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                <title>Ayodhya Ki Taza Khabar - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Ayodhya Ki Taza Khabar Live : ऐतिहासिक फैसला कुछ ही पलों  में, पूरे देश में सुरक्षा के कड़े इंतजाम</title>
                                    <description><![CDATA[देश के संवेदनशील मामले में फैसले को देखते हुए देशभर में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं।   सच कहूँ इस लाइव रिपोर्ट के जरिए फैसले से जुड़ा हर अपडेट आप तक पहुंचाएगा।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ayodhya-case-ki-taza-khabar/article-11077"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-11/ayodhya-case.jpg" alt=""></a><br /><h2><strong>उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक में धारा 144 लागू | Ayodhya Ka Taja Samachar</strong></h2>
<p><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ) – Ayodhya Ki Taza Khabar: </strong>अयोध्या के करीब पांच सौ साल पुराने विवाद में 206 साल के बाद फैसले की घड़ी आ गयी है और इन बीते वर्षों की तारीखों और तवारीखों के आइने में उच्चतम न्यायालय (<em><strong>Ayodhya News Supreme Court</strong></em>) आज इस पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाने जा रहा है। अयोध्या में राम मंदिर (<em><strong>Ram Mandir ka News</strong></em>) और बाबरी मस्जिद (<em><strong>Babri Masjid Latest News</strong></em>) के मालिकाना हक को लेकर चल रहा विवाद करीब 500 साल पुराना है। माना जाता है कि इस विवाद की शुरूआत 1528 में तब हुई थी जब मुगल शासक बाबर ने राम मंदिर को गिराकर वहां मस्जिद का निर्माण कराया था। इसी वजह से इसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा था। विवादित स्थल पर हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों में मालिकाना हक का विवाद सबसे पहले 1813 में शुरू हुआ था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ अब से चंद समय बाद इस मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाएगी।</p>
<h2>अपना-अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिए Ayodhya News in Hindi</h2>
<p>भारतीय राजनीति पर तीन दशक से अधिक समय से छाए इस विवाद की सुनवाई के दौरान राम जन्मभूमि पर अपने दावे के पक्ष में जहां रामलला विराजमान, निमोर्ही अखाड़ा, आॅल इंडिया हिन्दू महासभा, जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति एवं गोपाल सिंह विशारद ने दलीलें दी, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड, हासिम अंसारी (मृत), मोहम्मद सिद्दिकी, मौलाना मेहफुजुरहमान, फारुख अहमद (मृत) और मिसबाहुद्दीन ने विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक का दावा किया। इस मामले (<em><strong>Ayodhya Case in Hindi</strong></em>) में शीर्ष अदालत की ओर से न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की ओर से मध्यस्थता असफल रहने की बात बताए जाने के बाद संविधान पीठ ने नियमित सुनवाई की और सभी पक्षों को अपना-अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिए।</p>
<h2>चालीस दिन की सुनवाई दोनों पक्षों के वकीलों में गर्मागर्म बहस Ayodhya Case Hearing</h2>
<p><em><strong>Ayodhya Ki Taza Khabar:</strong></em> हिन्दू पक्ष की ओर से सबसे पहले ‘रामलला विराजमान’ के वकील के एस परासरण ने दलीलें शुरू की थी, जबकि सुनवाई का अंत सुन्नी वक्फ बोर्ड की जिरह से हुआ। चालीस दिन की सुनवाई के दौरान कई मौके ऐसे आए जब दोनों पक्षों के वकीलों में गर्मागर्म बहस हुई। दरअसल उच्चतम न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई न्यायिक इतिहास की दूसरी सबसे लंबी सुनवाई बन गयी। इससे पहले आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई 38 दिनों तक चली थी जबकि 68 दिनों की सुनवाई के साथ ही केशवानंद भारती मामला पहले पायदान पर बना हुआ है। वर्ष 1973 में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल’ के मामले में उच्चतम न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा था कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। ‘केशवानंद भारती बनाम केरल’ के मामले में 68 दिन तक सुनवाई हुई, यह तर्क-वितर्क 31 अक्टूबर 1972 को शुरू होकर 23 मार्च 1973 को खत्म हुआ था।</p>
<h2>10 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था</h2>
<p><em><strong>Ayodhya Case Judgement</strong></em>: आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीर्ष कोर्ट में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई की थी। इस बेंच में न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल थे। आधार मामले में 38 दिनों तक चली सुनवाई के बाद गत वर्ष 10 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, जबकि इस पर गत वर्ष सितंबर में फैसला सुनाया गया था। इस मामले में विभिन्न सेवाओं में आधार की अनिवार्यता की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।</p>
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                <pubDate>Sat, 09 Nov 2019 10:25:33 +0530</pubDate>
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