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                <title>Migrant Labour - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Migrant Labour RSS Feed</description>
                
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                <title>प्रवासी मजदूरों के खातों में रुपये जमा करे सरकार : राहुल</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने लॉकडाउन के कारण घर वापसी को मजबूर प्रवासी श्रमिकों के साथ सरकार को जिम्मेदारी से पेश आने की सलाह देते हुए मंगलवार को कहा कि उन्हें आर्थिक दिक्कत नहीं हो, इसलिए उनके बैंक खातों में तत्काल छह हजार रुपये जमा कराए जाने चाहिए। गांधी ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/government-should-deposit-money-in-the-accounts-of-migrant-labour-rahul/article-23059"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/rahul-gandhi2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने लॉकडाउन के कारण घर वापसी को मजबूर प्रवासी श्रमिकों के साथ सरकार को जिम्मेदारी से पेश आने की सलाह देते हुए मंगलवार को कहा कि उन्हें आर्थिक दिक्कत नहीं हो, इसलिए उनके बैंक खातों में तत्काल छह हजार रुपये जमा कराए जाने चाहिए। गांधी ने ट्वीट किया, ‘प्रवासी श्रमिक एक बार फिर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में केन्द्र सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि उनके बैंक खातों में रुपए डाले। लेकिन कोरोना फैलाने के लिए जनता को दोष देने वाली सरकार क्या ऐसा जन सहायक कदम उठाएगी। कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि सरकार विपक्ष के नेताओ की बात नहीं सुनती और उनके सुझाव का मजाक उड़ाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष फरवरी में जब गाँधी ने कोरोना महामारी के बारे में चेताया तो सरकार ने पहले मजाक उड़ाया और नमस्ते ट्रम्प मना कर मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार को जबरन गिराया। फिर बगैर बताए घातक लॉकडाउन लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने फिर चेताया कि बगैर इंतजाम लॉकडाउन से गरीब मजदूरों का क्या होगा…सरकार ने फिर से एक न सुनी और इसका नतीजा यह रहा कि देश को आजादी के बाद की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी का मंजर देखने को मिला। कांग्रेस ने प्रवासी मजदूरों का रेल भाड़ा जमा करवाया और बसों का इंतजाम करवाया तो उसका भी पहले मजाक उड़ाया फिर जा कर कहीं-कहीं रेल का इंतजाम करवाया गया। प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि पिछले एक साल में कोरोना टैक्स के नाम पर जनता को लूटा गया, लेकिन न अस्पताल, न डॉक्टर, न वेंटिलेटर, न वैक्सीन और न दवाई उपलब्ध करवाई और न ही 6,000 रुपये की राशि खाते में जमा कराई।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Apr 2021 11:34:29 +0530</pubDate>
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                <title>मुसाफिर हूँ यारों</title>
                                    <description><![CDATA[लगातार मजदूरों के पलायन की बातें सुन सुनकर और टीवी, व्हाट्सएप जैसे बहुत से माध्यमों के द्वारा बड़ी ही दुखदाई फोटो देख-देख कर मन बहुत ज्यादा व्यथित हो रहा था। सोच रहा था क्यों ना कुछ मजदूरों के पास जाकर उनकी स्थिति को जाना जाए। मन के कोतुहल को मिटाने के लिए मैंने इन लोगों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/story-about-migrant-labour/article-21436"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/migrant-labour.jpeg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">लगातार मजदूरों के पलायन की बातें सुन सुनकर और टीवी, व्हाट्सएप जैसे बहुत से माध्यमों के द्वारा बड़ी ही दुखदाई फोटो देख-देख कर मन बहुत ज्यादा व्यथित हो रहा था। सोच रहा था क्यों ना कुछ मजदूरों के पास जाकर उनकी स्थिति को जाना जाए। मन के कोतुहल को मिटाने के लिए मैंने इन लोगों के बीच जाकर इनकी स्थिति को समझने का कुछ प्रयास किया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी करना था और किसी भी तरीके से अपने आप को और दूसरे लोगों को भी कोरोना कि बीमारी से बचाया जाए। इसी विचार के साथ अपने सबसे निकट हाईवे पर पहुँचकर कुछ मजदूरों की परिस्थिति का जायजा लिया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">मैं अपने घर से निकल कर मेरठ रोड की तरफ चल पड़ा। अभी गाजियाबाद से थोड़ी दूरी पर आया ही था। सिहानी चुंगी के पास से एक मजदूरों की अपार भीड़ देखकर कुछ घबराहट सी महसूस हुई। पलायन करने वाले मजदूरों को मैं प्रवासी नहीं कहूँगा। अपने ही देश में इस तरीके का नाम पाने का शायद उन्हें अर्थ भी नहीं पता होगा। मजदूर अकेले नहीं जा रहे थे। छोटे छोटे मासूम बच्चे भी उनके साथ जा रहे थे। वो बच्चे जो मजदूरी नहीं करते हैं। वो अपने मेहनती माता पिता के पूरे दिन मेहनत करने की वजह से स्कूल में पढ़ते है। चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट हो लेकिन जैसे तैसे अपनी पढ़ाई कर रहे थे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सफर की थकान से लिप्त ऐसे ही लगभग 30-32 साल के एक युवक से मैंने पूछा भैया तुम लोग इतना पैदल चलकर जा रहे हो।यह जो बच्चे तुम्हारे साथ हैं। कौन-कौन सी कक्षा में पढ़ते हैं। वह मजदूर इतना भी नहीं बता पाया कि उसके बच्चे कौन सी कक्षा में पढ़ते हैं। उसने कहा भैया मैं इतनी मेहनत करता हूँ। कि मैं अपने बच्चो को पढ़ा सकूं। बस इसी लगन से 12-14 घंटे किसी ना किसी काम पर लगा रहता हूँ और रात को थक कर सो जाता हूँ। कक्षा का तो मैं बता नही पाऊँगा। बस इस बात की खुशी थी कि मेरे बच्चे पढ़ रहे है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अब मेरा मन पहले से भी ज्यादा व्यथित हुआ। वह छोटे-छोटे बच्चे जिनके लिए वह मेहनत कर रहा है ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो जाए। उसे पता भी नहीं कि वह कौन सी कक्षा में पढ़ रहे हैं।शायद इतने घंटे की मेहनत के बाद वह इस तरह बेसुध हो कर सो जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि कब नींद आई और कब रात गई। खैर इन को छोड़कर मैं थोड़ा सा आगे निकला और आगे जाकर मैं एक औरत से मिला।जिसके दो बच्चे थे लगभग दोनों बच्चों के बीच में 1 साल का फर्क था एक 4 साल का और एक लगभग 5 साल का होगा।एक बच्चे को गोद में लिए हुए थी और दूसरा उसके साथ पैदल पैदल चल रहा था।जब पैदल चलने वाला बच्चा थक जाता था तो वह पहले को नीचे छोड़ दूसरे को उठा लेती थी। इसी तरह उन्हें अदल बदल कर अपना सफर तय कर रही थी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">मैंने उससे पूछा इस तरह कब तक कल चलोगे। तुम्हारा पति कहां है, एक बच्चे को वह क्यों नहीं पकड़ता है। तब उस औरत ने अपने पति की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वह जा रहे मेरे पति जिनके सर पर एक भारी सा बक्सा है। जिस तरीके से भारी बक्सा लिए वो चला जा रहा था उसके लिए बच्चे को उठाना नामुमकिन था। उसे देखकर मुझसे और कुछ पूछा ही नही गया और मैं दुखी मन से आगे चल पड़ा। आधे घंटे के सफर में मुझे बहुत ही प्यास लगने लगी।मैंने अपनी गाड़ी से ठंडी पानी की बोतल उठाई और पानी पीना शुरू किया। अचानक मेरी नजर एक बच्चे की तरफ गई। जो मेरठ रोड पर स्थित पीएनबी बैंक के प्याऊ वाले नल से पानी पी रहा था। मन किया गाड़ी वहां छोड़कर उसी पानी को पीकर देखा जाए।जैसे ही मैंने उस नल खोला।उसमें से एक दम गरम पानी आया। मेरी उसे पीने की हिम्मत ही नहीं हुई। जिस पानी को को वो बच्चे आराम से पी रहे थे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इस बीच जगह-जगह मुझे रास्ते में कुछ लोग भी दिखाई दिए। जो कुछ खाने के पैकेट लेकर इन लोगों की सहायता भी कर रहे थे। लेकिन वह सहायता इतनी नहीं थी कि सभी मजदूरों की भूख को खत्म कर सकें। जिसको जहां-जहां जो भी कुछ मिल रहा था।बस वह अपना उससे ही पेट भर कर आगे बढ़ रहा था। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि इस तरह ये लोग कब तक चलेंगे। जहां तक देख रहा था बस मजदूर ही मजदूर नजर आ रहे थे।उनके साथ छोटे-छोटे मासूम बच्चे बस अपनी धुन में अपने मां-बाप के पीछे पीछे चले जा रहे थे। उन्हें ना किसी मंजिल का पता था ना यह पता कितना और चलना होगा।बस यह पता था कि अपने मां-बाप के पीछे पीछे चलना है और वह मां-बाप भी अपनी पूरी ताकत से अपनी मंजिल की तरह जल्दी पहुँचना चाह रहे थे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अपने मन की जिज्ञासा में आकर मैंने एक बुजुर्ग से पूछा कि क्या घर जाकर खाना पीना मिल जाएगा और इस बीमारी से बच जाओगे। उस बुजुर्ग की आंख में एक आशा दिखाई दी और जुबां पर एक बड़ा ही पॉजिटिव जवाब था। ये तो नहीं पता वहां खाना मिलेगा या इस बीमारी से बचेंगे। लेकिन अपने लोगों के बीच में जाकर कुछ दर्द तो दूर हो जाएंगे।उसकी इस बात से मन निशब्द हो गया। यहीं से मैंने वापसी आने का फैसला किया। मन में एक दुख यह भी था। इस पूरे रास्ते में कोई भी सरकारी वाहन, बस या टेंपो मुझे उनकी सहायता करता हुआ दिखाई नहीं दिया। मैं इन सभी लोगों को अपने मंजिल की ओर बढ़ता हुआ छोड़कर वापसी अपने घर की तरफ चल पड़ा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">लगभग 1 घंटे तक मैंने इन लोगों से विचार-विमर्श किया और पाया कि इतनी निराशा के बीच हुई इन लोगों के बीच में एक विश्वास था कि वे जल्द से जल्द अपने घर से पहुंच जाएंगे और अपने लोगों से मिल ही लेंगे। शायद छोटे-छोटे बच्चे जो बीच में ही पढ़ाई छोड़ आए हैं वह बाद में पढ़ लेंगे। अगर जिंदा रहे तो वापसी जरूर करेंगे ,क्योंकि बड़े बड़े शहरों में रह रहे लोगों को इनकी जरूरत हो या ना हो लेकिन ये लोग कल भी इसी उम्मीद में गांव से शहरों की तरफ आए थे, कि इनके बच्चे पढ़ लिखकर जीवन में आगे बढ़ सकें। इन सबके बीच मैंने बस यही अनुभव किया कि भारत मे सरकारे आएंगी और जाएंगी लेकिन इन लोगों का समय ना बदला है और ना ही बदलेगा। बस ये लोग अपने जीवन की अच्छी कल्पना की उम्मीद में जीवन भर चलते ही रहेंगे।</h6>
<h5><strong>-नीरज त्यागी</strong></h5>
<p> </p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Feb 2021 16:07:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कल चाहे जो दावे करें आज कहने को कुछ नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[कहने को हमारे देश में सूचना अधिकार एक्ट है, जो 2005 में लागू हो गया था जिसके अंतर्गत सरकार के किसी भी विभाग से कानूनन जानकारी मांगी जा सकती है लेकिन आज हाल यह है कि लॉकडाउन के दौरान मजदूरों की घर वापिसी संबंधित उनसे किराया वसूलने व खाना मुहैया करवाने संबंधी न तो केंद्र […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/claim-by-government-on-migrant-labour/article-15722"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-05/migrant-labour.jpeg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">कहने को हमारे देश में सूचना अधिकार एक्ट है, जो 2005 में लागू हो गया था जिसके अंतर्गत सरकार के किसी भी विभाग से कानूनन जानकारी मांगी जा सकती है लेकिन आज हाल यह है कि लॉकडाउन के दौरान मजदूरों की घर वापिसी संबंधित उनसे किराया वसूलने व खाना मुहैया करवाने संबंधी न तो केंद्र सरकार व न ही राज्य सरकार के पास कोई जानकारी है। जब सुप्रीम कोर्ट के पूछे जाने पर भी जानकारी नहीं मिल रही तब आम आदमी की क्या औकात। मामला यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर संज्ञान लिया था कि मजदूरों की वापिसी दौरान केंद्र व राज्य सरकारों ने गलती की है, जिस कारण मजदूर बदहाल हैं, कहीं सड़क हादसों में मजदूर मारे गए, लाखों पैदल जा रहे हैं, कुछ भूख-प्यास से मर रहे हैं और अब गर्मी के कहर ने उन्हें बेहाल कर दिया है।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में 91 लाख मजदूरों की वापिसी व साथ ही खाना उपलब्ध करवाने की बात कही है किंतु यहां दूसरे पक्ष के वकील की यह दलील भी वाजिब है कि मजदूर चार करोड़ के करीब हैं बाकी तीन करोड़ का क्या बना? हालांकि स्पष्ट है कि यदि 91 लाख रेल व सड़कों के माध्यम से घर वापिस लौटे हैं तब बाकी करोड़ों मजदूर दुखी व फटे हाल पैदल लौट रहे हैं जिनके पास न तो किराया है और न ही रास्ते में कोई रोटी-पानी का प्रबंध। यहां चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का सवाल भी महत्वपूर्ण है कि केंद्र व राज्य सरकारें कह रही हैं कि मजदूरों के किराया का उन्होंने भुगतान किया है तब फिर मजदूरों से किराया किसने वसूल किया? जहां तक आज के कम्प्यूटरीकृत व प्रशासनिक ढांचें का सम्बन्ध है, सरकारों के पास सारा रिकार्ड होना चाहिए जो अदालत में पेश किया जा सकता है, बाकी जो मजदूर पैदल जा रहे थे उन्हें रोक कर यातायात उपलब्ध करवाने की कोशिश क्यों नहीं की गई।</h5>
<h5 style="text-align:justify;">यह मामला चिंताजनक है कि एक लड़की अपने बीमार पिता को साइकिल पर बिठाकर 1200 किलोमीटर दिल्ली से बिहार ले गई, जिसकी सूचना अमेरिका के राष्ट्रपति की बेटी इंवाका के कानों तक भी पहुंच गई है, लेकिन हमारे देश के नेता जो पल-पल मीडिया का एक-एक शब्द पढ़ते रहते हैं उन्हें उस लड़की की मुश्किलों भरे सफर की कोई जानकारी क्यों नहीं रही? बेशक कल केंद्र व राज्य सरकारें अपने-अपने दावों के कागजात कोर्ट में पेश करती फिरें लेकिन आज देश की सबसे बड़ी अदालत में कहने के लिए उनके पास कुछ नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को सूचना का अधिकार प्राप्त है लेकिन इस मामले में सरकारों की चुप्पी उनकी जिम्मेदारी निभाने की वचनबद्धता पर सवाल खड़े कर रही है।</h5>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Fri, 29 May 2020 11:53:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>भागलपुर में ट्रक और बस की टक्कर में सात प्रवासी की मौत, 12 घायल</title>
                                    <description><![CDATA[भागलपुर। बिहार में भागलपुर जिले के खरीक थाना क्षेत्र के अंबो मोड़ के निकट राष्ट्रीय उच्च मार्ग-31 पर आज सुबह ट्रक और बस के बीच हुयी टक्कर में कम से कम सात प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई तथा 12 लोग घायल हो गये। नवगछिया के अनुमंडल पदाधिकारी मुकेश कुमार ने यहां बताया कि ट्रक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/seven-migrant-killed-in-truck-and-bus-collision-in-bhagalpur/article-15449"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-05/accident-..jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>भागलपुर।</strong> बिहार में भागलपुर जिले के खरीक थाना क्षेत्र के अंबो मोड़ के निकट राष्ट्रीय उच्च मार्ग-31 पर आज सुबह ट्रक और बस के बीच हुयी टक्कर में कम से कम सात प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई तथा 12 लोग घायल हो गये। नवगछिया के अनुमंडल पदाधिकारी मुकेश कुमार ने यहां बताया कि ट्रक पर सवार प्रवासी मजदूर खगड़िया की ओर जा रहे थे, तभी अंबो मोड़ के निकट बस और ट्रक में टक्कर हो गयी। इस दुर्घटना के बाद ट्रक पलट कर सड़क किनारे गड्ढे में जा गिरी। उन्होंने बताया कि ट्रक मे लदे लोहे के मोटे रॉड से दब जाने से मजदूरों की मौत की आशंका है।</p>
<p style="text-align:justify;">सात मृतकों के शवों को बाहर निकाल लिया गया है जबकि क्रेन की मदद से अन्य को बाहर निकालने का काम जारी है। कुमार ने बताया कि बस पर सवार मजदूर दरभंगा से बांका जा रहे थे। बस पर सवार 12 मजदूर घायल हो गये हैं जिन्हें नवगछिया के अनुमंडलीय अस्पताल मे भर्ती कराया गया है। उन्होंने बताया कि घटना की जानकारी मिलते हीं प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौके पर कैप कर रहे हैं। राहत और बचाव कार्य जारी है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2020 10:32:23 +0530</pubDate>
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