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                <title>Indian Exports - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Gems and Jewellery Exports FY 2024: भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात 3 साल के निचले स्तर पर!</title>
                                    <description><![CDATA[Gems and Jewellery Exports FY 2024: नई दिल्ली। रत्न और आभूषण निर्यात, जोकि भारत के निर्यात की सबसे बड़ी श्रेणियों में से एक है और जिसकी कम वैश्विक मांग के कारण वो वित्त वर्ष 2024 में भारी गिरावट के साथ समाप्त हुआ, जो पिछले तीन साल के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। वाणिज्य मंत्रालय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/business/indias-gems-and-jewellery-exports-at-3-year-low/article-56913"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/fy2024.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Gems and Jewellery Exports FY 2024: नई दिल्ली।</strong> रत्न और आभूषण निर्यात, जोकि भारत के निर्यात की सबसे बड़ी श्रेणियों में से एक है और जिसकी कम वैश्विक मांग के कारण वो वित्त वर्ष 2024 में भारी गिरावट के साथ समाप्त हुआ, जो पिछले तीन साल के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। वाणिज्य मंत्रालय के निर्यात पोर्टल के आंकड़ों की मानें तो वित्त वर्ष 2024 के दौरान रत्न और आभूषण निर्यात 32.71 अरब डॉलर रहा, जो वित्त वर्ष 2023 में 37.96 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 22 में 38.94 अरब डॉलर से कम है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत वर्षों में महामारी के दौरान, अन्य वस्तुओं के साथ-साथ रत्न और आभूषणों के निर्यात को भी काफी नुकसान झेलना पड़ा था क्योंकि अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं ने कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिए कड़े लॉकडाउन का सहारा लिया।</p>
<h3 style="text-align:justify;">निर्यात लक्ष्य | Gems and Jewellery Exports</h3>
<p style="text-align:justify;">महामारी के कारण वित्त वर्ष 2019 में रत्न और आभूषण निर्यात गिरकर 3.86 बिलियन डॉलर और वित्त वर्ष 2020 में 4.32 बिलियन डॉलर हो गया, जो वित्त वर्ष 2021 में बढ़कर 26.02 बिलियन डॉलर हो गया। सरकार समर्थित संस्था रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने संयुक्त अरब अमीरात में अधिक बिक्री के कारण वित्त वर्ष 2024 में 40 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्य रखा था। वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मांग में गिरावट भारत के प्रमुख बाजारों चीन और अमेरिका दोनों में मंदी की चुनौतियों के कारण है।</p>
<p style="text-align:justify;">सूत्रों के अनुसार वित्त वर्ष 2025 में इसमें सुधार होने की संभावना है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के वित्त वर्ष 2025 में बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था बढ़ती मुद्रास्फीति और उच्च ब्याज दरों से जूझ रही है, खासकर यूरोप और अमेरिका में, जो भारत के सबसे बड़े निर्यातक बाजार हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे संकेत मिले हैं कि इस साल इनमें से कुछ कारक कम हो सकते हैं। भारत कच्चे हीरों का आयात करता है क्योंकि यह इन वस्तुओं का कोई महत्वपूर्ण मात्रा में उत्पादन नहीं करता है। यह रत्न और आभूषणों का निर्यात करता है, जिससे इस प्रक्रिया में मूल्यवर्धन होता है। Gems and Jewellery Exports</p>
<h3>पिछले वर्ष में 13 बिलियन डॉलर और 9 बिलियन डॉलर से कम था</h3>
<p style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2024 में उत्तर अमेरिकी क्षेत्र में भारत का रत्न और आभूषण निर्यात 10 बिलियन डॉलर था, जबकि चीन सहित उत्तर पूर्व एशिया में निर्यात 7 बिलियन डॉलर था, जो पिछले वर्ष में 13 बिलियन डॉलर और 9 बिलियन डॉलर से कम था। पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में रत्न और आभूषण निर्यात, जिसमें भारत के निर्यात के लिए एक प्रमुख बाजार संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल है, वित्त वर्ष 2024 में बढ़कर 9 बिलियन डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष में 7 बिलियन डॉलर था। इस बीच, माल और सेवाओं सहित भारत का कुल व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2023 में 121.62 बिलियन डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 24 में 78.12 बिलियन डॉलर हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">आशा की किरण यह है कि विश्व व्यापार संगठन को उम्मीद है कि उच्च ऊर्जा कीमतों और मुद्रास्फीति के कारण 2023 में मंदी के बाद, 2024 के दौरान वैश्विक माल व्यापार में धीरे-धीरे सुधार होगा। डब्ल्यूटीओ ने अप्रैल में अपनी वैश्विक व्यापार आउटलुक और सांख्यिकी रिपोर्ट में कहा कि जैसे-जैसे आर्थिक दबाव कम होगा और आय बढ़ेगी, वैश्विक व्यापारिक व्यापार की मात्रा 2024 में 2.6% और 2025 में 3.3% बढ़ जाएगी। Gems and Jewellery Exports</p>
<p style="text-align:justify;">2022 में 3% की वृद्धि दर्ज करने के बाद, 2023 के दौरान, भू-राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल के बीच वैश्विक व्यापार में 1.2% की गिरावट आई। मूल्य के संदर्भ में, व्यापारिक निर्यात में गिरावट 2023 में अधिक स्पष्ट थी, जो 5% घटकर 24.01 ट्रिलियन डॉलर रह गई। डब्ल्यूटीओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्रीय संघर्ष, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक नीति अनिश्चितता पूवार्नुमान के लिए काफी नकारात्मक जोखिम पैदा करते हैं।</p>
<p><a title="Narendra Modi: दिल्ली हाईकोर्ट ने की मोदी को अयोग्य ठहराने की याचिका खारिज!" href="http://10.0.0.122:1245/delhi-high-court-rejects-petition-to-disqualify-modi/">Narendra Modi: दिल्ली हाईकोर्ट ने की मोदी को अयोग्य ठहराने की याचिका खारिज!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Apr 2024 18:16:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>रूस से तेल खरीदना भारत के लिए फायदे का सौदा</title>
                                    <description><![CDATA[इस वर्ष भारत का निर्यात प्रदर्शन बहुत दमदार होगा। निर्मित वस्तुओं का निर्यात 400 अरब डॉलर से अधिक होगा, जो अब तक का अधिकतम है। यह बीते साल से 40 फीसदी से ज्यादा है और सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की वृद्धि दर से पांच गुना अधिक है। यह वाणिज्य मंत्रालय द्वारा पूरा ध्यान देने से […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/buying-oil-from-russia-is-a-profitable-deal-for-india/article-31903"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/indian-exports.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इस वर्ष भारत का निर्यात प्रदर्शन बहुत दमदार होगा। निर्मित वस्तुओं का निर्यात 400 अरब डॉलर से अधिक होगा, जो अब तक का अधिकतम है। यह बीते साल से 40 फीसदी से ज्यादा है और सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की वृद्धि दर से पांच गुना अधिक है। यह वाणिज्य मंत्रालय द्वारा पूरा ध्यान देने से संभव हो सका है, जिसने उत्पाद और देश के स्तर पर लक्ष्य निर्धारित किया था और उस पर निगरानी रखी गई। सबसे बड़े निर्यातित पदार्थ पेट्रोलियम, कीमती पत्थर, आभूषण, इंजीनियरिंग वस्तुएं और रसायन रहे। उल्लेखनीय है कि 100 डॉलर शोधित पेट्रोलियम निर्यात करने के लिए हमें 90 डॉलर का कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। इसलिए जहां हमारा निर्यात बढ़ा है, वहीं आयात में भी वृद्धि हुई है। कच्चे तेल और मोबाइल फोन जैसी चीजों का आयात करीब 600 अरब डॉलर है। सोने का आयात भी एक हजार टन पार कर गया, जिसका मतलब है कि 70 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा बाहर चली गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वित्त वर्ष में कुल व्यापार घाटा संभवत: 200 अरब डॉलर हो जायेगा। निर्यात की तुलना में आयात अधिक होने से डॉलर की कमी होती है। यह संतोषजनक है कि भारत सेवाओं, विशेषकर सॉफ्टवेयर, आईटी से जुड़ी सेवाओं के निर्यात से भी डॉलर हासिल करता है। इसके अलावा पर्यटन, जो महामारी के कारण दबाव में है तथा कंसल्टेंसी जैसे क्षेत्र भी हैं। भारत दूसरे देशों में कार्यरत नागरिकों के भेजे धन को पानेवाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है। यह आंकड़ा करीब 80 अरब डॉलर है, जो सोने के आयात से बाहर जानेवाले धन के बराबर है। इस प्रकार, हमारा घाटा कम हो जाता है। अमेरिका के नेतृत्व में विभिन्न देशों द्वारा रूस पर लगाई गई पाबंदियों का मतलब यह है कि रूसी निर्यात का भुगतान डॉलर में नहीं किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है कि भुगतान के लिए न्यूयॉर्क की मंजूरी चाहिए और अमेरिका रूसी निर्यातकों के ऐसे किसी दावे को मानने के लिए तैयार नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूसी धनिकों के विदेशी धन को भी जब्त किया जा रहा है। अमेरिका स्विस बैंकों पर भी निश्चित ही दबाव डालेगा। तेल और गैस रूस के बड़े निर्यात हैं। जो देश इनका रूस से आयात करते हैं, वे तुरंत किसी और स्रोत से इनकी खरीद शुरू नहीं कर सकते। इनमें प्रमुख आयातक जर्मनी है और खरीदारों में भारत भी है। इसलिए रूस इन पदार्थों पर बड़ी छूट दे रहा है। भारत अपनी जरूरत का एक फीसदी से भी कम तेल रूस से खरीदता है। लेकिन यदि उसे आधे दाम पर तेल मिलेगा, वह भी तब, जब कच्चे तेल की कीमत सौ डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है तथा इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को खतरा हो गया है, तो उसे यह अवसर क्यों छोड़ना चाहिए? ऐसी स्थिति में भारत और रूस को रुपये-रूबल व्यापार के लिए कोई समझौता करना होगा, जिसके तहत भारत तेल के आयात के लिए रुपये में भुगतान करेगा और उस रुपये से रूस भारत से वस्तुओं की खरीदारी करेगा।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Mar 2022 09:51:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अगले वर्ष की दूसरी छमाही में निर्यात में सुधार संभव: फियो</title>
                                    <description><![CDATA[वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल पुथल बनी हुई और प्रमुख अर्थव्यवस्थायें संरक्षणवादी उपाय कर रही है जिसका वैश्विक आयात पर बुरा असर पड़ रहा है।
इससे विदेश व्यापार में अनिश्चितता बन हुई है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/improvement-in-second-category-next-year-fio/article-12104"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/fio.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">अर्थव्यवस्था: भारतीय निर्यातकों के आर्डर बुक की स्थिति मजबूत और बाजार में पूंजी की उपलब्धता बढ़ी है (Fio)</h1>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3>भारतीय निर्यात में 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> भारतीय निर्यातक महासंघ (फियो) के अध्यक्ष शरद कुमार सराफ (Fio)  ने सोमवार को कहा कि वर्ष 2020 के मध्य तक भारतीय निर्यात में सुधार के संकेत हैं। सराफ ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के आयात में वृद्धि होने से भारतीय निर्यात में तेजी आती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल पुथल बनी हुई और प्रमुख अर्थव्यवस्थायें संरक्षणवादी उपाय कर रही है जिसका वैश्विक आयात पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे विदेश व्यापार में अनिश्चितता बन हुई है। उन्होंने कहा कि भारतीय निर्यातकों के आर्डर बुक की स्थिति मजबूत है और बाजार में पूंजी की उपलब्धता बढ़ रही है। बुनियादी ढ़ांचे और मालवहन व्यवस्था में सुधार से भारतीय निर्यात अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनेगा।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार होने से वर्ष 2020 की दूसरी तिमाही में भारतीय निर्यात में मजबूती आएगी।</li>
<li style="text-align:justify;">इस अवधि में भारतीय निर्यात में 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">भारत से उच्च प्रौद्योगिकी उत्पादों का निर्यात मात्र 20 अरब डालर</h3>
<p style="text-align:justify;">फियो अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय निर्यात को अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप बदलाव करने होंगे। वैश्विक व्यापार में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रीकल, इलेक्ट्रोनिक्स, आटो, मशीनरी, पेट्रोलियम और प्लास्टिक उत्पादों की है। दुर्भाग्य से भारतीय निर्यात में इन उत्पादों की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत से भी कम है। वैश्विक स्तर पर भारतीय हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है। उन्होंने कहा कि भारत से उच्च प्रौद्योगिकी उत्पादों का निर्यात मात्र 20 अरब डालर है जबकि मलेशिया का 90 अरब डालर, सिंगापुर का अरब 155 डालर, दक्षिण कोरिया का 192 अरब डालर, अमेरिका का 192 अरब डालर और चीन का 652 अरब डालर है। भारत को मानव श्रम आधारित आधारित उत्पादों के साथ साथ उच्च प्रौद्योगिकी की ओर भी ध्यान देना चाहिए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Dec 2019 17:12:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारतीय निर्यात की सुस्त रफ्तार और सरकार के प्रयास</title>
                                    <description><![CDATA[केंन्द्रीय वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आकड़े बताते हैं कि अगस्त 2016 तक देश का निर्यात 6 फीसदी तक कम हुआ है। यह निर्यात क्षेत्र में लम्बे समय से चली आ रही मंदी की स्मृति को ताजा कराने वाले उदाहरण हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्घि दर 5 फीसदी ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/sluggish-pace-of-indian-exports/article-10603"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-10/nirmal-sitaram.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केंन्द्रीय वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आकड़े बताते हैं कि अगस्त 2016 तक देश का निर्यात 6 फीसदी तक कम हुआ है। यह निर्यात क्षेत्र में लम्बे समय से चली आ रही मंदी की स्मृति को ताजा कराने वाले उदाहरण हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्घि दर 5 फीसदी ही रह गई है, जबकि पिछली तिमाही में यह 5.8 फीसदी और पिछले साल की पहली तिमाही में 8 फीसदी रही। आमतौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था घरेलू मांग में कमी की समस्या से जूझ रही है, ऐसे में भारतीय उद्योगपति अपना सामान निर्यात करते हैं और विदेशों में बाजार तलाशते हैं। वैश्विक तौर पर कर्ज की ऊँची लागत, स्किल एवं इनोवेशन की कमी और ज्यादा टैक्स की वजह से भारतीय निर्यात वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में नही टिक पा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय निर्यात की रफ्तार सुस्त पड़ चुकी है और शुद्ध निर्यात तो लम्बे समय से निगेटिव ग्रोथ में है यानी इसमें गिरावट है। निर्यात जीडीपी के चार प्रमुख घटकों में से एक हैं। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी सुस्त हो रही है। इंंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में गिरावट काफी परेशान करने वाला हैं, क्योंकि गत वर्ष इसमें सुधार नजर आया था। मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में 2014 से 2019 के दौरान कुल औसत निर्यात वृद्घि दर 4 फीसदी रहा। हम लोग 2014-15 से पहले की बात करें तो निर्यात बेहतर था, वर्ष 2013-14 में निर्यात की वार्षिक वृद्धि दर 17% थी, जो कि 2014-15 और 2015-16 में घटकर क्रमश: -0.5% और -9% हो गई। इसके अलावा भारत की निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में 50 फीसदी से कम बढ़ोतरी देखने को मिली है। निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता वर्ष 2012 के तुलना में 2017 में शीर्ष भागीदार देशोंं में बाजार हिस्से के अनुपात के तौर पर परखी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक वृद्धि एवं निर्यात वृद्धि के कमी के कई कारण महत्वपूर्ण रहे। सरकार की दलील है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ती जा रही है और चीन अमेरिका ट्रेड वार के चलते अनिश्चितता का भी माहौल है। हालांकि यह दलील काफी हद तक सतही है। मसलन, ट्रेड वार में उलझे चीन की जून तिमाही में वृद्धि दर 6.2% रही। यह कहना मुश्किल है कि चीन की तुलना में भारत पर व्यापार युद्ध का ज्यादा असर पड़ रहा है। आईएमएफ के मुताबिक वर्ष 2018 में ही वियतनाम ने 10 वर्षों की उच्च वृद्धि दर 7.1% हासिल की। बांंग्लादेश भी गत वित्त वर्ष में 8 फीसदी की दर से आगे बढ़ने के बाद इस समय 7.5 फीसदी वृद्धि की उम्मीद कर रहा है। स्पष्ट है कि वैश्विक वितीय परिदृश्य अनुकूल है, बस एक विशिष्ट रणनीति की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछलें दो दशकों में वैश्विक कारोबार मुख्य रुप से जीवीसी अर्थात ग्लोबल वैल्यू चेन द्वारा ही पोषित होता रहा है। जीवीसी को अब निर्यात वृद्धि का मुख्य इंजन भी कहा जाता है। जीवीसी के लिए उत्पादों को कई बार सीमा के आर पार जाना पड़ता है। जीवीसी मॉडल के तहत किसी उत्पाद के जीवनचक्र को कई कार्यों में विभाजित किया जाता है। इसमें भाग लेने वाले देश ‘जस्ट इन टाइम’ परिस्थितियों में क्रमबद्ध रुप से प्रत्येक कार्य को पूरा करते हैं। उत्पादन प्रक्रिया के अन्तर्निहित विखण्डन ने अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञता का दायरा बढ़ा दिया है। उत्पादों के बीच तक सीमित न रहकर अब अलग -अलग उत्पादों के उत्पादन के विभिन्न चरणों में विशेषज्ञता हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">नतीजतन, विकासशील देशों के लिए जीवीसी के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए तुलनात्मक सुविधा के नए स्रोत सामने आए हैं। जीवीसी में भागीदारी का ताल्लुक निर्यात विभिन्नता और बढ़ी हुई उत्पादकता से है। जीवीसी को समझने के लिए आईफोन एक अच्छा उदाहरण है। अमेरिका द्वारा आईफोन का डिजाइन और प्रोटोटाइप तैयार किया जाता है, जबकि ताइवान और दक्षिण कोरिया द्वारा इसमें प्रयुक्त होने वाले एकीकृत सर्किट एवं प्रोसेसर जैसे महत्वपूर्ण इनपुट्स को तैयार किया जाता है। इसके पश्चात चीन में अन्तिम रुप प्रदान करके दुनियाभर में इसका विपणन किया जाता हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवीसी के साथ भारत का एकीकरण जी-20 देशों में सबसे कम हैं। आसियान देशों की तुलना में भारत का जीवीसी एकीकरण न केवल बहुत कम है, बल्कि इसके बैकवर्ड एवं फोरवर्ड दोनों ही गतिविधियों में गिरावट आई है। इसकी तुलना में आसियान देशों का बैकवर्ड जीवीसी सम्पर्क भले ही कम हुआ है, लेकिन पहले काफी ऊँँचे स्तर पर था और उनका फॉरवर्ड जीवीसी सम्पर्क स्थिर बना हुआ है। वियतनाम तो एकदम अलग अनुभव दिखाता है और उसका जीवीसी एकीकरण काफी उच्च स्तर पर है और इस अवधि में उसका बैकवर्ड एकीकरण स्थिर दर से बढ़ा है। भारत में हुए मूल्य वर्धन का पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशियाई निर्यात के रास्ते वैश्विक कारोबार में अंशदान महज एक टुकड़ा है। वर्ष 2016 में भारत का मूल्य वर्धन अंशदान वियतनाम के अंशदान का महज चौथा हिस्सा था और आसियान समूह के अंशदान का तो तीन फीसदी ही था। इतनी कम भागीदारी होने का मतलब है कि भारत के निर्यात की मांग आसियान देशों से तेजी नहीं पकड़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के शीर्ष निर्यात क्षेत्रों में शामिल मोटर वाहन, कपड़ा एवं परिधान तथा रत्न एवं आभूषण मूल्य श्रृंखला एकीकरण के उच्चतम स्तर वाले क्षेत्र भी हैं। लेकिन पिछले वर्षों में इन तीनों क्षेत्रों में भी भारत का जीवीसी एकीकरण गिरा है। कपड़ा एवं परिधान निर्यात में आयात की मात्रा वर्ष 2005 में 15.3 फीसदी थी, लेकिन2016 में यह घटकर 13.4 फीसदी पर आ गई। मोटर वाहन के निर्यात में भी आयात की हिस्सेदारी 25.3 फीसदी से घटकर 23.5 फीसदी पर आ गई। इसी के साथ वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी कपड़ा एवं परिधान क्षेत्र में खासी गिरी है और वाहन क्षेत्र में नगण्य स्तर पर बनी हुई हैं। ज्ञात हो विश्व व्यापार का लगभग 70% हिस्सा जीवीसी के अन्तर्गत ही अपना आकार ग्रहण करता हैं। ऐसे में भारत के लिए जीवीसी एकीकरण पर बल प्रदान करना आवश्यक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए श्रमबहुल उत्पादों का निर्यात आवश्यक है। विकासशील देशों में छोटे एवं मझोले उद्यमों के लिए जीवीसी से जुड़ना आसान नहीं है। ऐसे में भारतीय निर्यात के लिए रिजनल वैल्यू चेन भी काफी महत्वपूर्ण है। आरवीसी के लिए उतने सख्त मानदण्डों की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि जीवीसी में देखने को मिलता है। कारण यह है कि सम्बन्धित सामान स्थानीय बाजार की मांग की बारीकियों और खपत के पैटर्न को पूरा करते हैं, जो समूचे क्षेत्र में एक समान हो। आरवीसी विकास स्तम्भ हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में भारत के लिए निर्यात वृद्धि काफी आवश्यक है। इसके लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस माह कई प्रमुख घोषणाएँ की हैं। निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए 50 हजार करोड़ के पैकेज की घोषणा की गई है। सवाल यह है कि वित्त मंत्री की हाल की घोषणाओं से देश का निर्यात लम्बी अवधि में प्रतिस्पर्द्धी बन सकेगा । हमारे यहाँ लाल फीताशाही और ऋण उपलब्धता जैसी ढ़ांंचागत समस्याएँ भी हैं, जिन्हें हल करने की जरुरत है। हालांकि वित्त मंत्री ने इस दिशा में भी पहल की है। असली चुनौती निर्यात क्षेत्र में वैश्विक मानकों को स्वीकार करने में है। वित्त मंत्री ने कहा है कि निर्यात मंजूरी के काम अभी मैन्यूअल किए जाते हैं, उनको जल्द ही डिजिटल किया जाए। इसके लिए दिसंबर की समय सीमा तय की गई है। इस प्रक्रिया में तकनीक का प्रयोग हमारे बंदरगाहों को भी वैश्विक मापदंडों की ओर अग्रसारित करेगा। वैश्विक बंदरगाहों पर जहाज आधे दिन में हट जाते हैं और ट्रक आधे घंटे में। अगर हम इसे प्राप्त कर सकें तो देश की निर्यात प्रतिस्पद्धा में बड़ा सुधार नजर आएगा।</p>
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                <pubDate>Thu, 03 Oct 2019 19:57:53 +0530</pubDate>
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