हटाते हैं। सफाई अभियान चलाते हैं और पॉलीथीन के दुरूपयोग के बारे में बताते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अभावों में जी रहे इन लोगों तथा इक्कीसवीं सदी में मुख्यधारा से वंचित इन बच्चों को देखकर उनके मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा हुई। इसी भाव के साथ वे इस बस्ती में पहुंचे। एक चौपहिया वाहन अपनी ओर आते देख बच्चों ने उसे घेर लिया। मोदी उतरे और उनके हाथों मे कुछ नहीं था, तो एक बारगी बच्चे निराश हो गए। बच्चों को लगा जैसे हर कोई उनकी गरीबी और असमर्थता को देखकर उन्हें आर्थिक सहायता और कुछ सामान दे जाते हैं, मोदी भी उसी ध्येय से आए होंगे, लेकिन मोदी ने कहा वे बच्चों को पढ़ाने आए हैं। यह सुनकर भी उनके मन में कोई उत्सुकता देखने को नहीं मिली, क्योंकि वे इससे पहले भी ऐसे दावे देख चुके थे। लेकिन मोदी मानो ‘धुन के धनी’ थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने अगले ही दिन से वहां क्लास लगानी शुरू कर दी। पांच बच्चों से शुरू हुआ यह सिलसिला 28 तक पहुंच गया। उनकी लगन देखकर बच्चों के अभिभावकों ने पढ़ाई के लिए एक झोंपड़ी बना दी। अब मोदी प्रतिदिन यहां आते और उन्हें पढ़ाते। पढ़ाई के साथ वे बच्चों को सिखाते, अभिवादन का सलीका और शरीर को साफ-सुथरा रखने की कला। पांच-छह महीनों में ही इन बच्चों को अक्षर ज्ञान हो गया। अब इन बच्चों का दाखिला पास के एक सरकारी स्कूल में करवा दिया गया और भामाशाहों के सहयोग से स्कूल डेज्स, बस्ते और कॉपियां भी आ गईं। फिर इन बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूटर भी लगा दिया गया। मोदी इन बच्चों को अपने घर ले जाते। वहां भी एक क्लास-रूम बन गया।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चे यू-ट्यूब पर कार्टून और बच्चों की फिल्मे देखते। इन्होंने सैनिक स्कूल का भ्रमण किया। योग और प्राणायाम सीखा। साथ ही सीखा स्वावलम्बी बनकर जीने का तरीका। मोदी का जुनून यहां भी नहीं रुका। अब मोदी इन बच्चों को शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर ले जाते हैं। इन स्थलों के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में बताते हैं। प्रमुख सर्किलों और ऐतिहासिक भवनों पर लोगों द्वारा पोस्टर एवं हॉर्डिंग लगाकर इनकी सुंदरता को बिगाड़ दिया जाता, तो मोदी खुद भी इनकी सफाई करते और बच्चों से भी करवाते हैं। पिछले दो-ढाई सालों में मोदी इन बच्चों के साथ परिजन की तरह जुड़ चुके हैं। इस दौरान बच्चों के व्यवहार और रहन-सहन के सलीके में भी आमूलचूल परिवर्तन आ गया है। अब ये बच्चे किसी के सामने भीख के लिए हाथ नहीं फैलाते। झोपड़ियों में आने वालों को बेवजह परेशान नहीं करते।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कुछ समय पूर्व जो छोटा सा सपना देखा, वह आज साकार होने की ओर अग्रसर है। इसके लिए मोदी को किसी ने प्रेरित नहीं किया, बल्कि उनके दिल में इसके प्रति संवेदनशीलता की भावना जगी। ऐसा करना मोदी के लिए जरूरी नहीं था और वह भी आम चलन की भांति इन झोपड़ियों और इनमें रहने वाले लोगों के प्रति हीन भावना या क्षणिक संवेदना जताकर भूल सकते थे, लेकिन इन्होंने समाज को कुछ देने का मन बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक संकल्प लिया और इसे पूरा करने में जुट गए। भविष्य में यदि इनमें से एक या दो बच्चे भी अच्छा मुकाम हासिल कर लेंगे तो उनके मन में सदैव मोदी के प्रति कृतज्ञता का भाव रहेगा, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। तो इस ‘संडे का फंडा’ यह है कि हमें सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि देश और समाज को कुछ देने के जुनून के साथ जीना चाहिए। इस दिशा में किए गए हमारे छोटे-छोटे प्रयास पिछड़े लोगों को मुख्यधारा से जोड़ देते हैं और यह देश को विकास के पथ पर ले जाने में सूक्ष्म लेकिन ठोस भूमिका निभाते हैं।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Jun 2018 09:06:06 +0530</pubDate>
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                <title>कृपया खुद के रिस्क पर करें हवाई सफर</title>
                                    <description><![CDATA[नए विमानन नियम, नई सहूलियते, आधुनिक तामझाम, यात्रा में सुगमता की गारंटी और भी कई तमाम हवाई कागजी बातें उस समय धरी की धरी रह जाती हैं जब ΄लेन उड़ने से पहले अपनी अव्यवस्था ब्यां कर देता है। उदाहरण दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सपाट रनवे पर आमने-सामने एक साथ दो विमानों का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/please-make-yourself-at-ri-of-flight/article-682"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/plan-slip.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नए विमानन नियम, नई सहूलियते, आधुनिक तामझाम, यात्रा में सुगमता की गारंटी और भी कई तमाम हवाई कागजी बातें उस समय धरी की धरी रह जाती हैं जब ΄लेन उड़ने से पहले अपनी अव्यवस्था ब्यां कर देता है। उदाहरण दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सपाट रनवे पर आमने-सामने एक साथ दो विमानों का आ जाना। इसे एटीएस की गलती कहें या विमानन कंपनियों की तकनीकी नाकामी, या फिर पायलटों की लापरवाही! इसे घोर लापरवाही ही कही जाएगी।<br />
28 दिसंबर को देश में दो बड़े विमान हादसे होते-होते बचे। एक दिल्ली और दूसरा गोवा में। दोनों घटनाओं ने हवाई यात्रा सुरक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है। विमानन कंपनियां इस समय सवालों के घेरे में हैं और होनी भी चाहिए। गोवा और दिल्ली में एक ही दिन दो बड़ी विमान घटनाएं हो सकती थीं। गोवा में जिस तरह से विमान लैंडिंग के दौरान अपना संतुलन खोकर धरती पर गिरा और हादसा होने से बचा उसे कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे। अंदर बैठे यात्रियों ने बाहर निकलकर बताया कि जब विमान रनवे पर फिसल रहा था तो धड़ाम-धड़ाम की तेज आवाजें उन्हें सुनाई दे रही थी। विमान तेजी से अचानक मुड़ा और आगे की तरफ तेज आवाज करता हुआ एकदम झुक गया। थोड़ी देर के लिए सभी यात्रियों की सांसे थम सी गईं।<br />
विमान का लैंडिंग गियर जिस तरह से क्षतिग्रस्त हुआ है उससे हादसा होने की परिकल्पना की जा सकती हैं। लैंडिंग गियर पूरी तरह से चकनाचूर हो गया है। जेट एयरवेज के इस विमान में 161 यात्री यात्रा कर रहे थे। घटना के वक्त थोड़ी देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। विमान में सवार कू्र मेंबर यात्रियों को छोड़ खुद की जान बचाने के लिए तेजी से उतरते दिखाई दिए। इसी के चलते आपाधापी में 12 यात्री जख्मी हो गए।<br />
सवाल उठता है कि यात्रियों की सुरक्षा आखिर कौन करेगा? दोनों घटनाओं में विमानन कंपनियों की नाकामी प्रत्यक्ष रूप से सामने आ रही है। उनकी तकनीक में अव्यवस्था की तस्वीर सामने आई है। हालांकि यह गलती न विमानन कंपनी स्वीकार करेंगी और न ही सरकारी तंत्र! जिस तरह से विमान का अगला हिस्सा रनवे को पार करता हुआ दूसरी तरफ जाकर जमीन को छूआ उससे प्रतीत हो रहा है कि इसमें सिर्फ पायलट की गलती रही होगी। विमान के अंदर लोग दहशत में आ गये क्योंकि उस वक्त जोरदार झटका लगा। घटना की प्रारंभिक जांच करते हुए प्रशासन ने फिलहाल दोनों पायलटों के लाइसेंस अस्थायी रूप रद्द कर दिए हैं। सवाल उठता है कि क्या यह सब करने से हादसों को रोकने का हल निकल जाएगा। शायद नहीं! घटना की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए, दोषी कर्मचारियों को सख्त सजा देनी चाहिए।<br />
हरियाणा का चरखी विमान हादसा शायद ही कोई भूल पाए! उस हादसे को भारत में अब तक के सबसे बड़े हवाई हादसे में गिना जाता है। घटना को याद करते रूहें कांप उठती हैं। एटीसी से जुड़ा हुआ भारत में अबतक का सबसे बड़ा हवाई हादसा है। दिल्ली में चरखी हादसे की पुनरावृति होते-होते बची। दो विमान आमन-सामने टक्कर खाने से बच गए। बताने की जरूरत नहीं है कि अगर टक्कर हो जाती तो क्या होता? दिल्ली की तरह 12 नवंबर, 1996 में चरखी दादरी में दो विमानों में मिड एयर कलिजन हुआ। एक विमान सऊदी अरब का था तो दूसरा कजाखिस्तान का। उस हादसे में दोनों विमानों में सवार सभी 349 यात्रियों में से कोई जिंदा नहीं बचा।<br />
दिल्ली-गोवा की इन दोनों घटनाओं ने विमान यात्रियों की आशंकाओं में बढ़ोतरी की। क्योंकि हाल ही में विमान संबंधी हादसों की भयावह घटनाएं घटी हैं। पिछले स΄ताह ही रूस का एक विमान समुद्र में समा गया था। यात्रियों में हवाई सफर को लेकर डर है। इन ताजा घटनाओं ने डर में और बढोतरी कर दी है। तकनीकी नाकामी से विमान दुर्घटनाएं होती रही हैं। अब विमानन कंपनियों द्वारा सुरक्षा संबंधी लापरवाही और अशांत क्षेत्रों के ऊपर से उड़ान भरने को लेकर नए सवाल खड़े होने लगे हैं। आखिर कैसे हो सुगम हवाई यात्रा। हालांकि उक्त घटनाओं पर केंद्र सरकार ने नाराजगी जाहिर की है। सख्त जांच के आदेश पारित किए हैं। अगर पायलटों की गलती सामने आती है तो प्रशासन को ऐसे सभी पायलटों को अयोग्य कर देना चाहिए जो यात्रा के दौरान लापरवाही दिखाते हैं। क्योंकि उनकी थोड़ी सी चूक कई लोगों की जान ले सकती है।<br />
पूर्व की घटनाओं को देखें तो एयर इंडिया पहले भी कई बार विमान हादसों की शिकार हो चुकी है। खराब मौसम, पायलट की चूक या फिर कोई टेक्निकल समस्या से अब तक हवाई हादसों में अनगिनत यात्रियों ने अपनी जान गंवाई है। जनवरी 1978 में पहली बार एयर इंडिया का विमान अरब सागर में क्रैश हुआ था। उस विमान में 213 यात्री सफर कर रहे थे, जिनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित हुआ। विमान में सवार सभी लोग मारे गए। इसके बाद 21 जून 1982 को एयर इंडिया का एक और विमान मुंबई एयरपोर्ट पर क्रैश हुआ। विमान में सवार 111 लोगों में से 17 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना में प्रत्यक्ष रूप से पायलटों की गलती सामने आई। जांच में पाया गया कि पायलट की गलती से ये हादसा हुआ।<br />
भारत के सभी रनवे और विमानों को आधुनिक करने की जरूरत है। दक्ष पायलटों को ही विमान उड़ाने की इजाजत होनी चाहिए। विमानों का रखरखाव ठीक से हो और इनकी समय पर जांच करनी चाहिए। ताकि यात्री भयमुक्त होकर विमानों में सफर कर सकें। दरअसल पूर्व में हुए कई विमान हादसों ने यात्रियों के दिलों में भय पैदा कर दिया है। दो साल पहले गायब हुए एक विदेशी जहाज का आज तक पता नहीं चल सका। वहीं कुछ दिन पहले रूस का एक विमान समुद्र में समा गया। उस जहाज में सवार सभी यात्रियों की जलसमाधी बन गई। <em>रमेश ठाकुर</em></p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
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                <pubDate>Fri, 30 Dec 2016 05:10:14 +0530</pubDate>
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