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                <title>eradicate - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Cancer Day: सरकार के पास गरीबी मिटाने की इच्छाशक्ति है?</title>
                                    <description><![CDATA[इसी उद्देश्य से दुनियाभर में लोगों को कैंसर होने के संभावित कारणों के प्रति जागरूक करने, प्राथमिक स्तर पर कैंसर की पहचान करने और इसके शीघ्र निदान तथा रोकथाम के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवसष् मनाया जाता है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/government-has-the-will-to-eradicate-poverty-2/article-12916"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/cancer.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">(Cancer Day)</h2>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>वैसे तो कैंसर कई प्रकार का होता है और हर प्रकार के कैंसर के होने के कारण भी अलग-अलग होते हैं किन्तु इस बीमारी के कुछ ऐसे मुख्य कारक होते हैं, जिनकी वजह से किसी को भी कैंसर का खतरा हो सकता है। वजन बढ़ना या मोटापाए शारीरिक सक्रियता का अभावए अधिक मात्रा में अल्कोहल तथा नशीले पदार्थों का सेवन करनाए पौष्टिक आहार न लेनाए नियमित व्यायाम न करना इत्यादि इन कारणों में शामिल हो सकते हैं। कैंसर एक ऐसी खामोश बीमारी हैए जिसके कभी-कभार कोई लक्षण सामने नहीं आते किन्तु कैंसर के अक्सर जो लक्षण सामने आते हैं, उनकी जानकारी होना बहुत जरूरी है।</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">कैंसर एक ऐसा शब्द है, जिसे अपने किसी परिजन के लिए डॉक्टर के मुंह से सुनते ही परिवार के तमाम सदस्यों के पैरों तले की जमीन खिसक जाती है। दरअसल परिजनों को अपने परिवार के उस सदस्य को हमेशा के लिए खो देने का डर सताने लगता है। बढ़ते प्रदूषण तथा पोषक खानपान के अभाव में यह बीमारी एक महामारी के रूप में तेजी से फैल रही है। कैंसर के संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि यह बीमारी किसी भी व्यक्ति को किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन अगर इसका सही समय पर पता लगा लिया जाए तो उपचार संभव है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि हमारे देश में पिछले बीस वर्षों के दौरान कैंसर के मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। प्रतिवर्ष कैंसर से पीड़ित लाखों मरीज मौत के मुंह में समा जाते हैं और माना जा रहा है कि वर्ष 2020 तक कैंसर के मरीजों की संख्या एक करोड़ की संख्या को भी पार कर जाएगी। हालांकि कुछ वर्ष पूर्व तक कैंसर को एक असाध्य अर्थात लाइलाज रोग के रूप में जाना जाता था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कैंसर के उपचार की दिशा में क्रांतिकारी खोजें हुई हैं और अब अगर समय रहते कैंसर की पहचान कर ली जाए तो उसका उपचार किया जाना काफी हद तक संभव हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनियाभर में कैंसर के मामलों को कम करने के लिए कैंसर तथा उसके कारणों के प्रति लोगों को जागरूक किए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि वे इस बीमारी व इसके लक्षणों और इसके भयावह खतरे के प्रति जागरूक रहें। दरअसल कैंसर के करीब दो तिहाई मामलों का बहुत देर से पता चलता है और कई बार तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसी उद्देश्य से दुनियाभर में लोगों को कैंसर होने के संभावित कारणों के प्रति जागरूक करने, प्राथमिक स्तर पर कैंसर की पहचान करने और इसके शीघ्र निदान तथा रोकथाम के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवसष् मनाया जाता है। दरअसल कैंसर आज न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में एक ऐसी भयानक बीमारी बन चुका है कि तमाम प्रयासों के बावजूद इसके मरीजों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है तथा लाखों लोग हर साल इस बीमारी के कारण बेमौत मारे जा रहे हैं। इसी वजह से वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाने का निर्णय लिया गया ताकि लोगों को इस भयानक बीमारी से होने वाले नुकसान के बारे में बताया जा सके और ज्यादा से ज्यादा जागरूक किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल कैंसर से लड़ने का सबसे बेहतर और मजबूत तरीका यही है कि लोगों में इसके बारे में जागरूकता होए जिसके चलते जल्द से जल्द इस बीमारी की पहचान हो सके और शुरूआती चरण में ही इस बीमारी का इलाज संभव हो। यदि कैंसर का पता शीघ्र ही लगा लिया जाए तो उसके उपचार पर होने वाला खर्च बहुत कम हो जाता है लेकिन इसकी पहचान अगर विकसित दशा में होती है तो उपचार की लागत कई गुना बढ़ जाती है। कैंसर के तीसरे या चौथे चरण में पहुंच जाने की स्थिति में मरीज का इलाज मुश्किल हो जाता है और खर्च भी अपेक्षाकृत काफी बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों के लंबा जीवन जीने की उम्मीदें भी कम हो जाती है। यही वजह है कि जागरूकता के जरिये इस बीमारी को शुरूआती दौर में ही पहचान लेना बेहद जरूरी माना गया है क्योंकि ऐसे मरीजों के इलाज के बाद उनके स्वस्थ एवं सामान्य जीवन जीने की संभावनाएं काफी ज्यादा होती हैं। हालांकि देश में कैंसर के इलाज की तमाम सुविधाओं के बावजूद अगर हम इस बीमारी पर लगाम लगाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो इसके पीछे इस बीमारी का इलाज महंगा होना एक बहुत बड़ी समस्या है। वैसे देश में जांच सुविधाओं का अभाव भी कैंसर के इलाज में एक बड़ी बाधा है, जो बहुत से मामलों में इस बीमारी के देर से पता चलने का एक अहम कारण होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक जीवनशैली, नियमित व्यायाम न करना, भोजन की शुद्धता पर ध्यान न देना, प्रदूषित वातावरण इत्यादि कई ऐसे अहम कारण हैं, जो शरीर में कैंसर विकसित होने के प्रमुख कारक हो सकते हैं। कैंसर के संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि आखिर यह है क्या हमारे शरीर की कोशिकाएं जब अनियंत्रित होकर अपने आप तेजी से बढ़ने लगती हैं तो कोशिकाओं के समूह की उस अनियंत्रित वृद्धि को ही कैंसर कहते हैं। जब ये कोशिकाएं टिश्यू को प्रभावित करती हैं तो कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है और ऐसी स्थिति में कैंसर काफी घातक हो जाता है। वैसे तो कैंसर के सौ से भी ज्यादा प्रकार हैं लेकिन ब्रेन कैंसर के अलावा पुरूषों में मुख्यत: मुंह व जबड़ों का कैंसर, फेफड़े का कैंसर, पित्त की थैली का कैंसर, पेट का कैंसर, लीवर कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर होता है जबकि महिलाओं में होने वाले कैंसर में स्तन तथा ओवेरियन कैंसर प्रमुख हैं। दुनिया भर में कैंसर से लड़ने और इस पर विजय पाने के चिकित्सीय उपाय हो रहे हैं और चिकित्सा के क्षेत्र में शोधकतार्ओं के प्रयासों के चलते कैंसर का प्रारम्भिक स्टेज में इलाज अब संभव है। यही कारण है कि 1990 के बाद से कैंसर से मरने वालों की संख्या में करीब 15 फीसदी की कमी आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कीमोथैरेपी रेडिएशन थैरेपी, बायोलॉजिकल थैरेपी, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट इत्यादि के जरिये कैंसर का इलाज होता है किन्तु यह इलाज प्राय: इतना महंगा होता है कि एक गरीब व्यक्ति इतना खर्च उठाने में सक्षम नहीं होता। इसलिए जरूरत इस बात की महसूस की जाती रही है कि ऐसे मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों में हो या निजी अस्पतालों मेंए सरकार ऐसे मरीजों के इलाज में यथासंभव सहयोग करे। हालांकि दिल्ली स्थित एम्स में कैंसर के इलाज की सारी सुविधाएं हैं और हरियाणा में झज्जर के बादली क्षेत्र में बाढ़सा स्थित एम्स में भी कैंसर के इलाज की सुविधाएं शुरू हो चुकी हैं किन्तु देशभर में कैंसर के मरीजों की संख्या जिस गति से बढ़ रही हैए उसके दृष्टिगत केवल सरकारी अस्पतालों के भरोसे कैंसर मरीजों के इलाज की कल्पना बेमानी ही होगी।</p>
<p style="text-align:right;"><em><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong></em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Feb 2020 20:17:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सरकार के पास गरीबी मिटाने की इच्छाशक्ति है</title>
                                    <description><![CDATA[डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर लोग प्रति माह लाखों रूपए कमाते हैं किंतु उन पर कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह शेयर बाजार में बड़े-बड़े खिलाडी मोटी रकम कमाते हैं किंतु वे इस आय को आयकर विभाग की नजरों से बचा देते हैं। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि गरीब लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/government-has-the-will-to-eradicate-poverty/article-12807"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/poverty.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर लोग प्रति माह लाखों रूपए कमाते हैं किंतु उन पर कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह शेयर बाजार में बड़े-बड़े खिलाडी मोटी रकम कमाते हैं किंतु वे इस आय को आयकर विभाग की नजरों से बचा देते हैं। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि गरीब लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि उनकी संपत्ति में वृद्धि शेयर बाजार और भूसंपदा में वृद्धि से जुडी होती है जिससे रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते और न ही यह विकास कार्यों में सहायक होती है।</h2>
<h3 style="text-align:justify;">
धुर्जति मुखर्जी</h3>
<p style="text-align:justify;">
</p><h4 style="text-align:justify;">भारत सहित तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों में असमानता बढ़ती जा रही है। विभिन्न देशों की सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा विभिन्न विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं इसके बावजूद असमानता बढ़ती जा रही है। साथ ही राजनेता हमेशा ऐसी योजनाएं लाने का दावा करते हैं जिससे समाज के गरीब वर्गों को लाभ पहुंचता है किंतु विभिन रिपोर्टों से पता चलता है कि इसका लाभ गरीब और सीमान्त वर्गों तक नहीं पहुंच रहा है और इस परिदृश्य में फिलहाल बदलाव आने की संभावना भी नहीं है क्योंकि भारत जैसे अधिकतर लोकतत्रों में राजनेताओं और उद्योगपतियों के बीच सांठगांठ मजबूत है इसलिए स्वाभाविक है कि आगामी वर्षों में भी विकास का अधिकतर लाभ समृद्ध वर्गों तक ही पहुंचेगा। इसके साथ ही भारत और अन्य देशों में निजीकरण की मांग रखी जा रही है जिसके चलते स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की मुनाफा कमाने की प्रवृति से गरीब लोगों को नुकसान पहुंचेगा और भारत में ऐसा पहले ही देखने को मिल रहा है।<br />
टाइम टू केयर नामक ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार देश में 1 प्रतिशत जनसंख्या के पास 95.3 करोड लोगों की संपत्ति से चौगुनी संपत्ति है। देश के 106 अरबपतियों के पास 28.9 लाख करोड रूपए की संपत्ति है जो 2018-19 के 24.4 लाख करोड के बजट से अधिक है। देश में शीर्ष 1 प्रतिशत जनसंख्या की संपत्ति में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि निचले तबके के 50 प्रतिशत लोगों की संपत्ति में केवल 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। भारत सहित लगभग सभी देशों में सामाजिक और आर्थिक असंतोष आम बात हो गयी है और भ्रष्टाचार, संवैधानिक मूल्यों के उल्लंघन, बुनियादी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि आदि के मुद्दों पर भी असंतोष और बढ़ जाता है। इसलिए ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में अरबपतियों और बडे व्यावसायिक घरानों को अघिक लाभ पहुंच रहा है और आम आदमी को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड रहा है।<br />
ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2018 के अनुसार इस सहस्राब्दि की शुरूआत से देश में संपत्ति में प्रति वर्ष 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो विश्व औसत 6 प्रतिशत से अधिक है। किंतु ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार इस संपत्ति का लाभ धनी वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग ने अधिक उठाया है। इस रिपोर्ट मे यह भी कहा गया है कि विभिन्न देशों की सरकारें सबसे धनी लोगों और कंपनियों पर कम टैक्स लगा रही है। इसलिए इतना राजस्व अर्जित नहीं हो रहा है जिससे गरीब वर्ग को बुनियादी सुविधाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध करायी जा सके। किंतु इस बात को ध्यान में रखे बिना कि हमारी जनसंख्या का एक बडा भाग गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा है पत्रकारों सहित विभिन दबाव डालने वाले संगठन कल्याण कार्यों पर व्यय में कटौती और निजीकरण् की वकालत कर रहे हैं। जबकि वे जानते हैं कि देश में निजी क्षेत्र पूरी तरह बेईमान है और उसका उद्देश्य गलत तरीकों से पैसा बनाना होता है।<br />
हैरानी की बात है कि 15 अगस्त 2019 तक देश में केवल 5.87 करोड आय कर विवरणी भरी गयी। राजस्व विभाग द्वारा जारी कर विवरणियों के अनुसार मूल्यांकन वर्ष 2018-19 में करोडपति करदाताओं की संख्या 97689 थी। हमारी अर्थव्यवस्था अमरीका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद पांचवीं सबसे बडी अर्थव्यवस्था है किंतु यहां राजस्व संग्रहण की स्थिति अच्छी नहीं है। प्रश्न उठता है कि क्या कर संग्रहण विवेकपूर्ण ढंग से किया जा रहा है या केवल वेतनभोगी वर्ग से कर लिया जा रहा है।<br />
डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर लोग प्रति माह लाखों रूपए कमाते हैं किंतु उन पर कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह शेयर बाजार में बडेÞ-बड़े खिलाडी मोटी रकम कमाते हैं किंतु वे इस आय को आयकर विभाग की नजरों से बचा देते हैं। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि गरीब लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि उनकी संपत्ति में वृद्धि शेयर बाजार और भूसंपदा में वृद्धि से जुडी होती है जिससे रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते और न ही यह विकास कार्यों में सहायक होती है। भारत सहित विभिन देशों की सरकारें उन लोगों की अधिक चिंता करती है जो राजनीतिक दलों को और चुनाव प्रचार के लिए पैसे देते हैं और गरीबों के बजाय उनके हितों को प्राथमिकता दी जाती है।<br />
खपत व्यय में कमी तथा बढ़ती बेरोजगारी बताती है कि हालांकि गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या में कमी आयी हो किंतु समाज के गरीब लोगों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट है कि उनकी आजीविका के साधन समाप्त होते जा रहे हैं। स्थिति का आकलन सामान्यतया समृद्ध ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखकर किया जाता है किंतु देश के पिछडे क्षेत्रों में स्थिति वास्तव में काफी निराशाजनक है। सरकार विशेषकर आदिवासियों और दलितों की स्थिति और उनकी आजीविका पर ध्यान नहीं देती है। फिलहाल अमीर और गरीब, शहरी और ग्रामीण जनता, औद्योगिक कामगार और किसान के बीच असमानता कम होने की संभावना नहीं है और इसका कारण यह है कि पूंजीवादी सरकार ग्रामीण क्षेत्र और सीमान्त वर्ग के लोगों की आजीविका में सुधार लाने की इच्छुक नहीं है। राजनेताओं और नौकरशाहों में विकेन्द्रीकरण की प्रवृति नहीं है। इसलिए निर्देश शीर्ष स्तर से आते हैं जिसके चलते जनता की वास्तविक समस्याओं को नहीं सुना जाता है और उनकी उपेक्षा होती है।<br />
दूसरी ओर गरीबी हटाने में एक अन्य बडी अड़चन सरकार के पास संसाधनों की कमी है। बजट से पूर्व उद्योगपतियों, व्यापारिक संगठनों के साथ अनेक बैठकें होती हैं किंतु कृषक संगठनों या पंचायत प्रतिनिधियों के साथ ऐसी बैठकें कम ही होती हैं और इसीलिए व्यावसायिक वर्ग की मांगों पर ध्यान दिया जाता है और उन्हें रियायत दी जाती है और कृषक समुदाय की उपेक्षा की जाती है। जब तक रणनीति में बदलाव नहीं किया जाता और विकास रणनीति में ग्रामीण क्षेत्र कृषि और कृषि उद्योगों पर बल नही दिया जाता आय और जीवन शैली में असमानता बनी रहेगी। भारत और भारत जैसे देशों में जहां पर सच्चा लोकतंत्र नहीं है, वहां पर वर्तमान पीढ़ी के राजनेताओं से ऐसी आशा नहीं की जा सकती।</h4>
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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2020 20:33:38 +0530</pubDate>
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                <title>लैंगिक भेदभाव को मिटाने की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[स्त्रियों के अधिकार के प्रति हमारा समाज अब उतना रूढ़ नहीं रहा, जितना कछेक दशक पूर्व था। कुछ समस्याओं को छोड़ दें तो आज महिलाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। स्त्री-शिक्षा के व्यापक प्रसार ने स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के समुचित अवसर प्रदान किया है और उन्हें रूढ़िवादी विचारों से काफी सीमा तक मुक्त भी किया है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/challenge-to-eradicate-gender-discrimination/article-12365"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/gender-discrimination.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong><em>-अगर समाज में लैंगिक भेदभाव खत्म नहीं किया गया तो संयुक्त राष्ट्र के 2030 के सतत विकास लक्ष्यों के मूल में निहित महिला सशक्तीकरण और लैंगिक समानता के लक्ष्य की प्राप्ति में हम पिछड़ जाएंगे। हालांकि विश्व आर्थिक मंच ने कहा है कि दुनिया में लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए जिस गति से प्रयास किए जा रहे हैं, उस हिसाब से इस लक्ष्य को पाने में 99.5 साल लग जाएंगे!गौरतलब है कि दुनिया के 40 से भी अधिक देश अपने यहां लैंगिक समानता कानून लागू करके स्त्री-पुरुष समानता स्थापित कर चुके हैं। हालांकि कई देशों में यह एक बड़ी चुनौती के रूप में अभी भी विद्यमान है। ऐसे में भारत में लैंगिक भेदभाव की खाई घटने के बजाय बढ़ते जाना चिंता का सबब बन गया है।</em></strong></p>
<p style="text-align:justify;">
हाल ही में विश्व आर्थिक मंच द्वारा 14वीं ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स रिपोर्ट-2020 जारी की गई है। दुनिया के 153 देशों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आर्थिक सहभागिता, शिक्षा एवं स्वास्थ्य तक उनकी पहुंच और राजनीतिक सशक्तीकरण जैसे 4 मुख्य संकेतकों तथा लैंगिक भेदभाव के न्यूनीकरण की दिशा में किए जा रहे विभिन्न प्रयासों के अध्ययन के पश्चात तैयार किए गये इस सूचकांक में आइसलैंड, नार्वे, फिनलैंड और स्वीडन शीर्ष देशों में शामिल है, जबकि यमन, इराक और पाकिस्तान लैंगिक समानता के मामले में क्रमश: तीन सबसे फिसड्डी देश साबित हुए हैं। हालांकि यह रिपोर्ट भारत के संदर्भ में भी लैंगिक भेदभाव की धुंधली तस्वीर पेश करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल इस सूचकांक में भारत 2018 के मुकाबले 4 पायदान फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंच गया है। 14 साल पहले जब यह रिपोर्ट पहली बार जारी की गई थी तब भारत की स्थिति इससे बेहतर थी। उस समय हम 98वें स्थान पर थे। पिछले डेढ़ दशक में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के मामले में भारत की स्थिति सुधरी तो है, लेकिन महिला स्वास्थ्य और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत सबसे नीचे स्थान पाने वाले पांच देशों में शामिल है। राजनीतिक क्षेत्र में भारत का स्थान जहां 18 वां है, वहीं आर्थिक हिस्सेदारी में वह 149वें तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में 150वें स्थान पर पहुंच गया है!</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक सवाल का जवाब जानना समीचीन होगा कि लैंगिक समानता के मामले में आइसलैंड, फिनलैंड और नार्वे जैसे राष्ट्र ही प्रत्येक वर्ष शीर्ष पर क्यों रहते हैं?गौरतलब है कि इन राष्ट्रों की गिनती दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में भले ही नहीं होती हो, लेकिन बात जब खुशहाल और लैंगिक भेदभाव से मुक्त राष्ट्र की होती है, तो ये चुनिंदा देश संपूर्ण विश्व का नेतृत्व करते दिखाई देते हैं। क्यों न दुनिया के अन्य देश इनके अथक प्रयासों और अभिनव प्रयोगों से कुछ सीखे?आइसलैंड एक छोटा-सा यूरोपीय देश है, जिसकी जनसंख्या केवल साढ़े तीन लाख है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन लैंगिक समानता के मोर्चे पर आज वह विश्व का पथ-प्रदर्शक बन गया है। इस देश में लैंगिक भेदभाव को 88 फीसद तक खत्म किया जा चुका है, जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक है। आश्चर्य की बात है कि आइसलैंड में शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं तक स्त्री-पुरुष की समान पहुंच है। यह अपने आप में एक अनुपम उपलब्धि है। यही वजह है कि लगातार सातवें वर्ष आइसलैंड ने इस सूचकांक में शीर्ष स्थान हासिल किया है। अनोखी बात यह है कि आइसलैंड की सरकार ने पिछले साल ही कानून बनाकर एक ही काम के लिए किसी महिला को कम और पुरुष को ज्यादा वेतन देने की प्रथा को अवैध घोषित कर दिया है। भारत सहित अन्य देशों को आइसलैंड से सीखना चाहिए कि जब निश्चित समय में महिला और पुरुष से समान श्रम करवाया जाता है, तो लिंग के आधार पर उनके पगार में असमानता क्यों ?</p>
<p style="text-align:justify;">अफ्रीकी देश रवांडा अर्थव्यवस्था भले ही छोटी है, लेकिन महिला सशक्तीकरण की मिसाल के तौर उसे जाना जाता है। वह दुनिया का पहला देश है, जिसकी संसद में 64 फीसदी महिलाएं हैं!हालांकि ऐसा नहीं है कि यह परिवर्तन वहां एकाएक आ गया। 1994 के नरसंहार में लाखों महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ था। लेकिन उसके बाद महिलाओं ने खुद को संभाला और इस तरह वहां महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी भी बढ़ती चली गई। इसके बरक्स भारतीय संसद में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी देखें तो वह केवल 14.4 फीसद है। गौरतलब है कि 17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसद है, जो अब तक का सर्वाधिक है। वहीं संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का बिल अभी भी अधर में लटका हुआ है!जाहिर है, इस दिशा में भारत को अभी लंबा सफर तय करना होगा।1906 में महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देकर विश्व का पहला देश बना फिनलैंड के बारे में यह जानना रोचक है कि वहां कामकाजी महिलाओं की स्थिति बहुत ही अच्छी है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहां बच्चों के साथ उनके पिता ज्यादा समय व्यतीत करते हैं, जिससे महिलाएं अपने कामकाज पर अधिक ध्यान दे पाती हैं। फिनलैंड में स्त्री-पुरुष असमानता के अंतराल को 84.2 फीसद तक कम किया जा चुका है। बता दें कि फिनलैंड विश्व का सबसे खुशहाल राष्ट्र है। इसी महीने वहां सना मरीन को दुनिया की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि नॉर्वे के परिवहन मंत्री केतिल सोलविक ओल्सन ने गत वर्ष अपने मंत्री पद से सिर्फ इसलिए त्यागपत्र दे दिया था, क्योंकि उनकी पत्नी को अमेरिका में नौकरी मिल गई थी और वे उनके करियर को आगे बढ़ाना चाहते थे। आमतौर पर परिवार और बच्चों की परवरिश के लिए महिलाएं अक्सर ही नौकरी छोड़ती हैं, लेकिन ओल्सन ने एक मिसाल कायम की। ये उदाहरण ही इन देशों को विशिष्ट बनाते हैं। इनसे काफी कुछ सीखा जा सकता है। इस तरह के प्रयासों से लैंगिक भेदभाव खत्म करने में सफलता हासिल की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी भी राष्ट्र की सतत प्रगति के लिए लैंगिक समानता एक जरूरी तत्व है। विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करके ही राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक भारत में जेंडर गैप अभी 67 फीसद ही भरे हैं, जो चिंता की बात है। लैंगिक असमानता न केवल महिलाओं के विकास में बाधा पहुंचाती है, बल्कि किसी राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को भी गहरे तौर पर प्रभावित करती है। दरअसल किसी देश के पिछड़ेपन का एक अहम कारण स्त्रियों का समाज में उचित स्थान न मिल पाना भी रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लैंगिग समानता आज भी वैश्विक समाज के लिए एक चुनौती बनी हुई है। लैंगिक समानता को सुनिश्चित करना, महिला सशक्तीकरण को बढ़ाना और महिलाओं के खिलाफ हिंसा व भेदभाव को रोकना तथा सामाजिक पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों से निपटना आधुनिक समाज की बुनियादी जरूरत है। असंतुलित लिंगानुपात, पुरुषों के मुकाबले साक्षरता और स्वास्थ्य सुविधाओं का निम्न स्तर, पारिश्रमिक में लैंगिक विषमता जैसे कारक समाज में स्त्रियों की कमतर स्थिति को दशार्ते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में नारी की दशा में बहुत सुधार आया है। स्त्रियों के अधिकार के प्रति हमारा समाज अब उतना रूढ़ नहीं रहा, जितना कछेक दशक पूर्व था। कुछ समस्याओं को छोड़ दें तो आज महिलाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। स्त्री-शिक्षा के व्यापक प्रसार ने स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के समुचित अवसर प्रदान किया है और उन्हें रूढ़िवादी विचारों से काफी सीमा तक मुक्त भी किया है। बहरहाल समाज में लैंगिक समानता मानसिकता में बदलाव लाकर ही स्थापित किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझना होगा कि स्त्री-पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सामाजिक उत्थान में जितना योगदान पुरुषों का है, उतना ही महिलाओं का भी है। इस संबंध में हम मिजोरम और मेघालय से सीख सकते हैं, जहां बिना किसी भेदभाव के महिलाओं को समान रूप से काम दिया जाता है। महिलाओं का सम्मान तथा समूचित अवसर देकर ही लैंगिक भेदभाव से मुक्त प्रगतिशील समाज की स्थापना संभव है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>-सुधीर कुमार</em></strong></p>
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                <pubDate>Thu, 09 Jan 2020 20:12:58 +0530</pubDate>
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