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                <title>सेवा ही पूजा है</title>
                                    <description><![CDATA[Service is Worship एक भिक्षु था। उसे कोई भारी रोग लग गया। वह चल फिर नहीं सकता था। अपने मल-मूत्र में लिपटा पड़ा रहता था। उसके साथी भिक्षुक उससे घृणा करते थे। कोई भी उसके पास नहीं आता था। बेचारा बहुत परेशान था। अचानक बुद्ध को मालूम हुआ कि उस भिक्षुक की हालत खराब है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/service-is-worship/article-13034"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/service.jpg" alt=""></a><br /><h3>Service is Worship</h3>
<h4 style="text-align:justify;">एक भिक्षु था। उसे कोई भारी रोग लग गया। वह चल फिर नहीं सकता था। अपने मल-मूत्र में लिपटा पड़ा रहता था। उसके साथी भिक्षुक उससे घृणा करते थे। कोई भी उसके पास नहीं आता था। बेचारा बहुत परेशान था। अचानक बुद्ध को मालूम हुआ कि उस भिक्षुक की हालत खराब है। वे अपने शिष्य आनंद को लेकर वहाँ पहुँचे। वह उसकी बुरी हालत देखकर बड़े दु:खी हुए। उन्होंने उससे पूछा- ‘‘तुम्हें क्या रोग है?’’ उसने कहा, ‘‘मुझे पेट की बीमारी है’’ तुम्हारी सेवा करने वाला कोई नहीं है। उसने कहा, मेरे निकट कोई नहीं आता। बुद्ध ने तत्काल अपने शिष्य आनंद से कहा, जाओ तुरन्त पानी ले आओ। आनंद गए और पानी ले आए। इसके बाद बुद्ध ने पानी डाला और आनंद ने उसके मल-मूत्र को साफ किया। अच्छी तरह धो-पोंछकर बुद्ध ने उसे सिर की ओर से पकड़ा और आनंद ने पैरों की ओर से उठाकर चारपाई पर धीरे से लिटा दिया। फिर बुद्ध ने सारे भिक्षुओं को इकट्ठा करके उन्हें समझाया कि तुम्हारे माता-पिता, भाई-बहन नहीं है। जो तुम्हारी सेवा करें। इसलिए तुम लोग आपस में ही एक-दूसरे की सेवा किया करो। क्योंकि वास्तव में ‘‘मानव सेवा ही ईश्वर पूजा है।’’ सारे शिष्यों ने भगवान बुद्ध को नमन् किया और सबने अपने-अपने मन में सेवा-भाव का संकल्प किया।</h4>
<h2 style="text-align:justify;">महाभारत का प्रसंग</h2>
<h4 style="text-align:justify;">कहा गया है कि विनम्र व्यवहार और मन की कोमलता किसी भी हथियार से अधिक शक्तिशाली सिद्ध होती है। जहाँ कठोरता का जल्दी नाश होता है, वहीं कोमलता लंबे समय तक रहती है। सत्य भी है कि कठोर से कठोर वस्तु को काट देने वाली तलवार भी रूई के ढेर को काटने का सामर्थ्य नहीं रखती। महाभारत का प्रसंग है। भीष्म पितामह अपने अंतिम समय में शरशैय्या पर पड़े थे। धर्मराज युधिष्ठिर का आग्रह था कि पितामह ऐसे समय में जीवन के लिए कुछ उपयोगी शिक्षा दें। भीष्म ने इस पर कहा कि नदी जब समुद्र तक पहुँचती है, तो अपने पानी के संग बहुत-सी चीजों, बड़ें-बड़ें पेड़-पौधों तक को बहाकर ले जाती है। एक दिन समुद्र ने नदी से प्रश्न किया, ‘तुम बड़े-बड़े पेड़ों को अपने प्रवाह में ले आती हो, लेकिन क्या कारण है कि छोटी-सी घास, कोमल बेलों व नरम पौधों को क्यों नहीं ला पातीं?’ नदी का उत्तर था, ‘जब-जब मेरे पानी का बहाव आता है, तब-तब बेले झुक जाती हैं और उसे रास्ता दे देती हैं, लेकिन वृक्ष अपनी कठोरता के कारण यह नहीं कर पाते।’ भीष्म ने युधिष्ठिर को आगे समझाते हुए यही उपदेश दिया कि जीवन में कोमल व्यक्ति का ही अस्तित्व सदैव बना रहता है, यही मेरी शिक्षा सदैव मन में रखना।</h4>
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                <pubDate>Fri, 14 Feb 2020 11:27:29 +0530</pubDate>
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