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                <title>हिंदी संपर्क भाषा बनने के सक्षम</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/features-of-hindi-make-it-language-of-communication/article-10440"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-09/features-of-hindi-make-it-language-of-communication.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केन्द्रीय ग्रह मंत्री अमित शाह ने हिंदी दिवस के अवसर पर सुझाव दिया है कि देश की एक भाषा होनी जरूरी है। एक भाषा से उनका तात्पर्य, संपर्क भाषा है व इसलिए वह हिंदी को सक्षम मानते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि देश को संपर्क भाषा की जरूरत है। संविधान में किसी भी भाषा को राष्टÑीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया। हिंदी व अन्य भाषाओं पंजाबी, गुजराती, मराठी की तरह ही एक भारतीय भाषा है। परंतु व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के कारण हिंदी को यदि राष्टÑीय नहीं तो संपर्क भाषा का दर्जा देने में कोई दिक्कत नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">हिंदी का विरोध राजनीतिक ज्यादा है जबकि देश की भोगोलिक स्थितियों पर भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हिंदी को स्वीकार किया जा सकता है। एक विशाल देश में अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं की मौजूदगी में एक संपर्क भाषा ही संचार की समस्या का हल निकालती है। मिसाल के तौर पर हिंदी की जानकारी रखने वाले पंजाबियों को हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश सहित उत्तरी भारतीय राज्यों में कोई समस्या नहीं आती, पर दक्षिण में प्रवेश करते ही तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम बोलने वाले लोगों को अपनी बात कहनी, समझानी और समझना मुश्किल हो जाता है। हिंदी को संपर्क की भाषा बनाने पर विवाद आजादी के समय से ही चला आ रहा है, खासकर दक्षिणी राज्यों में इसको एक सांस्कृतिक हमले के रूप में देखा जाता है। दरअसल हमारे देश में भाषा और धर्म को जोड़ने वाली तंग सांप्रदायिक सोच है, स्वार्थी राजनीति है जिसने हिंदी के विवाद को गहरा किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हिंदी की तरह ही पंजाबी को सिक्खों तथा उर्दू को मुसलमानों की भाषा के कहकर समाज में फूट डालने की कोशिश की गई। हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल तथा उत्तराखंड में पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा व्यवहारिक रूप में ना देकर भाषा का वैज्ञानिक नियमों की बली दी गई। राजनीतिक शोरगुल में तीन-तीन भाषाई फार्मूला भी लागू नहीं हो सका जिस में क्षेत्रीय भाषा को प्रथम भाषा तथा गैर- हिंदी क्षेत्र में हिंदी को दूसरी भाषा तथा अंग्रेजी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने की सिफारिशें करता है। दरअसल भाषाओं पर राजनीति करने वाले लोग भाषा को सिर्फ राजनीति तथा सांप्रदायिक नजरिये से देखते हैं। जब विदेशों में जानें के लिए हमें अंग्रेजी या जर्मन जैसी विदेशी भाषाएं भी सीखनी पड़ती हैं तो अपने देश के लोगों से जो पंजाबी, तमिल, गुजराती, नहीं जानते से बात करने के लिए हिंदी सीखना कोई गलत नहीं।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sun, 15 Sep 2019 21:20:02 +0530</pubDate>
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