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                <title>प्रेरणास्त्रोत : राष्ट्रपति की एकाग्रता</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिकन राष्ट्रपति लिंकन के विरोधी अखबारों में जी खोलकर उनकी बुराई करते, किन्तु लिंकन अविचलित भाव से अपने काम में जुटे रहते। एक दिन उनके एक मित्र ने उनसे कहा, ‘‘विरोधी लोग आपके खिलाफ चाहे जैसी ऊल-जुलूल बातें अखबारों में प्रकाशित करवाते रहते हैं, उनकी बातों का प्रत्युत्तर आपको भी तो देना चाहिए।’’ मित्र की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/presidential-concentration/article-12931"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/presidential-concentration.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">अमेरिकन राष्ट्रपति लिंकन के विरोधी अखबारों में जी खोलकर उनकी बुराई करते, किन्तु लिंकन अविचलित भाव से अपने काम में जुटे रहते। एक दिन उनके एक मित्र ने उनसे कहा, ‘‘विरोधी लोग आपके खिलाफ चाहे जैसी ऊल-जुलूल बातें अखबारों में प्रकाशित करवाते रहते हैं, उनकी बातों का प्रत्युत्तर आपको भी तो देना चाहिए।’’ मित्र की बात सुनकर लिंकन मुस्कराते हुए बोले, ‘मित्र! यदि मैं अपनी आलोचनाओं पर ध्यान दूँ और उनका उत्तर देने लगूँ तो दिन भर में के वल इसी काम को कर पाऊँगा और इसके चलते मेरे कार्यालय में कोई अन्य कार्य हो ही नहीं सकेगा। मेरा तो एक ही उद्देश्य है, अपनी सारी सहायता और शक्ति का उपयोग करते हुए ईमानदारी से अपना पूरा काम करना। वह मैं करता हूँ और इस पद पर अंतिम घड़ियों तक करता भी रहूँगा। यदि मैं अंत में बुरा सिद्ध होता हूँ, तो मैं भले ही लाख सफाई देता रहूँ, मैं सही हूँ मेरा रास्ता सही था, कोई इस बात को क्यों सुनेगा और यदि मैं अंत में भला सिद्ध होता हूँ तो मेरे विषय में जो प्रलाप किया जा रहा है, वह निश्चित रूप से अनर्गल सिद्ध होगा। मुझे विरोधियों की ऐसी आलोचनाओं की न तो चिंता है और न ही भय।’</h4>
<h2 style="text-align:justify;">
महात्मा गाँधी का सत्य</h2>
<h4 style="text-align:justify;">सत्य के प्रति गाँधीजी का आग्रह सर्वोपरि था। वे स्वयं तो इसका पालन करते थे, अपने पास के लोगों से भी यही आशा रखते थे। उन दिनों वे दक्षिण अफ्रीका में थे और फिनिक्स आश्रम में रहते थे। कुछ युवक आश्रम में भर्ती हुए। उन युवकों ने एक महीने तक बिना नमक का भोजन करने की प्रतिज्ञा की। कुछ दिन तक तो वे अपनी प्रतिज्ञा पर अमल करते रहे, लेकिन शीघ्र ही वे सादे भोजन से उकता गए। जब और चलाना मुश्किल हो गया तो एक दिन उन युवकों ने डरबन से मंगवाकर मसालेदार और स्वादिष्ट चीजें खा लीं। उन्हीं में से एक युवक ने बापू को यह सब बता दिया। बापू उस समय कुछ नहीं बोले, लेकिन बापू की प्रार्थनासभा में उन्होंने उन सब युवकों को बुलाकर खाने के बारे में पूछा। सबने मना कर दिया। उन लोगों ने भेद खोलने वाले को ही झूठा ठहराया। बापू को यह सहन नहीं हुआ। वे जोरों से अपने गालों को पीटने लगे और बोले, ‘मुझसे सच्चाई छिपाने में कसूर तुम्हारा नहीं, मेरा है। क्योंकि मैंने अभी तक सत्य का गुण प्राप्त नहीं किया है, इसलिए सत्य मुझसे दूर भागता है।’ बापू का यह कार्य देखकर युवकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे सब एक-एक करके बापू के चरणों में गिर पड़े और अपना अपराध स्वीकार कर लिया।</h4>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi</a><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/"> News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong></p>
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                <pubDate>Wed, 05 Feb 2020 20:35:34 +0530</pubDate>
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