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                <title>Youth : बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्यगत दशकों में जिन युवाओं (Youth) द्वारा राजनीति में प्रभावी प्रवेश लिया गया था, वे अब लगभग उम्रदराज होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर के अधिकांश स्थापित राजनीतिज्ञ बीते समय में युवा नेता के रूप में राजनीति में वर्चस्व स्थापित किए हुए थे। समय की धारा का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/youth-are-the-near-future/article-58494"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/whatsapp-image-2024-06-09-at-10.48.38-am.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्यगत दशकों में जिन युवाओं (Youth) द्वारा राजनीति में प्रभावी प्रवेश लिया गया था, वे अब लगभग उम्रदराज होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर के अधिकांश स्थापित राजनीतिज्ञ बीते समय में युवा नेता के रूप में राजनीति में वर्चस्व स्थापित किए हुए थे। समय की धारा का प्रवाह निरंतर गतिमान होता है। इस आधार पर इन दिनों राजनीति में नए स्वरूप में युवाओं की एक नई पौध आकार लेती दिखाई देती है। यही नहीं अपितु इस पौध को व्यापक रूप से जनमत के बहुमत द्वारा स्वीकार भी किया गया है। ऐसी स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि बुजुर्गवार नेता सत्ता और संगठन में अपने वर्चस्व का परित्याग करना नहीं चाहते। इसके चलते बहुत स्वाभाविक है कि विभिन्न राजनीतिक दलो में आंतरिक रूप से वर्चस्व की लड़ाई दिखाई दे। इस संदर्भ में राजनीतिक दलों का निर्णायक कदम, समय की मांग है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी राजनीति में सत्ता का रसास्वादन कर लेने के उपरांत कोई भी राजनेता इससे वंचित नहीं होना चाहता। यह भी एक मनोविज्ञान है कि राजनीति में एक दूसरे को धकेल कर अपनी जगह बनाने की मनोवृति दिखाई देती है। राजनीति में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ती उम्र के साथ-साथ कम नहीं होती, अपितु बढ़ती ही चली जाती है। इन दिनों विशेष रूप से हिंदी भाषी राज्यों में उक्त परिस्थितियां राजनीतिक उलटफेर का कारण बनते हुए नजर आती है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल कांग्रेस में ही है। दरअसल किसी न किसी रूप में हर किसी दल के समक्ष उक्त स्थिति निर्मित होना अवश्यंभावी है। बेहतर हो यदि विभिन्न राजनीतिक दल इन तमाम संदर्भों में अपना अभिमत ऐसा कोई संकट आने के पूर्व ही स्पष्ट रूप से घोषित कर देवें।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक योग्यता का प्रश्न है, पुरानी और नई पीढ़ी के पक्ष विपक्ष में अलग-अलग तर्कसम्मत दृष्टिकोण व्यक्त किए जा सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। दरअसल दोनों ही वर्ग में बेहतरीन तालमेल ही श्रेयस्कर होगा। इस संदर्भ में एक कदम आगे बढ़कर विभिन्न राजनीतिक दलों में सक्रिय राजनीति की अधिकतम आयु सीमा सुनिश्चित कर देनी चाहिए। यही नहीं अपितु सत्ता में भागीदारी होने पर भी पृथक रूप से एक निश्चित आयु सीमा निर्धारित कर देनी चाहिए। रहा सवाल वनवास का, तो वरिष्ठ नेताओं को दिशा निर्देशक के रूप में स्थापित किया जा सकता है । नए दौर में नई सोच की आज देश प्रदेश को जरूरत है। बीते दौर की राजनीति के पट्टी पहाड़े भी अब अप्रासंगिक सिद्ध हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में समय रहते राजनीतिक दलों को संज्ञान ले लेना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी इस समय देश प्रदेश में युवा वर्ग की स्थानीय से लेकर शीर्ष स्तर तक राजनीति में सक्रिय भागीदारी नए आयाम स्थापित कर रही है। ऐसे में यदि सत्ता या संगठन का दामन संभाले बुजुर्गवार युवाओं के लिए स्थान रिक्त नहीं करेंगे, तो असंतोष तो पनपेगा ही। इस संदर्भ में यह गौर करने लायक है कि कल के युवा नेता आज वृद्धावस्था को प्राप्त करते जा रहे हैं लेकिन पदलिप्सा से उबरना नहीं चाहते। दरअसल इन्हें अपना मनोविज्ञान बदलने की जरूरत है। बेहतर हो यदि सक्रिय राजनीति में आयुबंधन हो न हो, लेकिन पदासीन होने की स्थिति में आयु बंधन का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए। राजनीति में यह प्रयोग काफी हद तक सफल सिद्ध हो सकता है। सक्रिय राजनीति से विदाई का तरीका सम्मानजनक भी तो हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय देश-प्रदेश में युवा वर्ग की प्रधानता है। युवा मतदाता का स्वाभाविक रुझान युवा प्रत्याशी पर ही अधिक रहता है। हालांकि राजनीतिक प्रतिबद्धता भी अपनी जगह महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। जैसे-जैसे शिक्षा का विस्तार होता जा रहा है, वैसे-वैसे युवा वर्ग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के परिपालन में सक्षम सिद्ध हो रहे हैं। यही नहीं अपितु निरंतर परिवर्तित दौर में राजनीति के तौर-तरीकों में भी व्यापक बदलाव आया है। कहीं-कहीं तो ऐसा प्रतीत होता है कि जहां अनुभव घुटने टेक देता है, वहां नई सोच कैसी भी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम सिद्ध होती है। निश्चित रूप से तकनीकी दुनिया में युवाओं की बौद्धिक क्षमता में भी आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। विषयों को समझने की गहरी समझ युवा रखने लगे हैं। बावजूद इस सबके अनुभव के महत्व को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सामंजस्य ही अंतिम समाधान हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर वर्तमान संदर्भों के चलते विभिन्न राजनीतिक दलों को उक्त विषय के बारे में स्पष्ट नीति घोषित कर देनी चाहिए। माना कि यह सब इतना आसान भी नहीं होगा लेकिन वर्तमान नेतृत्व को इस संदर्भ में दृढ़निश्चय करना जरूरी है। अन्यथा जो कुछ घटनाक्रम आज कांग्रेस में चलता दिखाई दे रहा है ,उसकी अन्य दलों में पुनरावृति होने की संभावना से एकदम इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में बेहतर यही रहेगा कि दोनों ही वर्ग को परस्पर एक दूसरे के पूरक के रूप में सक्रिय रखा जाए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Jun 2024 11:12:01 +0530</pubDate>
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                <title>फ्यूचर मेकर कंपनी के सीएमडी राधेश्याम 5 नवंबर तक रिमांड पर</title>
                                    <description><![CDATA[हिसार(सच कहूँ)। सिरसा एसआइटी की टीम ने फ्यूचर मेकर कंपनी के सीएमडी सीसवाल निवासी राधेश्याम सुथार और ¨चदड़ निवासी सुंदर सैनी को प्रोडक्शन वारंट पर लाकर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी निधि बंसल की अदालत में पेश किया। अदालत ने दोनों आरोपितों का 10 दिन का रिमांड मांगा। अदालत ने पुलिस की दलील सुनने के बाद दोनों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/future-maker-company-cmd-remand/article-6519"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/remad.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>हिसार(सच कहूँ)।</strong> सिरसा एसआइटी की टीम ने फ्यूचर मेकर कंपनी के सीएमडी सीसवाल निवासी राधेश्याम सुथार और ¨चदड़ निवासी सुंदर सैनी को प्रोडक्शन वारंट पर लाकर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी निधि बंसल की अदालत में पेश किया। अदालत ने दोनों आरोपितों का 10 दिन का रिमांड मांगा। अदालत ने पुलिस की दलील सुनने के बाद दोनों आरोपितों का 5 नवंबर तक रिमांड मंजूर कर लिया। पुलिस ने अदालत में दोनों आरोपितों का रिमांड मांगते हुए कहा कि उनसे जयपुर, सुनाम, नासिक, गोवा और फतेहाबाद एरिया की निशानदेही करानी है।</p>
<h2>विदेश भागने की तैयारी कर रहे थे राधेश्याम वगैरहा</h2>
<p style="text-align:justify;">फ्रॉड के पांच मामले दर्ज हैं फ्यूचर मेकर कंपनी का दफ्तर यहां रेड स्क्वेयर मार्केट में था। सितंबर के पहले हफ्ते में कंपनी के कर्ता-धर्ता दफ्तर को ताला लगाकर फरार हो गए थे। यह बात सुनकर काफी संख्या में निवेशक दफ्तर के बाहर इकट्ठे हो गए थे। कंपनी के सीएमडी और अन्य का कुछ अता-पता नहीं था। उसके बाद तेलंगाना पुलिस ने यहां आकर कंपनी का दफ्तर सील कर दिया था। तेलंगाना पुलिस ने राधेश्याम व अन्य पर धोखाधड़ी के तीन मुकदमे दर्ज किए हैं। इसके अलावा फतेहाबाद और हिसार सिटी थाना पुलिस एक-एक केस दर्ज किया है।</p>
<h2>लोगों से चिटफंड के रूप से इकट्ठा चुके थे एक लाख करोड़</h2>
<p style="text-align:justify;">यह है पूरा मामला फतेहाबाद के गांव किरढ़ान के सतबीर ¨सह ने सिटी थाना में शिकायत देकर कहा था कि वह 12 फरवरी 2015 को कंपनी का डिस्ट्रीब्यूटर बना था। सीएमडी राधेश्याम सुथार और एमडी बंसीलाल ने कंपनी के प्रोडक्ट का प्रचार करने के लिए उसे रखा था। अब कंपनी लोगों से चिटफंड के रूप से रकम इकट्ठा करके 1 लाख करोड़ रुपये इकट्ठा कर चुकी और राधेश्याम वगैरहा विदेश भागने की तैयारी कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी टीम 4000 करोड़ रुपये जमा करा चुकी है। मेरे खुद के 28 करोड़ रुपये बकाया हैं। वह 6 अप्रैल को कंपनी कार्यालय में गया था और अपनी रकम मांगी थी। तब राधेश्याम और अन्य ने उसे जान से मारने की धमकी दी थी। वे किसी भी समय उसे जान-माल का नुकसान पहुंचा सकते हैं। सिटी थाना पुलिस ने इस संबंध में 9 सितंबर को फ्रॉड का केस दर्ज किया था। तेलंगाना पुलिस ने दोनों को पहले गिरफ्तार कर लिया था।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Oct 2018 09:34:13 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>इतिहास से वर्तमान व भविष्य की ओर बढ़ते संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[भारत के बेहद खास रिश्ते वाले देशों में ‘बांग्लादेश’ का नाम अग्रणी है, वह भी बांग्लादेश के जन्म के समय से ही। रिश्ते की मजबूती का यह क्रम अनवरत बढ़ा है और यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि किस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर बांग्लादेशी समकक्ष की आगवानी की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/moving-from-history-to-present-and-future/article-6089"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/moving-from-history-to-present-and-future-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के बेहद खास रिश्ते वाले देशों में ‘बांग्लादेश’ का नाम अग्रणी है, वह भी बांग्लादेश के जन्म के समय से ही। रिश्ते की मजबूती का यह क्रम अनवरत बढ़ा है और यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि किस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर बांग्लादेशी समकक्ष की आगवानी की है। वस्तुत: इंदिरा गांधी ने जिस प्रकार बांग्लादेश को तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारों से मुक्त कराया तो एक तरह से यह रिश्ता स्वाभाविक ही था। चूंकि चीन, पाकिस्तान जैसे देश भारत के साथ दूसरे पड़ोसियों के रिश्तों को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश करते रहे हैं, ऐसे में बांग्लादेश के साथ भारत का कूटनीतिक संबंध और भी खास हो जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत लगातार बांग्लादेश से अपना संबंध मजबूत करने में दो कदम आगे बढ़कर पहल करता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">1947 में हुए भारत बंटवारे की कटु यादें भला किसे याद नहीं होंगी। दुनिया में उतना भीषण कत्ल-ए-आम संभवत: दूसरी जगह न हुआ होगा। पर उसका नतीजा क्या निकला, जिस धर्म के नाम पर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान मांगा था, वह तीन दशक भी संयुक्त रूप में पूरा न कर सका और बिखर गया। आखिर, वह जुड़ा रहता भी तो किस प्रकार? चूंकि, पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) कहे जाने वाले देश की संस्कृति, भाषा पश्चिमी पाकिस्तान से सर्वथा भिन्न थी। ऊपर से वहां के लोगों के साथ पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा किया जाने वाला भेदभाव ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। बांग्लादेशियों के अधिकारों को कुचलने में पाकिस्तान की सेना ने जो जुल्म ढाये, उससे समस्त विश्व की आँखें नम हो उठी थीं। आज के समय में हम सीरिया में गृहयुद्ध की जो हालत देख रहे हैं, उससे कम दुरूह हालात न थे उस समय! अंतत: उस अत्याचार से जब भारत पर दुष्प्रभाव पडऩे लगा तब इंदिरा गाँधी के रूप में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कठोरतम निर्णय लिया और फिर उदय हुआ बांग्लादेश का। जाहिर तौर पर बांग्लादेश के जन्म के समय से ही भारत का रिश्ता बेहद करीबी रहा है, जो लगातार आगे बढ़ता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बहुत कम लोगों को पता होगा कि शेख हसीना से भारत का बेहद करीबी जुड़ाव रहा है। 15 अगस्त 1975 को जब बांग्लादेश में सेना के गुट ने शेख मुजीबुर रहमान के घर पर हमला किया, तो शेख हसीना के परिवार के अधिकांश सदस्य मौत के घाट उतार दिए गए थे। उनके पिता और बांग्लादेश की आजादी के नायक शेख मुजीबुर रहमान का शरीर गोलियों से छलनी कर दिया गया था। किसी तरह शेख हसीना और उनकी बहन बच गयी थीं, पर उन्हें कहीं और राजनीतिक शरण नहीं मिल सकी। फिर इंदिरा गाँधी ने कई सालों तक शेख हसीना और उनके पति डॉक्टर वाजेद को सुरक्षा और शरण प्रदान की। बाद में स्थिति में सुधार होने के बाद शेख हसीना 17 मई, 1981 को अपने वतन लौट सकी थीं, जहाँ लाखों बांग्लादेशियों ने उनका स्वागत किया और फिर वह अपने पिता का रूतबा हासिल करने में सफल भी रहीं। पिछले दिनों भारत और बांग्लादेश के बीच हुए ‘परमाणु समझौतेझ् को दक्षिण एशिया की राजनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">सच कहा जाए तो भारत और दूसरे दक्षिण एशियाई देश ड्रैगन की दोहरी चाल को बखूबी समझते हैं। वह जानते हैं सच्चे मित्र भारत जैसी स्वाभाविक दोस्ती चीन से कभी हो ही नहीं सकती, इसलिए भारत को कूटनीति की बिसात पर सधी चाल से चलना होगा और संतुलन बनाकर चीन की दोस्ती के दांव को दक्षिण एशियाई क्षेत्र में मजबूती से उजागर करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट के सफल होने के बाद समुद्री मामलों के सुलझने की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि, ये तो एक छोटी सी झलक है, क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच कई सारे समझौते हो रहे हैं, जिनका प्रारूप और प्रभाव आने वाले समय में और भी बेहतर ढंग से नजऱ आएगा। वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के संबंधों की अहमियत बार बार प्रमाणित हुई है। वहीं बात जब बांग्लादेश जैसे महत्वपूर्ण पड़ोसी की हो तो फिर यह अहमियत और भी बढ़ जाती है। निश्चित रूप से दोनों देशों की आने वाली पीढिय़ां पीएम नरेंद्र मोदी और बांग्लादेशी पीएम शेख हसीना का धन्यवाद करेंगी, जिनके सकारात्मक दृष्टिकोण से दक्षिण एशियाई देशों के विकास का नया और चौड़ा मार्ग प्रशस्त हुआ है। <em><strong>जगजीत शर्मा</strong></em></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Oct 2018 12:42:14 +0530</pubDate>
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                <title>प्लास्टिक भविष्य का टाइम बम!</title>
                                    <description><![CDATA[पूरे देश से प्रतिदिन 25,940 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इसमें से 15,384 टन (60 प्रतिशत) कचरे का ही प्रतिदिन एकत्रण और पुनर्चक्रण हो पा रहा है। बाकी 40 फीसदी प्लास्टिक कचरे का अधिकांश हिस्सा जो एकत्र नहीं हो पाता है, वह नाले नालियों सहित अन्य माध्यम से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/time-bomb-of-plastic-future/article-5337"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/plastic.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूरे देश से प्रतिदिन 25,940 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इसमें से 15,384 टन (60 प्रतिशत) कचरे का ही प्रतिदिन एकत्रण और पुनर्चक्रण हो पा रहा है। बाकी 40 फीसदी प्लास्टिक कचरे का अधिकांश हिस्सा जो एकत्र नहीं हो पाता है, वह नाले नालियों सहित अन्य माध्यम से जलाशयों तक पहुंच जाता है और जो कचरा एकत्र हो जाता है, वह भी गैरशोधित रूप में डंपिंग ग्राउंड में पड़े रह कर आसापास की जमीन का प्रदूषण बढ़ाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संसद में पेश प्लास्टिक कचरे के शोधन से जुड़े आंकड़ों में यह बात सामने आयी है। प्लास्टिक आज के दौर की सर्वाधिक सर्वव्यापी और जरूरी वस्तु है। प्लास्टिक हमारे दिनचर्या में यूं बस गया है कि उसके बगैर हम जीवन की कल्पना नहीं कर पा रहे। सुबह से लेकर रात में बिस्तर में जाने तक अगर हम अपनी दिनचर्या पर ध्यान से गौर करेगे तो पाएंगे कि प्लास्टिक ने किसी न किसी रूप में हमें हर पल घेर कर रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">टूथब्रश से सुबह ब्रश करना हो या आॅफिस में दिन भर कम्प्यूटर पर काम, बाजार से कोई सामान लाना हो या टिफिन और वॉटर बॉटल में खाना और पानी लेकर चलना। प्लास्टिक हर जगह है, हर समय है। आज के वक्त में किसी भी ऐसे घर, संस्थान या दफ्तर की कल्पना करना मुश्किल है जो प्लास्टिक रहित हो। गांवों में भी शादी-ब्याह में प्रयुक्त होने वाले मिट्टी के बरतन और पत्तलों की जगह आज प्लास्टिक के उत्पादों ने ले ली है।</p>
<p style="text-align:justify;">लगभग हर उत्पाद की पैकेजिंग में प्लास्टिक प्रयुक्त हो रहा है।बाजार से कोई भी वस्तु खरीदने जाते शायद ही किसी व्यक्ति के पास अपना थैला होता है। सब्जियों से लेकर दूसरे उपयोग का कोई भी छोटा-मोटा सामान लाने के लिए लोग बिना किसी संकोच के प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल करते हैं। विडंबना यह है कि जहां भी लोग पिकनिक के लिए जाते हैं, यहां तक कि जंगलों, पर्वतों की चोटियों, रिवर राफ्टिंग कैंपों और नदियों के किनारों तक पर प्लास्टिक का कचरा छोड़ आते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शहरों में जगह- जगह सड़कों किनारे व गंदगीयुक्त कीचड़ में भी प्लास्टिक की थैलिया तैरती नजर आती है, जिससे पानी में विघटन के कारण ये दुर्गंध भी पैदा कर रही हैं। जिस प्लास्टिक ने हमारे जीवन को आसान और सुविधाजनक बनाया, वही आज हमारे लिए धीमा जहर बनता जा रहा है। प्लास्टिक जमीन, पानी और हवा तीनों को प्रभावित कर रहा है। सदियों तक नष्ट न होने वाला प्लास्टिक भूजल को प्रदूषित कर रहा है। प्लास्टिक के बहुत सूक्ष्म टुकड़े उसमें मिलकर उसे दूषित कर देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियां इसी भूजल का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उनकी प्रॉसेसिंग में वे सूक्ष्म कण खत्म नहीं हो पाते। यहीं नहीं माइक्रो प्लास्टिक हमारे नलों में आने वाले पानी या सांस ली जाने वाली हवा में भी पाए गए हैं। प्लास्टिक में कुछ जहरीले रसायनों जैसे स्टाइरीन डिमर बिस्फेनाल ए और पालीस्टेरेन के उप उत्पाद उपस्थित होते है। ये उत्पाद प्रति दिन पीने वाले पानी की गुणवत्ता खराब कर रहे है। गर्म होने पर प्लास्टिक जहरीली ग्रीनहाउस गैस का कारण भी बना हुआ है।प्लास्टिक बैग के कारण संपूर्ण पर्यावरण का चक्र प्रभावित हो रहा है और यह कचरा प्रबंधन की राह में भी बड़ी बाधा है। प्लास्टिक का कचरा आज हमारी गलियों, नालों और नदियों को जाम कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अनुमान के मुताबिक जितना प्लास्टिक प्रदूषण जमीन पर है उससे कहीं ज्यादा समुद्र के अंदर है जो जलीय जीवों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। कभी ये जीव इन प्लास्टिक में उलझ कर फंसे रह जाते हैं तो कभी मुंह के जरिए वो इनके पेट में पहुंच जाता है।दुनिया के लगभग 90% समुद्री जीव-जंतु एवं पक्षी किसी-न-किसी रूप में अपने शरीर में प्लास्टिक ले रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अनुमान के मुताबिक सालाना एक लाख से अधिक जलीय जीव प्लास्टिक प्रदूषण से मर रहे हैं। केवल उत्तरी प्रशांत महासागर में ही मछलियां 12,000 से 24,000 टन प्लास्टिक निगल जाती हैं, जिससे आंतों में घाव से लेकर उनकी मृत्यु तक हो जाती है। समुद्रों में प्लास्टिक प्रदूषण यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो 2050 तक वहां सागर में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">शहर और गाव की गलियों से लेकर खेतों तक में मुसीबत बन चुका प्लास्टिक कचरा 10 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है। वहीं 2022 तक भारतीय प्लास्टिक उद्योग प्लास्टिक उत्पादन को दोगुना करने के प्रयास में है। ऐसे में आने वाले वक्त में प्लास्टिक कचरे का सही से निस्तारण, पुनर्चक्रण और शोधन नहीं किया गया तो यह कचरा भविष्य में देश के लिये ‘‘विषैला टाइम बम’’ साबित हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कैलाश बिश्नोई</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/time-bomb-of-plastic-future/article-5337</link>
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                <pubDate>Sat, 11 Aug 2018 18:54:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दलितों का उत्थान ही देश का भविष्य तय करेगा</title>
                                    <description><![CDATA[भाजपा दलित हितैषी होने के लिए उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय के खिलाफ जिसमें एससी/एसटी वर्र्गाें के उत्पीड़न मामलों में स्वर्ण जातियों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक हो गई थी, को खत्म करने के लिए नया बिल ले आई है, जिससे कि दलित उत्पीड़न में स्वणों की तत्काल गिरफ्तारी तय हो। लेकिन भाजपा को सरकार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/the-rise-of-dalits-will-decide-the-future-of-the-country/article-5308"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/dalit.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भाजपा दलित हितैषी होने के लिए उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय के खिलाफ जिसमें एससी/एसटी वर्र्गाें के उत्पीड़न मामलों में स्वर्ण जातियों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक हो गई थी, को खत्म करने के लिए नया बिल ले आई है, जिससे कि दलित उत्पीड़न में स्वणों की तत्काल गिरफ्तारी तय हो। लेकिन भाजपा को सरकार बनाने देने के लिए जिस राज्य ने सबसे अधिक सीटें जिताई, यहां भाजपा की ही सरकार है वहां दलित उत्पीड़न थमने का नाम ही नहीं ले रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया आदेश में पुलिस अपनी रक्षात्मक ड्यूटी छोड़ कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा तो कर रही है लेकिन राज्य में दलित हिंसा के शिकार बना मौत के घाट उतारे जा रहे हैं, उनकी कोई सुनने वाला नहीं। उधर भाजपा है कि इस उधेड़-बुन में लगी हुई है कि दलितों के जो संगठन अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं उनके बढ़ते प्रभाव को कैसे कम किया जाए? आजादी के पहले से दलित बेवजह हो रहे अपने उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ रहे हैं। आजादी के बाद डॉ. बीआर अम्बेडकर द्वारा रचे संविधान से दलितों को समानता की कुछ आस जगी थी, लेकिन देश में जातिवादी सोच की जड़े इतनी गहरी हैं कि आज 70 साल हो गए समानता का संविधान रचे हुए परन्तु दलित समाज आज भी उत्पीड़ित है। भाजपा के शासन में अल्पसंख्यकों व दलितों के उत्पीड़न के मामले बेतहाशा बढ़े हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा का अभी दलित हितैषी बिल भी ऊपरी तौर पर एक स्वांग है, जबकि जमीनी सच्चाईयां बहुत कड़वी हैं। भाजपा शासित राज्यों में दलितों को कभी गाय, कभी उनका हक मांगने के लिए मौत के घाट उतारा जा रहा है, सरकारें हैं कि बस और ही और कामों में मश्गूल हैं। उत्तर प्रदेश में कावड़ियों पर बरसाए जाने वाले फूलों से स्पष्ट है कि यहां का लोकतंत्र व उसकी मशीनरी अब सांप्रदायिक कार्यों व अनुष्ठानों को पहले करेंगी बाकी देश या उसका कार्य कोई मायने नहीं रखता।</p>
<p style="text-align:justify;">दलित वर्ग देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, जब तक दलित आबादी को शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सुलभ नहीं हो जाता देश के विकास का सपना पूरा नहीं होगा। दलितों को राजनीतिक, जातिवादी चश्में से देखा जाना बंद होना चाहिए। देश के हर संस्थान व सरकार को देश के इस पिछड़े वर्ग के उत्थान को ज्यादा से ज्यादा गति देनी चाहिए ताकि भारत विश्व के पूर्ण विकसित राष्टÑों में शुमार हो सके। दलितों का उत्थान सामाजिक व मानवीय तौर पर होना भी बेहद आवश्यक है, जिसे हजारों वर्षाें से अनदेखा किया जा रहा है, जो कि भविष्य के भारत में नहीं होना चाहिए।</p>
<p> </p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Aug 2018 20:09:18 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>स्कूल में अध्यापकों की कमी, खतरे में बच्चों का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[गांववासियों ने सरकार से की स्कूलों में अध्यापक पूरे करने की मांग मानसा(सुखजीत मान)। बेशक जिला मानसा इस बार के बोर्ड के परिणामों में अच्छी कार्यशैली के कारण पहले स्थान पर आने में कामयाब हुआ है परन्तु बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल अध्यापकों की कमी के साथ जूझ रहे हैं किसान संघर्षों में अग्रणी रहने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/lack-of-teachers-in-school-future-of-children-in-danger/article-4931"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/school-teachers-news.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">गांववासियों ने सरकार से की स्कूलों में अध्यापक पूरे करने की मांग</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>मानसा(सुखजीत मान)।</strong> बेशक जिला मानसा इस बार के बोर्ड के परिणामों में अच्छी कार्यशैली के कारण पहले स्थान पर आने में कामयाब हुआ है परन्तु बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल अध्यापकों की कमी के साथ जूझ रहे हैं किसान संघर्षों में अग्रणी रहने वाले गांव भैनी बाघा के सरकारी सीनियर सेकैंडरी स्कूल में भी ऐसे ही हालात हैं। गांववासियों ने सरकार से अध्यापक पूरे करने की मांग की है और ऐसा न होने पर संघर्ष का बिगुल बजाने की घोषणा की है।</p>
<p style="text-align:justify;">गांववासियों ने कहा कि एक तरफ राज्य सरकार सरकारी स्कूलों में उच्च शिक्षा देने के दावे कर रही है व निजी स्कूलों के मुकाबले बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिल करवाने के लिए रैलियां की जाती हैं परन्तु दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों के में जरूरी विषयों के अध्यापकों की बड़ी कमी देखी जा रही है। उन्होंने बताया कि गांव भैनी बाघा के सरकारी सीनियार सेकैंडरी स्कूल में लम्बे समय से कुल 53 पोस्टों में से 38 पोस्टों ही भरी हैं व 15 रिक्त हैं। रिक्त पड़े अध्यापकों की पदों में से मुख्य तौर पर अंग्रेजी, इतिहास,रसायनिक विज्ञान ,हिसाब, जीव विज्ञान व ड्राइंग के लैक्चरर और वोकेशनल विषय व एसएस आदि शामिल हैं।</p>
<h2 style="text-align:center;">सरकारी स्कूलों के में जरूरी विषयों के अध्यापकों की बड़ी कमी</h2>
<p style="text-align:justify;">भैनी बाघा के इस स्कूल में पास के गांव ठूठ्यांवाली, भाई देसा, बुर्ज राठी और मानसा कैंची आदि से विद्यार्थी पढ़ने के लिए आते हैं। विद्यार्थियों के माता पिता ने कहा कि विद्यार्थी का पढ़ाई का लंबे समय से नुक्सान हो रहा है। कई बच्चों के माता-पिता ने अपने बच्चों के भविष्य को देखते भारी फीसें भर कर ट्यूशन रखवाए हुए हैं जिससे वह अपना सिलेबस पूरा कर सकें। गांववासियों ने बताया कि स्कूल पसवक समिति ने कई बार सबंधित विभाग को रिक्त पद पूरे करने के लिए लिखित तौर पर मांग की है परन्तु किसी दे भी कान पर जूं नहीं सरकी।</p>
<h2 style="text-align:center;">परीक्षा परिणाम अच्छा, अंग्रेजी से कमजोर हैं बच्चे : प्रिंसीपल</h2>
<p style="text-align:justify;">प्रिंसीपल गुरसेवक सिंह ने बताया कि शिक्षा विभाग की तरफ से इस बार घोषित किए गए दसवीं व बारहवीं के परिणामों में से अधिक विद्यार्थी अंग्रेजी में कमजोर रहे हैं परन्तु फिर भी अध्यापकों की सख़्त मेहनत से परिणाम अच्छा रहा है।</p>
<h2 style="text-align:center;">पता कर डैपूटेशन पर लगा देंगे अध्यापक: अधिकारी</h2>
<p style="text-align:justify;">जिला शिक्षा अधिकारी (सै.) सुरेश चंद्र का कहना है कि कैमिस्ट्री का अध्यापक नियुक्त कर दिया है उन्होंने कहा कि वहां अध्यापकों की कोई कमी नहीं परन्तु फिर भी यदि ऐसी बात है तो पता कर डैपूटेशन पर अध्यापक वहां नियुक्त कर दिए जाएंगे।</p>
<h2 style="text-align:center;">स्कूल कम हो रहे व शराब के ठेके बढ़ रहे : किसान नेता</h2>
<p style="text-align:justify;">पंजाब किसान यूनियन के राज्य सीनियर उप अध्यक्ष गोरा सिंह भैनी बाघा ने बताया कि पंजाब में आज स्कूलों की संख्या कम हो रही है और शराब के ठेके बढ़ रहे हैं। स्कूलों में अध्यापकों की कमी कारण देश का भविष्य अंधेरे की तरफ जा रहा है। उन्होंने अपने गांव के स्कूल में रिक्त पड़े पदों को तुरंत भरने की मांग की किसान नेता ने पद जल्द पुरे न होने पर संघर्ष शुरू करने की चेतावनी भी दी है।</p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Jul 2018 04:21:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>खतरे में लाखों दलित विद्यार्थियों का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्र ने बंद की स्कॉलरशिप योजना चंडीगढ़(अशवनी चावला)। पंजाब के लाखों विद्यार्थियों का भविष्य खतरे में है, क्योंकि जिस स्कॉलशिप योजना के तहत एससी बीसी विद्यार्थी नि:शुल्क अब तक पढ़ाई करते आ रहे हैं। वह स्कॉलरशिप जना को केंद्र सरकार ने कई तरह की शर्तें जारी करते बंद करने की कगार तक पहुंचा दी है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/future-of-danger-pupils-in-danger/article-4312"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/scolar.jpg" alt=""></a><br /><h1>केंद्र ने बंद की स्कॉलरशिप योजना</h1>
<h2><strong>चंडीगढ़(अशवनी चावला)।</strong></h2>
<p><span style="text-align:justify;">पंजाब के लाखों विद्यार्थियों का भविष्य खतरे में है, क्योंकि जिस स्कॉलशिप योजना के तहत एससी बीसी विद्यार्थी नि:शुल्क अब तक पढ़ाई करते आ रहे हैं। वह स्कॉलरशिप जना को केंद्र सरकार ने कई तरह की शर्तें जारी करते बंद करने की कगार तक पहुंचा दी है। केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई नयी शर्तों अनुसार अब पंजाब सरकार को स्कॉलरशिप योजना अपने हिस्से 60 करोड़ रुपये की जगह पर 750 करोड़ रुपये तक देने पड़ेंगे, जिस कारण पंजाब सरकार ने केंद्र की सहायता से बिना इस योजना को चलाने से साफ इन्कार कर दिया है। नकारी अनुसार केंद्र सरकार द्वारा पोस्ट मैट्रिक स्कालरशिप योजना नीचे देश भर के दलित विद्यार्थियों को 12वीं पास करने के बाद हर तरह की टैक्निकल व नॉन टैक्निकल डिग्री के लिए स्कॉलरशिप दी जाती थी।</span></p>
<p style="text-align:justify;">इस स्कॉलरशिप में एससी बीसी विद्यार्थियों को दाखिला से लेकर मासिक फीस व परीक्षा के पैसे भी नहीं देने पड़ते थे व सारा खर्च केंद्र व पंजाब सरकार मिलकर अपने जेब में से भरते थे। इस योजना के तहत पंजाब सरकार 60 करोड़ रुपये हर वर्ष अपना हिस्सा देती थी, जबकि शेष रहती राशि केंद्र सरकार द्वारा दी जाती थी।अब तक हर साल दलित विद्यार्थियों की पढ़ाई पर लगभग 750 करोड़ रुपये खर्च आ रहा है, जिसमें केंद्र सरकार 690 करोड़ रुपये अपना हिस्सा देती है। केंद्र सरकार द्वारा नये आदेश के द्वारा अब 750 करोड़ रुपये तक के खर्च तक कुछ भी देने से साफ इन्कार कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि दलित विद्यार्थियों की पढ़ाई पर 750 करोड़ से पर का खर्च आएगा तो उससे ऊपर का खर्च ही केंद्र सरकार देगी। पंजाब में 750 करोड़ रुपये पिछले वर्षांे में सबसे अधिक एक  ल में खर्च होने वाली रकम है, इसलिए पंजाब सरकार को लगता है कि शायद ही भविष्य में 750 करोड़ रुपये से ऊपर खर्च होगा व इतनी अधिक रकम पंजाब सरकार खर्च नहीं कर सकती है। इस लिए केंद्र सरकार द्वारा पैसा नहीं देने की सूरत में योजना बंद होने किनारे है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong> 30 दिनों में नहीं हुआ कुछ तो नहीं मिलेगा दाखिला</strong></p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब के सरकारी व प्राईवेट कॉलेजों में पढ़ाई करने वाले 3 लाख के लगभग विद्यार्थियों के भविष्य के लिए 30 दिनों में कोई फैसला नहीं हुआ तो 1अगस्त से शुरू होने वाले नये सैशन में किसी भी दलित विद्यार्थी को बिना फीस मुफ़्त में दाखिला नहीं मिलेगा, इस लिए पंजाब सरकार के पास सिर्फ 30 दिन का ही समय है। इसी 30 दिनों में ही सरकार को कुछ न कुछ करना होगा।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 Jun 2018 09:25:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अध्यापकों की कड़ी मेहनत की बदौलत संवरने लगा देश का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[श्री मुक्तसर साहिब। जिला श्री मुक्तसर साहिब विधानसभा हलका लंबी के गांव सरावां बोदला की ढ़ाणी गोबिंद नगरी में स्थापित स्कूल सुविधाआें, सरकारी प्राईमरी स्कूल अपने मेहनती स्टाफ, पढ़ाई के ऊंचे स्तर के कारण इस कदर मशहूर हो गया है कि गांव के इस स्कूल में आसपास के चार गांवों के अलावा मलोट शहर से भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/the-future-of-the-country-started/article-4052"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/ad-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>श्री मुक्तसर साहिब। </strong>जिला श्री मुक्तसर साहिब विधानसभा हलका लंबी के गांव सरावां बोदला की ढ़ाणी गोबिंद नगरी में स्थापित स्कूल सुविधाआें, सरकारी प्राईमरी स्कूल अपने मेहनती स्टाफ, पढ़ाई के ऊंचे स्तर के कारण इस कदर मशहूर हो गया है कि गांव के इस स्कूल में आसपास के चार गांवों के अलावा मलोट शहर से भी बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। स्कूल की प्रेरणादायक कहानी सांझी करते स्कूल प्रमुख सुरेन्द्र सिंह ने बताया कि उन्होंने 2007 में यहां अध्यापक के तौर पर सेवा शुरु की थी व इस स्कूल को एक मिशन के तौर पर लेते उन्होंने अपने साथी अध्यापक अर्जन सिंह के साथ इस स्कूल को उच्च स्थान पर पहुंचाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह स्कूल खेतों में गांव की आबादी से दूर है और 2007 में यहां केवल 10 विद्यार्थी थे, परंतु इन अध्यापकों की लग्न ने स्कूल में पढ़ाई का स्तर इस स्तर तक ऊंचा किया कि अब यहां कबरवाला, सरावांबोदला, भगवानपुरा, गांव मलोट के अलावा मलोट शहर के बच्चे भी दाखिला लेने के लिए पहुंच रहे हैं और अब यहां कुल 55 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। सुरेन्द्र सिंह ने कहा कि इस स्कूल में बच्चों को लाने के लिए उन्होंने अपनी कार भी इस्तेमाल की व जब माता-पिता को इस स्कूल की खासियतों का पता चला तो अब दूर से भी बच्चे आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अब बच्चों को स्कूल आने के लिए स्कूल वैन की सुविधा भी है। इस स्कूल के बच्चों की अंग्रेजी उच्चारण व लिखने में महारत महंगे निजी स्कूलों के बच्चों को पीछे छोड़ती है। बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा के लिए सुरेन्द्र सिंह ने अपना कंप्यूटर स्कूल में रख लिया। सुरेन्द्र सिंह ने कहा कि वह अब तक अपने स्कूल के विकास कार्योंं पर1 लाख रूपये अपनी जेब में से भी खर्च कर चुके हैं। स्कूल का ‘पढ़ो पंजाब, पढ़ाओ पंजाब’ के अंतर्गत इस वर्ष का परिणाम 98.7 प्रतिशत रहा है और जिले में से इस स्कूल का दूसरा स्थान रहा है।</p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 Jun 2018 10:52:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फिर बचपन सुरक्षित है कहां?</title>
                                    <description><![CDATA[देश की लोकतांत्रिक राजनीति गाहे-बगाहे किसानों, और अन्य लोगों की चर्चा कर लेती है। भले आखिरी में परिणाम वही हो, वहीं ढाक के तीन पात। ऐसे में पहला ज्वलंत सवाल यही है कि क्या राजनीति ने कभी देश के भावी भविष्य को याद करने की भूल की? उत्तर नहीं है किसी के पास। ऐसे में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/then-where-is-childhood-safe/article-3372"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की लोकतांत्रिक राजनीति गाहे-बगाहे किसानों, और अन्य लोगों की चर्चा कर लेती है। भले आखिरी में परिणाम वही हो, वहीं ढाक के तीन पात। ऐसे में पहला ज्वलंत सवाल यही है कि क्या राजनीति ने कभी देश के भावी भविष्य को याद करने की भूल की? उत्तर नहीं है किसी के पास। ऐसे में सवालों की एक लंबी कड़ी उत्पन्न होती है। क्या नौनिहाल देश का हिस्सा नहीं? क्या उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी सरकारों की नहीं? क्या बच्चों की दुनिया समाज से अलग है? जिनका ध्यान करती हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली दिखती नहीं। दुर्भाग्य से यही विचार मन को उधेड़ता है कि बच्चों के प्रति इतना तटस्थता भरा रवैया क्यों?</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों की नैसर्गिक आवश्यकता पोषक आहार, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि है। क्या आज के दौर में ये मूलभूत आवश्यकताओं को हमारी व्यवस्था पूरी करने में सक्षम हो पाई है। तो उत्तर ‘न’ में ही मिलेगा। जिस वक़्त देश में बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं आवश्यक होती हैं, उस दौर में आक्सीजन की कमी बच्चों की मौत का कारण बनती है। जिस उम्र में बच्चों को सम्पूर्ण पोषण की आवश्यकता होती है, उस दरमियान उन्हें अपनों के द्वारा ही हवस का शिकार बनाया जाता है। जिस समय बच्चों के हाथों में कलम और किताब होनी चाहिए। तब उनके हाथ मजदूरी करने के लिए बांध दिए जाते हैं। फिर बचपन कहाँ सुरक्षित है?</p>
<p style="text-align:justify;">पहले बात बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की करते हैं। एक रिपोर्ट्स के मुताबिक 2015 के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में 12, 859, बिहार 12,420 और उत्तर प्रदेश में 11,420 बाल अपराध के मामले दर्ज किए गए। इसी के अंतर्गत केंद्रीय महिला एवं बाल विकास विभाग ने एक अध्ययन में पाया कि बच्चों के खिलाफ यौन शोषण के मामले बढ़ रहे हैं, तो उसके साथ देश का माहौल ऐसा भी नहीं कि मात्र बच्चियां इन हरकतों से पीड़ित हों। इस कलुषित और हवसीपन ने समाज के लड़के और लड़कियों दोनों का भक्षण करने की कोशिश की है, जो एक आदर्शवादी देश की छवि को कलंकित और अमर्यादित करने का काम कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट-2016 में कहा गया कि यहाँ पाँच वर्ष से कम उम्र के 69 बच्चे प्रति वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। ‘दुनिया में बच्चों की स्थिति’ के अंतर्गत पेश की गई यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 52 है। वहीं जन्म के एक माह के भीतर प्रति हजार में से 36 बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं। इसी तरह पांच वर्ष की आयु तक के 42.8 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। इसके साथ 42 फीसद बच्चे नाटे हैं। वहीं एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के मात्र 5.9 फीसद, उत्तर प्रदेश के 5.3 प्रतिशत, राजस्थान में बच्चों को 3.4 फीसद और गुजरात के 5.2 प्रतिशत बच्चों को ही समुचित मात्रा में आहार मिल पा रहा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में जब केंद्र और राज्य सरकारों में समन्वयन न होने के कारण केंद्र की योजनाओं में गड़बड़ी होने का रोना रोया जाता है। सरकारी योजनाओं को देखकर ऐसा लगता है, कि केवल खानापूर्ति और दिखावट की दुकान के रूप में इन्हें नियंत्रित और संचालित किया जा रहा हैं। वहीं पोषण की कमी बच्चों में अन्य रोग की भी वाहक बनती है, जिसका सीधा सबूत यह है कि देश के 58 फीसदी बच्चे खून की कमी की गिरफ्त में हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत के सात करोड़ से अधिक बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। इसके साथ देश के बच्चों में स्वच्छता के प्रति उदासीनता भी कुपोषण के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर ऐसे में सवाल लाजिमी हैं कि बच्चों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति सजग क्यों नहीं बनाया जा रहा? ये कुछ चंद स्थितियां हैं, जो बच्चों की वास्तविक स्थिति से रूबरू कराती हैं, जिसको मद्देनजर रखते हुए, भावी भविष्य को बचाने का प्रयास सरकारों को करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-महेश तिवारी</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Oct 2017 04:47:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शिक्षा के मंदिर में ताश की क्लास</title>
                                    <description><![CDATA[तस्वीर देखकर अंदाजा लगाएं क्या बनेंगे इस स्कूल के बच्चे, डॉक्टर, इंजीनियर या जुआरी चरखी दादरी(सच कहूँ न्यूज)। विद्यालय को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है और हम अपने बच्चों को विद्यालय इसलिए भेजते हैं ताकि वे पढ़-लिखकर आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनें। लेकिन देश के इन भावी कर्णधारों के मार्गदर्शक के रूप […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/video-viral-teachers-playing-cards-in-school-time/article-2904"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/school-1.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">तस्वीर देखकर अंदाजा लगाएं क्या बनेंगे इस स्कूल के बच्चे, डॉक्टर, इंजीनियर या जुआरी</h2>
<p><strong>चरखी दादरी(सच कहूँ न्यूज)।</strong> विद्यालय को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है और हम अपने बच्चों को विद्यालय इसलिए भेजते हैं ताकि वे पढ़-लिखकर आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनें। लेकिन देश के इन भावी कर्णधारों के मार्गदर्शक के रूप में विद्यालय में मौजूद अध्यापक रूपी पुजारी ही यदि तमाम मर्यादाएं लांघकर अमर्यादित आचरण करने लगें, स्कूल समय में पढ़ाने की बजाए ताश के पत्ते पीटने लगें और दरी बिछाकर पूरी निडरता से सुस्साते रहें तो आप स्वंय अंदाजा लगा लीजिए कि देश का भविष्य कैसा होगा?</p>
<p>चरखी दादरी के गांव फतेहगढ़ स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में शुक्रवार को ली गई यह तस्वीर तो शिक्षा विभाग के साथ-साथ समस्त अध्यापक वर्ग को शर्मसार कर देने वाली है क्योंकि विद्यालय के अध्यापक स्कूल समय में ही मजे से ताश के पत्ते पिटते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस तस्वीर में ताश की क्लास में प्राचार्य व अध्यापकों के पीछे कुछ अध्यापक आराम से सोते हुए भी दिखाई दे रहे हैं।</p>
<h2>खंड शिक्षा अधिकारी को लिखित शिकायत मिलने का इंतजार</h2>
<p>साथ ही एक चारपाई भी दिखाई दे रही है लेकिन फिलहाल उस पर कोई नहीं है। दूसरी तरफ विद्यालय में विद्यार्थियों की अगर बात करें तो वे आराम से खेल-कूद में व्यस्त हैं। लगता है पढ़ाई-लिखाई से इन्हें कोई लेना-देना ही नहीं। पूछने पर विद्यार्थियों ने बताया कि विद्यालय में अध्यापकों का यही हाल है। वे रोजाना स्क्ूल समय में इसी तरह ताश खेलते हैं, उनकी पढ़ाई पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। कुछ भी हो यह तस्वीर शिक्षा विभाग के साथ-साथ प्रदेश सरकार के दावों की भी पोल खोल रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">स्कूल टाइम में ताश खेलते अध्यापकों का वीडियो वायरल</h2>
<p style="text-align:justify;">जो वीडियो वायरल हुआ है उसमें स्कूल के प्राचार्य विनोद श्योराण के साथ ताश खेलते हुए एसएस अध्यापक हरेंद्र, संस्कृत अध्यापक रामधन व मैथ अध्यापक सतीश कुमार दिखाई दे रहे हैं। एक अन्य अध्यापक ताश खेलने वाले अध्यापकों के साथ वाले कमरे में आराम से सो रहा है।</p>
<p>जिस स्कूल समय में प्राचार्य व अन्य अध्यापक अध्यापन की बजाए ताश खेलने में मशगुल रहते हों, भला ऐसे स्कूल में पढ़ाई व बेहतर रिजल्ट की आस कैसे की जा सकती है। स्कूल टाइम में कोइर् बच्चे ग्राऊंड में घूूम रहे हैं तो कुछ शोर-शराबा कर रहे हैं। लेकिन अध्यापक हैं कि उन्हें कोई सरोेकार नहीं। स्कूल का आधा स्टाफ जहां ताश व मोबाइल में व्यस्त है वहीं एक अध्यापक कमरे में आराम में सो रहे हैं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Aug 2017 00:20:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खूनी खेल ‘ब्लू व्हेल’ की गिरफ्त में भारत का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[हम आजतक सुनते आये हैं कि खेलों से स्वस्थ मनोरंजन व शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है। वस्तुत: खेल खेलने से मन:स्थिति में सकारात्मक सुधार, उत्साह का प्रफुस्टन एवं परस्पर भाईचारा और प्रेम के घनत्व में वृद्धि होती है, लेकिन, आधुनिक तकनीकी दौर में कम होते मैदानों के साथ मैदान में खेले जाने वाले […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-future-in-the-wake-of-blue-whale/article-2863"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/blue-fish.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हम आजतक सुनते आये हैं कि खेलों से स्वस्थ मनोरंजन व शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है। वस्तुत: खेल खेलने से मन:स्थिति में सकारात्मक सुधार, उत्साह का प्रफुस्टन एवं परस्पर भाईचारा और प्रेम के घनत्व में वृद्धि होती है, लेकिन, आधुनिक तकनीकी दौर में कम होते मैदानों के साथ मैदान में खेले जाने वाले वे खेल जो शारीरिक व्यायाम के साथ मानसिक एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाते थे, उनका बीते दो दशक से महत्व कम होता जा रहा है। इसका एक कारण इंटरनेट के गेम्स का बढ़ता दायरा भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इंटरनेट पर नाना प्रकार के गेम्स ने बाल एवं किशोर पीढ़ी को मैदानों के खेलों से अलगावित करने का प्रयास किया है। आज घंटों-घंटों तक एक बच्चा लेपटॉप, कम्प्यूटर व स्मार्ट फोन में इंटरनेट से डाउनलोड किये गये गेम्स खेलने में इतना मशगूल रहता है कि उसे खाने-पीने का ख्याल तक नहीं रहता। यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज इंटरनेट के इन आकर्षक और रोचक गेम्स ने बड़े-बुजुर्गों का भी काफी हद तक ध्यान आकर्षित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक, इंटरनेट के बढ़ते उपयोग व तकनीकी विकास क्रम में उन्नति के साथ ऐसा होना कोई नई बात नहीं है और बच्चे इंटरनेट पर गेम्स खेलें, इससे किसी को कोई गुरेज भी नहीं है, लेकिन कोई गेम्स बाल व किशोर पीढ़ी के जान पर बन आये, तो यह निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में बीते सोमवार की सुबह मुंबई में एक दु:खद वाक्या सामने आया, जहां 14 वर्षीय मनप्रीत ने इस गेम की लत में आत्महत्या कर ली। यह गेम ज्यादातर अवसाद से अकेले जूझ रहे बच्चों का निशाना बना रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया ऐसी जगह है, जहां हर प्रकार के विचारों का पालन-पोषण किया जाता है। यहां जितनी सकारात्मकता होती है, उससे कहीं ज्यादा नकारात्मकता पायी जाती है। अच्छी बातें हमें इतनी जल्दी आकर्षित नहीं करती, जबकि नकारात्मक बातों का प्रभाव बहुत जल्दी फैलता है। चाहे वो घृणा फैलाते लेख हों, पोर्न साइट्स की उपलब्धता हो, नशे को महिमामण्डित कर किया जाने वाला प्रचार हो या और कुछ हो। जब भी ऐसा कुछ कहीं लिखा जाता है, सबसे ज्यादा इससे प्रभावित होने वाला तबका किशोरावस्था में प्रवेश करते बच्चों का होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर रूस में एक मनोविज्ञान के छात्र ने 2013 में एक अनलाइन गेम बनाया ‘ब्लू व्हेल’। यह गेम 50 दिनों की अवधि में पूरा किया जाता है। इसमें प्रतिदिन तरह-तरह की चुनौतियां खिलाड़ी को दी जाती हैं, जिन्हें पूरा करने के बाद प्रमाण स्वरूप उस चुनौती का वीडियो या फोटो ग्रुप में भेजा जाता है। हर चुनौती के पूरा होने पर हाथ पर एक कट लगाना होता है,</p>
<p style="text-align:justify;">जो 50 दिन पूरे होने पर व्हेल की आकृति बनाते हैं। इस खेल की आखिरी चुनौती आत्महत्या है। यह गेम बच्चों तक सोशल मीडिया पर चल रहे कुछ ग्रुप्स के द्वारा पहुंचता है। दुनियाभर में अब तक 200-300 बच्चे इस गेम की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं। रूस, अमेरिका जैसे देशों में इसे बैन कर दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामान्यत: किशोरावस्था में दिमाग और शरीर विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों से जूझ रहा होता है, हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं, पढ़ाई-लिखाई का दबाव चरम पर होता है, ऐसे में सही दिशा-निर्देश न मिले, तो भटकाव हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। इस समय दिमाग इतना परिपक्व नहीं होता कि अपना भला-बुरा निर्धारित कर सके, किन्तु बड़े होने का बोध खुद को सही प्रमाणित करने पर तुला रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे बचने का सिर्फ और सिर्फ एक ही तरीका है, अभिभावकों का बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार और आपसी संवाद करे ताकि बच्चे किसी भी प्रकार की बात घर पर बताते वक्त हिचके नहीं। बच्चों के व्यवहार में किसी भी प्रकार का बदलाव होने पर उसे अनदेखा न करें। उनमें इतना विश्वास भरें कि उन्हें आसानी से गुमराह न किया जा सके। अंतत: इस दिशा में सरकार को त्वरित कदम उठाने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-future-in-the-wake-of-blue-whale/article-2863</link>
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                <pubDate>Thu, 03 Aug 2017 23:53:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>विनाश को संकेत देते महासागर</title>
                                    <description><![CDATA[प्रकृति के साथ खिलवाड़ के चलते वह दिन दूर नहीं जब महासागर विनाश का कारण बनने लगेंगे। ऐसे में महासागरों को बचाने के लिए दुनिया के 193 देशों द्वारा एक साथ आने का संकल्प निश्चित रुप से सुखद समाचार है। महासागर जिसकी पहचान ही धीर-गंभीर मानी जाती रही है, भविष्य में विनाश का संकेत देने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ocean-gives-destruction-signals/article-2207"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/mahasagar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रकृति के साथ खिलवाड़ के चलते वह दिन दूर नहीं जब महासागर विनाश का कारण बनने लगेंगे। ऐसे में महासागरों को बचाने के लिए दुनिया के 193 देशों द्वारा एक साथ आने का संकल्प निश्चित रुप से सुखद समाचार है।</p>
<p style="text-align:justify;">महासागर जिसकी पहचान ही धीर-गंभीर मानी जाती रही है, भविष्य में विनाश का संकेत देने लगे हैं। एक ओर तापमान में लगातार बढ़ोतरी से ग्लेसियर पिघलते जा रहे हैं, जिसका सीधा असर महासागरों के जल स्तर में बढ़ोतरी के रुप में सामने आने लगा है, वहीं समुद्र में अंदरुनी हलचल भी तेज होने लगी है। समुद्री जीव जंतु और पौध-पादप का अस्तित्व प्रभावित होने लगा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक मोटे अनुमान के अनुसार महासागरों में 15 करोड़ टन प्लास्टिक फैल चुका है। सवा पांच लाख करोड़ टुकड़े महासागरों में तैर रहे हैं। प्रदूषण के चलते महासागरों का सांस लेना भी दूभर होने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">समुद्र में आॅक्सिजन का स्तर कम होने लगा है। एक और महासागरों में प्रदूषण फैल रहा है दूसरी ओर समुद्री जीवों का अत्यधिक दोहन खासतौर से मछलियों के अधिक शिकार, ग्लेसियरों के पिघलने से बढ़ता जल स्तर इस कदर चिंतनीय होता जा रहा है कि वैज्ञानियों द्वारा यहां तक कयास लगाया जाने लगा है कि समुद्र के किनारे बसे शहरों के अस्तित्व पर संकट आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">समुद्री गतिविधियों में बदलाव का स्पष्ट संकेत आए दिन सुनामी और समुद्री तूफानों के माध्यम से देखा जा सकता है। समुद्र में प्रदूषण के चलते यह तो विनाश की शुरुआत के रुप में देखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाये तो प्रकृति ने संतुलन बनाए रखने के लिए ही धरातल और महासागरों का अनुपात तय किया है। महासागरों को भी संतुलित तरीके से व्यवस्थित किया है। प्रकृति से खिलवाड़ के चलते जल, थल और वायु प्रदूषण का असर सीधे-सीधे दिखाई देने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अतिवृष्टि और अनावृष्टि आम होती जा रही है। एक साथ अधिक बरसात के चलते औसत बरसात तो दिख जाती है पर मौसम के अनुसार बरसात से जल संचय अधिक सुचारु नहीं हो पाता है। दुनिया में जल संकट बढ़ता जा रहा है। समुद्री पानी में अम्लता बढ़ती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">आबादी के दबाव, अत्यधिक शहरीकरण, भूगर्भ का अत्यधिक दोहन, रसोई गैस, पेट्रोल आदि र्इंधन और बड़े-बड़े संयत्रों में थर्मल और कोयला, गैस आधारित ऊर्जा स्रोत, कल कारखानों की धुआं उगलती चिमनियां प्रदूषण को बढ़ाती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा इलेक्ट्रोनिक कबाड़ और समुद्र में फैंका जा रहा कचना विनाश का कारण बनता जा रहा है। हमारे जीवन में प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग ने प्रदूषण के स्तर को बढ़ाने में सबसे अधिक भूमिका निभाई। जीवन में प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से वातावरण पूरी तरह से असंतुलित होता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्लास्टिक का कचरा धरती, धरती के जीवों, जंगलों, नदी-नालों ही नहीं अब तो समुद्र तक को प्रभावित करने लगा है। प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग और इसके निस्तारण के ठोस प्रयास नहीं होने से पूरा वातावरण प्रभावित हो रहा है। जानवर प्लास्टिक खाने से असमय मृत्यु का कारण बन रहे हैं। जल स्रोतों मेंं प्लास्टिक बाधक व प्रदूषण का कारण बन रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों जून माह की 5 से 9 जून तक संयुक्त राष्टÑ के नेतृत्व में दुनिया के देशों ने महासागरों को बचाने के लिए किए जाने वाले उपायों पर गंभीर चिंतन मनन किया है। समुद्री कचरे को हटाने में सहयोग के लिए दुनिया भर के गैर सरकारी संगठनों ने भी आगे आने की पहल की है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के 193 देशों ने एक साथ आकर महासागरों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया है। संयुक्त राष्टÑ महासभा के अध्यक्ष पीटर थामसन ने बताया कि इन पांच दिनों में समुद्री जीवन को बर्बादी से बचाने रोकने के उपायों पर विचार किया गया है। महासागरों के सामने उभरते खतरों से निपटना और महासागरों का संरक्षण बड़ी चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस तरह से आज चीन की राजधानी सहित दुनिया के कई देशों मेंं धुंध के प्रभाव से जीवन प्रभावित हो रहा है उसी तरह की चुनौती आने वाले समय में सागरों में भी बढ़ने वाली है। समुद्र का जल स्तर बढ़ने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लेसियर पिघलने से टापुओं के अस्तित्व खतरे में पड़ने के साथ ही समुद्री यातायात प्रभावित होने और ग्लेशियरों के पानी से महासागरों के जल स्तर में अधिक बढ़ोतरी होने से स्थितियां गंभीर होने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले सालों में सुनामी और समुद्री तूफानों की मात्रा अधिक बढ़ी है। समुद्री किनारे वाले शहरों में आए दिन तूफानों से जीवन दूभर होने लगा है। जनहानि के साथ ही बेतहाशा धन हानि होने लगी है। प्लास्टिक के दुष्प्रभाव के कारण इसके उपयोग पर अब कई देशों द्वारा प्रतिबंध लगाया जाने लगा है। इलेक्ट्रोनिक कचरा भी महासागरों को प्रभावित कर रहा है। इसके चलते महासागरों की दुर्लभ प्रजातियों पर संकट आने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया में अब अधिक गरमी पड़ने लगी है। तापमान में बढ़ोतरी इसका साफ संकेत है। समुद्री हलचल प्रभावित होने लगी है। ऐसे में महासागरों के अस्तिÞत्व को बचाने के लिए दुनिया के देशों द्वारा साझा और ठोस प्रयास करने का निर्णय शुभ संकेत माना जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में महासागरों को भी प्रदूषण रहित करने के ठोस प्रयास करने होंगे और सम्मेलन केवल चिंता तक सीमित ना रहकर कारगर बनाने होंगे। लोगों को भी अपनी आदतों में बदलाव लाना होगा। कचरा प्रबंधन समझना होगा तभी जाकर इस तरह के प्रदूषण को रोका जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></p>
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</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <pubDate>Mon, 10 Jul 2017 23:25:26 +0530</pubDate>
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