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                <title>Brahmin - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>प्रेरणास्त्रोत: एक ब्राह्मण की कथा</title>
                                    <description><![CDATA[जिस धन के लिए मैंने जीतोड़ परिश्रम किया वह न तो धर्म-कर्म में लगा और न मेरे सुख भोग के काम ही आया। इस संसार सागर से पार होने के लिए वैराग्य एक नौका के समान है। अब मैं शेष बची हुई आयु से आत्म-लाभ लेकर अपना कल्याण करूँगा। वह ब्राह्मण मौनी-सन्यासी हो गया, वह अपना मन वश में करके पृथ्वी पर स्वतन्त्रता से विचरण करने लगा।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/story-of-a-brahmin/article-12277"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/story-of-a-brahmin.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्राचीन समय की बात है, उज्जैन में एक ब्राह्मण रहता था। उसने खेती, व्यापार आदि करके बहुत धन कमाया था, वह बहुत ही कन्जूस, कामी और लोभी था। क्रोध तो उसे बात-बात पर ही आ जाया करता था, उसने अपने जाति बन्धु और अतिथियोुं को कभी मीठी बात से प्रसन्न नहीं किया, खिलाने-पिलाने की तो बात ही क्या है? वह धर्म-कर्म से भी दूर था। उसकी कन्जूसी से उसका परिवार और नौकर-चाकर सभी दु:खी रहते थे। लेकिन बदकिस्मती से उस नीच ब्राह्मण का कुछ धन तो कुटुम्बियों ने ही छीन लिया, कुछ चोर चुरा ले गये और बचा खुचा धन कर और दण्ड के रूप में शासकों ने हड़प लिया। धन के नाश से उसके ह्रदय में बड़ी पीड़ा हुई। इस तरह चिन्ता करते-करते, उसके मन में संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया, अब वह ब्राह्मण मन ही मन कहने लगा कि हाय-हाय बड़े खेद की बात है कि मैंने इतने दिनों तक अपने को व्यर्थ ही इस प्रकार सताया।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस धन के लिए मैंने जीतोड़ परिश्रम किया वह न तो धर्म-कर्म में लगा और न मेरे सुख भोग के काम ही आया। इस संसार सागर से पार होने के लिए वैराग्य एक नौका के समान है। अब मैं शेष बची हुई आयु से आत्म-लाभ लेकर अपना कल्याण करूँगा। वह ब्राह्मण मौनी-सन्यासी हो गया, वह अपना मन वश में करके पृथ्वी पर स्वतन्त्रता से विचरण करने लगा। वह गाँव में भिक्षा माँगकर अपना जीवन व्यतीत करता था। दुष्ट लोग उसे बहुत सताते थे। कोई उसका दण्ड छीन लेता तो कोई भिक्षा पात्र ही झटक ले जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">कोई कमण्डल उठा कर ले जाता और कोई उस पर थूक एवं गाली देता आदि अनेक प्रकारों से लोग उसे सताते थे। ब्राह्मण यह सब चुपचाप सह लेता था। वह समझता था कि यह सब मेरे पूर्व जन्म के कर्माें का फल है और इसे मुझे अवश्य ही भोगना पड़ेगा। ब्राह्मण कहता-मेरे सुख अथवा दु:ख का कारण न तो ये मनुष्य हैं न देवता हैं, न यह शरीर है और न ये कर्म आदि हैं। श्रुतियाँ और महात्माजन ‘‘मन’’ को ही इसका परम कारण मानते हैं, और मन ही इस सारे संसार चक्र को चला रहा है। सचमुच यह मन बहुत बलवान है मन ही समस्त चेष्टाएँ करता रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अज्ञानी-मनुष्य मैं और मेरे पन के भ्रम में फँसकर अनन्त कष्ट पाते हैं। यदि मान ले कि मनुष्य ही दु:ख सुख का कारण है तो भी उससे आत्मा का क्या सम्बन्ध? क्योंकि दु:ख सुख पहुँचाने वाला भी मिट्टी का शरीर है। जीव के जन्म का कारण अहं है, अहंकार के कारण ही भटकता है, जो परमात्मा का आश्रय लेता है उसका भटकना समाप्त हो जाता है, उस ब्राह्मण का धन क्या नष्ट हुआ, उसका सारा क्लेश ही दूर हो गया। अब वह संसार से विरक्त हो गया और सन्यास लेकर पृथ्वी पर स्वतंत्र विचर रहा था। इसलिए मैं भी भगवान की शरण लेकर अज्ञान-सागर को पार करना चाहिए।</p>
<p> </p>
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</span></span></p>
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                <pubDate>Mon, 06 Jan 2020 20:22:18 +0530</pubDate>
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