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                <title>प्रेरणास्त्रोत : ज्ञान और कर्म</title>
                                    <description><![CDATA[भगवान बुद्ध के प्रवचन सुनने के लिए एक व्यक्ति नियमित रूप से आता था। इस प्रकार उसे एक माह हो चुका था। किन्तु उसके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। भगवान बुद्ध उपदेश में कहते थे कि धर्म पर चलो, अपने जीवन से राग-द्वेष को दूर करो, काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार से सदा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/knowledge-and-action/article-12961"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/knowledge-and-action.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">भगवान बुद्ध के प्रवचन सुनने के लिए एक व्यक्ति नियमित रूप से आता था। इस प्रकार उसे एक माह हो चुका था। किन्तु उसके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। भगवान बुद्ध उपदेश में कहते थे कि धर्म पर चलो, अपने जीवन से राग-द्वेष को दूर करो, काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार से सदा दूर रहो। बुद्ध के उपदेशों से लोगों को बहुत शान्ति मिलती थी। किन्तु उस व्यक्ति का मन अशांत रहता था। एक दिन उसने बुद्ध से जाकर कहा- हे प्रभु! मैं एक माह से आपका उपदेश सुन रहा हूँ, किन्तु उसका तनिक भी असर मेरे आचरण पर नहीं पड़ा। मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे क्या करना चाहिए? बुद्ध उनकी बात सुनकर बोले- तुम कहाँ के रहने वाले हो? उसने कहा, श्रावस्ती का। बुद्ध ने अगला प्रश्न किया। वह यहाँ से कितनी दूर है। उसने अनुमान से बता दिया। बुद्ध ने पुन: जिज्ञासा प्रकट की, कितना समय लगता है? उस व्यक्ति ने हिसाब लगाकर बता दिया। बुद्ध ने कहा- अब बताओ कि क्या तुम यहाँ पर बैठे-बैठे ही अपने घर पहुँच सकते हो? उसने कहा-यह कैसे हो सकता हैं? वहाँ पहुँचने के लिए तो चलना होगा। तब बुद्ध ने बड़े प्रेम से उसे समझाया कि जैसे चलने पर ही पहुँचा जा सकता है, वैसे ही अच्छी बातों पर अमल करने से लाभ होता है। हे प्यारे! तुम मेरे ज्ञान के साथ अपने कर्म को जोड़ दो, तब तुमको उत्तम-फल मिलेगा। उस व्यक्ति को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने अपने जीवन में सुधार कर लिया, जिससे उसका जीवन सदाचारी बन गया।</h4>
<h3 style="text-align:justify;">सूझ-बूझ और साहस</h3>
<h4 style="text-align:justify;">सफलता की मुख्य शर्त है- सकारात्मक चिंतन। एक प्रसिद्ध उद्योगपति अपने कारखाने में घूम रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि चारदीवारी पर उग गए एक पीपल के पौधे पर पड़ी। उन्होंने वहाँ के प्रबंधक से कहा, ‘दीवार पर पीपल उग गया है। कुछ दिनों में यह विशाल वृक्ष दीवार को तोड़ देगा। जल्द ही उसे उखड़वा दो।’ प्रबंधक ने सोचा, ‘पीपल के पेड़ को उखड़वाना तो अपराध है।’ प्रबंधक ने सूझ-बूझ से काम लेते हुए उसे पेड़ को वहीं पास में खुली जगह में लगा दिया। दूसरे दिन उद्योगपति ने देखा कि पीपल का पौधा अब दीवार पर नहीं है, बल्कि वहीं कुछ दूर जमीन में लगा दिया गया है। उन्होंने प्रबंधक को पदोन्नति देते हुए कहा, तुममें सूझ-बूझ के साथ साहस भी है।</h4>
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                <pubDate>Sat, 08 Feb 2020 20:57:08 +0530</pubDate>
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