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                <title>Initiative - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>पराली पर पंजाब की सराहनीय पहल</title>
                                    <description><![CDATA[आखिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद पंजाब सरकार ने पराली न जलाने वाले किसानों को वित्तीय मदद देने की घोषणा करते हुए इस समस्या को सुलझाने की पहल की है। प्रदेश सरकार पांच एकड़ तक की जमीन के मालिक किसानों को 2500 रुपए देगी। भले ही यह रकम बहुत कम है फिर भी शुरूआत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/punjab-commendable-initiative-on-parali/article-11140"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-11/parali.jpg" alt=""></a><br /><p>आखिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद पंजाब सरकार ने पराली न जलाने वाले किसानों को वित्तीय मदद देने की घोषणा करते हुए इस समस्या को सुलझाने की पहल की है। प्रदेश सरकार पांच एकड़ तक की जमीन के मालिक किसानों को 2500 रुपए देगी। भले ही यह रकम बहुत कम है फिर भी शुरूआत अच्छी है। हालांकि पंजाब व हरियाणा की सरकार ने पराली को समेटने वाले कृषि यंत्रों पर सब्सिडी भी मुहैया करवाई थी, गांवों में जागरूकता रैलियां व कृषि विभाग ने जागरूकता कैंप लगाकर भी पराली समस्या से निपटने की पहल की थी।</p>
<p>प्रदेश सरकार ने केंद्र से प्रति क्विंटल पराली 100 रुपए मांगे थे, यदि यह निर्णय धान की कटाई से दो माह पूर्व लिया जाता तब इसके अच्छे परिणाम आ सकते थे। पराली जलाने से दिल्ली सहित हरियाणा के चार पांच जिलों की हवा बहुत खतरनाक हो जाती है। हरियाणा के कई जिलों में स्कूलों में छुट्टियां भी करनी पड़ी हैं। यदि केंद्र सरकार राज्य की आर्थिक मदद करे तब कई अन्य राज्य भी पंजाब जैसी घोषणा कर सकते हैं। पंजाब सरकार की योजना के पीछे यह तर्क भी वाजिब है कि कि छोटे किसानों पर पराली को समेटने के लिए खर्च का बोझ नहीं पड़ना चाहिए। कोई भी समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान नहीं हो सकता। नि:संदेह सही समय पर काम करने की इच्छा शक्ति होनी चाहिए।</p>
<p>केंद्र व राज्य सरकारें लोगों के स्वास्थ्य के लिए अरबों रुपए का बजट आरक्षित रखती हैं। यदि बजट का छोटा सा हिस्सा किसानों पर खर्च किया जाए तब यह ‘एक पंथ-दो काज’ वाली बात होगी। दरअसल कृषि पहले ही घाटे का सौदा बन चुकी है और विशेष तौर पर छोटे किसान पराली समेटने के लिए महंगी मशीनरी खरीदने में असमर्थ हैं। किसानों को वित्तीय मदद देना ही पराली की समस्या का एकमात्र समाधान है। कुछ प्राईवेट संस्थाएं भी पराली का समाधान निकालने के लिए प्रयत्नशील हैं। सरकार इन संस्थाओं के साथ मिलकर समस्या का का स्थायी समाधान निकाल सकती हैं। बेहतर हो यदि केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय मदद देकर किसानों के बोझ को हलका करे। मुकदमे दर्ज करने से समस्या का समाधान संभव नहीं, बल्कि यह किसानों पर अत्याचार होगा। कृषि की स्थिति सरकारों से छिपी हुई नहीं। खाद, बीज व कीटनाशकों की कीमतों में वृद्धि होने से किसानों पर बोझ बढ़ा है। यही बेहतर पहल होगी यदि वातावरण की शुद्धता में पूरा देश अपनी जिम्मेदारी निभाए और अपना आर्थिक योगदान दे।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 15 Nov 2019 15:08:35 +0530</pubDate>
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                <title>स्त्री सम्मान को लेकर शिक्षक की अनूठी पहल</title>
                                    <description><![CDATA[सामान्य भारतीय जीवन में स्त्री को बहुत सम्मान से देखा जाता रहा है। यहां तक कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी का सम्मान और पूजन होता हैं, वहां देवता भी निवास करते हैं। हमारे भारतीय समाज में तो कन्याओं को साक्षात्तदेवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती रही है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/teachers-unique-initiative-to-honor-women/article-6198"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सामान्य भारतीय जीवन में स्त्री को बहुत सम्मान से देखा जाता रहा है। यहां तक कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी का सम्मान और पूजन होता हैं, वहां देवता भी निवास करते हैं। हमारे भारतीय समाज में तो कन्याओं को साक्षात्तदेवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती रही है। कोई भी समाज अथवा कोई भी काल कभी भी सौ प्रतिशत आदर्श नहीं हो सकता हंै, किंतु वैसा बनने का प्रयत्न करने में कोई बुराई नहीं है। अनादि काल से हमारी सांस्कृतिक परंपरा में ऐसी तमाम बातें रही है, जिन्होंने मानव मन की विकृतियों को मनोवैज्ञानिक ढंग से ठीक करने का कार्य किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकांश भारतीय पर्व एवं त्योहार मानव के मन एवं प्रकृति से जुड़े हैं। मानव जीवन में जिन सोलह संस्कारों की कल्पना रखी गई, उनका भी अपना वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधार है। रक्षा बंधन, भाई दूज, कन्या पूजन, संयुक्त परिवार व्यवस्था, विवाह संस्कार, करवा चौथ, कजरी तीज यह सब परंपराएं मानव के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देने वाली परंपराएं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में कन्या पूजन हमारी सनातन परम्परा का एक अंग है। हजार-बारह सौ वर्षों की गुलामी के कालखंड के दौरान भारतीय जनमानस संघर्षरत रहा। इसका प्रभाव हमारी विभिन्न सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं पर भी पड़ा। काल के प्रवाह में कन्या पूजन की परंपरा कुछ शिथिल हुई, विज्ञापनों और टीवी चैनलों ने स्त्री का विकृत स्वरूप दर्शाना शुरू किया, पश्चिमी देशों की आधुनिकता सिर चढ़ी तो परिणाम सब देख ही रहे हैं, भुगत भी रहे हैं। कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।</p>
<p style="text-align:justify;">व्यक्ति का देखने और सोचने का नजरिया यदि ठीक होगा तो वह कोई भी गलत कार्य करने से पहले सौ बार सोचेगा। नारी के प्रति, लड़कियों के प्रति दृष्टि में सकारात्मक बदलाव लाया जाए तो इस प्रकार की घटनाओं पर एक सीमा तक नियंत्रण किया जा सकता है और उसका उपाय है विद्यालय और गली मोहल्लों में कन्या पूजन जैसे सार्वजनिक आयोजन।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आयोजन नारी सम्मान की दिशा में एक बड़ी लाइन खींचने का प्रयास हैं। मनुष्य और पशु में बड़ा अंतर भावनाओं और समझ का ही है। आदिकाल से हम गाय को मां मानते हैं तो वैसी ही पवित्र सोच गाय के प्रति जन सामान्य की बन गयी। ऐसे ही लगातार कन्या पूजन कार्यक्रमों के आयोजनों से ही स्त्री के प्रति, सहपाठी छात्राओं के प्रति भी अच्छी दृष्टि बनने लगेगी। तब ही ‘मातृवत परदारेषु पर द्ब्येर्षु लोश्ठ्वत’ चरितार्थ होगा, ये सब घटनाएं रुकेगी। ”मातृवत परदारेषु” यदि सिद्धांत है तो कन्या पूजन उसका प्रायोगिक स्वरूप है। कन्या पूजन के इस एक कार्यक्रम से कई संदेश मिलेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी ही सोच है राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक संदीप जोशी की, जो पिछले कई वर्षों से स्कूल में ”कन्या पूजन कार्यक्रम” का आयोजन कर समाज में बालिका सम्मान व शिक्षा का संदेश देने का काम कर रहे हैं। शिक्षक संदीप जोशी बताते है कि उन्होंने अपने स्कूल में कुछ वर्ष पूर्व कन्या पूजन कार्यक्रम का आयोजन प्रारम्भ किया था, जो कि आज सभी के सहयोग से प्रदेश के 18 जिलों में 500 से अधिक विद्यालयों में बिना किसी सरकारी आदेश व सरकारी बजट के इस कार्यक्रम का सफल आयोजन किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनका मानना है कि स्त्री के पूज्या भाव का जागरण होने से समाज की दृष्टि बदलेगी और इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लगेगी। कन्या पूजन का कार्यक्रम केवल छात्रों को ही संस्कारित नहीं करता है, वरन उन छोटी बच्चियों के मन में भी आत्मविश्वास का संचार करता है। उनका मानना है कि समाज में व्यापक परिवर्तन का केंद्र विद्यालय ही बनेंगे। शिक्षण केवल वृत्ति नहीं है, एक दायित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एक माध्यम है समाज और देश के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का। इसलिए निरंतर कुछ न कुछ अच्छा करने का प्रयास जारी रहना ही चाहिए। सामान्य अनुभव की बात यह भी है कि हम किसी भी कार्य अथवा विषय में जितना गहरा उतरते हैं, उससे संबंधित नए विचार, नए प्रयोग अपने आप हमारे सामने आते रहते हैं। इसमें आध्यात्मिकता के भाव भी देख सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने काम में तल्लीन होना, अपने कार्य के साथ एकाकार होना, उसी में डूब जाना, प्रतिपल उसी का चिन्तन, उसी दिशा में बढ़ना, यहां तक कि उस काम का पर्याय बनना, यह भी ईश्वर की अनुभूति करने जैसा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Tue, 09 Oct 2018 13:50:46 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बैंकों का विलय करने की सकारात्मक पहल</title>
                                    <description><![CDATA[इंफा पिछली सरकार द्वारा सरकारी बैंकों का घाटा कम करने के लिए उनका विलय करने का निर्णय सही दिशा में उठाया गया कदम है। भरतीय स्टेट बैंक के पांच अनुषंगी बैंकों के विलय से इस बैंक की संपत्ति 37 ट्रिलियन डालर की हो गयी है और उससे देश का सबसे बडा व्यावसायिक बैंक मजबूत हुआ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/positive-initiative-to-merge-banks/article-4792"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/bank.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>इंफा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">पिछली सरकार द्वारा सरकारी बैंकों का घाटा कम करने के लिए उनका विलय करने का निर्णय सही दिशा में उठाया गया कदम है। भरतीय स्टेट बैंक के पांच अनुषंगी बैंकों के विलय से इस बैंक की संपत्ति 37 ट्रिलियन डालर की हो गयी है और उससे देश का सबसे बडा व्यावसायिक बैंक मजबूत हुआ है। बैंकों के विलय से बैंकों की स्थिति मजबूत होगी, उनका घाटा कम होगा और फिजूलखर्ची पर रोक लगेगी और एक सकारात्मक वातावरण बनेगा। इस बात की अटकलें लगायी जा रही हैं कि इलाहाबाद बैंक का पंजाब नैशनल बैंक के साथ विलय किया जा रहा है और सरकार बैंक आॅफ बडौदा, ओरिएंटल बैंक आॅफ कामर्स, सेन्ट्रल बैंक आॅफ इंडिया और आईडीबीआई बैंक के विलय के बारे में भी विचार कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">
इलाहाबाद बैंक और पंजाब नेशनल बैंक का विलय इस आधार पर उचित बताया जा रहा है कि इलाहाबाद बैंक पूर्वी क्षेत्र में और पंजाब नेशनल बैंक उत्तरी क्षेत्र में अच्छा कारोबार कर रहे हैं और यदि उक्त चार सरकारी बैंकों का भी विलय किया गया तो उनकी संयुक्त परिसंपत्ति 16.18 ट्रिलियन रूपए होगी और वे वित्तीय दृष्टि से मजबूत बनेंगे। सरकार द्वारा बैंकों के विलय का प्रस्ताव न केवल स्टेट बैंक आफ इंडिया के विलय से प्रभावित है अपितु इससे इन सरकारी बैंकों का अशोध्य ऋण भी कम होगा और उनकी संचालनात्मक कार्य कुशलता बढेगी किंतु कुछ विशेषज्ञों की राय इससे भिन्न है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व अध्यक्ष केसी चक्रवर्ती का कहना है कि अकुशल बैंकों का कुशल बैंकों के साथ विलय से आवश्यक नहंी है कि उनमें कार्य कुशलता आए और उत्पादकता बढे। बैंकों का निजीकरण कुछ सीमा तक किया जा सकता है। जिसके अंतर्गत प्रबंधन पर नियंत्रण सरकार और निजी साझीदार दोनों का रहे किंतु बैंकों की बहुमत हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को देने के बारे में संदेह व्यक्त किया गया कि वे प्राथमिक क्षेत्र ऋण देने के मानदंडों का पालन न करें। इस बात से इंकार नहंी किया जा सकता है कि सरकारी क्षेत्र के बैंक संकट का सामना कर रहे हैं, उनका पुनरूत्थान किए जाने की आवश्यकता है और उनहें आर्थिक दृष्टि से सक्षम बनाया जाना चाहिए। अधिकतर अर्थशास्त्री और बैंक विशेषज्ञों का मानना है कि विलय इस दिशा में पहला संभावित कदम है। इसके साथ ही बैंकों के प्रबंधन को भी पेशेवर बनाया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। सरकारी बैंकों को पेशेवर दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इस दिशा में पहला कदम बैंकों के बोर्डों में मंत्रालय के प्रतिनिधि या अधिकारियों की नियुक्ति के बजाय बैंक उद्योग का अनुभव रखने वाले पेशेवर नियुक्त किए जाने चाहिए। व्यापक दृष्टिकोण से उद्योग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। बैंकों को अधिक स्तंत्रता देने के मुद्दे पर विशेषज्ञों द्वारा अनेक बार चर्चा की गयी है और राजनेताओं द्वारा हस्तक्षेप के बिना बैंकों को स्वतंत्रता देना एक स्वागत योग्य कदम है। किंतु यह संभव नहंी है। सरकार को कठोर कदम उठाने होंगे साथ ही बैंकों के शीर्ष स्तर पर कडी निगरानी रखनी होगा ताकि बैंक प्रबंधन बेईमान व्यवसाइयों के जाल में न फंसे।<br />
वस्तुत: बडे ऋणों को मंजूरी देने का निर्णय शीर्ष स्तर पर किया जाना चाहिए और यदि इस ऋण का भुगतान नहंी किया जाता है तो उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाना चाहिए। वर्तमान में यह देखा गया है कि छोटे व्यवसाई अपने ऋण का भुगतान कर देते हैं किंतु बडे व्यवसाई कई बार ऐसा नहंी करते हैं। बडे व्यवसाई कई बार ऋण ली गयी राशि को अन्य प्रयोजनों के लिए खर्च करते हैं जिससे बैंकों को नुकसान होता है। बडे चूककतार्ओं की सूची को सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है। समय आ गया है कि ऐसे चूककतार्ओं की सूची सार्वजनिक की जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में जारी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष मार्च में सकल गैर-निष्पादनकारी आस्तियों का अनुपात बढकर 11.6 प्रतिशत हो गया है। किंतु आशा की जाती है कि दिवालियापन कोड और अशोध्य ऋणों के समाधान के लिए त्वरित मानदंड निर्धारित करने जैसी पहलों से अल्पकाल में संकट के बावजूद बैंकों में वित्तीय स्थिरता आएगी। भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गर्वनर विरल आचार्य के अनुसार वर्तमान में सरकार ने संकट से जूझ रहे सरकारी बैंकों के लिए शुरू किए गए पुर्न पंूजीकरण कार्यक्रम से इस पूरे क्षेत्र में मजबूती आनी चाहिए। दूसरी ओर समाज के एक वर्ग को बैंकों का पैसा हजम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। पेशेवरता अपनायी जानी चाहिए और यह स्पष्ट संदेश दिया जना चाहिए कि बैंकों का ऋण वापस किया जाएगा चाहे इसके लिए कंपनी की संपत्ति या उसके निवेशकों की संपत्ति को बेचना ही क्यों न पडे।</p>
<p style="text-align:justify;">
यदि सरकार चाहे तो एक दो साल में बैंकों की स्थिति में बदलाव आ सकता है। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में आशा व्यक्त की गयी है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वर्ष 2020 तक त्वरित सुधारात्मक ढ़ांचा अपनाए जाने से स्थिति में सुधार आएगा। वर्तमान में ऋण देने के कार्य में आए ठहराव को दूर किया जा सकता है किंतु इसके लिए आवश्यक है कि कुछ अशोध्य ऋणों की वसूली हो जिसके लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए। साथ ही बैंकों द्वारा यह स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि सरकारी पैसे को हजम नहंी किया जा सकता है और समय पर बैंकों का पैसा लौटाया नहंी गया तो ऐसे चूककतार्ओं को कडा दंड दिया जाएगा। कुल मिलाकर बैंकिंग प्रणाली में विश्वास बहाल किए जाने की आवश्यकता है।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/positive-initiative-to-merge-banks/article-4792</link>
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                <pubDate>Thu, 12 Jul 2018 02:14:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण संरक्षण को परम्पराओं से जोड़ना सार्थक पहल</title>
                                    <description><![CDATA[विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा में कमोबेस सभी जगह गिरावट देखी जाने लगी है डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा राजनीति के अखाड़े बने देश के विश्वविद्यालयों की दशा और दिशा के संदर्भ में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की पहल निश्चित रुप से ताजी हवा का झोंका है। देश की उच्च शिक्षा और खासतौर से विश्वविद्यालयों के हालातों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/meaningful-initiative-linking-environment-protection-to-traditions/article-4758"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/arical.jpg" alt=""></a><br /><h2>विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा में कमोबेस सभी जगह गिरावट देखी जाने लगी है</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति के अखाड़े बने देश के विश्वविद्यालयों की दशा और दिशा के संदर्भ में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की पहल निश्चित रुप से ताजी हवा का झोंका है। देश की उच्च शिक्षा और खासतौर से विश्वविद्यालयों के हालातों को देखते हुए राजस्थान के राजभवन से प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को जिस तरह का संदेश दिया गया है वह निश्चित रुप से आज की आलोचना-प्रत्यालोचना और राजभवन को सियासी नजरिएं से देखते चहुंऔर कमियां ढंूढ़ते बुद्धिजीवियों के लिए भी किसी तमाचे से कम नहीं माना जा सकता। दरअसल देश के विश्वविद्यालयों की अध्ययन-अध्यापन और शोध संदर्भ की स्थिति से कोई अनभिज्ञ नहीं है। विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा में कमोबेस सभी जगह गिरावट देखी जाने लगी है। शोध और अध्ययन कहीं पीछे छूट गया है।</p>
<h2>दुनिया के शैक्षणिक संस्थानों की सूची में  हमारे विश्वविद्यालयों का नाम दूर तक दिखाई नहीं देता हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के शैक्षणिक संस्थानों की सूची में ढूंढ़ने पर भी हमारे विश्वविद्यालयों का नाम दूर तक दिखाई नहीं देता हैं। कभी दुनिया के 100 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में नाम ढूंढते रह जाते हैं तो कहीं दो सौ की सूची में भी तलाश बनी रहती है। यह सब तो तब है जब विश्वविद्यालय एक तरह से स्वतंत्र है। हांलाकि स्वतंत्रता या यों कहें कि स्वायत्तता का दुरुपयोग भी आम होता जा रहा है। अभी पिछले दो तीन सालों में जिस तरह से देश के नामचीन विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी जुमलों और नारों और इनके समर्थन में सियासी नोटंकी से सारा देश वाकिफ है। आखिर शिक्षण संस्थान अपनी गरिमा बनाए रखने में भी सफल नहीं हो पाते हैं या यों कहें कि स्वायत्तता के नाम पर देश विरोधी गतिविधियां खुलेआम की जाती हो तो इससे अधिक दुर्भाग्यजनक क्या होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में यह स्थितियां चिंतनीय और समूचे देश को चेताने वाली है। यदि स्वतंत्रता के नाम पर देश विरोधी गतिविधियां की जाती हैं तो उसे किसी भी वुद्धिजीवी या राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक रोटियां सेंकने के प्रयास किए जाते हैं तो इसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। विश्वविद्यालयों के माहौल की तो यह स्थितियां हो गई कि पहले कुलपति बनने या प्रशासनिक पद पाने के लिए जोड़ तोड़ में लगे रहना और इस सबसे परे नए कुलपति से गोटियां नहीं बैठती हैं या हित नहीं सधते है तो दूसरे दिन से ही शिकायतों व विरोध की राह पकड़ लेना आम होता जा रहा है। इन सबसे विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल कहीं खो जाता है। यह सभी विश्वविद्यालयों के लिए लागू नहीं होता पर कमोबेस इस तरह की स्थिति देश के अधिकांश स्थानों पर आम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने राजस्थान के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को विश्वविद्यालयों के स्तर को सुधारने के लिए 12 सूत्र दिए हैं। इन 12 सूत्रों में खासबात यह है कि राज्यपाल कल्याण सिंह ने विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन, गुणवतापूर्ण शोध पर जोर दिया है वहीं पर्यावरण, सामाजिक संवेदनशीलता, छात्रों की व्यवस्थित जीवन शैली साथ ही सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की दिशा में भी कार्य योजना बनाकर आगे आने को कहा है। आखिर देश का भविष्य भावी पीढ़ी यानी की युवाओं के हाथों में ही है और उनको अच्छा शैक्षणिक माहौल, उच्च संवेदनशीलता, पर्यावरण की समझ और क्रियान्वयन, सामाजिक सरोकार के तहत स्मार्ट विलेज जैसी गतिविधियों से जुड़कर सहभागी बनने, जैसी 12 सूत्रों में उन सभी बिन्दुओं का समावेश किया गया है जो बदलते सामाजिक ताने बाने में आज की आवश्यकता बनता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यपाल की यह पहल इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि राजभवनों पर आए दिन केवल और केवल केन्द्र के इशारों पर राजनीतिक निर्णय करने के आरोप लगाए जाते रहते हैं। 12 सूत्रों में खासबात यह है कि सभी पहलूआें को नजदीक से समझा गया है और उसी के आधार पर यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी समग्र रुप से हालातों को सुधारने की संदेश हैं। छात्रों पर कक्षाएं गोल करने के आरोप लगते रहते हैं पर शिक्षकों के भी कक्षाएं गोल करना किसी से छुपा नहीं होने के कारण ही बायोमोट्रिक उपस्थिति की बात की गई है। शोध कार्यों की गुणवत्ता पर जोर दिया जाना तो खैर पहली शर्त और आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">खासबात यह है कि राजस्थान के राज्यपाल ने 12 सूत्र भेजकर औपचारिकता पूरी नहीं की हैं अपितु इसके प्रति गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि कुलपतियों की समन्वय समिति की बैठक का इन 12 सूत्रों पर रिव्यू किया जाना स्थाई एजेण्डा का हिस्सा बनाया गया है। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह की यह पहल निश्चित रुप से सराहनीय है। अन्य राज्यों के महामहिमों द्वारा भी इस तरह के नवाचार निश्चित रुप से किए जाते होंगे। सियासी चालों, राजभवनों पर आरोपों-प्रत्यारोपों से परे इस तरह के नवाचारों की सराहना की जानी चाहिए ताकि सियासी राजनीति से परे होने वाले इस तरह के कार्य जगजाहिर हो, इनका इम्फेक्ट सामने आ सके।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Jul 2018 05:47:53 +0530</pubDate>
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                <title>गंगा स्वच्छता: पहल ही नहीं, सख्ती भी आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[सेंट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सफाई पर विभिन्न परियोजनाओं के मद में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं। फिर आज क्या हम इस स्थिति में पहुंचे है कि गंगा को स्वच्छ नदी का दर्जा दे सकें? विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण जैसी संस्था […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ganga-hygiene-not-only-initiative-but-also-strictly-required/article-2412"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/ganga1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सेंट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा सफाई पर विभिन्न परियोजनाओं के मद में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं। फिर आज क्या हम इस स्थिति में पहुंचे है कि गंगा को स्वच्छ नदी का दर्जा दे सकें? विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण जैसी संस्था गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए समय-समय पर चिंतित और प्रयासरत है,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन दुर्भाग्यवश सामाजिक और राजनीतिक सरोकार की कमी की वजह से गंगा अभी भी अस्वच्छ है। कागजी आंकड़ों पर भी आज तक हमारी सरकारें यह बाताने को तैयार नहीं है कि गंगा कितनी स्वच्छ और निर्मल हुई?</p>
<p style="text-align:justify;">गंगा मंत्रालय का गठन बस दिखावा और छलावा ही साबित हो रहा है। सबसे बड़ी बात, जब तक गंगा की सफाई को लेकर सामाजिक सरोकारिता से जुड़े लोग और सामान्य जनमानस कदम उठाता प्रतीत नहीं होगा, गंगा की पूर्ण रूप से सफाई नहीं हो सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार पुन: गंगा को निर्मल बनाने के लिए राष्टÑीय हरित प्राधिकरण ने फैसला लिया है कि गंगा में हरिद्वार से उन्नाव के बीच कचरा फैंकने वालों पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाए, लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि जुर्माना लगाने का यह खेल नया तो नहीं है! जुर्माना पहले भी लगता आया है, लेकिन किसी सरकार या संस्था ने यह जहमत नहीं उठाई कि कितना जुर्माना वसूला गया और इस कदम से गंगा स्वच्छ कितनी हुई। यह आज तक पता नहीं चला।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियों पर हमारा कल निर्भर करता है, जिसके प्रति हमारे समाज में शनै:-शनै: जागरूकता फैल रही है, लेकिन बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चिंता व्यक्त की थी, वह यह दिखाती है कि केंद्र की राजग सरकार नदियों के संरक्षण की दिशा में सचेत है।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियों के प्रति हमें और हमारे समाज को ही नहीं, बल्कि कल-कारखानों को संचालित करने वालों को भी स्वच्छ बनाए रखने की दिशा में कार्य करना होगा, कुछ स्वार्थ पूर्ति की खातिर आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नर्मदा के उद्गम स्थल से बीते दिनों देश के प्रधानमंत्री ने नदियों के भविष्य को लेकर जो चिंता की लकीर खींची थी, उससे लगता है कि अब वक्त की मांग है कि समाज द्वारा नदियों को बचाने के लिए सार्थक विचार-विमर्श हो।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ वर्ष पूर्व केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा था कि देश के लगभग नौ सौ से ज्यादा कस्बों और शहरों का अमूमन 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। फिर यह देश का दुर्भाग्य है कि देश आने वाले समय की चिंता छोड़कर मात्र वर्तमान दौर की लड़ाई में आंखें मूंदकर आगे बढ़ रहा है। सबसे बड़े स्तर पर कारखाने और मिल नदियों की जान के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह हमारे समाज के समक्ष विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिन नदियों को हम मां का दर्जा देते हैं, उन्हें ही हमने हमने मल-मूत्र विसर्जन का अड्डा बनाकर रख दिया है। नदियों में सीवरेज छोड़ने की वजह से नदियां आज नालों के रूप में रूपांतरित होती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर देश की 70 फीसद नदियां प्रदूषित हैं और मरने के मुहाने पर खड़ी हैं, फिर इनको बचाने के लिए धरती पर एक बार फिर किसी को भागीरथ बनना होगा, और यह काम हमारे नीति-नियंता से अच्छा कोई और नहीं कर सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार फिर राष्टÑीय हरित प्राधिकरण का यह फैसला काफी सराहनीय है कि गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए 100 मीटर के क्षेत्र को ‘नो डेवलपमेंट जोन’ घोषित कर दिया जाए। यह घोषणा तब और अधिक कारगर सिद्ध होगी, जब स्थानीय प्रशासन और सरकारी रहनुमाई तंत्र के लोग अपने हितों को त्याग दें। इसलिए सर्वप्रथम आवश्यकता है कि सामाजिक सरोकार की दृष्टि को पैदा करना, जो धीरे-धीरे समाज से स्वहित के कारण गुम होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ हरिद्वार से उन्नाव के मध्य गंगा नदी के किनारे 500 मीटर तक कचरा फैंकने पर 50 हजार का जुर्माना ठोकने की बात कही गई है, लेकिन हमारे देश में मात्र अगर फरमान जारी होने पर लोग सुधर जाते, तो आज देश की स्थिति कुछ ओर होती। इसलिए सर्वप्रथम समाज के लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेवारियों के प्रति वफादार होना पड़ेगा, तभी कुछ सकारात्मक पहल अंजाम तक पहुंच सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-महेश तिवारी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Tue, 18 Jul 2017 01:48:45 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सरकार स्थायी हल के लिए करेगी पहल: निकाय मंत्री</title>
                                    <description><![CDATA[बिना नक्शे के बनी इमारतों पर सिद्धू का शिकंजा   नाजायज निर्माण को यकमुश्त छूट लाने की नीति अधीन लाने की योजना नाजायज निर्माण के लिये जिम्मेवार अधिकारियों को छोड़ा नहीं जाएगा चंडीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)। सरकार का मकसद किसी को भयभीत करना नहीं बल्कि उलझे मसलों का उचित हल ढूंढकर इनका निपटारा करना है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h1 style="text-align:center;">बिना नक्शे के बनी इमारतों पर सिद्धू का शिकंजा</h1>
<p> </p>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>नाजायज निर्माण को यकमुश्त छूट लाने की नीति अधीन लाने की योजना </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>नाजायज निर्माण के लिये जिम्मेवार अधिकारियों को छोड़ा नहीं जाएगा</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> सरकार का मकसद किसी को भयभीत करना नहीं बल्कि उलझे मसलों का उचित हल ढूंढकर इनका निपटारा करना है। यही पहुंच ईमारतों के निर्माण नियमों की उल्लंघना के मामले में अपनाई जायेगी। यह शब्द मीडिया को नाजायज ईमारतों के निर्माण के मामले संबंधी बात करते हुए स्थानीय निकाय मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने कही।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री नीति को पास करेंगे</h3>
<p style="text-align:justify;">सिद्धू ने कहा कि पंजाब सरकार नाजायज निर्माण के मामलों में यकमुश्त छूट लाने की नीति बना रही है जिस संबंधी शीघ्र ही कैबिनेट नोट लाकर मुख्यमंत्री के आगे स्वीकृति के लिये पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विभाग ऐसी नीति तैयार कर रहा है जिससे किसी भी शहरी को कोई भय या डर न हो और वह इस नीति तहत एक अवसर अवश्य देगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति में यह अवश्य देखा जायेगा कि कितना नाजायज निर्माण हुआ और यदि बड़ी अनियमिततांए सामने आती हैं तो कार्रवाई भी की जायेगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">लुधियाना में सबसे ज्यादा मामले</h3>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय निकाय मंत्री ने इससे पूर्व इस संबंधी विभाग के अधिकारियों से बैठक की। उन्होंने कहा कि इस मामले को विभाग में बहुत गंभीरता के साथ दे रहें हैं क्योंकि राज्यभर में से शहरों में नाजायज ईमारतों के निर्माण की शिकायतें आ रही हैं। उन्होंने कहा कि अकेले 5 बड़े शहरों लुधियाना, अमृतसर, जालंधर, पटियाला एवं बठिंडा में से 300 शिकायतें हैं और अकेले लुधियाना में 85 शिकायतें आयी है जहां रिहायशी एवं व्यापारिक ईमारतों का नाजायज निर्माण हुआ है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कानून अनुसार होगी कार्रवाई</h3>
<p style="text-align:justify;"><em>सिद्धू ने आगे कहा कि जिस अधिकारी के आधिकार क्षेत्र में नाजायज ईमारतों के निर्माण का मामला सामने आया उस विरूद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि जिसने शहरी तरफ से सांझी या सरकारी जगह पर नाजायज कब्जा कर कोई निर्माण किया तो उस विरूद्ध कानून अनुसार बनती कार्रवाई की जायेगी।</em></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/punjab/government-will-take-initiative-for-permanent-solution-sidhu/article-761</link>
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                <pubDate>Thu, 01 Jun 2017 07:57:31 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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