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                <title>Mentality - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>ईवीएम की खराबी बनाम दलों की मानसिकता</title>
                                    <description><![CDATA[देश में एक बार फिर से विद्युतीय मतदान यंत्र यानी ईवीएम के विरोध में स्वर मुखरित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। देश के सत्रह राजनीतिक दलों के नेता ईवीएम के बारे में गड़बड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं। वर्तमान राजनीति की वास्तविकता यही है कि जो भी राजनीतिक दल चुनाव में पराजय का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/evm-malfunction-vs-mentality-of-parties/article-5169"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/evm.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में एक बार फिर से विद्युतीय मतदान यंत्र यानी ईवीएम के विरोध में स्वर मुखरित होते हुए दिखाई दे रहे हैं। देश के सत्रह राजनीतिक दलों के नेता ईवीएम के बारे में गड़बड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं। वर्तमान राजनीति की वास्तविकता यही है कि जो भी राजनीतिक दल चुनाव में पराजय का सामना करता है, वह अपनी हार को स्वीकार न करते हुए कोई न कोई बहाने की तलाश करता है। वह ऐसा प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि उनकी पराजय में ईवीएम का ही हाथ है। अगर ऐसा होता तो स्वाभाविक रुप से पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से पराजित होकर सत्ता से बाहर नहीं होती, क्योंकि वह भी ईवीएम में गड़बडी कर सकती थी। वास्तविकता यही है कि राजनीतिक दल अपनी हार को छुपाने के लिए ही इस प्रकार के आरोप लगाने की राजनीति कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में ईवीएम को हटाकर जिस प्रकार से मत पत्रों से चुनाव कराने की कवायद की जा रही है, वह निश्चित रुप से मतदान की प्रक्रिया को बहुत धीमा करने वाला प्रयास ही कहा जाएगा। देश में जब बैलेट पेपर से चुनाव की प्रक्रिया होती थी, तब अनेक स्थानों से ऐसी खबरें भी आती थीं कि अमुक राजनीतिक दल के गुंडों ने मतदान केन्द्र पर कब्जा करके पूरे मत पत्रों पर अपनी पार्टी की मुहर लगाकर मतदान कर दिया। मत पत्रों के आधार पर किए जाने वाले चुनाव लोकतंत्र पर आधारित न होकर बाहुबल के आधार पर ही किए जाते हैं। मात्र इसी कारण ही कई क्षेत्रों से बाहुबली चुनकर भी आ जाते हैं। ईवीएम से मतदान होना निसंदेह समस्त चुनावी गड़बड़ियों पर रोक लगाने का काम करता है। क्योंकि प्रत्येक मतदान पर बीप की ध्वनि निकलने के पश्चात ही मत डाला जाता है, जिससे एक व्यक्ति किसी भी हालत में कई मत नहीं डाल सकता। इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि ईवीएम के बजाय मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की मांग लोकतंत्र को प्रभावित करने वाली ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">विगत लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद देश की जो राजनीतिक तसवीर बनी उससे कई राजनीतिक दलों के पैरों तले जमीन ही खिसक गई। कांग्रेस, सपा व बसपा का व्यापक जनाधार पूरी तरह से खिसक गया था। इसके बाद इन दलों के साथ ही आम आदमी पार्टी ने ईवीएम को लेकर ऐसा हंगामा किया कि जैसे यह परिणाम ईवीएम का कमाल है। इस समय ज्यादा विरोध होने के बाद चुनाव आयोग ने भी इन राजनीतिक दलों के बयानों को एक चुनौती के रुप में स्वीकार किया। चुनाव आयोग ने दिनांक तय करके कहा कि ईवीएम पूरी तरह से सुरक्षित हैं, किसी में दम हो तो ईवीएम को हैक करके दिखाए। इसके बाद इन सभी राजनीतिक दलों की बोलती बंद हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">ईवीएम हैक करने के लिए कोई भी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ। इसका मतलब साफ था कि ईवीएम को लेकर जो हंगामा किया गया था, वह पूरी तरह से देश की जनता को गुमराह करने के लिए खेला गया ऐ नाटक ही था। जो दल चुनाव आयोग के बुलाने पर पहुंचे थे, उनके द्वारा कहा गया कि ईवीएम तो सही है, हम केवल ईवीएम का प्रदर्शन देखने आए थे। आज जो राजनीतिक दल ईवीएम पर सवाल उठाकर मत पत्रों से चुनाव कराने की बात कह रहे हैं, उन्होंने भी उस समय कुछ नहीं बोला, जब चुनाव आयोग ने बुलाया था। दिल्ली राज्य की सत्ता संभालने वाली आम आदमी पार्टी ने भी ईवीएम की निष्पक्षता को लेकर खूब हंगामा किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तो ताल ठोकने वाले अंदाज में कहा था कि हम ईवीएम को हैक करके दिखाएंगे, इतना ही नहीं आप के विधायक सौरभ भारद्वाज ने यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया था कि ईवीएम को हैक कैसे किया जा सकता है, लेकिन बाद में उनकी भी हैकड़ी निकलती हुई दिखाई दी। वह भी इतना पीछे हट गए कि बाद में स्वर ही नहीं निकले।दिल्ली राज्य में व्यापक सफलता प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को उस समय ईवीएम में किसी भी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं दिखाई दी, जब दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को छप्पर फाड़ समर्थन दिया था। उसे वह जनता की जीत बताते हुए नहीं थक रहे थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि लोकसभा के चुनावों में ईवीएम खराब हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तविकता यही है कि ईवीएम में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है और हो भी नहीं सकती, क्योंकि अगर गड़बड़ी होती तो आज प्रत्येक राजनीतिक दल के पास आईटी विशेषज्ञ हैं, जो कंप्यूटरी कृत मशीनों को हैक करना भी जानते हैं। उनके ये विशेषज्ञ ईवीएम को भी हैक करके दिखा सकते थे, लेकिन चूंकि ईवीएम में कोई गड़बड़ी थी ही नहीं तो फिर हैक कैसे की जा सकती थी।आज जिस प्रकार से मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की बात हो रही है, वह पराजित मानसिक अवस्था का ही प्रदर्शन माना जा रहा है। लोकसभा और विधानसभा में हारे हुए राजनीतिक दलों को मत पत्रों से चुनाव कराए जाने की मांग के बजाय उन बातों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है, जिनके कारण वे पराजित हुए हैं। कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक स्थिति उसकी स्वयं की देन है, क्योंकि उसके शासनकाल में जिस प्रकार प्रतिदिन भ्रष्टाचार करने की खबरें आ रही थीं, उसके कारण देश की जनता व्यापक परिवर्तन करने का मन बना चुकी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा कांग्रेस ने देश में तुष्टिकरण का भी खेल खेला। लेकिन इसका लाभ भी कांग्रेस को नहीं मिल सका, क्योंकि देश में कई राजनीतिक दल आज भी खुलेआम तुष्टिकरण की भाषा बोलने में सिद्ध हस्त हो चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने समझदारी दिखाई, और उसी के हिसाब से परिणाम सामने आए। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती की पार्टी लोकसभा में खाता भी नहीं खोल पाई थी, इसका मलाल उनकी बातों में दिखाई देता है। उत्तरप्रदेश में लोकसभा और विधानसभा के बाद बसपा की जो राजनीतिक स्थिति बनी, उसने बसपा के जनाधार को जमीन सुंघाने का काम किया। लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी हार ठीकरा ईवीएम पर फोड़ दिया। इसी प्रकार 2014 में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस और सपा केवल एक परिवार की पार्टी बनकर ही रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा सुनियोजित तरीके से मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की मांग की जा रही है। लोकसभा चुनाव के चार साल बाद भी वे देश की जनता का विचार नहीं जान पाएं हैं। जितना वे ईवीएम के लिए चिल्ला रहे हैं, उतना अपनी कार्यशैली में सुधार करने की कार्यवाही करते तो संभवत: जनता के मन में स्थान बना पाने में समर्थ होते। हार की समीक्षा की जानी चाहिए थी, लेकिन हमारे देश के राजनीतिक दलों ने समीक्षा न करके बहाने तलाशने प्रारंभ कर दिए। ईवीएम में गड़बड़ी का बहाना भी ऐसा ही है। जबकि सच यह है कि मत पत्रों के आधार पर होने वाले चुनावों में गड़बड़ी की संभावना अधिक रहती है, जिसे जनता भी जानती है और राजनीतिक दल भी जानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ईवीएम पर संदेह व्यक्त करने वाले राजनीतिक दलों का भ्रम दूर हो सके, इसके लिए चुनाव आयोग ने अब मतदान के बाद ऐसी पर्ची प्राप्त करने की सुविधा भी जोड़ दी है, जिसके आधार पर पता चल सके कि उसने किस पार्टी को मत दिया है। इसके बाद राजनीतिक दलों को संदेह समाप्त हो जाना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि इन राजनीतिक दलों द्वारा मत पत्र से चुनाव कराए जाने के पीछे कुछ और ही मंशा है। यह भी हो सकता है कि इसके माध्यम से मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने जैसी कार्यवाही को अंजाम दिया जा सके। मतदाताओं को डरा, धमकाकर भगा दिया जाए और बाहुबल के सहारे एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान कराया जा सके। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ईवीएम में खराबी नहीं है, खराबी तो राजनीतिक दलों की मानसिकता में है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Aug 2018 10:24:33 +0530</pubDate>
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                <title>कला में राजनैतिक दखल व राजनैतिक कलाकार</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज नेहलानी ने इस्तीफे के बाद जो खुलासे किए हैं वह राजनैतिक पतन की निशानी है। राजनेता कला को अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं। कौन सी फिल्म को हरी झंडी देनी है, कौन सी फिल्म पर कितने कट लगाने हैं, यह भी मंत्रियों की मनमर्जी पर निर्भर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/political-interventions-and-political-artists-in-art/article-3271"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/censor-board.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज नेहलानी ने इस्तीफे के बाद जो खुलासे किए हैं वह राजनैतिक पतन की निशानी है। राजनेता कला को अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं। कौन सी फिल्म को हरी झंडी देनी है, कौन सी फिल्म पर कितने कट लगाने हैं, यह भी मंत्रियों की मनमर्जी पर निर्भर करता है। यदि कोई अधिकारी स्वतंत्र होकर काम करता है तो उसे पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। नेहलानी ने दावा किया है कि एक मंत्रालय फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को रिलीज करने की अनुमति नहीं देना चाहता था।</p>
<p style="text-align:justify;">नेहलानी की तारीफ करनी बनती है जिन्होंने अध्यक्ष रहते हुए बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र रूप से फिल्मों के संबंध में निर्णय लिए, किंतु सिक्के का दूसरा पहलू काला है। यदि राजनेता कला में दखलअंदाजी करते हैं तो कलाकार भी राजनैतिक नेताओं की मंशा अनुसार फिल्मों का विषय तय करने की मानसिकता का शिकार हो रहे हैं, जो अपने आप में कला का अपमान है। ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म तब आई जब पंजाब विधानसभा चुनाव सिर पर थे। इस फिल्म में पंजाब में नशे की चपेट में आए युवाओं को दिखाया गया, जिससे शिरोमणी अकाली दल को चुनावों में नुक्सान पहुंचना तय था। अकाली दल ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका विरोध कर फिल्म के प्रसार व सिनेमाघरों में पहुंचने पर विलम्ब करवा दिया। कलाकार राजनैतिक नेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर चुनावों पर आधारित फिल्में बनाने लग जाते हैं। यहां कला, कला न रहकर राजनैतिक प्रचार बन जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कलाकार कला को बेचने लगता है। नि:संदेह सब पैसों का खेल बन जाता है। पैसे के बिना कुछ नहीं होता। राजनेता सत्ता में आने के लिए हर तौर-तरीके इस्तेमाल करते हैं किंतु जब किसी वस्तु को बुरी मंशा से इस्तेमाल किया जाए तो वह हथकंडा बन जाता है। सत्ता के खेल में कला का हथकंडा बनना कलाकार को बेईमान साबित करता है। कला के लिए आजादी जरूरी है, लेकिन आजादी के नाम पर किसी और के हाथ में खेलना कला का केवल प्रदर्शन है। राजनैतिक विषयों पर फिल्म बनाना गलत नहीं लेकिन राजनैतिक विचारधारा से फिल्म बनाना गलत है। अब ‘इन्दू सरकार’ की भी चर्चा हो रही है। फिल्मों की रिलीजिंग के लिए अदालतों के चक्कर भी लगा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस घमासान में न तो राजनेता और न ही कलाकारों को क्लीन चिट दी जा सकती है। हर कला संदेश देती है लेकिन संदेश पर कला का ठप्पा लगाना कला को कमजोर करता है। कलाकार समाज की बेहतरी के लिए मानवीय जीवन को पेश करें। राजनेता फिल्मों को अपने उद्देश्य अनुसार बनवाने की बजाय कलाकारों द्वारा बनाई गई फिल्म में खुद की पहचान करें। फिल्म में दिखाए जा रहे जीवन दृश्य में से राजनेता यह जरूर देखें कि समाज कहां खड़ा है और उसे कहां ले जाने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Sun, 20 Aug 2017 04:21:22 +0530</pubDate>
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                <title>पाकिस्तान परस्त मानसिकता और कश्मीर का दर्द</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान में भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम के चलते निश्चित ही पाकिस्तान के मंसूबे ध्वस्त हो रहे होंगे। इसमें सबसे बड़ी बात यह है भारत की जनता भी यह समझने लगी है कि धीरे धीरे यह अब राष्ट्रद्रोही भाषा बोलने वालों के दिन लद चुके हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे बयानों पर जिस प्रकार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/pakistans-persistent-mentality-and-the-pain-of-kashmir/article-812"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/pathar-baj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान में भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम के चलते निश्चित ही पाकिस्तान के मंसूबे ध्वस्त हो रहे होंगे। इसमें सबसे बड़ी बात यह है भारत की जनता भी यह समझने लगी है कि धीरे धीरे यह अब राष्ट्रद्रोही भाषा बोलने वालों के दिन लद चुके हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे बयानों पर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, उससे तो ऐसा ही लगता है कि देश में एक बार फिर से राष्ट्रवाद का ज्वार प्रकट हो रहा है और भारत विरोधी मानसिकता दम तोड़ती हुई नजर आने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान की ओर से संचालित किए जा रहे आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकी बुरहान बानी और अब सब्जार अहमद की मौत के बाद पाकिस्तान को गहरा आघात लगा ही होगा। भारतीय सेना की ओर से की गई इस जवाबी कार्यवाही के बाद उत्पन्न हुए हालातों के चलते पाकिस्तान सुधरेगा, इस बात की कल्पना करना निरर्थक ही कहा जाएगा। क्योंकि जिस प्रकार बुरहान के मारे जाने के बाद पाकिस्तान के आतंकी आकाओं में घाटी में सक्रियता दिखाई थी, वैसी ही संभावनाओं की तलाश करता हुआ पाकिस्तान अपने आपको प्रस्तुत करेगा। इसलिए भारत सरकार को अब कश्मीर मामले में अत्यंत सचेत रहने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के चलते कश्मीर में जिस प्रकार के हालात बने हुए हैं, उनसे यही कहा जा सकता है कि पाकिस्तान द्वारा इस मुद्दे को हमेशा उलझाए रखने की कवायद करता रहा है। इतना ही नहीं उसका यह खेल अब सारी दुनिया के सामने उजागर हो चुका है। अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश यह तो मानने लगा है कि पाकिस्तान के कारण ही कश्मीर के हालात बिगड़ रहे हैं, लेकिन कश्मीर को लेकर अमेरिका को पाकिस्तान पर जैसी कार्यवाही करना चाहिए, वैसी वह नहीं कर पा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके पीछे उसके अपने हित हो सकते हैं, लेकिन अमेरिका का इस प्रकार का दोहरा रवैया कहीं न कहीं पाकिस्तान को समर्थन करता हुआ दिखाई देता है। अमेरिका का यह अघोषित समर्थन अप्रत्यक्ष रुप से भारत के विरोध में उठाया गया कदम माना जा सकता है। ऐसी बात नहीं है कि आतंकवाद से अमेरिका पीड़ित नहीं है। वहां भी दिल दहलाने वाली घटनाओं को आतंकियों ने अंजाम दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इतना ही नहीं अमेरिका ने आतंक के विरोध में जोरदार अभियान भी चलाया था, लेकिन पाकिस्तान के प्रति उसके अभियान में नरमी क्यों आ जाती है। हालांकि अमेरिका द्वारा बरती जा रही यह नरमी कहीं न कहीं पाकिस्तान को बहुत बड़े नुकसान की ओर ले जाने का प्रयास सिद्ध हो रहा है। कश्मीर घाटी में आतंकी षड्यंत्र रचने वाले पाकिस्तानी सपोलों को भारतीय सेना द्वारा धराशायी किए जाने से पाकिस्तान बौखला गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आतंकवादी ताकतें लगातार भारत के विरोध में अलगाववादी बनाकर कश्मीर घाटी में स्थापित किए गए अपने दलालों के माध्यम से पाकिस्तान लगातार कश्मीर घाटी का माहौल खराब करने का प्रयास करता रहा है। पाकिस्तान जहां एक ओर आतंकियों की घुसपैठ कराकर कश्मीर को कब्जाने का प्रयास कर रहा है, वहीं स्थानीय युवाओं को लालच और भयभीत कर भारतीय सेना के खिलाफ बंदूक उठाने के लिए भी जोर लगा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकी बुरहान बानी और सब्जार अहमद की मौत से निश्चित ही पाकिस्तान को बड़ा झटका लगा है। कारण पाकिस्तान ने इन दोनों को ही कश्मीर घाटी में युवाओं को बरगलाने का ठेका दे रखा था। बदले में पैसा, हथियार और ऐशो आराम का सामान इन आतंकियों को भेजा जाता रहा है। पाकिस्तान घाटी के उन युवाओं, नौजवानों को भारतीय सेना के विरुद्ध खड़ा करना चाहता है, जो कल के कश्मीर का उज्जवल भविष्य गढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार जिन युवाओं के हाथ में पेन थमाकर उन्हें शिक्षित करना चाहती है, पाकिस्तान उन्हें बचपन से ही बंदूक थमाकर आतंकी बनाना चाहता है। कश्मीर के बारे में एक कहावत अत्यधिक प्रचारित है कि वह खाता भारत का है और बजाता पाकिस्तान का है। भारत की वर्तमान केन्द्र सरकार युवाओं को बंदूक पकड़ने की राह से अलग कर उनका उज्जवल भविष्य बनाने की दिशा में प्रयत्नशील है, लेकिन पाकिस्तान युवाओं को ऐसी राह पर ले जाने का भरसक प्रयास कर रहा है, जो उनकी प्रगति और विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में वर्तमान हालात ऐसे हैं जो यह सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं कि भारत सरकार जो आर्थिक सहायता उपलब्ध करा रही है, वह किसके हाथ में जा रही है। वह आम कश्मीरी युवाओं के हिस्से में जा रहा है अथवा आतंकियों के पास। विगत ढाई-तीन दशक में कश्मीरी पंडितों को विस्थापित कर और पाकिस्तानी नागरिकों और आतंकियों को स्थापित कर पाकिस्तान ने निश्चित ही कश्मीर घाटी में भारतीय समर्थन को भौतिक और मानसिक रूप में असंतुलित करने का प्रयास किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी सरकार ने पाकिस्तानी आतंकियों के रास्ते बंद किए और घाटी में छुपे बैठे आतंकियों को खोजना शुरू किया तो पाकिस्तान और चीन की पैरवी करने वाले कुछ भारतीय राजनेताओं के पेट में मरोड़ होने लगी। कश्मीर घाटी में सेना पर पत्थर और गोलियां बरसाने वाले आतंकियों की मौत पर विलाप करते पाकिस्तानियों का छाती पीटना तो उन्हें दिखाई दिया,</p>
<p style="text-align:justify;">हिन्दुस्तानी सीमाओं की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर वाले भारतीय वीर सपूतों के सिर कटे धड़, पति और पिता के विछोह में विलाप करती वीरांगनाओं व मासूमों के आंसू और बेटे के शव पर बिलखती मां की वेदना इन्हें सुनाई नहीं दी। राष्टÑ की रक्षा के लिए तैनात जवानों के हितों पर देश की जनता कतई राजनीति नहीं चाहती।</p>
<p style="text-align:justify;">घाटी में सेना पर पत्थर बरसाने वाले पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के प्रति आम हिन्दुस्तानी नागरिक संवेदनाएं नहीं रखता। वह चाहता है कि आतंकवादियों की ढाल बनकर सेना पर पत्थर बरसाने वाले आतंकियों पर सीधे गोलियां दागी जाएं। फिर कौन वह तथाकथित नेता हैं जो वोटों के लिए घाटी के पत्थरबाजों और बुरहान बानी जैसे आतंकियों का समर्थन करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे नेता क्या दुश्मन देश का हौसला नहीं बढ़ा रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि इन नेताओं को आतंकियों का समर्थन करने के लिए साधन मिलते हों? यह सब जांच का विषय हो सकता है, लेकिन यह बात अत्यंत चिंतनीय है कि भारतीय सेना की कार्यवाही की आलोचना होना देश के लिए विनाशकारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बात के लिए राजनेताओं का सिरे से चिन्तन करने की आवश्यकता है कि कहीं हम अपने राजनीतिक स्वार्थों के चलते देश को गर्त में तो नहीं ले जा रहे? वास्तव में देश की सुरक्षा के लिए की कार्यवाही के लिए भारतीय सेना की प्रशंसा करना चाहिए। जैसा अन्य देशों में होता है।हमारे देश में नेताओं द्वारा बोली जाने वाली भाषा के आधार पर कई बार उनके आतंकियों से तार जुड़े होने की आशंका भी की गई है। राजनेताओं को सबसे पहले यह सोचना होगा कि वह सबसे पहले भारत के नागरिक हैं। अगर भारत खंडित होगा, तो उनका भी अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong>सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 02 Jun 2017 23:42:02 +0530</pubDate>
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