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                <title>CAA Protest - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>हिंसा का ताडंव राजनीतिक विफलता</title>
                                    <description><![CDATA[पुलिस अधिकारियों का यह बयान बहुत निराशा जनक है कि पुलिस कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण हिंसा नहीं रोकी जा सकी।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/raising-violence-political-failure/article-13277"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/raising-violence-political-failure.jpeg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">राष्ट्रीय नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ दिल्ली में हिंसा का ताडंव जारी है। लगातार चौथे दिन हुई हिंसा में डेढ़ दर्जन के करीब मौतें हो चुकी हैं। हैरानी की बात यह है कि देश की राजधानी में हमारे पास सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त ही नहीं हैं। पुलिस अधिकारियों का यह बयान बहुत निराशा जनक है कि पुलिस कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण हिंसा नहीं रोकी जा सकी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वास्तविकता तो यह है कि सरकार को सोमवार को ही कड़े कदम उठाने चाहिए थे। सीएए विरोधी व समर्थकों के मध्य हुई झड़पों में एक व्यक्ति पिस्तौल तानकर खड़ा नजर आ रहा था। इस बात से इंकार करना काफी कठिन है कि यह दंगे अचानक हुए हैं। दंगाईयों का हथियारबंद होकर सड़कों पर उतरना, टायर मार्किट को आग लगाना, कुछ घरों को आग के हवाले करने की कोशिश जैसी घटनाएं पूरी तरह साजिश का हिस्सा नजर आ रही हैं। बल्कि सीएए का विरोध तो लगभग पिछले 75 दिनों से चल रहा था। परंतु टकराव कहीं नहीं हुआ था, एक राजनेता धरनार्थियों को केवल तीन दिन के अंदर हटाने की चेतावनी का बयान देता है और अगले दिन ही हिंसा शुरू हो जाती है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी जायज है कि विवादित बयान के बाद सबंधित नेता के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? राजनीतिक पार्टियों ने अपने बड़बोले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई तो क्या करनी ऐसे नेताओं के बयान की निंदा भी नहीं की, जिसका परिणाम यह है कि हिंसा पैदा करने वाले नेताओं के हौंसले बढ़ते गये। शमर्नाक बात यह है कि दंगे तब हो रहे थे जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली में मौजूद थे और वह धार्मिक सद्भावना के लिए भारत की प्रशंसा कर रहे थे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अब भी जरूरी है कि हालातों को काबू किया ताकि ये दंगे दूसरे राज्यों में ना फैलें। राजनीतिक पार्टियों को अमन व भाईचारे की अपील करने के लिए आगे आना चाहिए, किसी कानून का विरोध जायज है और सुप्रीम कोर्ट भी कानून की पड़ताल करेगी। सुप्रीम कोर्ट विरोध करने के अधिकार को जायज मानती है। शाहीन बाग का धरना खत्म करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थ भेजकर धरना खत्म करने के लिए उचित कदम उठाया था, इसके बावजूद कोई नेता धरने खत्म की चेतावनी दे तो यह लोकतंत्र और शासन प्रबंधों का अपमान है। केन्द्र व दिल्ली सरकार को सख्त उठाते हुए अमन शांति कायम करनी चाहिए। हिंसा संविधान के विरूद्ध है, बेशक ऐसी हिंसा वह किसी कानून के हक में हो या विरोध में। पार्टी कोई भी हो वह न्याय को अपनी बपौती नहीं बना सकती। अमन-चैन व शांतपूर्वक विरोध ही देश की ताकत है।</h6>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Feb 2020 00:03:46 +0530</pubDate>
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                <title>टकराव में बदलता विरोध</title>
                                    <description><![CDATA[अब कानून के समर्थक व विरोधी ही आपस में टकरा रहे हैं।  नि:संदेह ऐसे टकराव हमारे देश, संविधान व समाज के लिए खतरनाक परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/collision-turned-into-protest/article-13240"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/collision-turned-into-protest.jpeg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">केन्द्रीय नागरिकता शोध कानून के खिलाफ पिछले 70 दिनों से चल रहा विरोध-प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर रहा है। विगत दो दिनों में देश की राजधानी में तोड़फोड़ व आगजनी हुई व एक पुलिस कर्मचारी की जान भी चली गई। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि प्रदर्शनकारियों का पुलिस झड़प से भी मामला आगे निकल गया है। अब कानून के समर्थक व विरोधी ही आपस में टकरा रहे हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">नि:संदेह ऐसे टकराव हमारे देश, संविधान व समाज के लिए खतरनाक परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं। विरोध का तरीका संवैधानिक, सद्भावना भरा व तर्कसंगत होना चाहिए। सड़कें जाम करना व लोगों को परेशान करने को धरना नहीं कहा जा सकता। महात्मा गांधी के आंदोलन की मिसाल हम सभी के सामने है। देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करवाने के लिए महात्मा गांधी ने शांतिमय अहिंसक आंदोलन शुरू किया था, जो पूर्णत: सफल रहा। आज दुनिया के छोटे-बड़े देश गांधी जी की विचारधारा को अपना रहे हैं। अमेरिका सहित यूरोपीय व अफ्रीकी देशों ने महात्मा गांधी के नाम पर गलियों-चौकों के नाम रखे हैं। वहां उनकी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">नि:संदेह एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी कानून से किसी भी वर्ग को असहमति हो सकती है व उस वर्ग को विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर हिंसा फैलाना सही नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने सड़क के एक तरफ बैठकर धरना दिया था व यूपीए सरकार को हिला दिया था। यहां गलती महज प्रदर्शनकारियों की ही नहीं बल्कि कानून के सर्मथकों का गैर-जरूरी उत्साह एवं उनकी भड़काहट स्थिति को बिगाड़ रही है। सत्तापक्ष व पुलिस पर सर्मथकों के हुड़दंग को शह देने के आरोप लगे रहे हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">दरअसल इस विरोध को बिगाड़ने का काम कुछ बड़बोले नेता भी कर रहे हैं जो अपने नफरत भरे भाषणों द्वारा अपने-अपने वर्ग के लोगों को भड़का रहे हैं, नहीं तो टकराव जैसी स्थिति पैदा ही क्यो हो? प्रदर्शनकारी अपनी बात रखें, उनका विरोध सरकार से है, लेकिन जब यहां कानून के समर्थक क्यों ठेकेदार बन रहे है? अच्छा हो अगर राजनीतिक पार्टियां अपने नेताओं व कार्यकत्ताओं को संयम में रहने की नसीहत दें। अगर कोई नहीं मान रहा तब उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएं। लेकिन हिंसा का मौन समर्थन नहीं हो।  कोई भी राजनीतिक पक्ष देश का मालिक नहीं व न ही जज है । जनता ही असली जज है। जनता दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है, सीएए कानून की परख जनता की कचहरी में होनी चाहिए। अगला आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं।</h6>
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                <pubDate>Tue, 25 Feb 2020 00:10:59 +0530</pubDate>
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