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                <title>Challenge - Sach Kahoon Hindi</title>
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                            <item>
                <title>केजरीवाल के सामने पिछली जीत का इतिहास दोहराने की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[पिछले आम चुनाव में पंजाब में चार सीटें जीतने वाली आप इस बार एक पर ही सिमट गई। केजरीवाल की पार्टी में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को छोड़ दिया जाए तो संभवत: ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी पूरी दिल्ली पर मजबूत पकड़ नजर आती हो ।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/kejriwal-has-a-challenge-to-repeat-the-history-of-previous-victories/article-12429"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/delhi-assembly-elections.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">दिल्ली विधानसभा चुनाव: केजरीवाल का जादू इस बार चलेगा या नहीं इस पर पूरे देश की निगाहें</h2>
<h2 style="text-align:center;">(Delhi Assembly Elections 2020)</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h3>राजनीतिक पंडितों का मानना- पिछला करिश्मा दोहराना मुश्किल</h3>
<h3></h3>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h3>दिल्ली में आठ फरवरी को मतदान और 11 फरवरी को मतगणना होगी</h3>
</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> अगले माह होने वाले (Delhi Assembly Elections 2020) दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी(आप) के राष्ट्रीय संयोजक एवं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समक्ष अपना सबसे मजबूत किला बचाने की प्रबल चुनौती है। पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतने वाले केजरीवाल का जादू इस बार चलेगा या नहीं इस पर पूरे देश की निगाहें हैं। केजरीवाल अपने पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान विशेषकर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों को गिनाते हुए इस बार भी पूरे आत्मविश्वास में हैं जबकि राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पिछला करिश्मा दोहराना मुश्किल नजर आ रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जब भाजपा तीन पर सिमटी थी</h3>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही ‘आप’ का गठन हुआ था और उस चुनाव में दिल्ली में पहली बार त्रिकोणीय संघर्ष हुआ जिसमें 15 वर्ष से सत्ता पर काबिज कांग्रेस 70 में से केवल आठ सीटें जीत पाई जबकि भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) सरकार बनाने से केवल चार कदम दूर अर्थात 32 सीटों पर अटक गयी। ‘आप’ को 28 सीटें मिली और शेष दो अन्य के खाते में रहीं। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के प्रयास में कांग्रेस ने ‘आप’ को समर्थन दिया और केजरीवाल ने सरकार बनाई।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">लोकपाल को लेकर दोनों पार्टियों के बीच ठन गई और केजरीवाल ने 49 दिन पुरानी सरकार से इस्तीफा दे दिया ।</li>
<li style="text-align:justify;">इसके बाद दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा ।</li>
<li style="text-align:justify;"> फरवरी 2015 में ‘आप’ने सभी राजनीतिक पंडितों के अनुमानों को झुठलाते हुए 70 में से 67 सीटें जीतीं।</li>
<li style="text-align:justify;">भाजपा तीन पर सिमट गई जबकि कांग्रेस की झोली पूरी तरह खाली रह गई ।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">यह चुनाव का दारोमदार पूरी तरह से केजरीवाल के कंधों पर</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">दिल्ली में 2015 ‘आप’ को मिली भारी जीत के समय केजरीवाल के साथ कई दिग्गज नेता थे</li>
<li style="text-align:justify;">किंतु सत्ता में आने के बाद वे एक एक करके किनारे कर दिए गए ।</li>
<li style="text-align:justify;">इनमें योगेंद्र यादव , प्रशांत भूषण और आनंद कुमार प्रमुख थे।</li>
<li style="text-align:justify;">पार्टी के एक अन्य प्रमुख चेहरा कुमार विश्वास पार्टी में तो हैं किंतु एक तरह से बनवास ही भुगत रहे हैं ।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">‘आप’ ने दिल्ली विधान सभा चुनाव और 2014-2019 के आम चुनावों के अलावा इस दौरान विभिन्न राज्य विधानसभा चुनावों में भी हिस्सा लिया। पंजाब विधानसभा को छोड़ दिया जाए तो उसकी झोली खाली ही रही बल्कि उसके बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हुई । पिछले आम चुनाव में पंजाब में चार सीटें जीतने वाली आप इस बार एक पर ही सिमट गई। केजरीवाल की पार्टी में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को छोड़ दिया जाए तो संभवत: ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी पूरी दिल्ली पर मजबूत पकड़ नजर आती हो ।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">इस विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी को जीत दिलाने का दारोमदार पूरी तरह से केजरीवाल के कंधों पर ही है ।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">21 वर्ष से भाजपा सत्ता से बाहर (Delhi Assembly Elections 2020)</h3>
<p style="text-align:justify;">भाजपा 21 वर्ष से दिल्ली की सत्ता से बाहर है और वह इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि तथाहाल ही में 1731 कच्ची कालोनियों को नियमित करने के केंद्र सरकार के फैसले को लेकर अपना मजबूत दावा ठोंकने की बात कर रही है। पार्टी का कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली में तीनों नगर निगमों के चुनाव में राजधानी की जनता ने ‘आप’ को नकार दिया ।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;"> इस बार लोकसभा चुनाव में उसकी स्थिति पिछले आम चुनाव से भी बदतर हुई।</li>
<li style="text-align:justify;">पार्टी कांग्रेस की सक्रियता का लाभ मिलने की उम्मीद कर रही है ।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">कांग्रेस को उम्मीद इस बार बनेगी उसकी सरकार</h3>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस ने हाल ही में अपने पुराने नेता सुभाष चोपड़ा को कमान सौंपी है और वह सभी पुराने नेताओं को एकजुट कर पूरी सक्रियता से जुटे हैं और पार्टी का घोषणापत्र आने से पहले ही सत्ता में आने पर लोक लुभावने वादे करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि कांग्रेस के वोट प्रतिशत में अच्छा इजाफा होता है तो केजरीवाल के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।  पिछले साल मई में हुए आम चुनाव भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें जीतीं थी  और कांग्रेस पांच में दूसरे नंबर पर रही थी ।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">वर्ष 2014 के आम चुनाव में सभी सातों सीटों पर दूसरे नंबर पर रहने वाली ‘आप’ इस बार केवल दो पर ही दूसरे स्थान पर रही ।</li>
<li style="text-align:justify;">पिछले साल हुए आम चुनाव में कुल पड़े वोटों में से आधे से अधिक 56.50 प्रतिशत भाजपा की झोली में पड़े</li>
<li style="text-align:justify;">जबकि ‘आप’ को केवल 18.10 प्रतिशत ही मत मिले।</li>
<li style="text-align:justify;">आम चुनाव में भाजपा 70 में से 65 विधानसभा सीटों पर आगे रही थी, शेष पांच पर कांग्रेस आगे रही थी।</li>
</ul>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Jan 2020 16:36:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली ‘आप’, भाजपा व कांग्रेस के लिए बनी चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में कांग्रेस अपनी स्थिति सुधार सकती है, वह भाजपा को तो पछाड़ सकती है परन्तु आम आदमी पार्टी ने जिस तरह की राजनीतिक विचारधारा चलाई है उसके चलते अभी कांग्रेस को बहुत मेहनत की जरूरत है। दिल्ली चुनाव में इस बार आम आदमी पार्टी यदि अच्छा बहुमत हासिल कर लेती है
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/a-challenge-for-delhi-aap-bjp-and-congress/article-12418"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/a-challenge-for-delhi-aap-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली में चुनावों का बिगुल बज चुका है। इस बार भी स्थिति आप बनाम अन्य बनी हुई है। दिल्लीवासी पिछले पांच साल के आम आदमी पार्टी सरकार के कामकाज से खुश हैं। सरकार के शुरूआती सालों में अनुभव की कमी कहें या भारतीय जनता पार्टी की हार की टीस दिल्ली में माहौल बेहद तनाव का रहा। आए दिन उपराज्यपाल व दिल्ली सरकार के बीच 36 का आंकड़ा बना रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां तक कि इस राजनीतिक उठापठक के चलते आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को भी निलम्बन का सामना करना पड़ा, आम आदमी पार्टी ने कोर्ट में जाकर लंबी लड़ाई लड़ी। स्वयं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कार्यलय में सीबीआई के छापे पड़े, अरविंद केजरीवाल पर मानहानि के कई मुकदमे भी दर्ज हो गए, लेकिन एक वक्त के बाद सब शांत होने लगा, आम आदमी पार्टी धरने प्रदर्शनों से हट गई। मीडिया में रोज की तूं-तूं मैं शांत हो गई, केजरीवाल को लगा कि उनकी जुबान ने कई गलतियां की हैं सो उन्होंने माफी मांगकर विवादों का अंत कर दिया और आम आदमी पार्टी ने काम में मन लगा लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसका नतीजा आज दिल्ली के दिल में आम आदमी व अरविंद केजरीवाल के लिए खास जगह बन गई है। दिल्ली में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। बिजली सस्ती हुई, स्वास्थ्य व शिक्षा प्रबंध तो बेमिसाल हो गए। लेकिन अभी दिल्ली प्रदूषण, पानी की किल्लत व आबादी के बोझ तले है जिसके लिए अगले सालों में बहुत काम किया जाना है। अब भाजपा व कांग्रेस ने भी आम आदमी पार्टी की तरह भ्रष्टाचार सहन न करने एवं विकास में कोई भेदभाव न होने देने की बातों पर जोर देकर अपनी राजनीतिक धारा बदल ली है। लेकिन मतदाता बदलाव की पहल बनी आम आदमी पार्टी को अब कसौटी बना चुका है, लिहाजा भाजपा-कांग्रेस के लिए आप चुनौती बन चुकी है। भाजपा की छवि को यहां पहले जीएसटी व नोटबंदी का धक्का है वहीं अब नागरिकता कानून को लेकर भी बहुत गुस्से एवं सवालों का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली में मुस्लिम अल्पसंख्यक इस बार जरूर भाजपा से इसका हिसाब करेंगे। कांग्रेस के पास कुछ भी नया नहीं है उसके पास दिल्ली में स्वर्गीय पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की कांग्रेस सरकार के विकास की बातें एवं भाजपा के विरुद्ध सांप्रदायिक सकीर्णता का सहारा है। जिसके सहारे कांग्रेस यहां पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में भाजपा को ठिकाने लगा चुकी है वहीं वह महाराष्ट, झारखंड में भाजपा को किनारे कर चुकी है, कर्नाटक में भी कांग्रेस ने दम दिखाया था लेकिन वहां भाजपा ने अपनी चालों से पासा पलट लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली में कांग्रेस अपनी स्थिति सुधार सकती है, वह भाजपा को तो पछाड़ सकती है परन्तु आम आदमी पार्टी ने जिस तरह की राजनीतिक विचारधारा चलाई है उसके चलते अभी कांग्रेस को बहुत मेहनत की जरूरत है। दिल्ली चुनाव में इस बार आम आदमी पार्टी यदि अच्छा बहुमत हासिल कर लेती है तब पंजाब में अवश्य वापिस करेगी, अगर आप पंजाब में वापिसी कर लेती है तब आने वाले दशकों में आप देश के भविष्य का अहम चेहरा होगी इसमें कोई शक नहीं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jan 2020 20:43:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लैंगिक भेदभाव को मिटाने की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[स्त्रियों के अधिकार के प्रति हमारा समाज अब उतना रूढ़ नहीं रहा, जितना कछेक दशक पूर्व था। कुछ समस्याओं को छोड़ दें तो आज महिलाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। स्त्री-शिक्षा के व्यापक प्रसार ने स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के समुचित अवसर प्रदान किया है और उन्हें रूढ़िवादी विचारों से काफी सीमा तक मुक्त भी किया है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/challenge-to-eradicate-gender-discrimination/article-12365"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/gender-discrimination.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong><em>-अगर समाज में लैंगिक भेदभाव खत्म नहीं किया गया तो संयुक्त राष्ट्र के 2030 के सतत विकास लक्ष्यों के मूल में निहित महिला सशक्तीकरण और लैंगिक समानता के लक्ष्य की प्राप्ति में हम पिछड़ जाएंगे। हालांकि विश्व आर्थिक मंच ने कहा है कि दुनिया में लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए जिस गति से प्रयास किए जा रहे हैं, उस हिसाब से इस लक्ष्य को पाने में 99.5 साल लग जाएंगे!गौरतलब है कि दुनिया के 40 से भी अधिक देश अपने यहां लैंगिक समानता कानून लागू करके स्त्री-पुरुष समानता स्थापित कर चुके हैं। हालांकि कई देशों में यह एक बड़ी चुनौती के रूप में अभी भी विद्यमान है। ऐसे में भारत में लैंगिक भेदभाव की खाई घटने के बजाय बढ़ते जाना चिंता का सबब बन गया है।</em></strong></p>
<p style="text-align:justify;">
हाल ही में विश्व आर्थिक मंच द्वारा 14वीं ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स रिपोर्ट-2020 जारी की गई है। दुनिया के 153 देशों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आर्थिक सहभागिता, शिक्षा एवं स्वास्थ्य तक उनकी पहुंच और राजनीतिक सशक्तीकरण जैसे 4 मुख्य संकेतकों तथा लैंगिक भेदभाव के न्यूनीकरण की दिशा में किए जा रहे विभिन्न प्रयासों के अध्ययन के पश्चात तैयार किए गये इस सूचकांक में आइसलैंड, नार्वे, फिनलैंड और स्वीडन शीर्ष देशों में शामिल है, जबकि यमन, इराक और पाकिस्तान लैंगिक समानता के मामले में क्रमश: तीन सबसे फिसड्डी देश साबित हुए हैं। हालांकि यह रिपोर्ट भारत के संदर्भ में भी लैंगिक भेदभाव की धुंधली तस्वीर पेश करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल इस सूचकांक में भारत 2018 के मुकाबले 4 पायदान फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंच गया है। 14 साल पहले जब यह रिपोर्ट पहली बार जारी की गई थी तब भारत की स्थिति इससे बेहतर थी। उस समय हम 98वें स्थान पर थे। पिछले डेढ़ दशक में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के मामले में भारत की स्थिति सुधरी तो है, लेकिन महिला स्वास्थ्य और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत सबसे नीचे स्थान पाने वाले पांच देशों में शामिल है। राजनीतिक क्षेत्र में भारत का स्थान जहां 18 वां है, वहीं आर्थिक हिस्सेदारी में वह 149वें तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में 150वें स्थान पर पहुंच गया है!</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक सवाल का जवाब जानना समीचीन होगा कि लैंगिक समानता के मामले में आइसलैंड, फिनलैंड और नार्वे जैसे राष्ट्र ही प्रत्येक वर्ष शीर्ष पर क्यों रहते हैं?गौरतलब है कि इन राष्ट्रों की गिनती दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में भले ही नहीं होती हो, लेकिन बात जब खुशहाल और लैंगिक भेदभाव से मुक्त राष्ट्र की होती है, तो ये चुनिंदा देश संपूर्ण विश्व का नेतृत्व करते दिखाई देते हैं। क्यों न दुनिया के अन्य देश इनके अथक प्रयासों और अभिनव प्रयोगों से कुछ सीखे?आइसलैंड एक छोटा-सा यूरोपीय देश है, जिसकी जनसंख्या केवल साढ़े तीन लाख है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन लैंगिक समानता के मोर्चे पर आज वह विश्व का पथ-प्रदर्शक बन गया है। इस देश में लैंगिक भेदभाव को 88 फीसद तक खत्म किया जा चुका है, जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक है। आश्चर्य की बात है कि आइसलैंड में शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं तक स्त्री-पुरुष की समान पहुंच है। यह अपने आप में एक अनुपम उपलब्धि है। यही वजह है कि लगातार सातवें वर्ष आइसलैंड ने इस सूचकांक में शीर्ष स्थान हासिल किया है। अनोखी बात यह है कि आइसलैंड की सरकार ने पिछले साल ही कानून बनाकर एक ही काम के लिए किसी महिला को कम और पुरुष को ज्यादा वेतन देने की प्रथा को अवैध घोषित कर दिया है। भारत सहित अन्य देशों को आइसलैंड से सीखना चाहिए कि जब निश्चित समय में महिला और पुरुष से समान श्रम करवाया जाता है, तो लिंग के आधार पर उनके पगार में असमानता क्यों ?</p>
<p style="text-align:justify;">अफ्रीकी देश रवांडा अर्थव्यवस्था भले ही छोटी है, लेकिन महिला सशक्तीकरण की मिसाल के तौर उसे जाना जाता है। वह दुनिया का पहला देश है, जिसकी संसद में 64 फीसदी महिलाएं हैं!हालांकि ऐसा नहीं है कि यह परिवर्तन वहां एकाएक आ गया। 1994 के नरसंहार में लाखों महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ था। लेकिन उसके बाद महिलाओं ने खुद को संभाला और इस तरह वहां महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी भी बढ़ती चली गई। इसके बरक्स भारतीय संसद में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी देखें तो वह केवल 14.4 फीसद है। गौरतलब है कि 17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसद है, जो अब तक का सर्वाधिक है। वहीं संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का बिल अभी भी अधर में लटका हुआ है!जाहिर है, इस दिशा में भारत को अभी लंबा सफर तय करना होगा।1906 में महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देकर विश्व का पहला देश बना फिनलैंड के बारे में यह जानना रोचक है कि वहां कामकाजी महिलाओं की स्थिति बहुत ही अच्छी है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहां बच्चों के साथ उनके पिता ज्यादा समय व्यतीत करते हैं, जिससे महिलाएं अपने कामकाज पर अधिक ध्यान दे पाती हैं। फिनलैंड में स्त्री-पुरुष असमानता के अंतराल को 84.2 फीसद तक कम किया जा चुका है। बता दें कि फिनलैंड विश्व का सबसे खुशहाल राष्ट्र है। इसी महीने वहां सना मरीन को दुनिया की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि नॉर्वे के परिवहन मंत्री केतिल सोलविक ओल्सन ने गत वर्ष अपने मंत्री पद से सिर्फ इसलिए त्यागपत्र दे दिया था, क्योंकि उनकी पत्नी को अमेरिका में नौकरी मिल गई थी और वे उनके करियर को आगे बढ़ाना चाहते थे। आमतौर पर परिवार और बच्चों की परवरिश के लिए महिलाएं अक्सर ही नौकरी छोड़ती हैं, लेकिन ओल्सन ने एक मिसाल कायम की। ये उदाहरण ही इन देशों को विशिष्ट बनाते हैं। इनसे काफी कुछ सीखा जा सकता है। इस तरह के प्रयासों से लैंगिक भेदभाव खत्म करने में सफलता हासिल की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी भी राष्ट्र की सतत प्रगति के लिए लैंगिक समानता एक जरूरी तत्व है। विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करके ही राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक भारत में जेंडर गैप अभी 67 फीसद ही भरे हैं, जो चिंता की बात है। लैंगिक असमानता न केवल महिलाओं के विकास में बाधा पहुंचाती है, बल्कि किसी राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को भी गहरे तौर पर प्रभावित करती है। दरअसल किसी देश के पिछड़ेपन का एक अहम कारण स्त्रियों का समाज में उचित स्थान न मिल पाना भी रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लैंगिग समानता आज भी वैश्विक समाज के लिए एक चुनौती बनी हुई है। लैंगिक समानता को सुनिश्चित करना, महिला सशक्तीकरण को बढ़ाना और महिलाओं के खिलाफ हिंसा व भेदभाव को रोकना तथा सामाजिक पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों से निपटना आधुनिक समाज की बुनियादी जरूरत है। असंतुलित लिंगानुपात, पुरुषों के मुकाबले साक्षरता और स्वास्थ्य सुविधाओं का निम्न स्तर, पारिश्रमिक में लैंगिक विषमता जैसे कारक समाज में स्त्रियों की कमतर स्थिति को दशार्ते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में नारी की दशा में बहुत सुधार आया है। स्त्रियों के अधिकार के प्रति हमारा समाज अब उतना रूढ़ नहीं रहा, जितना कछेक दशक पूर्व था। कुछ समस्याओं को छोड़ दें तो आज महिलाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। स्त्री-शिक्षा के व्यापक प्रसार ने स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के समुचित अवसर प्रदान किया है और उन्हें रूढ़िवादी विचारों से काफी सीमा तक मुक्त भी किया है। बहरहाल समाज में लैंगिक समानता मानसिकता में बदलाव लाकर ही स्थापित किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझना होगा कि स्त्री-पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सामाजिक उत्थान में जितना योगदान पुरुषों का है, उतना ही महिलाओं का भी है। इस संबंध में हम मिजोरम और मेघालय से सीख सकते हैं, जहां बिना किसी भेदभाव के महिलाओं को समान रूप से काम दिया जाता है। महिलाओं का सम्मान तथा समूचित अवसर देकर ही लैंगिक भेदभाव से मुक्त प्रगतिशील समाज की स्थापना संभव है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><em>-सुधीर कुमार</em></strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Thu, 09 Jan 2020 20:12:58 +0530</pubDate>
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                <title>बनवास खत्म, अब ‘वचन’ पूरा करने की चुनौती</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hard-challenge-for-congress/article-7005"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/congress.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">2018 ने जाते-जाते कांग्रेस को लाईफ लाईन दे गया है। तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत उसके लिए बहुत अहमियत वाली है इससे देश की राजनीति में लम्बे समय से अपना मुकाम तलाश रहे उसके नेता राहुल गांधी को आखिरकार एक राजनेता के रूप में अपना मुकाम मिल गया है। कांग्रेस के लिये मध्यप्रदेश की जीत बहुत खास है यह भाजपा का सबसे मजबूत किला माना जाता था यहां शिवराज सिंह चौहान जैसे मजबूत नेता मुख्यमंत्री थे मध्यप्रदेश को भाजपा विकास के मॉडल के तौर पर भी प्रस्तुत करती रही है, मध्यप्रदेश में कांग्रेस पिछले तीन चुनावों से लगातार सत्ता से बाहर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2003 में उमा भारती को दिग्विजय सिंह की सरकार को उखाड़ फेकने का श्रेय दिया जाता है तब उन्होंने कुशासन, बिजली, पानी और सड़क को मुद्दा बना कर चुनाव लड़ा था और भारी बहुमत के साथ जीती थीं। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में से 58 सीटें मिली थीं, 2008 में कांग्रेस को 71 सीटें मिली थीं जबकि 2003 के चुनाव में कांग्रेस मात्र 38 सीटों पर सिमट कर रह गयी थी। 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीटें मिली हैं जोकि बहुमत से दो कम हैं दूसरी तरफ भाजपा को 109 मिली हैं पिछली बार के मुकाबले उसे 56 सीटों का नुकसान हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">वोट प्रतिशत की बात करें तो बीजेपी को 41 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत। यानी भाजपा को 0.1 प्रतिशत ज्यादा मत मिले हैं। दूसरी पार्टियों की बात करें तो इस बार बहुजन समाज पार्टी को दो सीटें समाजवादी पार्टी को एक और निर्दलियों को 4 सीटों मिली हैं। बसपा-सपा और निर्दलीयों ने कांग्रेस को समर्थन दिया है जिसके बाद कांग्रेस मध्यप्रदेश में 121 सीटों के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गयी है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने बहुत ही थोड़े समय में कांग्रेस ने अपना कायाकल्प करने का चमत्कार किया है और इसका श्रेय निश्चित रूप से राहुल गांधी को दिया जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश में लम्बे समय से कांग्रेस संगठन में भ्रम, असमंजस और अनिर्णय की स्थिति बनी हुई थी ऐसे में राहुल ने कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह की जिम्मेदारी तय करते हुये इन्हें एक साथ काम करने को प्रेरित किया। क्रेडिट कमलनाथ को भी जाता है जिन्होंने बहुत कम समय में लम्बे समय से से सुस्त पड़ चुके संगठन को सक्रिय करके पार्टी को मुकाबले में ला दिया। उन्हें 1 मई 2018 से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी थी। शिवराज के बाद मध्यप्रदेश को कमलनाथ के रूप में नया मुख्यमंत्री मिला है जीत के बाद कांग्रेस के लिये यह फैसला अपेक्षाकृत काफी आसान रहा विधायक दल की बैठक में खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए कमलनाथ का प्रस्ताव रखा गया।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने चार दशक लम्बे राजनीतिक कैरियर में यह पहला मौका है जब कमलनाथ मध्यप्रदेश की राजनीति में इस तरह से सक्रिय भूमिका में हैं। इससे पहले राज्य की राजनीति में वे अपने आप को छिंदवाड़ा तक ही सीमित किये रहे। कमलनाथ के लिये शिवराज जैसे लोकप्रिय, जमीनी और हमेशा जनता के बीच रहने वाले मुख्यमंत्री की जगह भर पाना आसान नहीं होगा। कमलनाथ की दूसरी चुनौती चुनाव अभियान के दौरान किये गये भारी-भरकम वादों पर खरा उतरना होगा चुनाव प्रचार के दौरान कमलनाथ ने ‘कर्ज माफ, बिजली का बिल हाफ और इस बार भाजपा साफ’ का नारा दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस का सबसे बड़ा चुनावी वादा किसानों की कर्जमाफी का है जिसके तहत दो लाख तक के कर्ज को माफ करने का वादा किया गया था कर्जमाफी के इस दायरे में करीब 40 लाख किसान आ रहे हैं। इस कर्जमाफी के लिये तकरीबन 56 हजार रुपए कि जरूरत पड़ेगी लेकिन इस दिशा में सबसे बड़ी परेशानी ये है कि मध्यप्रदेश के सरकारी खजाने की हालत बहुत खस्ता है राज्य पर लगभग पौने दो लाख करोड़ रुपये का कर्ज पहले से ही था ऊपर से विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से ठीक पहले निवर्तमान सरकार द्वारा 500 करोड़ रुपए के कर्ज लेने की खबरें आयीं थी। दूसरी तरफ केंद्र की भाजपा कि सरकार कभी नहीं चाहेगी कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के खाते में कर्जमाफी की उपलब्धि दर्ज हो ऐसे में मध्यप्रदेश में नवगठित सरकार को इस मामले में केंद्र की तरफ मदद की उम्मीद नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि कांग्रेस को अपने किये गये वादों को बायपास करके आगे निकलना उतना आसान भी नहीं है इस बार उसे मजबूत विपक्ष मिला है। इस्तीफा देने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रदेश की जनता ने हमें एक चौकीदार की भूमिका सौंपी है हम एक सशक्त और जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। शिवराज सिंह ने प्रदेश की सत्ता संभालने जा रही कांग्रेस को अभी से ही उसका सबसे बड़ा चुनावी वादा याद दिलाते हुये कहा है कि राहुल गांधी ने कहा था कि अगर 10 दिन में किसानों की कर्जमाफी नहीं हुई तो हम मुख्यमंत्री बदल देंगे अब कांग्रेस अपने वादे पूरे करे।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>जावेद अनीस</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 16 Dec 2018 20:33:28 +0530</pubDate>
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                <title>किकी डांस चैलेंज का बुखार</title>
                                    <description><![CDATA[इन दिनों इंटरनेट से लेकर सोशल मीडिया पर एक डांस खूब वायरल हो रहा है। यह डांस जितना मजेदार है, उतना ही जानलेवा भी साबित हो रहा है। दरअसल, इस डांस का नाम ”किकी डांस” बताया जा रहा है। इस डांस को यूट्यूब पर अब तक 8.2 करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। वहीं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/kiki-dance-challenge-fever/article-5171"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/kiki-dance.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इन दिनों इंटरनेट से लेकर सोशल मीडिया पर एक डांस खूब वायरल हो रहा है। यह डांस जितना मजेदार है, उतना ही जानलेवा भी साबित हो रहा है। दरअसल, इस डांस का नाम ”किकी डांस” बताया जा रहा है। इस डांस को यूट्यूब पर अब तक 8.2 करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। वहीं सोशल मीडिया पर लोग इस डांस को पूरा करने के लिए एक-दूसरे को चैलेंज दे रहे हैं। चैलेंज के मुताबिक, लोगों को 10 किलोमीटर प्रति घंटे से चल रहे अपने वाहन से नीचे उतर कर कनाडा के रैपर ड्रेक के ”किकी डू यू लव मी” गाने पर डांस करके वापस वाहन में बैठना होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान वाहन चला रहा या वाहन के अंदर बैठा एक अन्य व्यक्ति डांस कर रहे व्यक्ति का वीडियो बनाता है। इस तरह डांस का चैलेंज पूरा होता है। दुनिया भर के लोग चाहे वे बच्चे हो, बूढ़े हो, महिलाएं हो, या फिर जवान सब इस डांस के चैलेंज को पूरा करने के लिए उत्सुक नजर आ रहे हैं। यह जानते हुए भी कि ऐसा करना उनकी जान के लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है। दरअसल, चुनौती बन चुका यह डांस दुनिया भर की पुलिस के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। यूएई की पुलिस ने तो इस डांस को मानव इतिहास का सबसे खतरनाक डांस का करार दे दिया है। मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, फिलिस्तीन व थाईलैंड जैसे कई देशों में इस डांस पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं स्पेन, अमेरिका, मलेशिया में इस चैलेंज से खतरे का अलर्ट जारी किया है। फ्लोरिडा पुलिस ने हजार डॉलर का जुमार्ना लगाकर इस डांस को नहीं करने की अपने देश की जनता को नसीहत दी है। दुनिया के साथ-साथ इस डांस का असर भारत में भी दिखने लगा है। इस डांस ने भारत के लोगों को भी अपनी गिरफ़्त में लेना शुरू कर दिया हैं। देश के कई राज्यों में इस डांस चैलेंज को पूरा करने के चक्कर में लोग गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने सतर्कता का संदेश देते हुए ट्वीट किया है, ”फ्लोर पर डांस करें, न कि रोड पर। किकी चैलेंज मौज-मस्ती के लायक नहीं। दिल्ली की सड़कों को सुरक्षित रखें।” पिछले दिनों पंजाब में इसी तर्ज पर युवाओं ने ‘इन माय फीलिंग्स’ गाने पर डांस वीडियो बनाकर अपलोड किए।</p>
<p style="text-align:justify;">चंडीगढ़ पुलिस ने ऐसे लोगों का चालान काटने और गिरफ़्तारी तक की बात कही है। यूपी पुलिस ने भी ट्वीट में कहा है, ”डियर पेरेंट्स, किकी आपके बच्चे से प्यार करे या नहीं। लेकिन आप जरूर करते हैं। कृपया, किकी चैलेंज को छोड़कर, जिंदगी की हर चुनौतियों में उनके साथ खड़े रहें।” लेकिन, इन सब बावजूद इस डांस चैलेंज को पूरा करने की पागलपंती लोगों के सिर पर इस कदर संवार है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही है। क्षणिक आनंद के साथ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की आड़ में लोग भेड़चाल के रूप में अपनी जान का खतरा मौल लेने से जरा भी नहीं कतरा रहे हैं। समाज की यह कमजोरी ही रही है कि लोग गलत चीजों का जल्दी से अनुसरण करते है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्व बड़ी मानहानि करने की ताक में लगे रहते है। फिर वह किकी डांस चैलेंज हो या ब्लू व्हेल गेम, लोगों को अपने मोहपाश में बांधकर सीधे जिंदगी के अंतिम स्टेशन पर ले जाने से जरा भी देरी नहीं करता है। एक ओर इस तरह चलते वाहन से उतर कर डांस करना यातायात नियमों का उल्लंघन तो है ही, दूसरी ओर वीडियो बनाकर ऐसा करने के लिए दूसरे लोगों को भी प्रेरित करना उससे भी बड़ा अपराध है। ऐसे में भारत को इस डांस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। क्योंकि हम इससे पहले भी ब्लू व्हेल गेम के कारण अपने देश के कितने ही मासूमों को गंवा चुके हैं और अब किकी डांस हमारे देश के लोगों को अपना निशाना बनाए उससे पहले ”दुर्घटना से सावधानी भली” अर्थात शीघ्र कदम उठाने की आवश्यकता है। साथ ही, सरकार को विज्ञापन चलाकर ऐसा नहीं करने की चेतावनी को सार्वजनिक करने में देर नहीं करनी चाहिए।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Aug 2018 11:05:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>आरक्षण की मांग सरकार के लिए चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[मराठा समुदाय का आरक्षण को लेकर संघर्ष हिंसक रूप धारण कर गया है। महाराष्टÑ में मराठा समुदाय का आरक्षण को लेकर संघर्ष हिंसक रूप धारण कर गया है। राज्य सरकार ने 72,000 नौकरियों में मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने का ऐलान कर मामले को शांत करने की बजाय और भड़का दिया है। हिंसक भीड़ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/reservation-requisition-challenge-for-government/article-5003"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/reservation.jpg" alt=""></a><br /><h2>मराठा समुदाय का आरक्षण को लेकर संघर्ष हिंसक रूप धारण कर गया है।</h2>
<p style="text-align:justify;">महाराष्टÑ में मराठा समुदाय का आरक्षण को लेकर संघर्ष हिंसक रूप धारण कर गया है। राज्य सरकार ने 72,000 नौकरियों में मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने का ऐलान कर मामले को शांत करने की बजाय और भड़का दिया है। हिंसक भीड़ ने बसों को फूंक दिया। इस घटनाक्रम ने राजस्थान के गुज्जर आंदोलन व हरियाणा जाट आंदोलन की यादों को ताजा कर दिया है। दरअसल यह हालात बेरोजगारी की भयानकता व राज नेताओं की नाकामी व स्वार्थ का परिणाम है।</p>
<h2>राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक की नीति के कारण आरक्षण का सहारा ले रही हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">बेशक सभी योग्य युवाओं को सरकारी नौकरियां देना सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन नौकरियों का विकल्प रोजगार के अन्य अवसरों के द्वारा बनाया जा सकता है जिस पर सरकारें गौर नहीं कर रही। राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक की नीति के कारण आरक्षण का सहारा ले रही हैं जिसका परिणाम है कि जाति आरक्षण एक नियति बनता जा रहा है। देखा-देखी उच्च जातियां भी आरक्षण की मांग करने के लिए संगठित हो रही हैं।</p>
<h2>बिगड़े हुए हालात सरकारों की पैंतरेबाजी के कारण बने हैं।</h2>
<p style="text-align:justify;">आरक्षण के साथ-साथ हिंसा भी स्थायी रूप से जुड़ती जा रही है। बिगड़े हुए हालात सरकारों की पैंतरेबाजी के कारण बने हैं। दरअसल यह मामला केवल कानून व व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि इसके पीछे राजनैतिक स्वार्थ, सरकारों की नाकामी जैसे कारणों का भी विश्लेषण जरूरी है। कई राज्य सरकारों ने जाति वोट बैंक पर कब्जा करने के लिए आरक्षण मुद्दे को ऐसी हवा दी कि पचास फीसदी हद का भी ध्यान नहीं रखा।</p>
<h2>हरियाणा में जाटों के लिए आरक्षण कानूनी पेच के कारण अदालतों में फंसे</h2>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान में गुज्जरों को आरक्षण व हरियाणा में जाटों के लिए आरक्षण कानूनी पेच के कारण अदालतों में फंसे हुए हैं। दरअसल इसे राष्ट्रीय समस्या की नजर से नहीं देखा गया, इसका समाधान निकालने की बात तो दूर है। राज्य सरकारों ने अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति की। प्रत्येक पार्टी सभी जातियों के वोट बैंक को रूझाने के लिए घोषणाओं के तोहफे जरूर देती हैं। देश के राजनीतिक ढांचे व राजनीतिक ताने -बाने को रिझाने बनाने के लिए भारी नीतियां व कार्यक्रम लागू करने की सख्त आवश्यकता है।जाति संगठनों को भी चाहिए कि वह सरकारी नौकरियों को रोजगार का एकमात्र स्रोत न समझें, बल्कि अन्य कारोबार से भी लाखों युवा अपना अच्छा रोजगार चला रहे हैं। देश में ऐसी मिसालें भी हैं जब किसी ने सरकारी नौकरी छोड़कर अपनी रुचि व लगन पर आधारित काम कर लाखों-करोड़ों रूपए कमाए।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Jul 2018 05:22:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>विराट ने किया चैलेंज, मोदी बोले, कबूल है..</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली ने पीएम नरेंद्र मोदी को चैलेंज किया है। इतना ही नहीं पीएम मोदी ने भी चैलेंज स्वीकार कर लिया है और जल्द ही वो इसे पूरा भी करेंगे। दरअसल, क्रिकेट कप्तान कोहली ने खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के हम फिट तो इंडिया फिट चैलेंज के लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/pm-modi-accepts-virats-challenge/article-3776"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-05/virat.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong>भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली ने पीएम नरेंद्र मोदी को चैलेंज किया है। इतना ही नहीं पीएम मोदी ने भी चैलेंज स्वीकार कर लिया है और जल्द ही वो इसे पूरा भी करेंगे। दरअसल, क्रिकेट कप्तान कोहली ने खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के हम फिट तो इंडिया फिट चैलेंज के लिए वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इसके बाद विराट ने फिटनेस की इस मुहिम के लिए पत्नी अनुष्का शर्मा और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी के अलावा पीएम नरेंद्र मोदी को चैलेंज किया। पीएम ने भी विराट कोहली के चैलेंज को स्वीकार करते हुए ट्वीट किया- चैलेंज स्वीकार कर लिया गया है। विराट! मैं भी जल्द अपना वीडियो शेयर करूंगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, खेल मंत्री राठौड़ ने फिटनेस के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए एक नया प्रयोग किया। उन्होंने अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। जिसमें वो देश के लोगों से फिटनेस की अपील कर रहे हैं। वीडियो की शुरुआत में राज्यवर्धन सिंह ने अपनी फिटनेस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रेरणा बताया। राठौड़ ने इस मुहिम को हम फिट तो इंडिया फिट का नाम दिया। राठौड़ ने इस फिटनेस मुहिम में भागीदारी के लिए विराट कोहली, रितिक रोशन और साइना नेहवाल को भी चैलेंज किया है। जिसके बाद विराट ने इस चैलेंज को स्वीकार करते हुए वीडियो पोस्ट किया और आगे पीएम मोदी को चैलेंज किया।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 May 2018 10:44:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महिला आईपीएल की तैयारी : वूमेन टी-20 चैलेंज मुकाबला आज</title>
                                    <description><![CDATA[यहां के वानखेड़े स्टेडियम में मंगलवार को आईपीएल के पहले क्वालीफायर मुकाबले से पहले एक महिला टी-20 प्रदर्शनी मैच खेला जाएगा। बीसीसीआई ने इस मुकाबले को टी-20 चैलेंज गेम नाम दिया गया है। टी-20 चैलेंज को भविष्य में महिला आईपीएल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अगर परिणाम सकारात्मक रहे तो बीसीसीआई महिला […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sports/woman-t-20-challenge-match-today/article-3714"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-05/sports.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यहां के वानखेड़े स्टेडियम में मंगलवार को आईपीएल के पहले क्वालीफायर मुकाबले से पहले एक महिला टी-20 प्रदर्शनी मैच खेला जाएगा। बीसीसीआई ने इस मुकाबले को टी-20 चैलेंज गेम नाम दिया गया है। टी-20 चैलेंज को भविष्य में महिला आईपीएल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अगर परिणाम सकारात्मक रहे तो बीसीसीआई महिला आईपीएल का ब्लू प्रिंट तैयार करेगा। टी-20 चैलेंज गेम के लिए दुनिया भर की टॉप महिला क्रिकेटरों की दो टीमें आईपीएल ट्रेलब्लेजर्स और आईपीएल सुपरनोवा बनाई गईं हैं। ट्रेलब्लेजर्स की कमान स्मृति मंधाना और सुपरनोवा की हरमनप्रीत कौर को सौंपी गई है। टीम का एलान 17 मई को हुआ था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मकसद- देश में महिला क्रिकेट को बढ़ावा देना</h3>
<p style="text-align:justify;">टी-20 चैलेंज कराने के पीछे बीसीसीआई का मकसद देश में महिला क्रिकेट को बढ़ावा देना है। पिछले साल भारतीय महिला टीम ने पहली बार वर्ल्ड कप का फाइनल खेला था। तभी से ऐसी चर्चाएं शुरू हो गईं थी कि महिला क्रिकेट के ज्यादा से ज्यादा मैच कराए जाएं। बीसीसीआई के अपने सबसे लोकप्रिय टूर्नामेंट के साथ टी-20 चैलेंज की भी मेजबानी करने से भविष्य में महिला क्रिकेटरों को अपनी प्रतिभा का और ज्यादा प्रदर्शन करने का मौका मिल सकता है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>खेल</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/sports/woman-t-20-challenge-match-today/article-3714</link>
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                <pubDate>Tue, 22 May 2018 08:00:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मालदीव में भारत के लिए चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[संवैधानिक संकट में घिरा मालदीव कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के लिए नई चुनौती बन गया है। मालदीव ने क्षेत्रीय देशों की समुद्री सेना के अभ्यास में शामिल होने के लिए भारत के न्यौता को ठुकरा दिया है। चाहे मालदीव ने स्पष्ट तौर पर न्यौता न ठुकराने का कोई कारण नहीं बताया, लेकिन हालातों से स्पष्ट […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/challenge-for-india-in-maldives/article-3571"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/maldiv.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संवैधानिक संकट में घिरा मालदीव कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के लिए नई चुनौती बन गया है। मालदीव ने क्षेत्रीय देशों की समुद्री सेना के अभ्यास में शामिल होने के लिए भारत के न्यौता को ठुकरा दिया है। चाहे मालदीव ने स्पष्ट तौर पर न्यौता न ठुकराने का कोई कारण नहीं बताया, लेकिन हालातों से स्पष्ट है कि मालदीव ने चीन को खुश करने और भारत को चिढ़ाने के लिए ही ऐसा किया है। यामीन सरकार द्वारा आपातकाल का घोषणा करने और इसे एक महीने के लिए आगे बढ़ाने के खिलाफ भारत ने सख्त टिप्पणी की थी। भारत की इस टिप्पणी से मालदीव सहित चीन भी सकते में था।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन द्वारा कहा गया था कि भारत मालदीव के आतंरिक मामलों में दखल न दे और मालदीव सरकार भी संकट से उभरने के लिए समर्थ है। दरअसल चीन और मालदीव की गिटमिट भारत के लिए चुनौती बन गई है। चीन पाकिस्तान और नेपाल में पहले ही अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है। श्रीलंका और बांग्लादेश में उसकी कोशिशें अवश्य नाकाम हो रही हैं लेकिन इन देशों में चीन ने अपनी मुहिम जारी रखी हुई है। डोकलाम विवाद का कुछ हद तक समाधान होने के बावजूद चीन भूटान में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन का सरकारी मीडिया निरंतर भारत के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहा है। दूसरे तरफ अरूणाचल प्रदेश में भारतीय शासन-प्रशासन की सरगर्मियों पर चीन किंतु-परंतु करने से गुरेज नहीं कर रहा। भारत के लिए इन हालातों से निपटने और शक्ति संतुलन कायम रखने में बड़ी रुकावट दो विरोधी ताकतें अमेरिका और रूस के साथ बराबर दोस्ती वाली कूटनीति है। इस असमंजस्य के कारण ही कभी अमेरिका भारत के प्रभाव में पाक की खिंचाई करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी रूस-भारत की मित्रता के मद्देनजर पाकिस्तान से नरमी ईस्तेमाल करता है। नि:संदेह हमारी गुट निर्पेक्षता कमजोर पड़ी है, इसके बावजूद हम अमेरिका से अपेक्षित समर्थन प्राप्त करने में समर्थ नहीं हुए। अब मालदीव में चीन का बढ़ रहा प्रभाव काफी मुश्किल भरा है। मालदीव का बाद में हमदर्द बना चीन उसका सबसे बड़ा घनिष्ठ मित्र होने का दावा कर रहा है। छोटे व गरीब देशों में चीन के पैसे और तकनीक की ताकत का मुकाबला करने के लिए भारत को मजबूत ठोस कूटनीति बनाने की जरूरत है, ताकि नेपाल की तरह कहीं भूटान और मालदीव भी हमारे हाथों से न निकल जाएं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/challenge-for-india-in-maldives/article-3571</link>
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                <pubDate>Thu, 01 Mar 2018 03:09:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कृषि से पलायन थामने की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2017-18 में यह स्वीकारोक्ति कि रोजी की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ रहा है और कृषि कार्य का बोझ महिलाओं पर आन पड़ा है। रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि कृषि से जुड़े रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं। आर्थिक समीक्षा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/challenge-to-stop-migrating-from-agriculture/article-3546"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/farmer.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2017-18 में यह स्वीकारोक्ति कि रोजी की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ रहा है और कृषि कार्य का बोझ महिलाओं पर आन पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि कृषि से जुड़े रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं। आर्थिक समीक्षा में यह तथ्य भी सामने आया है कि खेतीबाड़ी के काम में यांत्रिकीकरण यानी मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है और जोतों का आकार छोटा हुआ है। आर्थिक समीक्षा में आशंका जतायी गयी है कि कृषि आय पर जलवायु परिवर्तन का साया मंडरा रहा है जिसके कारण कृषि आय के मध्यम तौर पर 20-25 प्रतिशत तक घटने का जोखिम हो सकता है। अगर यह आशंका सच साबित होती है तो नि:संदेह गांवों से पलायन की गति और तेज होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">गौर करें तो भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर पहले से ही देखा जा रहा है और अगर कहीं इसका प्रभाव व्यापक हुआ तो न केवल कृषि आय प्रभावित होगी बल्कि शहरों पर जनसंख्या का दबाव पर बढ़ेगा। विश्व बैंक पहले ही आगाह कर चुका है कि गांवों से पलायन की वजह से भारत की आधी आबादी 2050 तक शहरी हो जाएगी और कुल श्रम बल में कृषि श्रमिकों का प्रतिशत 2001 के 58.2 प्रतिशत से गिरकर 2050 तक 25.7 प्रतिशत तक आ जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">आश्चर्य है कि एक ओर केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुना करने के उद्देश्य से किसानों को संस्थानात्मक स्रोतों से ऋण उपलब्ध कराने के साथ मृदा कार्ड स्वास्थ्य, लागत प्रबंध, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, पीएमएफबीवाई तथा प्रोत्साहन जैसी योजनाएं चला रही है, वहीं गांवों से पलायन थमने का नाम नहीं ले रहा। यह स्वीकारने में हिचक नहीं कि खेती के विकास में क्षेत्रवार विषमता का बढ़ना, प्राकृतिक बाधाओं से पार पाने में विफलता, भूजल का खतरनाक स्तर पर पहुंचना और हरित क्रांति वाले इलाकों में पैदावार में कमी आना के अलावा फसलों और बाजारों की दूरी न घटने, फसलों का उचित मूल्य न मिलने जैसे कई कारण हैं जिसकी वजह से गांवों से पलायन बढ़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह तथ्य यह भी दर्शाता है कि किसान क्रेडिट कार्ड और फसलों की बीमा योजनाओं के अलावा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, गुणवत्तापूर्ण बीज के उत्पादन और वितरण, राष्ट्रीय बागवानी मिशन जैसी अनगिनत योजनाओं से भी किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है। कृषि कार्य में लागत के अनुपात में लाभ न के बराबर है ऐसे में इससे जुड़े लोगों का शहर की ओर पलायन लाजिमी है।</p>
<p style="text-align:justify;">भूमि अधिग्रहण के कारण आज देश में प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता 0़18 हेक्टेयर रह गयी है। 82 प्रतिशत किसान लघु एवं सीमांत किसानों की श्रेणी में आ गए हैं और उनके पास कृषि भूमि दो हेक्टेयर या उससे भी कम रह गयी है। जो कल तक किसान थे, आज खेतीहर मजदूर बन गए हैं। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र की विकास दर भी लगातार घटती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार दावा करती है कि वह गांवों से पलायन रोकने के लिए कृषि ग्रोथ के लिए रचनात्मक पहल कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि वर्ष 2012 से 2017 के 12 वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि में भारत की पहले चार साल में 1़6 प्रतिशत की वृद्घि रही है, जो कि 4 प्रतिशत के लक्ष्य से कोसों दूर है। हां, विगत वर्षों से कृषि का उत्पादन जरुर बढ़ा है लेकिन इसके बाद भी किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की तारीख में देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में से 52 प्रतिशत कर्ज में डूबे हैं और प्रत्येक किसान पर तकरीबन 47 हजार रुपए कर्ज है। आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में कृषि और संबंद्घ क्षेत्रों की वृद्घि दर 2़1 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 4़9 प्रतिशत थी। ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि भारत में कृषि की स्थिति कितनी बदतर हो चुकी है। अगर ऐसे में कृषि क्षेत्र से जुड़े लोग रोजी-रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं तो सरकार को चाहिए कि कृषि को रोजगारपरक बनाने की दिशा में ठोस पहल करे।</p>
<p><strong><em>रीता सिंह</em></strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Feb 2018 01:41:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत को भूख मुक्त करने की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व खाद्य असुरक्षा रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। यहां पर लगभग 19.46 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं और यह संख्या चीन की तुलना में 5.58 करोड़ अधिक है। संयुक्त राष्टÑ संघ की यह वार्षिक भूख रिपोर्ट खाद्य और कृषि संगठन द्वारा तैयार की जाती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-hunger-free-challenge/article-3387"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/poor-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व खाद्य असुरक्षा रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। यहां पर लगभग 19.46 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं और यह संख्या चीन की तुलना में 5.58 करोड़ अधिक है। संयुक्त राष्टÑ संघ की यह वार्षिक भूख रिपोर्ट खाद्य और कृषि संगठन द्वारा तैयार की जाती है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि इस वर्ष सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना है। इन लक्ष्यों में पहला लक्ष्य गरीबी और भूख को मिटाना है। विश्व में प्रत्येक चार भूखे लोगों में से एक भारत में है और भूख मिटाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इस संबंध में अन्य प्राधिकारियों के आकलन अलग-अलग हैं। अंतर्राष्टÑीय एजेंसियों द्वारा कुपोषण का आकलन जातीय विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसके कारण भारत के बारे में आंकड़े बढ़-चढ़कर सामने आते हैं। तथापि भारत में स्थिति बहुत गंभीर है और इसमें तुरंत सुधार किए जाने की आवश्यकता है और भुखमरी को समाप्त करना हमारे अपने हित में भी है। कुपोषण के दो रूप हो सकते हैं। पहले रूप में भोजन में कैलोरी की पर्याप्त मात्रा नहीं होती है और दूसरा रूप संक्रमण है जो लिए गए भोजन में कैलोरी के प्रभाव को प्रभावित करता है। भूख और कुपोषण एक नहंी हैं। भूख के कारण कुपोषण होता है क्योंिक गरीब अपने भोजन को संतुलित नहीं बना पाता है और इसका मुख्य कारण प्रोटीन युक्त भोजन का अभाव है। कुपोषण तथा भूख को सामान्यतया एक ही अर्थों में प्रयोग किया जाता है किंतु वे दोनों अलग-अलग हैं। कुपोषण भोजन में पोषक तत्वों का अभाव है जबकि भुखमरी में भोजन हीं नहीं मिल पाता है और इसके कारण अन्य विकृतियां पैदा हो जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महानगरों में लोग भव्य शादियों को देखते हैं और उनमें भारी मात्रा में खाने की बर्बादी होती है। वहीं दूसरी ओर अनेक लोगों को खाना नहंी मिल पाता है। ये दोनों साथ-साथ चलते हैं और इस विषमता को देखते हुए लगता है वास्तव में हमारा देश अतुलनीय है। कृषि आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है और यह रोजगार के अवसर देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसका सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान है। भारत विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है। यहां सबसे अधिक भैसें हैं। भारत सब्जियां, फलों उत्पादन में विश्व में सबसे बड़ा देश है। इसके बावजूद देश से भूख समाप्त नहंी की जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक रिपोर्टों में कहा गया है कि विश्व में सभी के लिए पर्याप्त खाद्यान्न है। भूख का कारण गरीबी, खराब आर्थिक प्रणाली, युद्घ, जनसंख्या वृद्घि, खाद्य नीति, खराब कृषि और जलवायु परिवर्तन है। विश्व की तरह हमारे देश में भी भूख और कुपोषण का कारण अपर्याप्त उत्पादन की बजाय खाद्यान्नों पर सबकी पहुंच और खराब वितरण प्रणाली है। भारत में भूख का एक बड़ा कारण खाद्यान्नों की बर्बादी है। तत्कालीन कृषि और खाद्य मंत्री शरद पवार ने 2013 में कहा था कि प्रति वर्ष लगभग 8.3 बिलियन डालर मूल्य के खाद्यान्नों की बर्बादी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भंडारण सुविधाओं के अभाव के कारण आस्टेÑलिया के कुल फसल उत्पादन के बराबर 21 मिलियन टन गेहूं की देश में बर्बादी होती है। संयुक्त राष्टÑ विकास कार्यक्रम ने भी खाद्यान्न क्षेत्र में बर्बादी को एक मुख्य समस्या बताया है। इसके अनुसार भारत में 40 प्रतिशत खाद्यान्न बर्बाद होते हंैं और यह मंहगाई का भी मुख्य कारण है। हमारे देश में एक ओर खाद्यान्नों की अत्यधिक बर्बादी होती है तो एक ओर भुखमरी है। खाद्यान्नों की बर्बादी तीन स्तरों पर होती है। उत्पादन, भंडारण, परिवहन और विपणन स्थान और इन सभी स्थानों पर खाद्यान्नों की बर्बादी को रोका जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लोबल फूड बैंकिंग नेटवर्क नामक संगठन की स्थापना भूख का मुकाबला करने, पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए किया गया है। इसका उद्देश्य विश्व में खाद्यान्न बैंकों की स्थापना करना है। इंडिया फूड बैंकिंग नेटवर्क ने देश को भूख और कुपोषण मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है और 2020 तक प्रत्येक जिले में एक फूड बैंक बनाने का लक्ष्य रखा है। भारत के संदर्भ में परंपरागत मूल्यों को नजरंदाज नहंी किया जा सकता है जहां पर भूखे को भोजन कराने की परंपरा है। धार्मिक स्थानों पर मुफ्त भोजन कराया जाता है। भूख से संबंधित विकृति के कारण विश्व में करोडों लोग हमेशा संकट की स्थिति में रहते हैं। कुपोषण के शिकार अमीर और गरीब दोनों बन सकते हैं और इनसे अनेक विकृतियां होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भूख मुक्त भारत का तात्पर्य है कि भोजन के अभाव में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। वर्तमान आथिक और सामाजिक दशाओं में यदि राजनीतिक इच्छा शक्ति और जनता का सहयोग हो तो भूख की समस्या से निपटा जा सकता है। कठिनाई कुपोषण का मुकाबला करने में है जिसमें भोजन उपलब्ध कराने वाले और उपभोक्ता दोनों को कुछ ज्ञान होना चाहिए। यदि लोग दो मिनट में खाना तैयार करने, अलग-अलग तरह के स्वाद आदि के प्रति आकर्षित होते हैं तो भुखमरी तो कम होगी किंतु कुपोषण बढ़ता जाएगा। भूख और कुपोषण सामान्यतया गरीबी से जुड़े हैं। हम मध्यम और उच्च वर्गों में अस्वस्थकर भोजन की आदतों के कारण कुपोषण की समस्या के प्रति उदासीन हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये लोग अस्वस्थकर खाद्य आदतों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं जिसके कारण उनमें तनाव, मधुमेह, जैसी जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां हो जाती हैं। जबकि दूसरी ओर यदि गरीब कुपोषित बच्चों को पर्याप्त और संतुलित भोजन मिले तो वे कुपोषण से बच सकते हैं। इसलिए हम आंकड़ों पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं कर सकते हैं। आंकड़ों का वास्तविक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कुपोषण की प्रकृति और कारणों का अलग-अलग विश्लेषण किया जाना चािहए ताकि समुचित उपाय किए जा सकें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डा. एस़ सरस्वती</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Oct 2017 04:16:13 +0530</pubDate>
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                <title>साइबर अपराध रोकने की चुनौती</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/challenging-the-cyber-crime-prevention/article-3305"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/cyber-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><em><strong>Challenges of Cyber Security:</strong></em> देश में डिजिटल लेन-देन और कैशलेश अर्थव्यवस्था को गति दिए जाने के तहत भारतीय बैंकों ने भले ही अपनी सेवाओं को काफी हद तक आॅनलाइन कर दिया है और ऐप के जरिए सेवाएं देने लगे हैं, लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि बैंकों की सेवाओं को लेकर देश के लोग संतुष्ट नहीं हैं। उसका एक प्रमुख कारण साइबर अपराध में लगातार हो रही वृद्धि है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में अमेरिकी कंपनी एफआईएस ने वैश्विक स्तर पर कुछ ऐसा ही खुलासा किया है। उसने अपने तीसरे वार्षिक परफार्मेंस अगेंस्ट कस्टमर एक्सपेक्टेशन सर्वेक्षण में पाया है कि देश के लोग विशेषकर 18 से 36 वर्ष के आयु वर्ग के युवा उपभोक्ता अपनी सुविधानुसार किसी भी समय कहीं से भी जुड़े रहना चाहते हैं और बैंक शाखा तक जाना पसंद नहीं करते।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वेक्षण में कहा गया है कि दुनिया के अन्य बैंकों की तरह भारतीय बैंक भी अपने ग्राहकों की अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहे हैं। बैंकों की जो सबसे बड़ी समस्या साइबर अपराध रोकने की है, उसमें वह बुरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। अभी पिछले ही दिनों सरकार के आंकड़ों से उद्घाटित हुआ कि पिछले तीन वित्त वर्ष में बैंकों से जुड़े साइबर अपराध के 43,204 मामले सामने आए हैं, जिसमें अपराधियों ने 232.32 करोड़ रुपए का चूना लगाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर साइबर अपराध पर नियंत्रण नहीं कसा गया, तो साइबर हमलावर न्यूक्लियर प्लांट, रेलवे, ट्रांसपोर्टेशन और अस्पतालों जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर कंट्रोल कर सकते हैं, जिसके नतीजे में पावर फेलियर, वाटर पॉल्युशन, बाढ़ जैसी गंभीर समस्या उत्पन हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">साइबर अपराध के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे नंबर पर है। आज भारत की बड़ी आबादी डिजिटल जिंदगी जी रही है। अधिकांश लोग बैंक खाते से लेकर निजी गोपनीय जानकारी तक कंप्यूटर और मोबाइल फोन में रखने लगे हैं। इंटरनेट उपयोग करने के मामले में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। इंटरनेट पर जितनी तेजी से निर्भरता बढ़ी है, उतना ही तेजी से खतरे भी बढ़े हैं। यहीं वजह है कि हैकिंग की वारदातें भी बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की ही बात करें, तो यहां ऐसी अनेक देशी-विदेशी कंपनियां हैं, जो इंटरनेट आधारित कारोबार एवं सेवाएं प्रदान कर रही हैं। उचित होगा कि भारत सरकार ऐसी कंपनियों पर निगरानी रखने के लिए एक ऐसी निगरानी तंत्र को विकसित करे, जो इन कंपनियों के कार्यप्रणाली पर कड़ी नजर रखे।</p>
<p style="text-align:justify;">उचित यह भी होगा कि जिन कंपनियों की कार्यप्रणाली संदिग्ध नजर आए उन पर शीध्र शिकंजा कस कानूनी कार्रवाई की जाए। ऐसे कंपनियों का लाइसेंस निरस्त किया जाए जो साइबर सुरक्षा से संबंधित नियमों का पालन करने में कोताही बरतती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा देश में अनेक ऐसी विदेशी कंपनियां सेवाएं दे रही हैं जिनका सर्वर अपने देश में नहीं है। ऐसी कंपनियों को निगरानी की जद में रखना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा नहीं है कि भारत में साइबर अपराध रोकने के लिए कानून नहीं है। भारत में साइबर अपराध को तीन मुख्य अधिनियमों के अंतरर्गत रखा गया है। ये अधिनियम हैं-सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, भारतीय दंड संहिता और राज्य स्तरीय कानून।</p>
<p style="text-align:justify;">सच कहें तो साइबर अपराध के बदलते तरीकों और घटनाओं ने भीषण समस्या का रुप ग्रहण कर लिया है। जुर्म की दुनिया में अपराधी हमेशा कानून को गुमराह करने के लिए नए-नए तरीके ईजाद कर लेते हैं। देखा भी जा रहा है कि साइबर अपराधी आए दिन देश में साइबर तकनीक के जरिए जहरीला माहौल निर्मित करने का काम कर रहे हैं और सरकार चाहकर भी उस पर रोक लगाने में विफल है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां ध्यान देना होगा कि साइबर अपराध के खेल में अमेरिका, रुस, चीन, ब्रिटेन, जापान बड़े खिलाड़ी है। अमेरिका की साइबर सेंधमारी की कारस्तानी का विकलीक्स द्वारा खुलासा किया जा चुका है। हैकिंग के जरिए रक्षा-सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी हासिल करने का मामला दुनिया में अनगिनत बार उजागर हो चुका है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में अभी भी साइबर अपराध गैर जमानती नहीं है। साथ ही इसके लिए अधिकतम सजा तीन साल है। उचित होगा कि सरकार साइबर अपराध से जुड़े कानूनों में फेरबदल कर इसे कठोर बनाए तथा सजा की दर बढ़ाए।</p>
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                <pubDate>Wed, 23 Aug 2017 00:39:03 +0530</pubDate>
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