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                <title>मुद्दे बनाम राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[पंजाब विधान सभा का एक दिवसीय मानसून सत्र बड़े ही गंभीर सवाल छोड़ गया है, जो राजनीतिक पतन का प्रमाण है। पंजाब के 29 विधायक कोरोना पीड़ित और कई उनके संपर्क में हैं। विपक्ष आम आदमी पार्टी का भी विधायक मनजीत सिंह बिलासपुर भी कोरोना पीड़ित है व पार्टी के कई विधायक उनके संपर्क में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/issues-and-politics/article-17917"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/will-politics-be-crime-free.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पंजाब विधान सभा का एक दिवसीय मानसून सत्र बड़े ही गंभीर सवाल छोड़ गया है, जो राजनीतिक पतन का प्रमाण है। पंजाब के 29 विधायक कोरोना पीड़ित और कई उनके संपर्क में हैं। विपक्ष आम आदमी पार्टी का भी विधायक मनजीत सिंह बिलासपुर भी कोरोना पीड़ित है व पार्टी के कई विधायक उनके संपर्क में थे। सभी विधायकों ने गत दिवस उनके साथ भोजन किया था। स्वास्थ्य विभाग के प्रोटोकल के अनुसार कोरोना पीड़ता या संपर्क में आने वालों को सत्र में भाग नहीं लेना चाहिए था। मुख्यमंत्री और स्पीकर की विनती के बावजूद आम आदमी पार्टी के कोरोना संपर्क वाले सदस्य सदन में भाग लेने के लिए पहुंचे। पुलिस ने उन्हें सदन में दाखिल होने से रोका। इसी तरह कांग्रेस का एक विधायक बुखार होने के बावजूद सदन में पहुंचा व सत्र के बाद उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मौके न तो सरकार ने व न ही विपक्ष के विधायकों द्वारा नियमों का पालन किया गया। आम आदमी के दो विधायक अमन अरोड़ा व प्रो. बलजिन्द्र कौर को कोरोना पीड़ित के संपर्क में आने के बावजूद उन्हें सदन में जाने दिया गया। इस मामले में हरपाल चीमा को रोकने का कोई औचित्य नहीं था, क्योंकि वे अपने साथ नेगेटिव रिपोर्ट लेकर पहुंचे थे। दरअसल कोरोना महामारी से पूरा देश परेशान है और 33 लाख मरीज सामने आ चुके हैं। इन परिस्थितियों में लोगों के चुने हुए नुमाइंदों को आम जनता के लिए प्रेरक बनना चाहिए था। इस मामले में हरियाणा से भी काफी कुछ सीखने की आवश्यकता थी जहां मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर स्पीकर ज्ञानचंद ने कोरोना पीड़ित होने पर सत्र में भाग नहीं लिया। यह पहली बार हुआ है जब हरियाणा विधानसभा में सत्र की कार्यवाही बिना मुख्यमंत्री और स्पीकर के चली। नि:संदेह जनता के मुद्दों की अपनी महत्वता है लेकिन देश के हालातों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">महामारी के कारण कई दिन चलने वाले सत्र को एक दिवसीय करना इस तथ्य की गवाही भरता है कि केंद्र से लेकर राज्य सरकारें सत्र को लंबा नहीं खींचना चाहती। पिछले करीब पांच माह से लॉकडाऊन से अनलॉक के दौरान सभी राज्य सरकारें ही लोगों को घरों में रहने की अपील कर रही हैं। इन परिस्थितियों में कोरोना पीड़ितों के संपर्क में आने वाले लोगों का सार्वजनिक स्थानों पर जाकर बैठना उचित नहीं। यह स्वास्थ्य विभाग के नियमों की भी उल्लंघना है। एक तरफ राजनीतिक दल नीट और जेईई की परीक्षा करवाने का विरोध यह तर्क देकर कर रहे हैं कि विद्यार्थियों कोरोना का शिकार हो जाएंगे, फिर विधायकों का कोरोना पीड़ित या संपर्क में होने के बावजूद विधानसभा में जाना कहां तक सही है। यह केवल विधायकों के स्वास्थ्य का ही सवाल नहीं है बल्कि पूरे देश की जनता का सवाल है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Aug 2020 09:45:41 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सरसा में स्वास्थ्य मामलों की जांच के लिए बनेगा ‘चिकित्सक बोर्ड’</title>
                                    <description><![CDATA[कष्ट निवारण समिति की बैठक में राज्यमंत्री कृष्ण बेदी ने 30 में से 14 शिकायतों का किया निपटारा राज्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग की तीन शिकायतों पर दिखाई तल्खी सच कहूँ-सुनील वर्मा/सरसा। पंचायत भवन में शनिवार को आयोजित कष्ट निवारण समिति की बैठक में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री राज्य मंत्री कृष्ण कुमार बेदी के समक्ष […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/medical-board-will-be-formed-to-investigate-health-issues-in-sirsa/article-4447"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/medical.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">कष्ट निवारण समिति की बैठक में राज्यमंत्री कृष्ण बेदी<br />
ने 30 में से 14 शिकायतों का किया निपटारा</h1>
<ul>
<li><strong>राज्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग की तीन शिकायतों पर दिखाई तल्खी</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ-सुनील वर्मा/सरसा।</strong> पंचायत भवन में शनिवार को आयोजित कष्ट निवारण समिति की बैठक में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री राज्य मंत्री कृष्ण कुमार बेदी के समक्ष कुल 30 शिकायतें रखी गई जिनमें से 14 शिकायतों का मौके पर ही निपटान कर दिया गया तथा शेष शिकायतों बारे संबंधित अधिकारियों को तुरंत निपटान करने के निर्देश दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान मंत्री बेदी बैठक में स्वास्थ्य विभाग से संबंधित आई चार शिकायतों पर जिला स्तर पर गठित बोर्ड की जांच से असंतुष्ट नजर आए और कहा कि सरसा में स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता लाने और स्वास्थ्य संबंधी मामलों की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग चंडीगढ़ के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञ चिकित्सकों पर आधारित एक बोर्ड बनेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बोर्ड में सरसा के एचसीएस अधिकारी को भी शामिल किया जाएगा। यहीं तक नहीं बेदी ने आगे कहा कि जिलास्तर पर गठित पांच सदस्यीय चिकित्सीय जांच बोर्ड पर लोगों का भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि इस संंवेदनशील मसले पर वे मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री से भी मिलेंगे।</p>
<h2 style="text-align:center;">डॉ. आरके जैन पर केस दर्ज करने के आदेश, सिविल सर्जन को फटकार</h2>
<p style="text-align:justify;">बैठक में स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों पर खूब आरोप लगे। मंत्री ने एक शिकायत पर सरसा के चिकित्सक डॉ. आरके जैन के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश भी दिए। साथ ही मंत्री ने स्वास्थ्य से संबंधित मामलों पर जांच से खफा नजर आए और इस मामले पर सिविल सर्जन गोबिंद गुप्ता की भी क्लास लगाई। गांव हंजीरा निवासी सुभाष पुत्र रामेश्वर ने कष्ट निवारण समिति की बैठक में शिकायत दी थी कि वह अपनी बेटी का नसबंदी का आॅप्रेशन करवाने के लिए मई 2017 में सिविल अस्पताल में गए।</p>
<p style="text-align:justify;">सिविल अस्पताल में डा. सुभाषिनी जैन ने उन्हें नसबंदी का आॅप्रेशन प्राइवेट अस्पताल जैन आॅर्थो से करवाने को कहा। सुभाष का आरोप था कि डॉ. आरके जैन ने जल्दबाजी दिखाते हुए उसकी पुत्री का बिना चैकअप किए और बिना टैस्ट करवाए बेहोशी की असहनीय डोज का इंजैक्शन दे दिया। जिसके बाद उसकी बेटी कोमा में चली गई और तीन माह के बाद उसकी मौत हो गई।</p>
<h1 style="text-align:center;">आपको सीएम ने सिविल सर्जन लगाया है या डॉ. सिंगला ने?</h1>
<p style="text-align:justify;">ऐलनाबाद के वार्ड-5 निवासी रेणू रानी पत्नी राजेंद्र कुमार की शिकायत पर भी पेट में दर्द होने पर उन्होंने सरसा के चिकित्सक कपिल सिंगला को दिखाया। इस पर डॉ. सिंगला ने उनकी किडनी की नाड़ी ब्लॉक होने और पत्थरी होने का हवाला देते हुए आॅप्रेशन करने की बात कही। 2 लाख रुपए की राशि खर्च कर आॅप्रेशन करवाया, लेकिन उसके बाद भी दर्द नहीं रूका। पूरे मामले को सुनने के बाद मंत्री बेदी ने सिविल सर्जन को खरी-खरी सुनाई और यहां तक कहा कि उन्हें सिविल सर्जन मनोहर लाल ने बनाया है या कपिल सिंगला ने?</p>
<h1 style="text-align:center;">सरपंच को सस्पैंड करने के आदेश</h1>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार से गांव चक्कां में बिना मंजूरी के 240 वृक्ष काटने पर गांव के सरपंच महेंद्र नारायण को सस्पैंड करने की अनुशंसा भी बैठक में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ने की। गांव निवासी बृजलाल ने शिकायत की थी कि सरपंच ने बिना मंजूरी पंचायती भूमि एवं जलघर में खड़े करीब 240 पेड़ कटवा कर राशि हड़प ली।</p>
<p> </p>
<p> </p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 Jun 2018 08:39:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आर्थिक मुद्दे राजनीतिक सोच से नहीं निपटते</title>
                                    <description><![CDATA[नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने इस बात को कबूल किया है कि अभी दो अंकों की विकास दर भारत के लिए सपना ही है, जिसके लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। मीटिंग में मुद्दों की बात तो हुई पर कारणों पर विचार करने के लिए जोर नहीं दिया गया। कहनेभर को यह केन्द्र व […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/economic-issues-do-not-deal-with-political-thinking/article-4307"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/modi-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने इस बात को कबूल किया है कि अभी दो अंकों की विकास दर भारत के लिए सपना ही है, जिसके लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। मीटिंग में मुद्दों की बात तो हुई पर कारणों पर विचार करने के लिए जोर नहीं दिया गया। कहनेभर को यह केन्द्र व राज्य की मीटिंग थी लेकिन में एकजुटता नजर नहीं आई। दरअसल अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए चुनावी वायदों व वास्तविकता में बड़ा अंतर है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तक नीतियों को लागू करने के लिए व्यवहारिक जोर नहीं दिया जाता तब तक अच्छे परिणम नहीं मिल सकते। अभी तक सरकारी योजनाएं बेसिर-पैर घूमती हैं। कृषि की दुर्दशा मिटाने को केंद्र द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई है पर इस योजना का फायदा किसानों को कम बीमा कंपनियों को अधिक हुआ। तमिलनाडू के एक किसान को फसल के नुकसान होने पर महज सात रुपए दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी हालत में अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान की उम्मीद कैसे की जा सकती है? बिहार में गठबंधन सरकार ने ही इस योजना को लागू करने से मना कर दिया है। राज्य सरकार व केन्द्र सरकार द्वारा कंपनियों को दिया जा रहा प्रीमियम बीमा कंपनियों के लिए मोटी कमाई बना हुआ है। कई योजनाओं में के न्द्र तथा राज्यों की हिस्सेदारी के लिए कोई योजनाबंदी ही नहीं। उधर दलितों के लिए वजीफा योजना में के न्द्र सरकार का बड़ा हिस्सा है, अचानक केन्द्र सरकार अपना हिस्सा बंद कर देती है बाद में यह योजना राज्य के गले की फांस बन जाती है। ऐसी योजना के लिए ना केन्द्र कुछ देता है ना ही खाली खजाने का सामना कर रही राज्य सरकारें कुछ कर पा रही हैं</p>
<p style="text-align:justify;">। निष्कर्ष के तौर पर योजना सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है। आर्थिक मामलों संबंधी राज्यों तथा केन्द्र के बीच सहमति नहीं। कम से कम कृषि प्रधान देश के लिए एक सामूहिक योजना तो बनाई जा सकती है। कर्ज माफी के लिए केन्द्र राज्यों को कोरा जवाब दे चुका है। भाजपा की सरकार वाले राज्य कर्जा माफी की घोषणा करते हैं परंतु केन्द्र भाजपा सरकार ही कर्ज माफी की मांग को वाजिब नहीं मानती। वोट की राजनीति पर तर्क का कोई अर्थ नजर नहीं आ रहा। यदि यह कहा जाए कि अनाज की खरीद को छोड़कर देश में कोई कृषि नीति ही नहीं है, तो गलत नहीं होगा। विकास दर में बढ़ोत्तरी के लिए वोट बैंक की नीति से ऊपर उठ कर कुछ करना होगा। आर्थिक मामलों से राजनीतिक सोच द्वारा निपटना मुश्किल ही नहीं असंभव है।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 Jun 2018 08:25:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गौरक्षा को बनाया जाए सामाजिक मुद्दा</title>
                                    <description><![CDATA[गौवंश से होने वाले हादसों का मामला सच में ही गम्भीर है और इस पर विचार होना जरूरी भी है। जहां सड़कों पर घूमता बेपनाह गौवंश परेशानी का सबब है वहीं गौशालाओं में भी बीमारी की मार झेल रहा है। ऐसी हालत में आखिर पशु क्या करें।गौवंश को अवारा कह कर पुकारने वालो से मैं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/social-issues-to-be-made-in-gorkha/article-3501"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/cow.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गौवंश से होने वाले हादसों का मामला सच में ही गम्भीर है और इस पर विचार होना जरूरी भी है। जहां सड़कों पर घूमता बेपनाह गौवंश परेशानी का सबब है वहीं गौशालाओं में भी बीमारी की मार झेल रहा है। ऐसी हालत में आखिर पशु क्या करें।गौवंश को अवारा कह कर पुकारने वालो से मैं एक सवाल करना चाहता हूं कि इनकी इस हालत का जिम्मेवार कौन है? गांवो से शहर में धकेल दिये गये इस गौवंश को कौन सम्भाले यह एक बड़ा सवाल है। हादसों के बाद ठीकरा प्रशासन के सिर पर फूटता है, क्योंकि या तो यह किसी हादसे का शिकार होते हैं या इनके करण कोई हादसे का शिकार होता हैं। हरियाणा के हर बाजार में 20 से 30 के झुण्ड में घूम रहे इस गौवंश की पनाह का स्थाई हल ढूंढना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हर शहर व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी संख्या 2000 तक भी हो सकती है, ऐसा भी अनुमान है। अगर यह अनुमान ठीक है तो 50000 से 100000 बेपनाह पशु हरियाणा की सड़कों पर हैं। बेपनाह पशु तो एक समस्या है, पर उनकी लगातार बढ़ती संख्या इस समस्या को और उलझाती जा रही है। ज्ञात रहे कि ये जंगल में अपनी संख्या नहीं बढ़ा रहे, गोपालक जो आप और हम है, इस बढ़ती हुई जनसंख्या के जिम्मेदार है। गौपालक गौवंश का पालन करते और दूध पीने के लालच में पहले बछड़ों को घर से बाहर धकेल देते हैं और दूध पीकर गाय को धकेल देते है। नन्दियों की संख्या शहरों में बढ़ती जा रही है, क्योंकि गांव में जब ये खेतों का नुक्सान करते लोग इन्हें शहरों और मण्डियों में धकेल देते है। कैसी मूर्खता है नील गाय, हिरण, खरगोश जैसे वन्य जीव सैकड़ों की संख्या में विचरण करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन पर हमारा कोई जोर नहीं, पर गौवंश को हम अपनी हदों से बाहर धकेल देते हैं।इस समस्या का हल इन्हें गौशालाओं में बंद करने से नहीं होगा, इन्हें अपनाने की सोच से आयेगा। अगर हर मन्दिर, हर गांव, हर बड़ा जमींदार एक गौवंश को अपना ले तो यह बेपनाह सड़कों से हटकर सम्मान सहित जीवन जी लेंगे, दूसरी ओर पशुपालन विकास अगर तुरन्त प्रभाव से गौपालकों की शिनाख्त करे और गौवंश के जन्म पर उनका रिकार्ड रखे, गायब होने पर जवाब-तलब करे तो वह दिन दूर नहीं जब समस्या का हल हो जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ हो गौवंश के मलमूत्र से होने वाले लाभ पर हर गांव में स्वास्थ्य चर्चा हो। ग्रामीणों को कम्पोस्ट बनाना सिखाया जाए, तो लोग गौवंश को घरों से बाहर नहीं धकेलेंगे। क्योंकि अधिकतर गौवंश को बाहर इसलिए धकेल दिया जाता है, क्योंकि दूध की कमी के कारण उनसे कोई आर्थिक लाभ नजर नहीं आता और लोग उसे बोझ समझने लगते हैं। अगर गौवंश से होने वाले लाभ की जानकारी लोगों तक पहुंचे तो वह इन्हें जरूर अपनाएंगे। सरकार व सामाजिक संगठनों को चाहिए कि जीवन दायिनी गाय पर चर्चा आरम्भ करें और गौरक्षा को एक सामाजिक मुद्दा बनाये और ऐसे प्रयास किए जायें कि लोग जान सके कि गाय एक सस्ता सुलभ स्वस्थदायिक जीव है। आओ सब मिलकर प्रयास करें,गौवंश पर लगे आवारा के धब्बे को,मिटाकर अपनाने का प्रयास करे,जब कभी ‘‘कल’’ हमसे पूछेगा,मानव रक्षक गौ कहा गई,तब क्या कहोगे कल से,हम निष्ठुर थे इतने कि,सड़के ’माँ’ को खा गई,हम चुपचाप देखते रहे,माँ तो अपना फर्ज निभा गई।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-लेखक आशीष सिंह</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Nov 2017 03:52:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>नॉर्थ कोरिया मुद्दे को लेकर चीन पर दबाव बनाएंगे ट्रम्प</title>
                                    <description><![CDATA[वॉशिंगटन। अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प अगले महीने चीन के दौरे पर जा रहे हैं। इस दौरान वो चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग से नॉर्थ कोरिया को समझाने के लिए दबाव बनाएंगे। इस दौरे को लेकर ट्रम्प का असल मकसद दुनियाभर के देशों से नॉर्थ कोरिया को अलग करना है। बता दें, नॉर्थ कोरिया के न्यूक्लियर वेपन्स […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/north-korea-issues-pressure-on-china-over-issue/article-3443"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/donald-trump.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वॉशिंगटन। </strong>अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प अगले महीने चीन के दौरे पर जा रहे हैं। इस दौरान वो चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग से नॉर्थ कोरिया को समझाने के लिए दबाव बनाएंगे। इस दौरे को लेकर ट्रम्प का असल मकसद दुनियाभर के देशों से नॉर्थ कोरिया को अलग करना है। बता दें, नॉर्थ कोरिया के न्यूक्लियर वेपन्स और मिसाइल प्रोग्राम को लेकर उसके और यूएस के बीच हाल के हफ्तों में तनाव काफी बढ़ गया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">नॉर्थ कोरिया के न्यूक्लियर टेस्ट</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">नॉर्थ कोरिया 2006, 2009, 2013 और 2016 में न्यूक्लियर बम की टेस्टिंग कर चुका है।</li>
<li style="text-align:justify;">9 अक्टूबर, 2006 – पहली बार जमीन के अंदर किया न्यूक्लियर टेस्ट। यूएस से एटमी वॉर का बताया था खतरा।</li>
<li style="text-align:justify;">25 मई, 2009 – दूसरी बार किया एटमी टेस्ट।</li>
<li style="text-align:justify;">13 जून, 2009 – यूरेनियम एनरिचमेंट करेगा। इसे प्लूटोनियम बेस्ड रिएक्टर बनाने की संभावना माना गया।</li>
<li style="text-align:justify;">11 मई, 2010 – न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर बनाने का दावा किया।</li>
<li style="text-align:justify;">आशंका जताई गई कि नॉर्थ कोरिया ज्यादा पावरफुल बम बनाएगा।</li>
<li style="text-align:justify;">13 फरवरी, 2013 – तीसरी बार न्यूक्लियर टेस्ट किया।</li>
<li style="text-align:justify;">10 दिसंबर, 2015 – तानाशाह उन का दावा- हासिल की हाइड्रोजन बम टेस्ट की कैपिबिलिटी।</li>
<li style="text-align:justify;">6 जनवरी, 2016 – हाइड्रोजन बम का टेस्ट किया।</li>
<li style="text-align:justify;">सितंबर, 2016 – पांचवां एटमी टेस्ट किया।</li>
<li style="text-align:justify;">3 सितंबर, 2017 – छठा एटमी टेस्ट किया। ये हाइड्रोजन बम था।</li>
</ul>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Oct 2017 05:18:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रीय समस्याएं बने मुद्दा</title>
                                    <description><![CDATA[देश के पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ से 26 जिलों के लाखों लोग प्रभावित हैं। भारी वर्षा से जन-धन दोनों की हानि हो रही है। काजीरंगा नेशनल पार्क के जीव-जंतुओं का जीवन संकट में पड़ा हुआ है। संसद में किसी भी राजनीतिक दल ने बाढ़ व उससे हो रही क्षति को लेकर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/national-problems-made-issues/article-2413"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/rain-11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ से 26 जिलों के लाखों लोग प्रभावित हैं। भारी वर्षा से जन-धन दोनों की हानि हो रही है। काजीरंगा नेशनल पार्क के जीव-जंतुओं का जीवन संकट में पड़ा हुआ है। संसद में किसी भी राजनीतिक दल ने बाढ़ व उससे हो रही क्षति को लेकर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है। क्योंकि संसद अभी राष्ट्रीय व उपराष्ट्रीय के चुनावों में व्यस्त है। राजनेता महज धर्म व जाति की ही राजनीति कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी भी दल की राजनीतिक सभाओं में बाढ़ या प्राकृतिक आपदा का कोई जिक्र नहीं होता। आसाम में बाढ़ के कारण कई स्थानों पर पीने के पानी की किल्लत खड़ी हो गई है। अभी राजनीतिक लोग खाने-पीने की वस्तुओं पर महंगाई की बात तो कर रहे हैं, लेकिन वह भी समस्या के पूर्ण हल के इच्छुक नहीं हैं। मानवीय मुद्दे महज वोट बटोरने तक सिमट कर रह गए हैं। वोट नहीं मिलता तो कोई परवाह नहीं की जाती।</p>
<p style="text-align:justify;">वोट मिल जाता है तब अपने व परायों में सत्ता सुख बंट जाता है। जो सरकार के चहेते हैं उनके मजे, बाकि सब परेशानी में रहते हैं। अभी बाढ़ की दशा में सबसे पहले प्रभावितों के लिए सुरक्षित आश्रय उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">तत्पश्चात भोजन व दवाओं की व्यवस्था किया जाना बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन राजनीति जाति व धर्म के राग अलाप रही है। बार-बार मीडिया भी इन्हीं दो बातों का शोर मचा रहा है। भारतीय राजनीति का चरित्र बेहद सतही हो चला है, इसमें आमजन की पीड़ा व उनकी सहायता की कहीं कोई चाहत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति दलालों, ठेकेदारों, माफिया, धर्म व जाति के पैरोकारों की दासी बनकर रह गई है। जबकि देश मेें अब परिस्थितियों ऐसी है कि राजनीति अपना चरित्र बदल भी सकती है। गरीबों, हिंसाग्रस्त लोगों की बिना स्वार्थ सहायता की जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय मुद्दों में कल्याणकारी मुद्दों को वरीयता दी जाए। भ्रष्टाचार व सत्ता लोलुप राजनीति का दमन किया जाए। संवेदनशील नेता पैदा किए जाएं। व्यवसायी व शासक सोच रखने वाले नेताओं को किनारे किया जाए। तभी देश में समग्र विकास का सपना पूरा होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/national-problems-made-issues/article-2413</link>
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                <pubDate>Tue, 18 Jul 2017 01:52:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण मुद्दों पर अमेरिका का दोहरा आचरण</title>
                                    <description><![CDATA[पेरिस समझौते से बाहर आकर अमेरिका ने अपनी पारंपरिक आार्थिक पूंजीवादी सम्राज्यवाद की नीतियों का ही प्रमाण है। सन 2015 में हुए पैरिस समझौते पर 72 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस समझौते से खुशी जताई थी। विकासशील देशों को इस समझौते पर संतुष्टि हुई थी, क्योंकि इससे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">पेरिस समझौते से बाहर आकर अमेरिका ने अपनी पारंपरिक आार्थिक पूंजीवादी सम्राज्यवाद की नीतियों का ही प्रमाण है। सन 2015 में हुए पैरिस समझौते पर 72 देशों ने हस्ताक्षर किए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस समझौते से खुशी जताई थी। विकासशील देशों को इस समझौते पर संतुष्टि हुई थी, क्योंकि इससे पहले विकसित देशों द्वारा ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के लिए विकासशील देशों को ही जिम्मेवार ठहराया जाता था। दरअसल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर फैसले को लाभ-हानि की नजर से देखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वह विश्व के बड़े बिजनेसमैन हैं, जिनका अरबों डॉलर का रीयल एस्टेट का कारोबार है। ट्रंप ने राष्ट्रपति रीगन, जार्ज बुश व जार्ज डब्ल्यू बुश की परंपरा को दोहराया, जब अमेरिका का प्रशासन लंबे समय से जलवायु परिवर्तन का कारण विकासशील देशों को बताता आ रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">बराक ओबामा ने इस नीति को बदलते हुए सद्भावना व लोकतंत्र मूल्यों की नीति अपनाई व विकसित देशों को अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए तैयार किया, उनके उलट अब ट्रंप विकासशील देशों को आंखें दिखाने लगे हैं, खासकर भारत व चीन को निशाना बनाया जा रहा है। दरअसल अमेरिका के इस फैसले के पीछे उसकी कूटनीति भी काम कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने समझौता छोड़ने का फैसला उस समय किया, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रूस के दौरे पर थे। रूस व भारत के बीच रक्षा साजो-सामान के लिए अहम समझौता हुआ है। पेरिस समझौते के नाम पर अमेरिका भारत की रूस से दोस्ती को निशाना बना रहा है। अमेरिका का दावा है कि भारत व चीन ग्रीन हाऊस गैसों में कटौती के लिए कुछ खास नहीं कर रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि जलवायु परिवर्तन को एतिहासिक नजरिए से देखें तो 2015 के पेरिस समझौते के आधार पर भारत की जिम्मेवारी तय करना तथ्यहीन व तर्कहीन मामला है। पिछली एक सदी से विकसित देश ही प्रदूषण के लिए जिम्मेवार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विकासशील देशों में औद्योगिक विकास पिछड़ा हुआ है। अब जब विकासशील देशों को उद्योगों की जरूरत है तब विकसित देश प्रदूषण की दुहाई दे रहे हैं। प्रदूषण की इस दुहाई से विकासशील देशों को उत्पादन करने से रोक कर विकसित देश अपने माल की बिक्री के लिए मंडी बनाना चाहते हैं। अमेरिका की पर्यावरण पर दोहरी नीतियां कई विकसित देशों को भी पसंद नहीं आ रही।</p>
<p style="text-align:justify;">फ्रांस व कई अन्य यूरोपीय देशों ने अमेरिका के उक्त फैसले की अलोचना की है। जलवायु परिवर्तन बहुत बड़ी समस्या है, जिसे विश्व कल्याण की दृष्टि से समझने की आवश्यकता है, अत: विकासशील देशों पर प्रदूषण नियंत्रण व पर्यावरण सरंक्षण का उतना ही दवाब डाला जाए, जितनी कि वह भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/americas-double-conduct-on-environmental-issues/article-814</link>
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                <pubDate>Fri, 02 Jun 2017 23:52:07 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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