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                <title>Peace Agreement - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>संपादकीय: अमेरिका-तालिबान समझौता : शांति के प्रयासों की जीत</title>
                                    <description><![CDATA[कई मौकों पर यह बात भी सामने आती रही है कि उनका इस्लाम के नाम पर किसी अन्य देश के साथ कोई वास्ता नहीं है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/us-taliban-agreement-peace-efforts-triumph/article-13380"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-03/peace-agreement.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">अमेरिका ने अफगानिस्तान से सेना वापिस निकालने का निर्णय इस शर्त पर लिया है कि तालिबान हिंसा का रास्ता छोड़ेगा और अलकायदा के साथ अपना नाता तोड़ेगा। भले ही इस बात की भी चर्चा है कि इस समझौते पीछे अमेरिका के राष्टÑपति डोनाल्ड ट्रम्प अपना अगला राष्टपति चुनाव जीतने के लिए एवं नोबल शांति पुरूस्कार हासिल करने के लिए यह सब कर रहे हैं। फिर भी यह अंधेरे में उजाले की किरण से कम नहीं।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">इस समझौते को अमेरिका की बजाय शांति की जीत का करार देना उचित होगा। दरअसल तालिबान संगठन भी हिंसा को राजनीतिक ताकत हासिल करने का साधन मान कर चल रहे थे। पाकिस्तान को ठिकाना बनाने के बावजूद तालिबान की सरगर्मियों का केन्द्र बिन्दु अफगानिस्तान ही रहा है। कई मौकों पर यह बात भी सामने आती रही है कि उनका इस्लाम के नाम पर किसी अन्य देश के साथ कोई वास्ता नहीं है।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">अगर तालिबान संगठन देश में लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में हिस्सेदार बनने की कोशिश करते हैं तब यह अफगानिस्तान के लिए बहुत ही अच्छा होगा। तालिबान ने देख लिया है कि अमेरिका व अन्य ताकतवर देशों की मौजूदगी में वे हथियारों के बल पर तानाशाही के साथ शासन नहीं कर सकते, वहीं दूसरी ओर अमेरिका भारी नुक्सान के बावजूद लम्बे समय तक अफगानिस्तान में लड़ाई के लिए डटा रहा।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">बाराक ओबामा के कार्यकाल तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापिसी के लिए अमेरिका में भारी अंदरूनी दबाव पैदा हो चुका था, लेकिन हिंसा के रहते मैदान छोड़ना अमेरिकी विचारधारा व उसकी राष्टÑीय पॉजीशन के खिलाफ था। आखिर तालिबानों की कमर तोड़ने के बाद अमेरिका ने और जानी नुक्सान से बचते हुए ये किनारा किया है। समझौता करने के बाद भी अमेरिका बहादुरों वाली जीत की पॉजीशन में है। यह घटनाक्रम दुनिया के अन्य देशों में सक्रिय आतंकवादियों के लिए भी बड़ा सबक है।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">अमन-शांति व बातचीत ही आखिर किसी मसले का हल है। खासकर पाकिस्तान को भी समझना चाहिए कि बातचीत के लिए आतंकी हिंसा रोकनी होगी। अमेरिका तालिबान समझौते से भारत की विचारधारा को भी बल मिला है। भारत कश्मीर सहित हर मसले पर बातचीत के लिए पाकिस्तान के सामने सीमाओं पर अमन की शर्त रखता आ रहा है। आतंकवाद को कोई भी देश या विचारधारा स्वीकार नहीं करती। आतंकवाद के खिलाफ शांति पसंद देशों की एकजुटता अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है।</h4>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2020 13:22:14 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिका ने तालिबान के साथ शांति समझौते पर किए हस्ताक्षर</title>
                                    <description><![CDATA[साथ ही अमेरिकी-तालिबान शांति समझौते में किए गए वादों को 135 दिन में लागू किया जाएगा। इस बीच अमेरिका ने फिर से जोर देकर कहा कि वह अफगानिस्तान की सरकार की सहमति से लगातार सैन्य आॅपरेशन चलाने को तैयार है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/america-signs-peace-deal-with-taliban/article-13355"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/peace-agreement.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">यूएस ने कहा- तालिबान को अलकायदा से खत्म करने होंगे रिश्ते</h2>
<h3 style="text-align:center;">(Peace-Agreement)</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>दोहा (एजेंसी)।</strong> कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच शनिवार को बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसमें कहा गया है कि अगर तालिबान अमेरिका की शर्तें मान लेता हैं तो नाटो अफगानिस्तान से अपनी सेना 14 माह के भीतर वापस बुला लेगा। अमेरिका और तालिबान ने कतर की राजधानी दोहा में शनिवार को शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जारी एक बयान में कहा कि अगर तालिबान अमेरिका की शर्ते मान लेता है तो अमेरिका और नाटो 14 महीनों में अफगानिस्तान से अपने सेनाओं को पूरी तरह वापस बुला लेगा। बयान के अनुसार समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिका 135 दिनों के भीतर अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या में कमी कर इसे 8,600 तक ले आएगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य बलों की संख्या घटाकर 8,600 की जाएगा</h4>
<p style="text-align:justify;">अफगानिस्तान और अमेरिका ने संयुक्त रूप से घोषणा की है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य बलों की संख्या घटाकर 8,600 की जाएगा। साथ ही अमेरिकी-तालिबान शांति समझौते में किए गए वादों को 135 दिन में लागू किया जाएगा। इस बीच अमेरिका ने फिर से जोर देकर कहा कि वह अफगानिस्तान की सरकार की सहमति से लगातार सैन्य आॅपरेशन चलाने को तैयार है। (Peace-Agreement) अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा, हम इसकी करीब से निगरानी करेंगे कि तालिबान अपने वादों को लागू करता है या नहीं। इसके साथ ही हम अफगानिस्तान से अमेरिकी सैन्य बलों को निकालने का फैसला लेंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पाक का नाम, भारत का जिक्र नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">तालिबान के प्रतिनिधि अब्दुल बरादर ने समझौते में मदद के लिए पाकिस्तान का नाम तो लिया, लेकिन भारत का कोई जिक्र नहीं था। अब्दुल्ला बरादर ने अफगानिस्तान में राष्ट्रपति अशरफ गनी का भी नाम नहीं लिया। इस समझौते में अफगानिस्तान सरकार की सक्रिय भागीदारी ना होने के कारण पहले से चिंता जताई जा रही थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भारत क्यों है चिंतित</h3>
<p style="text-align:justify;">अफगानिस्तान के विकास के लिए भारत अरबों रुपए खर्च कर चुका है। इस वक्त भी कई विकास कार्य चल रहे हैं। भारत को आशंका है कि तालिबान के हाथ में सत्ता आने के बाद वह इन विकास कार्यों को बंद करा सकता है। भारत अफगानिस्तान में महिला सुरक्षा और उनके अधिकारों की भी बात करता रहा है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">तालिबान हमेशा से महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन करता रहा है।</li>
<li style="text-align:justify;">वह महिलाओं पर कई तरह की बंदिशें लगाने की बात करता रहा है।</li>
<li style="text-align:justify;">तालिबान 16 साल की लड़की की शादी का समर्थन करता है।</li>
<li style="text-align:justify;">समझौते में महिलाओं की आजादी का कोई जिक्र नहीं है।</li>
</ul>
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                <pubDate>Sat, 29 Feb 2020 21:07:13 +0530</pubDate>
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