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                <title>Inspirational - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>टाटा स्टील की नींव</title>
                                    <description><![CDATA[औद्योगिक भारत की नींव जमशेदपुर से ही पड़ी थी, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इसके प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद रहे। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जेएन टाटा और विवेकानंद की मुलाकात ऐसे समय में हुई, जब दोनों एक इतिहास रचने अमेरिका जा रहे थे। जेएन टाटा भारत में इस्पात संयंत्र की स्थापना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/foundation-of-tata-steel/article-26317"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/j.n.-tata.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">औद्योगिक भारत की नींव जमशेदपुर से ही पड़ी थी, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इसके प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद रहे। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जेएन टाटा और विवेकानंद की मुलाकात ऐसे समय में हुई, जब दोनों एक इतिहास रचने अमेरिका जा रहे थे। जेएन टाटा भारत में इस्पात संयंत्र की स्थापना के उद्देश्य से जा रहे थे, जबकि विवेकानंद को शिकागो की संसद में आध्यात्मिक प्रवचन देना था। बात सितंबर 1893 की बात है। वे एक ही जहाज पर आमने-सामने बैठे थे, लेकिन एक-दूसरे को नहीं जानते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">बातचीत के क्रम में स्वामी जी की बातों और विचारों से जमशेदजी टाटा बहुत प्रभावित हुए। जब जेएन टाटा ने स्वामी विवेकानंद को बताया कि वे भारत में इस्पात संयंत्र स्थापित करना चाहते हैं, तो उन्होंने मयूरभंज राज में कार्यरत भूगर्भशास्त्री पीएन (प्रमथनाथ) बोस से मिलने की सलाह दी। यह भी बताया कि उसी क्षेत्र के आसपास लौह अयस्क, कोयला समेत अन्य खनिज का प्रचुर भंडार भी है। जेएन टाटा के मन में एक इस्पात कारखाना के साथ ही एक ऐसा शहर बसाने की कल्पना भी थी, जहां सारी सुविधाएं उपलब्ध हों।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने पुत्र दोराबजी को अपनी मृत्यु के पूर्व पत्र लिखा था- पुत्र, इस्पात नगर ऐसा हो जहां पार्क हों, सड़क के दोनों ओर हरे-भरे लहराते पेड़ पौधे हों, शिक्षा की उचित व्यवस्था हो, खेलकूद के लिये लम्बे-चौड़े मैदान हों, सभी जातियों, हिंदू, मुसलमान, ईसाई सहित सभी धर्मावलंबियों के लिए प्रार्थना स्थल हों, रहने के लिए सुविधा संपन्न घर हों, ताकि यहां कार्य करने वाले सभी जन इस कारखाने और शहर को अपना मानें-जानें। लगन, निष्ठा, परिश्रम से कार्य होता रहा और आखिर वह पुनीत दिन 27 अगस्त, 1907 को आया जब इस्पात कारखाने का रजिस्ट्रेशन हुआ। दो करोड़ की लागत से कार्य को मूर्त रुप दिया गया।</p>
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                <pubDate>Fri, 27 Aug 2021 09:39:26 +0530</pubDate>
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                <title>जब माइकल जॉनसन ने बुरी यादों को पीछे छोड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[माइकल जॉनसन का लक्ष्य अटलांटा 1996 ओलंपिक में इतिहास बनाना था। ओलंपिक के 100 सालों के इतिहास में, किसी भी पुरुष एथलीट ने कभी भी एक ही ओलंपिक में 200 मीटर और 400 मीटर दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण नहीं जीता था। और जॉनसन को उस उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए, बार्सिलोना की बुरी यादों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/when-michael-johnson-left-behind-bad-memories/article-26296"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/michael-johnson.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">माइकल जॉनसन का लक्ष्य अटलांटा 1996 ओलंपिक में इतिहास बनाना था। ओलंपिक के 100 सालों के इतिहास में, किसी भी पुरुष एथलीट ने कभी भी एक ही ओलंपिक में 200 मीटर और 400 मीटर दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण नहीं जीता था। और जॉनसन को उस उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए, बार्सिलोना की बुरी यादों को पछाड़ना था। 1992 में, जॉनसन स्वर्ण पदक जीतने के दावेदारों में से एक थे। हालाँकि, फूड पोइसोनिंग के कारण, वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए और सेमीफाइनल हीट में छठे स्थान पर रहे। वह 0.16 सेकंड से फाइनल में पहुंचने में रह गए।</p>
<p style="text-align:justify;">चार साल बाद, 1 अगस्त 1996 को, 29 वर्षीय जॉनसन ने तीन दिन पहले ही 43.49 सेकंड के ओलंपिक रिकॉर्ड समय में 400 मीटर स्वर्ण पदक जीता था। अब, वह 20 मीटर की दौड़ में स्वर्ण जीतने की तैयारी कर रहे थे। फाइनल में, यह जीत के लिए उनका दृढ़ संकल्प नहीं था जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया, बल्कि यह उनके जूते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने करियर की सबसे महत्वपूर्ण दौड़ के दौरान, जॉनसन ने गोल्डन रंग के रनिंग जूते पहनने का फैसला किया। कस्टम-मेड डिजाइन ने उन्हें ‘द मैन विद द गोल्डन शूज’ का उपनाम दिया। हालांकि गोल्डन रंग के जूते पहनने का मतलब कुछ न होता अगर वह स्वर्ण पदक जीतने में असफल रहते। ऐतिहासिक रूप से, ‘विश्व का सबसे तेज आदमी’ का खिताब 100 मीटर चैंपियन को दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अटलांटा में उनके अविश्वसनीय प्रदर्शन के बाद, यह खिताब माइकल जॉनसन के लिए आरक्षित था। 200 मीटर के फाइनल के दौरान, उन्हें हैमस्ट्रिंग की चोट का सामना करना पड़ा जिसने उन्हें 4X100 मीटर रिले फाइनल में प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। चार साल बाद सिडनी 2000 खेलों में, जॉनसन 200 मीटर/400 मीटर डबल के साथ इतिहास दोहराना चाह रहे थे।</p>
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                <pubDate>Thu, 26 Aug 2021 10:01:44 +0530</pubDate>
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                <title>राखी पर किडनी देकर बहन ने बचाई भाई की जान</title>
                                    <description><![CDATA[झुंझुनूं (एजेंसी)। राजस्थान में झुंझूनूं जिले के खेतड़ी नगर में रक्षाबंधन पर एक बहन ने छोटे भाई को अपनी किडनी देकर उसकी जान बचाई है। खेतड़ी उपखंड के डाडा फतेहपुरा गांव की महिला ने रक्षाबंधन से महज चार दिन पहले अपने छोटे भाई को किडनी देकर उसे बचा लिया। दोनों ने रक्षाबंधन का पर्व भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/sister-saved-brothers-life-by-giving-kidney-on-rakhi/article-26240"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/sister-saves-brothers-life.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>झुंझुनूं (एजेंसी)।</strong> राजस्थान में झुंझूनूं जिले के खेतड़ी नगर में रक्षाबंधन पर एक बहन ने छोटे भाई को अपनी किडनी देकर उसकी जान बचाई है। खेतड़ी उपखंड के डाडा फतेहपुरा गांव की महिला ने रक्षाबंधन से महज चार दिन पहले अपने छोटे भाई को किडनी देकर उसे बचा लिया। दोनों ने रक्षाबंधन का पर्व भी दिल्ली के अपोलो अस्पताल में ही मनाया। इस मौके बहन ने अपने भाई के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। खेतड़ी की गुड्डी देवी (49) ने अपने छोटे भाई खुडाना महेंद्रगढ़ निवासी सुंदर सिंह (47) को किडनी दी है। गुड्डी देवी ने बताया कि सुंदरसिंह की तबीयत खराब हो गई थी। इसके चलते दिल्ली के अपोलो अस्पताल में जांच में पता चला कि दोनों किडनी खराब हैं। जल्द ही नहीं बदली तो भाई की जान को खतरा हो सकता है। इस पर गुड्डी देवी ने 19 अगस्त को अपने भाई को किडनी देकर उसकी जान बचा ली।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Aug 2021 11:13:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>जब भूखे का सहारा बने ईश्वर चंद विद्यासागर</title>
                                    <description><![CDATA[स्वतंत्रता सेनानी ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म आज ही के दिन 26 सितंबर, 1820 को मेदिनीपुर में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय एवं माता का नाम भगवती देवी था। वे एक दार्शनिक, अकादमिक शिक्षक, लेखक, अनुवादक, समाज सुधारक और परोपकारी थे। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध ज्ञान होने के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/when-ishwar-chand-vidyasagar-became-the-support-of-the-hungry/article-25014"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-07/when-ishwar-chand-vidyasagar-became-the-support-of-the-hungry.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">स्वतंत्रता सेनानी ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म आज ही के दिन 26 सितंबर, 1820 को मेदिनीपुर में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय एवं माता का नाम भगवती देवी था। वे एक दार्शनिक, अकादमिक शिक्षक, लेखक, अनुवादक, समाज सुधारक और परोपकारी थे। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध ज्ञान होने के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने उन्हें विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी। इसके बाद से उनका नाम ईश्वर चंद्र विद्यासागर हो गया था।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उन दिनों वे कोलकाता के एक समीपवर्ती कस्बे में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त थे। वातावरण में भयानक ठंड बढ़ गई। एक दिन शाम से ही बूंदाबांदी हो रही थी। ईश्वरचंद्र अपने स्वाध्याय में व्यस्त थे, तभी किसी ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी। उन्होंने एक अजनबी को दरवाजे पर खड़ा देखा। अपनेपन से उस अजनबी को घर के भीतर बुलाया। उसे अपने नए कपड़े देकर भीगे वस्त्र बदलने को कहा। वह अतिथि उनके इस प्रेम भरे व्यवहार को देखकर भर्राए गले से बोला- ‘मैं इस कस्बे में नया हूं, यहां मैं अपने एक मित्र से मिलने के लिए आया था। जब मैं उसके घर के बाहर पहुंचा तो पूछने पर पता चला कि वह इस कस्बे से बाहर गया हुआ है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">ये सुनकर निरुपाय होकर मैंने कई लोगों से रात्रिभर के लिए शरण मांगी। लेकिन सभी ने मुझे संदेह की दृष्टि से देखकर दुत्कार दिया। आप पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने …।ईश्वरचंद्र ने कहा- अरे भाई, तुम तो मेरे अतिथि हो। हमारे शास्त्रों में भी तो कहा गया है कि अतिथि देवो भव। मैंने तो सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया है। कहकर उन्होंने अतिथि के सोने के लिए बिस्तर व भोजन की व्यवस्था की। फिर अपने हाथ से अंगीठी जलाकर उसके कमरे में रख दी। सुबह जब वह अतिथि पंडित ईश्वरचंद्र से विदा लेने गया तो वे हंसकर बोले – कहिए अतिथि देवता! रात को ठीक ढंग से नींद तो आई? अतिथि उनके सद्व्यवहार को मन ही मन नमन करते हुए बोला- असली देवता तो आप हैं, जिसने मुझे विपदग्रस्त देखकर मदद की। पूरी जिंदगी उस व्यक्ति के मन में विद्यासागर की करुणामय दवि बसी रही। ऐसी महान विभूति ईश्वरचंद्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई, 1891 को कोलकाता में हुआ था।</h6>
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                <pubDate>Fri, 09 Jul 2021 12:10:31 +0530</pubDate>
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                <title>विज्ञान और आविष्कार की ताकत थे नरसिम्हा</title>
                                    <description><![CDATA[20 जुलाई, 1933 को जन्मे, प्रो नरसिम्हा (Prof. Roddam Narasimha) ने एयरोस्पेस के क्षेत्र में द्रव डायनामिस्ट के रूप में एक पहचान बनाई। वे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वैज्ञानिकी सलाहकार भी रहे थे। प्रो. नरसिम्हा का लड़ाकू विमान लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस की डिजाइनिंग और इसे विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/narasimha-was-the-power-of-science-and-invention/article-21761"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/narasimha-was-the-power-of-science-and-invention.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">20 जुलाई, 1933 को जन्मे, प्रो नरसिम्हा (Prof. Roddam Narasimha) ने एयरोस्पेस के क्षेत्र में द्रव डायनामिस्ट के रूप में एक पहचान बनाई। वे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वैज्ञानिकी सलाहकार भी रहे थे। प्रो. नरसिम्हा का लड़ाकू विमान लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस की डिजाइनिंग और इसे विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वह 2000 से 2014 तक बेंगलुरु के जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च में इंजीनियरिंग मैकेनिक्स यूनिट के अध्यक्ष थे।</p>
<p style="text-align:justify;">नरसिम्हा को साल 2013 में विज्ञान और तकनीकि के क्षेत्र में उनके अपार योगदान के लिए देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। वह भारतीय अंतरिक्ष आयोग के भी सदस्य थे और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ईसरो) के अंतरिक्ष कार्यक्रमों के साथ निकटता से जुड़े थे। साल 1962 से 1999 तक नरसिम्हा शहर के द इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस (आईआईएससी) में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोसेफर रह चुके हैं और वह 1984 से 1993 तक भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (आईसीएसआईआर) के राज्य सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय एयरोस्पेस लेबरेटरीज (एनएएल) के निदेशक भी रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके पारिवारिक मित्रों के अनुसार, वे भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की लीग में थे। डॉ. कलाम और प्रोफेसर नरसिम्हा ने मिलकर एक किताब लिखी थी ‘डेवलपमेंट इन फ्लूइड मैकेनिक्स एंड स्पेस टेक्नोलॉजी।’ वह प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत रत्न से सम्मानित डॉ. सीएनआर राव के अच्छे दोस्त भी थे। वह भारतीय रॉकेट वैज्ञानिक प्रोफेसर सतीश धवन के छात्र थे।</p>
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                                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Feb 2021 16:01:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>समझौता: ब्रिटेन ने चीन को सौंपा ‘हांगकांग’</title>
                                    <description><![CDATA[डेढ़ सौ से भी ज्यादा सालों तक ब्रिटिश उपनिवेश रहे हांगकांग को आज ही के दिन 1984 में चीन ( ‘Hong Kong’ to China) को सौंपने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। ब्रिटेन और चीन ने अगले 13 वर्षों में सत्ता का हस्तांतरण पूरा करने का फैसला लिया। 19 दिसंबर 1984 को ब्रिटेन की ओर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/agreement-britain-handed-over-hong-kong-to-china/article-20666"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/agreement-britain-handed-over-hong-kong-to-china.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">डेढ़ सौ से भी ज्यादा सालों तक ब्रिटिश उपनिवेश रहे हांगकांग को आज ही के दिन 1984 में चीन ( ‘Hong Kong’ to China) को सौंपने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। ब्रिटेन और चीन ने अगले 13 वर्षों में सत्ता का हस्तांतरण पूरा करने का फैसला लिया। 19 दिसंबर 1984 को ब्रिटेन की ओर से प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर और चीनी प्रधानमंत्री झाओ जियांग ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इस संयुक्त सहमति पत्र में तय हुआ कि 1997 तक हांगकांग को चीन को सौंप दिया जाएगा। 155 वर्षों तक हांगकांग में ब्रिटिश कब्जे के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक व कूटनीतिक संबंधों का एक नया अध्याय शुरू हुआ। संयुक्त घोषणा-पत्र में कहा गया कि एक जुलाई 1997 को हांगकांग को पुन: पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को सौंप दिया जाएगा और इस स्थानांतरण की अवधि होगी 50 साल। इस क्षेत्र को ‘हांगकांग स्पेशल एडमिनिस्ट्रेटिव रीजन’ (एसएआर) कहा गया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">ब्रिटेन इसके लिए इस गारंटी पर राजी हुआ कि उसे हांगकांग में ‘विदेश और रक्षा मामलों के अलावा बाकी हर क्षेत्र में ज्यादा स्वायत्तता मिलेगी।’ इसके लिए चीन ने ‘वन कंट्री, टू सिस्टम’ का सिद्धांत लागू किया। जून 1989 में चीन की राजधानी बीजिंग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों को रोकने के लिए सख्त सैनिक कार्रवाई की गई। इसमें कई लोगों की जान चली गई और “तियानमेन स्क्वेयर मैसेकर” के नाम से जाने जानी वाली इस घटना से ब्रिटेन और चीन के रिश्तों में काफी खटास आ गई। इसके तुरंत बाद ब्रिटेन की सरकार ने हांग कांग के करीब 50,000 परिवारों को ब्रिटिश पासपोर्ट दे डाले।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">1992 में हांग कांग के अंतिम गवर्नर क्रिस पैटन ने लोकतांत्रिक सुधारों की शुरूआत की जिसका चीनी सरकार ने कड़ा विरोध किया। सालों तक चली द्विपक्षीय बातचीत की एक लंबी कड़ी के बाद ब्रिटेन और चीन के बीच संबंध फिर सुधरे। फिर 13 साल पहले हुए समझौते को लागू करते हुए 1 जुलाई 1997 को हांग कांग में हुए एक बड़े समारोह में इसे चीन को सौंप दिया गया।</h6>
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                <pubDate>Fri, 18 Dec 2020 21:08:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मौलाना आजाद : जिन्होंने जगाई शिक्षा की अलख</title>
                                    <description><![CDATA[11 नवंबर को भारत में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में शिक्षा के विकास में जबरदस्त भूमिका निभाने वाले पहले शिक्षा मंत्री (Maulana Abul Kalam Azad) मौलाना अबुल कलाम आजाद आज ही के दिन पैदा हुए थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/maulana-azad-who-raised-education/article-19820"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/maulana-azad-who-raised-education.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">11 नवंबर को भारत में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में शिक्षा के विकास में जबरदस्त भूमिका निभाने वाले पहले शिक्षा मंत्री (Maulana Abul Kalam Azad) मौलाना अबुल कलाम आजाद आज ही के दिन पैदा हुए थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने वाले मौलाना आजाद भारत के बंटवारे के घोर विरोधी और हिन्दू मुस्लिम एकता के सबसे बड़े पैरोकारों में थे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">हालांकि वह उर्दू के बेहद काबिल साहित्यकार और पत्रकार थे लेकिन शिक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने उर्दू की जगह इंग्लिश को तरजीह दी, ताकि भारत पश्चिम से कदमताल कर चल सके। 11 नवंबर, 1888 को मक्का में पैदा हुए मौलाना आजाद का मानना था कि अंग्रेजों के जमाने में भारत की पढ़ाई में संस्कृति को अच्छे ढंग से शामिल नहीं किया गया, लिहाजा 1947 में आजादी के बाद शिक्षा मंत्री बनने पर उन्होंने पढ़ाई लिखाई और संस्कृति के मेल पर खास ध्यान दिया। वह भारत के केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन थे, जिसका काम केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर शिक्षा का प्रसार था।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उन्होंने सख्ती से वकालत की कि भारत में धर्म, जाति और लिंग से ऊपर उठ कर 14 साल तक सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जानी चाहिए। वह महिला शिक्षा के खास हिमायती थे। उनकी पहल पर भारत में 1956 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की स्थापना हुई। मौलाना आजाद को एक दूरदर्शी विद्वान माना जाता है, जिन्होंने 1950 के दशक में ही सूचना और तकनीक के क्षेत्र में शिक्षा पर ध्यान देना शुरू कर दिया था।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">शिक्षा मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल में ही भारत में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी का गठन किया गया। मौलाना आजाद पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना के घोर विरोधी थे और उन्होंने अपनी किताब इंडिया विन्स फ्रीडम में आजादी के बारे में कुछ विवादित हिस्सों को भी छुआ है। 1958 में आखिरी सांस लेने तक वह भारत के शिक्षा मंत्री बने रहे। मौलाना आजाद को 1992 में मरणोपरांत भारत के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।</h6>
<h6></h6>
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                <pubDate>Tue, 10 Nov 2020 21:13:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>विज्ञान के क्षेत्र में महान योगदान रहा वेंकट रमन का</title>
                                    <description><![CDATA[दक्षिण भारत के त्रिचुनापल्ली में पिता चंद्रशेखर अय्यर व माता पार्वती अम्मा के घर में 7 नवंबर 1888 को जन्मे भौतिक शास्त्री चंद्रशेखर वेंकट रमन उनके माता-पिता के दूसरे नंबर की संतान थे। उनके पिता चंद्रशेखर अय्यर महाविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता थे। बेहतर शैक्षिक वातावरण में पले बढ़े सीवी रमन ने अनुसंधान के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/venkat-raman-made-a-great-contribution-in-the-field-of-science/article-19751"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/venkat-raman-made-a-great-contribution-in-the-field-of-science.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">दक्षिण भारत के त्रिचुनापल्ली में पिता चंद्रशेखर अय्यर व माता पार्वती अम्मा के घर में 7 नवंबर 1888 को जन्मे भौतिक शास्त्री चंद्रशेखर वेंकट रमन उनके माता-पिता के दूसरे नंबर की संतान थे। उनके पिता चंद्रशेखर अय्यर महाविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता थे। बेहतर शैक्षिक वातावरण में पले बढ़े सीवी रमन ने अनुसंधान के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित किए। भारत में विज्ञान को नई ऊंचाइयां प्रदान करने में उनका काफी बड़ा योगदान रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से भौतिक विज्ञान से स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाले श्री रमन को गोल्ड मैडल प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने भी विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के उन्हें भारत रत्न सम्मान से नवाजा। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दिए जाने वाले प्रतिष्ठित लेनिन शांति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया। उन्होंने महज 11 वर्ष की आयु में उच्चतर माध्यमिक की पढ़ाई पूरी कर ली लेकिन विदेश जाना शायद उनकी किस्मत में नहीं था और स्वास्थ्य खराब होने के कारण वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश नहीं जा सके। उन्होंने 1902 में मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया और 1904 में बीएससी (भौतिकी) की डिग्री हासिल की।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वर्ष 1907 में उन्होंने एमएससी की डिग्री हासिल की। भौतिकी विशेषज्ञ सर सीव. रमन द्वारा ‘रमन इफैक्ट’ की खोज के उपलक्ष्य में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने ही पहली बार तबले और मृदंगम के संनादी (हार्मोनिक) की प्रकृति का पता लगाया था। विज्ञान के क्षेत्र में योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें वर्ष 1929 में नाइटहुड, वर्ष 1954 में भारत रत्न तथा वर्ष 1957 में लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले सीवी रमन पहले भारतीय वैज्ञानिक बने।  ‘रमन प्रभाव’ की खोज भारतीय भौतिक शास्त्री सर सीवी रमन द्वारा दुनिया को दिया गया विशिष्ट उपहार है। इस खोज के लिए उन्हें विश्व प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और भारत में इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। ‘रमन प्रभाव’ विश्व को दिए गए इस अनूठी खोज के बाद ही उन्हें वर्ष 1930 में प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।</h6>
<p> </p>
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                <pubDate>Fri, 06 Nov 2020 21:24:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>करवाचौथ: रिश्तों को प्रेम से सुलाझाएं</title>
                                    <description><![CDATA[आज आधुनिक टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के युग में जहां हम दुनिया के अलग-अलग समुदाय व धर्मों के लोगों से आपस में जुड़ते जा रहे हैं वहीं अपने घर में हमारे संबंध भारत-पाकिस्तान से कम नहीं रह गए हैं। कल बहुत से लोगों ने व्रत रखा होगा जिनमें से कुछ ने इसलिए भी रखा होगा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/karva-chauth-make-relationships-sweet-with-love/article-19713"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/karva-chauth-make-relationships-sweet-with-love.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">आज आधुनिक टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के युग में जहां हम दुनिया के अलग-अलग समुदाय व धर्मों के लोगों से आपस में जुड़ते जा रहे हैं वहीं अपने घर में हमारे संबंध भारत-पाकिस्तान से कम नहीं रह गए हैं। कल बहुत से लोगों ने व्रत रखा होगा जिनमें से कुछ ने इसलिए भी रखा होगा कि नहीं रखेंगे, तो पड़ोस में चिंटू की मम्मी या घर में बड़ों को क्या जवाब देंगे? दुनिया को अपने प्वाइंट समझाते-समझाते हम अपने घर में एक दूसरे की भावनाओं को समझने व समझाने में नाकाम होते जा रहे हैं, वजह चाहे इगो हो या अहंकार हो या चाहे कुछ और हो।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">करवा चौथ एक दूसरे के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक बहुत ही बढ़िया त्यौहार है। आइए, पहले करवा चौथ का व्रत क्यों रखा जाता है। करवा चौथ का व्रत इसलिए रखा जाता है कि इसमें पत्नी अपने सौभाग्य (पति) की रक्षा के लिए व्रत रखती हैं। पर कई बार ऐसे हालात होते हैं की छलनी से देखना तो दूर आपस में एक दूसरे को सामने से देखना भी पसंद नहीं करते। अगर आपस में प्रेम है तो एक दूसरे को समझने की समझ है, अपनी भावनाओं को व दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता है तो हर दिन ही करवा चौथ है ।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">यह लेख, उन मित्रों के लिए है जो अपने हमसफर के साथ सिर्फ सफर काट रहे हैं ना कोई मंजिल है ना कोई उमंग है ना कोई प्रेम है। पति पत्नी का रिश्ता दुनिया का पवित्र और अनोखा रिश्ता है जिसमें दो अजनबी 20-25 साल के बाद मिलते हैं और ताउम्र इकट्ठे रहने की कसम खाते हैं पर यह रिश्ता अविश्वास, अप्रेम, अहंकार, ईगो के साथ कभी भी नहीं चल सकता। जरूरत है, यदि रिश्ते इस बुनियाद पर फंसे हैं तो समय रहते इसको प्रेम से सुलझाएं और जीवन का सही आनंद लें।</h6>
<p style="text-align:right;"><em>लेखक: विकास शर्मा, सच कहूँ</em></p>
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                <pubDate>Wed, 04 Nov 2020 20:44:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>किशोर कुमार: जिन्होंने दुनिया में अपनी आवाज का बिखेरा जादू</title>
                                    <description><![CDATA[आज हिन्दी सिनेमा जगत में शायद ही कोई ऐसा युवा गायक हो जो किशोर कुमार से प्रभावित ना हो। किशोर कुमार, एक ऐसी शख्सियत थे, जिसमें बहुमुखी प्रतिभा होने के साथ वह सब था जिसकी वजह से लोग उन्हें महान मानते थे। एक गायक और अभिनेता होने के साथ किशोर कुमार ने लेखक, निर्देशक, निर्माता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/kishore-kumar-who-spread-the-magic-of-his-voice-in-the-world/article-19180"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/kishore-kumar-who-spread-the-magic-of-his-voice-in-the-world.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">आज हिन्दी सिनेमा जगत में शायद ही कोई ऐसा युवा गायक हो जो किशोर कुमार से प्रभावित ना हो। किशोर कुमार, एक ऐसी शख्सियत थे, जिसमें बहुमुखी प्रतिभा होने के साथ वह सब था जिसकी वजह से लोग उन्हें महान मानते थे। एक गायक और अभिनेता होने के साथ किशोर कुमार ने लेखक, निर्देशक, निर्माता और संवाद लेखक तक की भूमिका निभाई। सिर्फ हिन्दी ही नहीं बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नड़ जैसी कई फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। एक बेहतरीन गायक होने के साथ किशोर कुमार को उनकी कॉमेडियन अदाकारी के लिए आज भी याद किया जाता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">किशोर कुमार का जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में हुआ था। उनका बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था। 4 अगस्त, 1929 को जन्मे आभास कुमार ने फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान किशोर कुमार के नाम से बनाई। फिल्म बॉम्बे टॉकीज से किशोर कुमार ने अपने गायन कॅरियर की शुरूआत की। इस फिल्म में उन्होंने पार्श्व गायक की भूमिका निभाई। 1946 में आई फिल्म शिकारी उनकी पहली ऐसी फिल्म थी जिसमें उन्होंने अभिनेता की भूमिका निभाई थी। इसके बाद 1948 में फिल्म जिद्दी में उन्होंने देव आनंद के लिए गाना गाया था। फिल्म में किशोर कुमार के काम की बहुत प्रशंसा हुई और उनको कई अन्य कार्य भी मिले। संगीत निर्देशक आर.डी. बर्मन ने किशोर कुमार के कॅरियर को बनाने में बहुत मदद की थी। आरडी बर्मन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने मुनीम जी, टैक्सी ड्राइवर, फंटूश, नो दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, गाइड, ज्वेल थीफ, प्रेमपुजारी, तेरे मेरे सपने जैसी फिल्मों में अपनी जादुई आवाज से फिल्मी संगीत के दीवानों को अपना दीवाना बना लिया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">एक अनुमान के अनुसार किशोर कुमार ने वर्ष 1940 से वर्ष 1980 के बीच के अपने कॅरियर के दौरान करीब 574 से अधिक फिल्मों में गाने गाए। वह अक्सर कहा करते थे कि दूध जलेबी खायेंगे खंडवा में बस जाएंगे। लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रह गया। 13 अक्टूबर, 1987 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनकी मौत हो गई। किशोर की जिंदगी में कई ऐसे अहम मोड़ और वाकए हैं जिन्हें एक ब्लॉग में समेट पाना नामुमकिन है फिर भी यह कोशिश आवाज के मस्तमौला किशोर को एक श्रद्धांजलि है।</h6>
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                                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Oct 2020 21:13:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>दुखियों व पीड़ितों का सहारा है यह संस्था</title>
                                    <description><![CDATA[26 अगस्त 1910 को मेसेडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर में जन्मी मदर टेरेसा ने महज 18 साल उम्र में अपना परिवार छोड़ दिया और अपना जीवन समाज सेवा में समर्पित कर दिया था। जब मदर टेरेसा वर्ष 1929 में भारत आईं थी उस समय उनकी उम्र 19 साल थी। मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज एक एनजीओ है, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/this-institution-is-the-support-of-the-sufferer-and-the-victims/article-19026"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/this-institution-is-the-support-of-the-sufferer-and-the-victims.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">26 अगस्त 1910 को मेसेडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर में जन्मी मदर टेरेसा ने महज 18 साल उम्र में अपना परिवार छोड़ दिया और अपना जीवन समाज सेवा में समर्पित कर दिया था। जब मदर टेरेसा वर्ष 1929 में भारत आईं थी उस समय उनकी उम्र 19 साल थी। मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज एक एनजीओ है, जिसकी स्थापना मदर टेरेसा ने की थी। भारत रत्न से सम्मानित मदर टेरेसा ने आज ही के दिन 7 अक्टूबर, 1950 में कोलकाता में इसकी स्थापना की थी। इसकी मुख्य पदाधिकारी सिस्टर प्रेमा, मदर जनरल ऑफ़ मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी हैं। इस संस्था की अलग-अलग शाखाएं देश और विदेश के अलग-अलग हिस्सों में खोली गईं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">फिलहाल इस संस्था की दुनिया के 120 देशों में 4500 से भी ज्यादा शाखाएं हैं। अकेले झारखंड में ही कुल 12 संस्थाएं हैं। इस संस्था में दुनिया भर के गरीब, बीमार, अनाथ और बेघर बच्चों को मदद मिलती है। किसी दुष्कर्म पीड़िता और उसके होने वाले बच्चे की देखभाल इस संस्था में की जाती है। यदि कोई दुष्कर्म पीड़िता गर्भवती होती है और वो अपना बच्चा नहीं चाहती है, तो संस्था उस बच्चे को किसी निसंतान दंपती को भारतीय कानून के तहत गोद लेने का प्रावधान करती है। इसके अलावा मानव तस्करी से छुड़ाई गई लड़कियों और उनके बच्चों को भी इस संस्था में रखा जाता है। संस्था में आने वाली महिलाओं और बच्चों को रहना-खाना दवाइयां और शिक्षा मुफ्त दी जाती हैं। इसके लिए संस्था को देश-दुनिया की कई संस्थाओं से चंदा भी मिलता है, जो करोड़ों रुपये में होता है। मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी के तहत निर्मल हृदय के अलावा भी कई और संस्थाएं हैं। इनमें मिशनरी ऑफ़ चैरिटी ब्रदर्स, मिशनरीज ऑफ़ द वल्ड, मिशन कोलकाता, मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी फादर्स इंडिया और मिशनरीज सिस्टर्स मेरी जैसी कई संस्थाएं हैं। इसके सदस्यों को चार प्रणों के प्रति अंजान रहना होता है: 1- पवित्रता, 2- दरिद्रता, 3- आज्ञाकारिता और 4- प्रण। यह है कि वह व्यक्ति गरीब से गरीब इंसान की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करे।</h6>
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                <pubDate>Tue, 06 Oct 2020 21:47:58 +0530</pubDate>
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                <title>शांति और प्रसन्नता के प्रचारक दलाई लामा</title>
                                    <description><![CDATA[दलाई लामा विश्व में एक तिब्बती धर्मगुरु के रूप में जाने जाते हैं। दलाई लामा को साल 1989 में आज के ही दिन नाबेल का शांति पुरस्कार मिला था। दलाई लामा का वास्तविक नाम ल्हामो धोण्डुप है और उनका जन्म 6 जुलाई साल 1935 को तिब्बत में हुआ था। इनके पिता का नाम चोक्योंग त्सेरिंग […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/dalai-lama-a-preacher-of-peace-and-happiness/article-18905"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/dalai-lama-a-preacher-of-peace-and-happiness.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">दलाई लामा विश्व में एक तिब्बती धर्मगुरु के रूप में जाने जाते हैं। दलाई लामा को साल 1989 में आज के ही दिन नाबेल का शांति पुरस्कार मिला था। दलाई लामा का वास्तविक नाम ल्हामो धोण्डुप है और उनका जन्म 6 जुलाई साल 1935 को तिब्बत में हुआ था। इनके पिता का नाम चोक्योंग त्सेरिंग और माता का नाम डिकी त्सेरिंग था। दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं। मात्र दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। इसके लिए दलाई लामा को एक कड़ी परीक्षा से होकर गुजरना पड़ा था और इस प्रकार ल्हामो धोण्डुप 14वें धर्मगुरु दलाई लामा बन गये। ऐसा विश्वास है कि दलाई लामा अवलोकितेश्वर या चेनेरेजिग का रूप हैं जो कि करुणा के बोधिसत्त्व तथा तिब्बत के संरक्षक संत हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">साल 1949 में चीन ने तिब्बत पर हमला किया जिसके बाद साल 1950 में दलाई लामा से तिब्बत के लोगों ने राजनीतिक विरासत संभालने का अनुरोध किया। 29 मई साल 2011 तक दलाई लामा तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष भी रहे। आज भी उन्हें लोग राष्ट्राध्यक्ष मानते हैं लेकिन साल 2011 के बाद इन्होंने अपनी सारी शक्तियां तिब्बत सरकार को दे दी। तिब्बत पर चीन का कब्जा रहता है लेकिन दलाई लामा इसका विरोध करते हैं इसी कारण चीन दलाई लामा के विरोध को दबाने के लिए अक्सर दलाई लामा को अलगाववादी भी करार देता है। दलाई लामा अक्सर भारत आकर यहां विभिन्न विशिष्ट लोगों और सामान्य जनता से भी मिलते हैं जिसका चीन अपने स्तर से हर मुमकिन विरोध करता है। यहां तक कि चीन की सरकारी मीडिया ये दावा भी कर चुकी है कि दलाई लामा भारत के साथ मिलकर देश विरोधी नीतियों को अंजाम देने का प्रयास करते हैं। दलाई लामा को बौद्ध धर्म के प्रचार के अतिरिक्त पूरी दुनिया में शांति के प्रचार-प्रसार और खुशियां बांटने के लिए साल 1989 में आज के दिन शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। दलाई लामा अभी तक शांति और प्रसन्नता के प्रचार-प्रसार के लिए पूरी दुनिया के 65 से भी अधिक देशों की एक से अधिक बार यात्रा कर चुके हैं। साल 1959 से लेकर अभी तक दलाई लामा को 85 से भी ज्यादा पुरस्कार मिल चुके हैं।</h6>
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                <pubDate>Fri, 02 Oct 2020 21:45:08 +0530</pubDate>
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