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                <title>welfare - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>वाह दान हो तो ऐसा, मरने के बाद भी सृष्टि के भले की सोचते हैं डेरा श्रद्धालु</title>
                                    <description><![CDATA[जयनारायण इन्सां की पार्थिव देह मेडिकल रिसर्च के लिए दान भरा-पूरा परिवार छोड़कर मालिक की गोद में जा विराजे सच कहूँ/संजय कुमार मेहरा गुरुग्राम। डेरा सच्चा सौदा के अनुयाई न सिर्फ जीते जी बल्कि इस जहां से जाने के बाद भी इन्सानियत के काम आते हैं। इसी कड़ी में शुक्रवार को जिले के गाँव नानू […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/dera-devotees-think-of-the-welfare-of-the-universe-even-after-death/article-45255"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-03/dera-devotees-15.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;">जयनारायण इन्सां की पार्थिव देह मेडिकल रिसर्च के लिए दान</li>
<li style="text-align:justify;">भरा-पूरा परिवार छोड़कर मालिक की गोद में जा विराजे</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/संजय कुमार मेहरा</strong><br />
<strong>गुरुग्राम।</strong> डेरा सच्चा सौदा के अनुयाई न सिर्फ जीते जी बल्कि इस जहां से जाने के बाद भी इन्सानियत के काम आते हैं। इसी कड़ी में शुक्रवार को जिले के गाँव नानू कलां निवासी जयनारायण इन्सां (92) का निधन होने पर परिजनों ने उनकी पार्थिव देह को मेडिकल रिसर्च के लिए रामा मेडिकल कालेज एंड रिसर्च सेंटर हापुड़ (यूपी) को दान कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी जयनारायण इन्सां वर्षों से डेरा सच्चा सौदा से जुड़े रहे। उनका परिवार भी डेरा सच्चा से जुड़कर सेवा कार्यों में लगा हुआ है। पिछले काफी समय से अपने पैतृक गाँव नानू कलां स्थित अपने परिवार के साथ घर में रह रहे थे। वे पूरी तरह स्वस्थ थे। शुक्रवार की सुबह 8 बजे उन्होंने परिवार के बीच अंतिम सांस ली और मालिक के चरणों में जा विराजे। पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की प्रेरणा से जयनारायण इन्सां ने जीते जी ही शरीरदान के लिए संकल्प पत्र भरा हुआ था। इसके चलते जयनारायण इन्सां के मरणोपरांत परिजनों ने उनकी अंतिम इच्छा को पूरा करते हुए पार्थिव देह मेडिकल रिसर्च हेतु दान करने का निर्णय लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आवश्यक कागजी कार्रवाई के बाद जयनारायण इन्सां की पार्थिव देह को रामा मेडिकल कालेज एंड रिसर्च सेंटर हापुड़ (यूपी) के लिए रवाना किया गया। इस मौके पर परिजनों, रिश्तेदारों, शाह सतनाम जी ग्रीन एस. वेलफेयर फोर्स विंग के सेवादारों और साध-संगत ने जयनारायण इन्सां को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके साथ ही ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, जयनारायण इन्सां तेरा नाम रहेगा’, ‘डेरा सच्चा सौदा की सोच पर, पहरा देंगे ठोक कर’ आदि नारों से आसमान गुंजायमान कर दिया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">चार पीढ़ियां देखने का मिला सौभाग्य</h4>
<p style="text-align:justify;">92 वर्षीय जयनारायण को चार पीढ़ियां देखने का सौभाग्य मिला। वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। परिवार में उनकी तीन संतान एक बेटा रामपाल व दो बेटी राजबाला व संतरा के अलावा तीन पौते भागीरथ, जयबीर, कमलदीप और एक पौती ऊषा, चार पड़पौते व दो पड़पौती हैं।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Mar 2023 11:39:27 +0530</pubDate>
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                <title>क्या महिलाओं के कल्याण के लिए नए कदम उठाएंगे ?</title>
                                    <description><![CDATA[एक जादू की झप्पी ने प्रधानमंत्री मोदी को अचंभित कर दिया। इस झप्पी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नमो को मोदी शैली में ही उत्तर दे दिया और यह स्पष्ट किया कि हालांकि राजनीतिक दृष्टि से वे भाजपा का विरोध करते हैं किंतु वे मोदी से घृणा नहीं करते हैं। आप इसे पप्पू की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/will-we-take-new-steps-for-the-welfare-of-women/article-4992"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/women-welfare.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक जादू की झप्पी ने प्रधानमंत्री मोदी को अचंभित कर दिया। इस झप्पी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नमो को मोदी शैली में ही उत्तर दे दिया और यह स्पष्ट किया कि हालांकि राजनीतिक दृष्टि से वे भाजपा का विरोध करते हैं किंतु वे मोदी से घृणा नहीं करते हैं। आप इसे पप्पू की बात भी कह सकते हैं, मुन्ना भाई की हरकत भी कह सकते हैं और इसे संसदीय मर्यादा के विरुद्ध भी कह सकते हैं किंतु उनकी यह झप्पी न केवल सुर्खियों में रही अपितु इससे राजनीतिक हिन्दू परेशान हो गए। भाजपा राहुल के इस कदम को बचकाना कहती है और केवल दिखावा बताती है तथा शुक्रवार को लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव पर लंबी चली बहस में चिपको आंदोलन शुरू करना बताते हैं। यह निश्चित था कि अविश्वास प्रस्ताव गिरेगा क्योंकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास संख्या नहीं थी और मतदान ने भी इसे स्पष्ट कर दिया था। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 126 और विपक्ष में 325 मत पड़े। विपक्ष ने बेरोजगारी, राफेल सौदा, किसानों की दुर्दशा, अर्थव्यवस्था आदि के मुद्दे पर सरकार को घेरा। इस अविश्वास प्रस्ताव पर भाजपा की जीत सुनिश्चित थी और विपक्ष के हौसले गिराने के लिए अनेक बातें कही गयी। किंतु भाजपा की सहयोगी शिव सेना ने रंग में भंग डाल दिया और उसने चर्चा में भाग नहीं लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या राहुल की यह झप्पी सरकार और विपक्ष के संबंधों में एक नए अध्याय की शुरूआत करेगी? क्या कांग्रेस और भाजपा के बीच कोई नई खिचडी पक रही है? क्या मोदी और राहुल महिलाओं के लिए कुछ नया करने वाले हैं? विशेषकर इसलिए कि भारत को विश्व की बलात्कार राजधानी और महिलाओं के लिए असुरक्षित कहा जाता है। समाचार पत्रों में हर दिन खबरें छायी रहती हैं कि दो-चार-छह वर्ष की बच्चियों का बलात्कार किया गया है, चलती रेलगाडी में किशोरियों के साथ बलात्कार किया जा रहा है, चलती कारों में लडकियों और टैक्सी में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है। हाल ही में असुरक्षित शहरों के बारे में एक सर्वेक्षण में 150 शहरों में नई दिल्ली का स्थान 139वां और मुंबई का 126वां है। हमारे राजनेता मेरा देश महान और ब्रांड इंडिया के बारे में बडी-बडी बातें करते रहते हैं किंतु महिलाआं और लडकियां असुरक्षित वातावरण में रह रही हैं। यदि मोदी और उनका राजग महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए बडी-बडी बातें करते हैं और वे तीन तलाक और निकाह हलाला के संबंध में उनके कल्याण के लिए कदम उठाने की बात करते हैं तो फिर वे संविधान 108वां संशोधन विधेयक अर्थात महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पेश क्यों नहीं करते जिसमें संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रावधान है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस विधेयक को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पहल पर मार्च 2010 में राज्य सभा में पारित किया गया था। किंतु हमारे नेताओं ने इस व्यापक सुधार वाले विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इस विधेयक में ऐसा क्या है कि इससे हमारे सांसद अपना आपा खो देते हैं और इसे पारित नहीं होने देते हैं? पिछले आठ वर्षों से इसके बारे में बात तक क्यों नहीं हो रही है और इसे पारित करने में क्या अड़चन है? क्या यह एक बहाना है? क्या यह शिक्षित महिलाओं को खुश करने का एक बहाना है? क्या इसकी बात महिला मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए की जाती है? क्या राजनीतिक दृष्टि से ऐसा करना सही है? इस संबंध में कांग्रेस और भाजपा दोनों के अलग-अलग मत हैं। इस संबंध में सही बातें करने के बावजूद वे महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर आगे नहीं आते हैं और इस विधेयक को वास्तव में पारित नहीं करवाते हैं। इस विधेयक के मार्ग में अनेक अड़चनें हैं। उन्हें विश्वास है कि मायावती के नेतृत्व में दलित और पिछडा वर्ग ब्लॉक इस विधेयक को पारित होने नहीं देगा। इसीलिए वे सार्वजनिक रूप से इस विधेयक का समर्थन करते हैं। निश्चित रूप से वह विधेयक कभी कानून नहीं बनेगा। महिला आरक्षण का खुलेआम विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि इस कानून के बनने से केवल शहरी उच्च वर्गीय महिलाएं सत्ता में आएंगी जबकि किसी भी आरक्षण में समान प्रतिनिधित्व नहीं होता है और यदि उनका तर्क सही भी हो तो क्या हम ये मानें कि भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व शहरी शिक्षित महिलाओं के बजाय अखिलेश और तेजस्वी जैसे नेता करें।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना देखिए। भारत ऐसा देश है जहां पर कहा जाता था कि इंदिरा गांधी अपने मंत्रिमंडल में केवल एक मात्र पुरूष सदस्य थी। महिला मुख्यमंत्री और ग्राम प्रधान यहां रहे हैं किंतु संसद और राज्य विधान मंडलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के प्रयास विफल हुए हैं। संसद के दोनों सदनों में महिलाओं की संख्या 10 प्रतिशत से कम है। वस्तुत: गत वर्षों में विभिन्न लोक सभाओं में महिलाओं की संख्या कमोबेश एक ही रही है। उनकी संख्या 19 से 62 के बीच रही है। वर्तमान लोक सभा में सर्वाधिक 62 महिला सदस्य हैं। 15वीें लोक सभा में 58, 12वीं में 43, 11वीं में 40, नौंवे मे 28 और छठी में सबसे कम 19 महिला सदस्य थीं। संसद में महिला सदस्यों के मामले में भारत का रिकार्ड सबसे खराब है। 135 देशों में भारत का 105 वां स्थान है। महिलाओं के खराब प्रतिनिधित्व का क्या कारण है? क्या इसका कारण हमारा दृष्टिकोण है? या महिलाओं द्वारा राजनीति के उतार-चढ़ाव से दूर रहना है? अवसरों की कमी है या पुरूषों का प्रभुत्व है? इस सबका कारण ये सब हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">साठ के दशक में फ्री सेक्स की शुरूआत हुई तो सत्तर के दशक में ब्रा जलाकर महिलाओं की मुक्ति की शुरूआत की गयी। अस्सी के दशक में गर्भपात के अधिकार के साथ उन्हें समानता दी गयी और नब्बे के दशक में अधिकार और समानता के साथ उन्हें अधिकार संपन्न बनाया गया। वस्तुत: गत सदियों में महिलाओं की स्थिति में बदलाव आया है। प्रत्येक पीढ़ी और दशक में महिलाओं के प्रति भेदभाव को समाप्त करने के लिए कदम उठाए गए। एक महिला कार्यकर्ता के अनुसार महिलाएं पुरूषों की दासी हैं। उनका कार्य खाना बनाना, बच्चों को खाना खिलाना और अपने पति का गृहस्थ निभाना है और यह स्थिति तब है जब महिला-पुरूष अनुपात भी खराब है। देश में लड़कियों के बजाय लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है। बालिकाओं की उपेक्षा, साक्षरता में अंतर आदि के कारण पुरूष प्रधान समाज में महिलााओं की कमी है और इन सभी करणों के चलते राजनीति, प्रशासन और आर्थिक कार्यकलापों में महिलाओं की भागीदारी कम रही है। संसद और विधान मंडलों में महिलाओं को आरक्षण देने से उन्हें मुख्य राजनीतिक धारा में लाने में मदद मिलेगी साथ ही उन्हें प्रभावी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति भी मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सच है कि राजनीति में ताकतवर महिलाओं की कमी है और पार्टी के आका भी उन पर चुनाव जीतने का भरोसा नहीं करते हैं। साथ ही अधिकतर निर्वाचित निकायों में महिलाओं के मुद्दे की उपेक्षा होती है। किंतु क्या इस एक विधेयक से महिलाओं के प्रति सदियों से चला आ रहा भेदभाव दूर होगा? क्या राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि से बालिका भू्रण हत्याएं कम होंगी, दहेज मृत्यु कम होंगी, बहुओं को कम जलाया जाएगा और महिलाओं की आकांक्षाओं को नहीं दबाया जाएगा? अनुभव बताते हैं कि कानून बनाकर लैंगिक भेदभाव दूर नहीं किए जा सकते हैं। महिलाओं के प्रति भेदभाव के विरुद्ध कठोर कानून बनाने से महिलाओं के विरुद्ध अपराधों मे कमी नहीं आयी है। अक्सर दोषी छूट जाता है या उसे बहुत कम दंड मिलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महिलाओं को अधिकार संपन्न समाज के विकास के साथ बनाया जा सकता है। शिक्षा, परिवार नियोजन, आदि के माध्यम से महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाया जा सकता है। न केवल दिखावे के लिए अपितु वास्तव में इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि पुरूष और महिलाएं दोनों बराबर हैं। देखना यह है कि क्या महिलाओं के कल्याण के लिए नए कदम की बातें केवल सांकेतिक बनकर रहेंगी। लिंग विषमता के मामले में हमारा देश 134 देशों में से 114वें स्थान पर है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम महिलाओं के लिए समान अवसर सृजित करें। सुशासन लिंग आधारित नहीं है। अब मोदी और राहुल के लिए बड़ी चुनौती है कि वे इस दिशा में आगे बढें, महिला सशक्तिकरण पर बल दें और यह सुनिश्चित करें कि यह विधेयक पारित हो। क्या हम एक नए दौर की अपेक्षा कर सकते हैं?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>पूनम आई कौशिश (इंफा)</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 24 Jul 2018 03:29:34 +0530</pubDate>
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                <title>कल्याणकारी योजनाओं में आधार का पेंच</title>
                                    <description><![CDATA[2007 में शुरू की गई मिड डे मील भारत की सबसे सफल सामाजिक नीतियों में से एक है, जिससे होने वाले लाभों को हम स्कूलों में बच्चों कि उपस्थिति, बाल पोषण के रूप में देख सकते हैं। आज मिड डे मील स्कीम के तहत देश में 12 लाख स्कूलों के 12 करोड़ बच्चों को दोपहर […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/screw-of-base-in-welfare-schemes/article-775"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/aadhar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">2007 में शुरू की गई मिड डे मील भारत की सबसे सफल सामाजिक नीतियों में से एक है, जिससे होने वाले लाभों को हम स्कूलों में बच्चों कि उपस्थिति, बाल पोषण के रूप में देख सकते हैं। आज मिड डे मील स्कीम के तहत देश में 12 लाख स्कूलों के 12 करोड़ बच्चों को दोपहर का खाना दिया जाता है। इस योजना पर सरकार सालाना करीब साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये खर्च करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">28 फरवरी, 2017 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा मिड डे मील से जुड़ी एक अधिसूचना जारी की गयी जिसमें कहा गया था कि मिड डे मील योजना का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य होगा ,जिनके पास आधार नंबर नहीं है उन्हें आधार कार्ड बनवाने के लिए 30 जून तक का समय है उसके बाद आधार कार्ड नहीं होने की स्थिति में मिड डे मील लेने के लिए आधार कार्ड की रजिस्ट्रेशन स्लिप दिखानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने इस कदम को लेकर मंत्रालय का तर्क है कि आधार कार्ड कि अनिवार्यता से इस योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता आएगी साथ ही इसका लाभ लेने वालों को आसानी होगी। इस अधिसूचना पर हंगामा होने के बाद सरकार द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें कहा गया कि यह सुनिश्चित किया गया है कि आधार न होने के कारण किसी को भी लाभ से वंचित न किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर किसी बच्चे के पास आधार नहीं है तो अधिकारी उसे आधार नामांकन सुविधा उपलब्ध करायेंगें जब तक ऐसा न हो लाभार्थियों को मिल रहे लाभ जारी रहेंगे। हालांकि बाद में जारी प्रेस विज्ञप्ति में नियमों में किसी किस्म की ढील नहीं दी गई है यहाँ बस शब्दों की हेरा फेरी ही की गयी है,</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेस विज्ञप्ति के बाद भी 28 फरवरी, 2017 को जारी की गई अधिसूचना का सारा ज्यों का तयों बना हुआ है जिसमें कहा गया था कि कि देश के 14 करोड़ बच्चों को आधार कार्ड उपलब्ध कराने पर ही भोजन कराया जाएगा और अगर उनके पास आधार कार्ड नहीं है तो उसे बनवाना ही पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकार बताते हैं कि मिड डे मील जैसी योजनाओं में आधार कि अनिवार्यता का नकारात्मक असर पड़ सकता है और इससे देश के सबसे गरीब और जरूरतमंद प्रभावित होंगें। योजना में “फर्जीवाड़ा रोकने के लिये भी यह कोई प्रभावकारी तरीका नहीं है। इसके लिये सरकार को आधार अनिवार्य करने के बजाए योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने पर ध्यान देना चाहिए चाहिए</p>
<p style="text-align:justify;">जिससे इनमें लोगों की भागेदारी बढ़े, दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि योजनाओं को लागू करने में लोगों कि सहभागिता और जन निगरानी बहुत अच्छे उपाय साबित हुए हैं इससे गड़बड़ी होंने की गुंजाइश ना के बराबर रह जाती है । कल्याणकारी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता को को लेकर कई गंभीर सवाल हैं, एक तो इसमें फिंगर प्रिंट मैच करने कि समस्याएँ हैं</p>
<p style="text-align:justify;">और दूसरी इस बात बात की आशंका है कि आधार कि बहाने सरकार लोगों की निगरानी करना चाहती है, निजता को लेकर भी सवाल हैं पिछले दिनों आधार कार्ड बनाने वाली एजेंसी द्वारा महेंद्र सिंह धोनी जैसे हाई प्रोफाइल क्रिकेटर की निजी जानकारी सोशल नेटवर्किंग साइट पर लीक कर देने का मामला सामने आ चुका है ऐसे में आधार कार्ड की वजह से देश के करोड़ों लोगों की निजता कैसे बनी रहेगे इसकी गया गारंटी है, आधार कार्ड का पूरा डाटाबेस कोई भी अपने फायदे के लिए उपयोग कर सकता है या उसकी जानकारी लीक कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">निजता और निगरानी का मसाला लोगों के मौलिक अधिकारों से जुड़ता है शायद इसी वजह से आधार नंबर को अनिवार्य बनाए जाने को लेकर कई जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता इसका विरोध कर रहे हैं उनका कहना है कि सबकुछ आधार से जोड़ देने से आधार कार्ड धारकों की निजी जानकारियां चुराने, आर्थिक घपले करने, पहचान का दुरुपयोग करने और तमाम सूचनाओं का गलत इस्तेमाल करने का खतरा बढ़ जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मिड डे मील के मामले में तो मसला बाल अधिकारों से भी जुड़ता है इस तरह से सरकार देश के बच्चों को एक तरह से जबरदस्ती एक ऐसे काम के लिये मजबूर कर रही है जिसमें इन नाबालिगों की कोई रजामंदी नहीं है। सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए आधार की अनिवार्यता को लेकर हमेशा से ही विवाद रहा है, आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकायें कई साल से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है इस बीच अदालत द्वारा समय-समय पर अंतरिम निर्णय भी सुनाये गए हैं, जैसे 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था</p>
<p style="text-align:justify;">कि रसोई गैस सब्सिडी जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जा सकता इसी तरह से 2015 में भी अदालत ने मनरेगा, पेंशन, भविष्य निधि, प्रधानमंत्री जनधन योजना आदि को आधार कार्ड से जोड़ने की इजाजत तो दी, पर साथ में ही यह भी कहा कि यह स्वैच्छिक होना चाहिए, अनिवार्य नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार भी इसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बार फिर स्पष्ट किया गया है कि सरकार और उसकी एजेंसियां समाज कल्याण योजनाओं के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं कर सकती हंै और सिर्फ आधार न होने की वजह से किसी व्यक्ति को किसी भी सरकारी योजना के फायदे से महरूम नहीं रखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इन सबके बावजूद सरकार लगातार आधार की अनिवार्यता बढ़ाती जा रही है मध्यान्ह भोजन योजना इस सूची में एक नयी कड़ी है जिसे रोजी रोटी अधिकार अभियान सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन बताया है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड लोगों को मिलने वाली किसी भी सेवा के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">अभियान का कहना है कि कि मिड डे मील भारतीय बच्चों का एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कानूनी तौर पर और साथ ही साथ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लागू किया गया है, सरकार के इस कदम को मिड डे मील योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं में रुकावट पैदा होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पूर्व अध्यक्ष शांता सिन्हा द्वारा सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए आधार को अनिवार्य करने पर अंतरिम रोक लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कि गयी थी जिसमें केंद्र सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं में आधार को अनिवार्य करने पर अंतरिम रोक लगाने कि मांग की गयी है ।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 27 जून को सुनवाई करेगा, सरकार ने सरकारी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता के लिये 30 जून की डेडलाइन भी रखी है इसलिए 27 जून की सुनवाई बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि केन्द्र सरकार अपने रुख पर अड़ी हुई है उसने तो 27 जून को याचिका पर होने वाली सुनवाई का भी विरोध करते हुए कहा है कि 30 जून की समय सीमा को अब और आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
इस बीच राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार के राशन के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू करने के आदेश पर रोक लगा देने से उम्मीदें बढ़ी हैं दरअसल राजस्थान सरकार ने 24 मार्च 2017 को सूबे में राशन सामग्री के वितरण के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया था । उम्मीद है राजस्थान सरकार को मिले इस झटके से दिल्ली सरकार कोई सबक सीखेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong>जावेद अनीस</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 02 Jun 2017 00:01:26 +0530</pubDate>
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