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                <title>GDP growth rate - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>GDP Growth Rate: आर्थिक मोर्चे पर भारत के लिए आई ये खुशखबरी, जानिए&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[GDP Growth Rate: नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। उद्योग संगठन फिक्की ने चालू वित्त वर्ष में औसत जीडीपी वृद्धि दर 7.0 प्रतिशत रहने का अनुमान जताते हुये सरकार से आम बजट में कराधान सुधार, रोजगार सृजन, नवाचार और सतत विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने की अपील की है। जुलाई 2024 में किसे गये सर्वेक्षण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/gdp-growth-rate-estimated-to-be-7-0-percent-in-the-current-financial-year-ficci/article-60021"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/gdp-growth-rate.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>GDP Growth Rate: नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> उद्योग संगठन फिक्की ने चालू वित्त वर्ष में औसत जीडीपी वृद्धि दर 7.0 प्रतिशत रहने का अनुमान जताते हुये सरकार से आम बजट में कराधान सुधार, रोजगार सृजन, नवाचार और सतत विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने की अपील की है। जुलाई 2024 में किसे गये सर्वेक्षण के आधार पर जारी फिक्की के आर्थिक दृष्टिकोण रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है। इसमें कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए औसत वृद्धि दर 2024-25 के लिए 3.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। यह वर्ष 2023-24 में दर्ज की गई लगभग 1.4 प्रतिशत की वृद्धि दर की तुलना में सुधार दशार्ता है। सामान्य दक्षिण-पश्चिम मानसून की उम्मीद के साथ अल नीनो प्रभाव में कमी आने से कृषि उत्पादन के लिए अच्छा संकेत मिलने की संभावना है। दूसरी ओर, उद्योग और सेवा क्षेत्र में चालू वित्त वर्ष में क्रमश: 6.7 प्रतिशत और 7.4 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/if-you-are-bored-of-eating-dal-and-vegetables-everyday-then-definitely-try-this-tadka-dahi-once/">Dahi Tadka: रोज-रोज दाल सब्जी खाते-खाते ऊब गया है मन, तो एक बार जरूर ट्राई करें ये तड़का लगा दही</a></p>
<p style="text-align:justify;">इस सर्वेक्षण में उद्योग, बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों से प्रतिक्रियाएँ ली गई थीं। अर्थशास्त्रियों से वर्ष 2024-25 के लिए और वित्त वर्ष 25 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) और दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के लिए प्रमुख मैक्रो-इकोनॉमिक चर के लिए अपने पूवार्नुमान साझा करने का अनुरोध किया गया था।<br />
सर्वेक्षण के परिणामों के अनुसार, 2024-25 की पहली तिमाही और 2024-25 की दूसरी तिमाही में औसत जीडीपी वृद्धि क्रमश: 6.8 प्रतिशत और 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति के लिए औसत पूवार्नुमान 4.5 प्रतिशत रखा गया है, जिसमें न्यूनतम और अधिकतम सीमा क्रमश: 4.4 प्रतिशत और 5.0 प्रतिशत है। जबकि खाद्य पदार्थों की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं और अनाज, फलों और दूध में मुद्रास्फीति बढ़ रही है, सर्वेक्षण में भाग लेने वालों को उम्मीद है कि खरीफ उत्पादन के बाजार में आने के साथ दूसरी तिमाही में कीमतों में कमी आएगी। रिजर्व बैंक की नीतिगत पहल पर अर्थशास्त्रियों का मानना ​​था कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ही रेपो दर में कटौती की उम्मीद है क्योंकि आरबीआई से मुद्रास्फीति के रुझान पर कड़ी नजर रखते हुए अपने सतर्क दृष्टिकोण को जारी रखने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2024-25 (मार्च 2025) के अंत तक नीतिगत रेपो दर के 6.0 प्रतिशत तक कम होने का अनुमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगले सप्ताह केंद्रीय बजट 2024-25 की घोषणा की जाएगी, इसलिए भाग लेने वाले अर्थशास्त्रियों से नई सरकार की पहली बड़ी सार्वजनिक नीति घोषणा से उनकी अपेक्षाएँ साझा करने के लिए कहा गया। अर्थशास्त्रियों ने नीति में निरंतरता और सरकार द्वारा पहले से किए जा रहे सुधारों में और तेजी आने की उम्मीद जताई। राजकोषीय प्रबंधन और व्यय के विषय पर, भाग लेने वाले अर्थशास्त्रियों ने उल्लेख किया कि सरकार ने राजकोषीय पक्ष पर एक कुशल काम किया है। उम्मीद है कि इस तरह की समझदारी जारी रहेगी क्योंकि वृहद आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, सरकार के पास मजबूत कर संग्रह और भारतीय रिजर्व बैंक के लाभांश हस्तांतरण से अतिरिक्त संसाधनों का लाभ उठाने का अवसर है। इस राजकोषीय हेडरूम का उपयोग सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं पर खर्च बढ़ाने के लिए किया जा सकता है, खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए। पूंजीगत व्यय पर, यह बताया गया कि लक्ष्य बढ़ाया जा सकता है, लेकिन वित्त वर्ष 2025 के लिए अंतरिम बजट में 11.1 लाख करोड़ रुपये की घोषणा में अधिक वृद्धि की उम्मीद नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसमें भाग लेने वाले अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कराधान के पक्ष में कुछ सुधारों की उम्मीद जतायी है। व्यय योग्य आय को बढ़ावा देने और विशेष रूप से निम्न आय वर्ग के लिए उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिए कर दरों में संभावित संशोधन की उम्मीद है। इसके अलावा, यह सुझाव दिया गया कि धारा 80 सी और इसी तरह के प्रावधानों के तहत सीमा बढ़ाने से दीर्घकालिक बचत और निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। पूंजीगत लाभ कर व्यवस्था का सरलीकरण और जीएसटी स्लैब को सुव्यवस्थित करने की दिशा में मार्गदर्शन करने वाला ढांचा भी अपेक्षित है।</p>
<p style="text-align:justify;">अर्थशास्त्रियों ने संकेत दिया कि आगामी बजट में रोजगार को बढ़ावा देने और कार्यबल क्षमताओं को बढ़ाने के लिए व्यापक उपाय पेश किए जाने की उम्मीद है। रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजना की घोषणा, मनरेगा के शहरी समकक्ष की शुरूआत, श्रम कौशल कार्यक्रमों और सॉफ्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश में वृद्धि, और महिला श्रम शक्ति भागीदारी को बढ़ाने के लिए लक्षित नीतियों और सहायता प्रणालियों का कार्यान्वयन की उम्मीद की गयी है। इस साल की शुरूआत में घोषित अंतरिम बजट ने नवाचार को प्रोत्साहित करने की स्पष्ट मंशा दिखाई और यह जारी रहने की उम्मीद है। प्रतिभागियों ने इसके प्रभावी उपयोग के लिए अंतरिम बजट में घोषित अनुसंधान एवं विकास और नवाचार निधि पर आगे के विवरण और तौर-तरीकों की अपेक्षा की है।</p>
<p style="text-align:justify;">बजट में सतत विकास पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है। इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) और हरित हाइड्रोजन उत्पादन और ऊर्जा संक्रमण समर्थन के लिए प्रोत्साहन मुख्य मांगें हैं। आगामी बजट में कृषि क्षेत्र पर अधिक ध्यान दिए जाने की उम्मीद है। अर्थशास्त्रियों ने कृषि सुधारों को लागू करने और दक्षता में सुधार करने के लिए राज्यों के लिए सुधार-संबंधी प्रोत्साहनों का निर्माण करने का प्रस्ताव रखा; मौसम प्रतिरोधी फसलों को विकसित करने और जलवायु प्रभावों के खिलाफ अनुकूली उपायों को लागू करने के लिए समर्थन में वृद्धि; भंडारण बुनियादी ढांचे में सुधार के उपाय; और कृषि-आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए गैर-एमएसपी फसलों के लिए मूल्य पूवार्नुमान तंत्र की स्थापना प्रतिभागियों द्वारा साझा किए गए अन्य सुझाव/अपेक्षाएँ हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बजट में औद्योगिक विकास के लिए अधिक अनुकूल वातावरण बनाने पर भी ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है। अधिक श्रम-गहन क्षेत्रों और घटक विनिर्माण को शामिल करने के लिए पीएलआई योजना की समीक्षा; घरेलू टैरिफ क्षेत्र में उदार भूमि और श्रम कानूनों के साथ बड़े एसईजेड जैसे समूहों का निर्माण; लचीलापन और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए श्रम कानून सुधारों में तेजी लाने की उम्मीद जतायी गयी है। मजबूत सामाजिक बुनियादी ढांचे के निर्माण और दीर्घकालिक आर्थिक विकास का समर्थन करने के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों पर सरकारी खर्च में वृद्धि को भी अर्थशास्त्रियों द्वारा प्राथमिकता के रूप में सूचीबद्ध किया गया है और सरकार से इस पर ध्यान देने की उम्मीद की गयी है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jul 2024 11:08:57 +0530</pubDate>
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                <title>जीडीपी वृद्धि दर जनवरी-मार्च 2022 की तिमाही में 4.1 प्रतिशत</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर (GDP Growth Rate) वित्त वर्ष 2021-22 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च 2022) में इससे पिछली तिमाही की तुलना में घटकर 4.1 प्रतिशत रही। यह अर्थव्यवस्था पर ओमिक्रोन वायरस के संक्रमण की लहर और वैश्विक परिस्थितियों के कारण पैदा चुनौतियों के प्रभाव को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/gdp-growth-rate-in-the-quarter-january-march-2022-at-4-1-percent/article-34052"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/gdp-growth-rate.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर (GDP Growth Rate) वित्त वर्ष 2021-22 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च 2022) में इससे पिछली तिमाही की तुलना में घटकर 4.1 प्रतिशत रही। यह अर्थव्यवस्था पर ओमिक्रोन वायरस के संक्रमण की लहर और वैश्विक परिस्थितियों के कारण पैदा चुनौतियों के प्रभाव को दशार्ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत अक्टूबर-दिसंबर 2021 की तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 5.4 प्रतिशत थी। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने मंगलवार को जीडीपी के आंकड़े जारी करते हुए कहा कि वित्त वर्ष अप्रैल-मार्च 2021-22 में जीडीपी वृद्धि दर 8.7 प्रतिशत रही। इससे पिछले वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी कोरोना महामारी और लॉकडाउन के चलते 6.6 प्रतिशत गिर गयी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2021-22 की आर्थिक वृद्धि दर सरकार के अनुमान से हल्की कम है। वित्त मंत्रालय ने फरवरी 2022 में वित्त वर्ष 2021-22 की वृद्धि दर 8.9 रहने का अनुमान लगाया था। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, स्थिर मूल्य (2011-12 के मूल्य स्तर पर) 2021-22 की चौथी तिमाही का सकल घरेलू उत्पाद 40.78 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पिछले वित्त वर्ष 2020-21 की चौथी तिमाही में स्थिर मूल्य पर जीडीपी 39.18 लाख करोड़ रुपये था, जो इस बार चौथी तिमाही की वास्तविक जीडीपी में वार्षिक आधार पर 4.1 प्रतिशत की वृद्धि दशार्ता है। वार्षिक आधार पर भारत का जीडीपी 2021-22 में अनुमानित 147.36 लाख करोड़ रुपये रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2020-21 के प्रथम संसोधित अनुमान के अनुसार उस वर्ष में वास्तविक जीडीपी 135.58 लाख करोड़ रुपये रहा था। इस तरह 2021-22 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में सालाना आधार पर अनुमानित 8.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। वर्ष 2020-21 में वास्तविक जीडीपी उससे पिछले साल की तुलना में 6.6 प्रतिशत गिर गया था।</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 31 May 2022 20:34:16 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>लुढ़कती भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के प्रयास</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो गई है। अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी से प्रभावित है। उद्योगों के बहुत से सेक्टर में विकास दर कई सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है। वर्ष 2016-17 में जीडीपी विकास दर 8.2 प्रतिशत थी,जो 2017-18 में घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई और वर्ष 2018-19 […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-declining-indian-economy-and-the-efforts-of-the-government/article-10327"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-08/indian-economygdp-growth-rate-financial-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो गई है। अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी से प्रभावित है। उद्योगों के बहुत से सेक्टर में विकास दर कई सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है। वर्ष 2016-17 में जीडीपी विकास दर 8.2 प्रतिशत थी,जो 2017-18 में घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई और वर्ष 2018-19 में जीडीपी की विकास दर 6.8 प्रतिशत रह गई। ताजा अधिकारिक आँकड़ों पर यकीन करें तो वर्ष 2019 की जनवरी से मार्च की तिमाही में जीडीपी की विकास दर 5.8 फीसदी रह गई थी,जो 5 साल में सबसे कम है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह तीन साल में विकास की रफ्तार में 1.5 प्रतिशत की कमी आ गई है। पिछले 20 वर्षों में ऐसा पहले सिर्फ दो बार हुआ है कि लगातार तीन तिमाही में वृद्धि दर गिरी हो। जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत और निवेश,सब पर असर पड़ रहा है। जिन सेक्टरों पर इस मंदी का सबसे ज्यादा असर पड़ा है,वहाँ पर नौकरियाँ घटाने के ऐलान हो रहे हैं। आरबीआई ने अपनी मौद्रिक समिति की बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था के जीडीपी ग्रोथ रेट के पूवार्नुमानों को घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ी अर्थव्यवस्था के मामले में भारत की रैंकिंग 7 वें नंबर पर आ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दौर में प्रभावशाली निजी विमान सेवा कंपनी जेट एयरवेज आज बंद हो चुकी है। एयर इंडिया काफी घाटे में चल रही है। किसी दौर में टेलीकॉम सेक्टर की पहचान रही बीएसएनएल आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स ने हाल ही में बाजार से एक हजार करोड़ रुपए का कर्ज लेकर अपने कर्मचारियों को वेतन दिया। यह इस दशक में पहली बार था। भारतीय डाक सेवा का वित्त वर्ष 2019 में वार्षिक घाटा 15 हजार करोड़ हो चुका है। भारत की सबसे बड़ी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कंपनी ओएनजीसी का अतिरिक्त कैश रिजर्व तेजी से घट रहा है। सरकार द्वारा गैर जरूरी अधिग्रहण के चलते आज यह कंपनी एक बड़े कर्ज के दबाव में आ गई है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3><em>खपत में गिरावट:</em></h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">विकास दर घटने से लोगों की आमदनी पर बुरा असर पड़ रहा है। देश में बाजार की सबसे बड़ी रिसर्चर कंपनी नील्सन की रिपोर्ट कहती है कि तेजी से खपत वाले सामान यानी फास्ट मूविंग कंजपशन गुड्स अर्थात एफएमसीजी की बिक्री की विकास दर इस साल जनवरी से मार्च के बीच 9.9 प्रतिशत थी, लेकिन इसी साल अप्रैल से जून की तिमाही में ये घटकर 6.2 फीसदी रह गई। एफएमसीजी के उपरोक्त आँकड़ों से स्पष्ट है कि लोग अब अनिवार्य आवश्यकताओं में भी कटौती कर रहे हैं। ब्रिटेनिया बिस्किट का कहना है कि अब लोग 5 रू के बिस्कुट को भी खरीदने से पहले सोच रहे हैं। इसी तरह पारले जी बिस्कुट कंपनी की हालत बिगड़ती जा रही है और लगभग 10 हजार लोगों की नौकरियाँ छंटनी के कगार पर है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्राहकों की खरीददारी के उत्साह में कमी का बड़ा असर आॅटो उद्योग पर पड़ा है। बिक्री घटी है और नौकरियों में बड़े पैमाने पर कटौती हो रही है। भारत की सबसे बड़ी कार निमार्ता मारूति सुजुकी ने जुलाई माह में पिछले साल के मुकाबले में कारों की बिक्री में 36 प्रतिशत की गिरावट की बुरी खबर दी है। खपत में कमी की वजह से टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों को अपनी गाड़ियों के निर्माण में कटौती करनी पड़ी है। इसका नतीजा ये हुआ है कि कल पुर्जे और दूसरे तरीके से आॅटो सेक्टर से जुड़े हुए लोगों पर भी इसका बुरा असर पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरण के लिए जमशेदपुर का टाटा मोटर्स का प्लांट दो माह से 30 दिनों में केवल 15 दिन ही चलाया जा रहा है। इससे जमशेदपुर और आस-पास के इलाकों में 1,100 से ज्यादा कंपनियाँ बंदी के कगार पर खड़ी हैं,जो टाटा मोटर्स को सप्लाई कर रही थी। आॅटो सेक्टर में अगर यही हालत रही तो तकरीबन 10 लाख लोगों को नौकरियाँ गंवानी पड़ सकती हैं। ज्ञात हो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आॅटोमोबाइल सेक्टर की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि मैन्युफैक्चरिंग में इसकी हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3><em>निर्यात में लगातार गिरावट:</em></h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">आमतौर पर जब घरेलू बाजार में खपत कम हो जाती है,तो भारतीय उद्योगपति,अपना सामान निर्यात करने और विदेश में बाजार तलाशतें हैं। अभी स्थिति ये है कि विदेशी बाजार में भी भारतीय सामान के खरीददार का विकल्प बहुत सीमित है। पिछले दो सालों से जीडीपी विकास दर में निर्यात का योगदान घट रहा है। मई माह में निर्यात की विकास दर 3.9 प्रतिशत थी,लेकिन इस साल जून में निर्यात में 9.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। ये 41 महीनों में सबसे कम निर्यात दर है। चीन-अमेरिका ट्रेड वार का विस्तार भारत के साथ भी हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में निर्यात वृद्धि के लिए विशिष्ट रणनीति की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए चीन में अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ने से एक रिक्तता पैदा हुई है,ऐसे में भारत लगभग 57 प्रकार के उत्पादों को चीन में बेच सकता है,जो चीन के साथ हमारे एकपक्षीय व्यापार में संतुलन बना सकता है। हम लोग देख सकते हैं कि किस तरह ट्रेड वार के संकट को वियतनाम और बांग्लादेश ने अपने लिए अवसर में बदला। जब चीन ने टेक्सटाइल सेक्टर को छोड़कर अधिक मूल्य वाले उत्पादों पर जोर दिया तो उस जगह को भरने के लिए बांग्लादेश और वियतनाम तेजी से आएँ,वहीं भारतीय टेक्सटाइल इसका लाभ नहीं उठा सका।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><em>बचत में गिरावट:</em></h3>
<p style="text-align:justify;">अर्थव्यवस्था का विकास धीमा होने का रियल स्टेट सेक्टर पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। एक आकलन के अनुसार इस वक्त देश के 30 बड़े शहरों में 12.76 लाख मकान बिकने को पड़े हुए हैं। कोच्चि में मकानों की उपलब्धता 80 महीनों के उच्चतम स्तर पर है,वहीं जयपुर में 59 महीनों ,लखनऊ में 55 महीनों और चैन्नई में ये 75 महीनों के अधिकतम स्तर पर है। इसका ये मतलब है कि इन शहरों में जो मकान बिकने को तैयार हैं,उनके बिकने में 5 से 7 वर्ष लग रहे हैं। आमदनी बढ़ नहीं रही है और बचत की रकम बिना बिके मकानों में फंसी हुई है। वित्त वर्ष 2011-12 में घरेलू बचत ,जीडीपी का 34.6 प्रतिशत थी,लेकिन अब यह बचत दर जीडीपी के अनुपात में घटकर 17% पर आ गई है,जो पिछले 20 वर्षों में सबसे कम है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3><em>वित्त मंत्री द्वारा उठाए गए कदम</em></h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">वित्त मंत्री ने आर्थिक मंदी के बीच अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए “32 सूत्रीय” उपायों की घोषणा की । इसमें सर्वप्रथम कदम फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (एफपीआई) और घरेलू इक्विटी इन्वेस्टर्स पर बढ़ाए गए सुपर रिच सरचार्ज को वापस लेना। इसके अतिरिक्त सरकार ने बैंक लॉन और रेपो रेट को जोड़ने की भी घोषणा की। ज्ञात हो,पिछले दिसंबर से अब तक रेपो रेट में लगातार चार बार कटौती की गई है,लेकिन स्वयं आरबीआई का कहना है कि यह कटौती उपभोक्ताओं तक नहीं पहुँच रही है। ऐसे में यह घोषणा भी महत्वपूर्ण है। जहाँ तक बात है गहन ढ़ाँचागत दिक्कतों की, तो उन्हें हल करना शेष है और निवेश भी बढ़ाना है। इसके लिए केंद्र सरकारी को काफी काम करना होगा। सरकार ने आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है,लेकिन इसके लिए ढ़ांचागत सुधारों के तरफ भी प्रतिबद्धता आवश्यक है।<br />
<strong><em>-राहुल लाल</em></strong></p>
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                <pubDate>Wed, 28 Aug 2019 20:52:51 +0530</pubDate>
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