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                <title>संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता के लिए भारतीय दावेदारी</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र के 75 वर्ष पूर्ण होने पर एक बार पुन: संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की मांग जोर पकड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं संयुक्त राष्ट्र महासभा को वीडियो कांफ्रेंसिंग द्वारा संबोधित करते हुए कहा कि व्यापक सुधारों के बिना संयुक्त राष्ट्र विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रहा है। साथ ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indian-claim-for-permanent-membership-in-the-united-nations/article-18904"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/indian-claim-for-permanent-membership-in-the-united-nations.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र के 75 वर्ष पूर्ण होने पर एक बार पुन: संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की मांग जोर पकड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं संयुक्त राष्ट्र महासभा को वीडियो कांफ्रेंसिंग द्वारा संबोधित करते हुए कहा कि व्यापक सुधारों के बिना संयुक्त राष्ट्र विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि दुनिया को एक सुधारवादी बहुपक्षीय मंच की जरूरत है, जो आज की हकीकत को प्रति बंबित करे, सबको अपनी बात रखने का मौका दे और समकालीन चुनौतियों का समाधान कर मानव कल्याण पर ध्यान दे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">द्वितीय विश्व युद्ध का विध्वंसक रूप देखने के बाद भविष्य के युद्धों को रोकने तथा शांति स्थापित करने के लिए 24 अक्टूबर 1945 को इसकी स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से आज संपूर्ण विश्व पूरी तरह बदल चुका है। महाशक्तियों के मायने बदल गए हैं। कई देश सैन्य और आर्थिक ताकत के रूप में उभरे हैं। इसलिए इस बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में सबसे ज्यादा जरूरत शक्ति संतुलन की महसूस की जा रही है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सभी बदल जाएं और संयुक्त राष्ट्र नहीं बदलेगा,की नीति अब नहीं चलेगी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">भारत संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधारों का सदैव समर्थक रहा है। संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् में सुधार 1993 से ही संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे में है। संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व ही सुरक्षा परिषद् पर आधारित है। उसके सारे कार्यक्रम तब तक कार्यरूप नहीं ले सकते जब तक सुरक्षा परिषद् की उस पर स्वीकृति नहीं हो। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र का बजट भी सुरक्षा परिषद् के अधीन है। उसकी स्वीकृति के बिना बजट के लिए न तो धन की आपूर्ति हो सकती है और न ही तमाम बिखरे कार्य ही पूरे किए जा सकते हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र का जब गठन हुआ था, तब इसके सदस्य 51 थे, परंतु अब सदस्य संख्या 193 हो चुकी है।ऐसे में सुरक्षा परिषद् के विस्तार के अपरिहार्यता को समझा जा सकता है। इस बीच में केवल 1965 में सुरक्षा परिषद् का विस्तार किया गया।मूल रुप में इसमें 11 सीटें थी-5 स्थायी और 6 अस्थायी सीटें। वर्ष 1965 के विस्तार के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में कुल 15 सीटें हो गई, जिसमें 4 अस्थायी सीटों को जोड़ा गया, लेकिन स्थायी सीटों की संख्या पूर्ववत ही रही।1965 के बाद से सुरक्षा परिषद् का विस्तार नहीं हुआ, जबकि सदस्य देशों की संख्या 118 से बढ़कर 193 हो गई।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सुरक्षा परिषद् में प्रतिनिधित्व के मामले में जहाँ तक स्थायी सदस्यों (चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, यूएसए, रूस) का सवाल है, आनुपातिक नहीं है, न तो भौगोलिक दृष्टि से और न ही क्षेत्रफल तथा संयुक्त राष्ट्र के सदस्य की संख्या या आबादी की दृष्टि से। इस तथ्य के बावजूद की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का 75% कार्य अफ्रीका पर केन्द्रित है,फिर भी इसमें अफ्रीका का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।यही कारण है कि अफ्रीकी यूनियन के देशों का भी एक गुट “सी-10” किसी अफ्रीकी देश की स्थायी सदस्यता का वकालत कर रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">महाक्तियों में मतभेद की स्थिति में वीटो पावर भी अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के लोकतंत्रीकरण द्वारा इसका भी हल निकाला जा सकता है। किसी मुद्दे पर दो स्थाई सदस्यों में मतभेद हो तो उसे संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाया जाए। फिर बहुमत के फैसले को सुरक्षा परिषद् क्रियान्वित करे।लेकिन संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली में इतना बड़ा परिवर्तन कभी आ पाएगा,ये अपने आप में बड़ा सवाल है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के बुनियादी ढ़ांचे में बदलाव के लिए 2005 में “जी-4” की नींव रखी गई थी।उस समय संयुक्त राष्ट्र महासभा में 60 वीं वर्षगांठ धूमधाम से मनाई जा रही थी। सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यता हेतु भारतीय दावेदारी को निम्न कसौटियों से समझा जा सकता है।प्रथम–लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होना। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">द्वितीय-विशाल जनसंख्या और विश्व में समग्र रुप से व्यापक प्रतिनिधित्व। भारत दुनिया में द्वितीय सबसे बड़ा जनसंख्या वाला देश है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा लोकतांत्रिक देश है, जहां दुनिया की 18 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या रहती है, जहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियाँ हैं,अनेकों पंथ और विचारधाराएँ हैं। ऐसे में भारतीय प्रतिनिधित्व के बिना सुरक्षा परिषद् में संपूर्ण वैश्विक प्रतिनिधित्व का सपना अधूरा ही रह जाएगा। तृतीय-विश्व अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान होना और विश्व की समृद्धि में साझेदारी-भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक है। साथ ही विश्व की समृद्धि में भारतीय भूमिका अग्रगण्य है। चतुर्थ- संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों में व्यापक सहयोग। अभी भारत के सात हजार जवान संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों में शामिल हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के सैनिकों में भारत का तीसरा सबसे बड़ा योगदान है। संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि भारत ने 50 से ज्यादा पीस कीपिंग मिशन में जांबाज सैनिकों को भेजा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों में सबसे ज्यादा अपने वीर सैनिकों को खोया है। पंचम-प्राचीन संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहर देश होने के साथ भारत आत्मनिर्भर, शक्तिसंपन्न और अपनी एकता, अखंडता, सार्वभौमिकता की रक्षा करने में सक्षम देश है। इस दृष्टि से भी भारतीय दावेदारी की प्रबलता को समझा जा सकता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त भारत, जर्मनी, ब्राजील और जापान का भी सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता का भी समर्थन करता है। संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट में जापान दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश है, जबकि जर्मनी का योगदान में तीसरा स्थान है। ऐसे में जर्मनी और जापान की दावेदारी को समझा जा सकता है। लैटिन अमेरिका में ब्राजील न केवल क्षेत्रफल अपितु आबादी एवं अर्थव्यवस्था के मामले में भी सबसे बड़ा देश है। यही कारण है कि भारत, ब्राजील सहित संपूर्ण जी-4 का समर्थन करता है। जी-4 के अतिरिक्त इटली के नेतृत्व में यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस भी सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता की मांग करता है। इसके अतिरिक्त सिंगापुर, स्विटजरलैंड, कोस्टारिका इत्यादि देशों का एक छोटा समूह ‘स्मॉल-5’ सुरक्षा परिषद् में पारदर्शिता की मांग कर रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">कुल मिलाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि महाशक्तियों ने संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को जहाँ वीटो के विशेषाधिकार के दुरुपयोग द्वारा अप्रासंगिक बनाया, वहीं भारत अपनी पूर्ण क्षमता से संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने में लगा है। यही कारण है कि कोरोना की इस भीषण महामारी में भी भारत के दवा उद्योग ने 150 से अधिक देशों को जरूरी दवाइयां भेजीं हैं। वैश्विक शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का क्रियान्वयन,जलवायु परिवर्तन और सतत विकास जैसे लक्ष्यों की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र को किसी सॉफ्टवेयर की तरह अपडेट करने की जरूरत है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">21वीं शताब्दी में विनाशकारी एवं विघटनकारी परिवर्तनों पर काबू पाने के लिए व संयुक्त राष्ट्र के क्षमता निर्माण में वृद्धि हेतु संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का विस्तार अपरिहार्य हो गया है। सुरक्षा परिषद् के विस्तार से जहाँ इसको नया कलेवर मिलेगा, वहीं भारत जैसे उज्ज्वल छवि के देश को स्थायी सदस्यता मिलने से सुरक्षा परिषद् की गरिमा बढ़ेगी और वैश्विक स्तर पर अमन,चैन,शांति,समृद्धि एवं मानवीय सरोकारों के प्रति भारत कहीं अधिक प्रभावी एवं अधिकारपूर्ण ढंग से काम कर सकेगा।</h6>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Oct 2020 21:24:53 +0530</pubDate>
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                <title>सुरक्षा परिषद् में भारत को स्थायी सदस्यता कब!</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत बरसों से प्रयासरत् रहा है। अमेरिका, रूस समेत दुनिया के तमाम देश स्थायी सदस्यता को लेकर भारत पक्षधर भी हैं मगर यह अभी मुमकिन नहीं हो पाया है। फिलहाल भारत 8वीं बार इसी परिषद् में अस्थायी सदस्य के लिए फिर चुन लिया गया जो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/when-will-india-get-permanent-membership-in-the-security-council/article-17009"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-07/when-will-india-get-permanent-membership-in-the-security-council.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:center;"><strong>संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत बरसों से प्रयासरत् रहा है। अमेरिका, रूस समेत दुनिया के तमाम देश स्थायी सदस्यता को लेकर भारत पक्षधर भी हैं मगर यह अभी मुमकिन नहीं हो पाया है। फिलहाल भारत 8वीं बार इसी परिषद् में अस्थायी सदस्य के लिए फिर चुन लिया गया जो साल 2021- 2022 के </strong><strong>लिए है।</strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;">पड़ताल बताती है कि इसके पहले सात बार अस्थायी सदस्य के रूप में सिलसिलेवार तरीके से 1950-51, 1967-68, और 1972-73 से लेकर 1977-78 समेत 1984-1985, 1991-1992 व 2011-2012 में भी सुरक्षा परिषद् में अस्थायी सदस्य रहा है। जहां तक सवाल स्थायी सदस्यता का है इस पर मामला खटाई में बना हुआ है। विदित हो कि आगामी नवम्बर में अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होना है। जाहिर है रिपब्लिकन के डोनाल्ड ट्रम्प व अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति एक बार फिर मैदान में हैं। हाऊडी मोदी के चलते भारतीय अमेरिकियों के वोट के मामले में ट्रम्प पिछले साल कोशिश कर चुके हैं। इतना ही नहीं मुख्य विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी के राष्ट्रपति पद के सम्भावित उम्मीदवार बिडेन भी कुछ ऐसा इरादा जता रहे हैं जिससे कि भारत का रूख अपनी ओर आकर्षित करके सियासी फायदा उठाना चाहते हैं। वैसे भारतीय मूल के अमेरिकी रिपब्लिकन के बजाय डेमोक्रेट की ओर अधिक झुकाव रखते हैं। फिलहाल भारत में अमेरिकी राजदूत रह चुके रिचर्ड वर्मा के हवाले से यह पता चला है कि यदि बिडेन राष्ट्रपति बनते हैं तो संयुक्त राष्ट्र जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को नया रूप देने में मदद करेंगे ताकि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिल सके। गौरतलब है कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस समेत चीन इसके पांच स्थायी सदस्य हैं ओर केवल चीन ही ऐसा देश है जो सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य बनाने का विरोध करता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के मामले में भारत दुनिया भर से समर्थन रखता है सिवाय एक चीन के। ऐसे में परिवर्तन का समय अब आ चुका है। आखिर परिवर्तन की आवश्यकता क्यों है यह भी समझना ठीक रहेगा। असल में सुरक्षा परिषद की स्थापना 1945 की भू-राजनीतिक और द्वितीय विश्वयुद्ध से उपजी स्थिति को देखकर की गई थी। 75 वर्षों में पृष्ठभूमि अब अलग हो चुकी है। देखा जाए तो शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ ही इसमें बड़े सुधार की गुंजाइश थी जो नहीं किया गया। 5 स्थायी सदस्यों में यूरोप का प्रतिनिधित्व सबसे ज्यादा है जबकि आबादी के लिहाज से बामुश्किल वह 5 फीसद स्थान घेरता है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका का कोई सदस्य इसमें स्थायी नहीं है जबकि संयुक्त राष्ट्र का 50 प्रतिशत कार्य इन्हीं से सम्बन्धित है। ढांचे में सुधार इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि इसमें अमेरिकी वर्चस्व भी दिखता है। भारत की सदस्यता के मामले में दावेदारी बहुत मजबूत दिखाई देती है। जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश, हालांकि कोरोना के चलते इन दिनों अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी है बावजूद इसके प्रगतिशील अर्थव्यवस्था और जीडीपी की दृष्टि से भी प्रमुखता लिए हुए देश है। ऐसे में दावेदारी कहीं अधिक मजबूत है। इतना ही नहीं भारत को विश्व व्यापार संगठन, ब्रिक्स और जी-20 जैसे आर्थिक संगठनों में प्रभावशाली माना जाता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">भारत की विदेश नीति तुलनात्मक प्रखर हुई है और विश्व शान्ति को बढ़ावा देने वाली है साथ ही संयुक्त राष्ट्र की सेना में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देश के नाते भी दावेदारी सर्वाधिक प्रबल है। हालांकि भारत के अलावा कई और देश की स्थायी सदस्यता के लिए नपे-तुले अंदाज में दावेदारी रखने में पीछे नहीं है। जी-4 समूह के चार सदस्य भारत, जर्मनी, ब्राजील और जापान जो एक-दूसरे के लिए स्थायी सदस्यता का समर्थन करते हैं ये सभी इसके हकदार समझे जाते हैं। एल-69 समूह जिसमें भारत, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई 42 विकासशील देशों के एक समूह की अगुवाई कर रहा है। इस समूह ने भी सुरक्षा परिषद् में सुधार की मांग की है। अफ्रीकी समूह में 54 देश हैं जो सुधारों की वकालत करते हैं। इनकी मांग यह है कि अफ्रीका के कम-से-कम दो राश्ट्रों को वीटो की शक्ति के साथ स्थायी सदस्यता दी जाये। उक्त से यह लगता है कि भारत को स्थायी सदस्यता न मिल पाने के पीछे मेहनत में कोई कमी नहीं है बल्कि चुनौतियां कहीं अधिक बढ़ी हैं। बावजूद इसके यदि भारत को इसमें शीघ्रता के साथ स्थायी सदस्यता मिलती है तो चीन जैसे देशों के वीटो के दुरूपयोग पर न केवल अंकुश लगेगा बल्कि व्याप्त असंतुलन को भी पाटा जा सकेगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सवाल यह है कि भारत को स्थायी सदस्यता की आवश्यकता क्यों है और यह मिल क्यों नहीं रही है और इसके मार्ग में क्या बाधाएं हैं। माना जाता है कि जिस स्थायी सदस्यता को लेकर भारत इतना एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है वही सदस्यता 1950 के दौर में बड़ी आसानी से सुलभ थी। आवश्यकता की दृष्टि से देखें तो भारत का इसका सदस्य इसलिए होना चाहिए क्योंकि सुरक्षा परिषद प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्था है। प्रतिबंध लगाने या अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिए इस परिषद के समर्थन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में भारत की चीन और पाकिस्तान से निरंतर दुश्मनी के चलते इसका स्थायी सदस्य होना चाहिए। चीन द्वारा पाकिस्तान के आतंकवादियों पर बार-बार वीटो करना इस बात को पुख्ता करता है। साथ ही कुलभूषण जाधव का मामला भी इसका उदाहरण हो सकता है। स्थायी सीट मिलने से भारत को वैश्विक पटल पर अधिक मजबूती से अपनी बात कहने का ताकत मिलेगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">स्थायी सदस्यता से वीटो पावर मिलेगा जो चीन की काट होगी। इसके अलावा बाह्य सुरक्षा खतरों और भारत के खिलाफ सुनियोजित आतंकवाद जैसी गतिविधियों को रोकने में मदद भी मिलेगी। भारत को स्थायी सदस्यता न मिलने के पीछे सुरक्षा परिषद की बनावट और मूलत: चीन का रोड़ा समेत वैश्विक स्थितियां हैं। वैसे चीन न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) के मामले में भी भारत के लिए रूकावट बनता रहा है। गौरतलब है सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। अस्थायी सदस्य देशों को चुनने का उद्देश्य सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय संतुलन कायम करना होता है। जबकि स्थायी सदस्य शक्ति संतुलन के प्रतीत हैं और इनके पास वीटो की ताकत है। इसी ताकत के चलते चीन दशकों से भारत के खिलाफ वीटो का दुरूपयोग कर रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव प्रति चार वर्ष में होता रहता है जबकि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का मामला दशकों पुराना है। यदि अमेरिका जैसे देशों को यह चिंता है तो सुरक्षा परिषद में में बड़े सुधार को सामने लाकर भारत को उसमें जगह देना चाहिए। अभी हाल ही में रूसी विदेश मंत्री ने भी यह कहा है कि स्थायी सदस्यता के लिए भारत मजबूत नॉमिनी है। वैसे देखा जाय तो दुनिया के कई देश किसी भी महाद्वीप के हों भारत के साथ खड़े हैं मगर नतीजे वहीं के वहीं हैं। डोनाल्ड ट्रम्प कई मामलों में भारत के साथ सकारात्मक हैं और डेमोक्रेट के राष्ट्रपति के सम्भावित उम्मीदवार बिडेन भी स्थायी सदस्यता के मामले में भारत के चहेते दिखते हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">यह अच्छी बात है कि अमेरिका के दो मूल राजनीतिक दल से भारत का सम्बंध और संवाद बेहतर है मगर उक्त आकर्षण कहीं चुनावी न हो। ऐसे में भारत को कूटनीतिक तरीके से ही समाधान की ओर जाना चाहिए। राष्ट्रपति कोई भी बने रणनीतिक समाधान पर भारत की दृष्टि होनी चाहिए। जाहिर है अमेरिका में चुनाव उसका आन्तरिक मामला है। ध्यानतव्य हो कि 2016 में डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की अक्सर तारीफ करते थे और नतीजे उनके पक्ष में आये। कहीं ऐसा तो नहीं कि डेमोक्रेट के बिडेन सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्य के रूप में लाने का इरादा चुनावी फायदे में बदलने का हो। फिलहाल इरादा कुछ भी हो भारत को परिणाम से मतलब रखना चाहिए जो बाद में ही पता चलेगा पर सबके बावजूद यह सवाल उठता रहेगा कि आखिर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता कब मिलेगी।</h6>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Jul 2020 21:39:50 +0530</pubDate>
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