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                <title>Sahitya - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Sahitya: विलासिता का दुख!</title>
                                    <description><![CDATA[Sahitya: जब कभी भी किसी विकसित देश में उपलब्ध आम जनसुविधाओं के बारे में सुनता या पढ़ता हूं तो हृदय से हूक उठ जाती है। अब इसका अर्थ आप यह कदापि ग्रहण न करें कि मैं उनकी सुविधा-सम्पन्नता से जल उठता हूं। बिना किसी आत्म प्रवंचना के कहूं तो मुझे यह उनकी विपन्नता ही नजर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/the-misery-of-luxury/article-60127"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/sahitya-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Sahitya: जब कभी भी किसी विकसित देश में उपलब्ध आम जनसुविधाओं के बारे में सुनता या पढ़ता हूं तो हृदय से हूक उठ जाती है। अब इसका अर्थ आप यह कदापि ग्रहण न करें कि मैं उनकी सुविधा-सम्पन्नता से जल उठता हूं। बिना किसी आत्म प्रवंचना के कहूं तो मुझे यह उनकी विपन्नता ही नजर आती है। सुख-सुविधाओं का जो मायाजाल अपने देश में निहित है वह कहीं ओर कहां हो सकता है। अब आप ही बताइए वो सुविधा किस काम की जो आप को बांध कर ही रख दे। सुना है अमेरिका में बिजली कटौती न के बराबर है। यदि ऐसा है तो वहां के घरों में रहने वाले लोग इक्का-दुक्का मौकों पर ही एक-साथ घर से बाहर निकलते होंगे। Sahitya</p>
<p style="text-align:justify;">अब अपने यहां देखिए दिन में दसियों घंटों तक तो बिजली गुल रहती है, बिजली होती भी है तो जल देवता नदारद मिलते हैं। इन दोनों ही अवसरों पर जमावड़ा चौक पर होता है। दिन में 24 घंटों में से 16 घंटे तक रौनक घर के बाहर ही होती है और ऐसे अवसरों पर जो मुख और श्रवण सुख मनुष्येन्द्रियों को प्राप्त होता है, वह भला उन पाश्चात्य देशों में रहने वाले लोगों को कहां मिलता होगा। अपने यहां की महिलाएं एवं पुरुष दोनों ही इस अवसर का लाभ अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए बखूबी करते हैं। दूसरों की बुराइयां करने में जो सुख मिलता है वो भला 5 सितारा होटलों में कहां…। अब बताइए यह किस काम की विकसितता। ट्रेफिक नियमों के संबंध में भी वहां फैली विषयता झलकती है। बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज आदि जैसी अनेक हाई क्लास भारी-भरकम गाड़ियां भी अदनी-सी रेड लाइट के इशारे पर नाचती हैं, अपने यहां तो लखटकिया वाली छकड़ा गाड़ी भी काले धुंए का गुब्बार उड़ाती हुई फर्राटे से ट्रैफिक नियमों को धत्ता दे जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ी-बड़ी गाड़ियों का तो कहना ही क्या! वो तो जब तक जी चाहा रोड पर, नहीं तो फुटपाथ पर दौड़ पड़ती हैं विदेशों में मॉडर्न आॅर्ट की मांग बहुत है। परन्तु वहां पर इस कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। अपने यहां तो लोग मुंह में कूची लेकर घूमते रहते हैं। जहां दिल किया पच्च… पिचकारी मारी और दीवार पर मॉडर्न आॅर्ट तैयार। जबकि विदेशों में तो सड़क पर थूकने पर ही जुर्माने का प्रावधान है। Sahitya</p>
<p style="text-align:justify;">अब आप ही बताइए यह कहां का इंसाफ है कि मनुष्य को सोने के पिंजरे में कैद करके रखा जाए। संभवत: यह सारी कमियां वहां के प्रशासन की देन हैं। हम अपने विकास के पाषाणयुग को भी नहीं भूलते बल्कि उसका यदा-कदा प्रदर्शन सांसद में कर उसका सीधा प्रसारण देश भर में करवा देते हैं ताकि हमारी वास्तविक पहचान छोटे-छोटे बच्चों तक के हृदय में स्थायी बनी रहे। हम अपनी शारीरिक क्षमता एवं धाराप्रवाह बोलने की दक्षता का सटीक अवलोकन संसद में माइक, कुर्सी, मेज तोड़कर तथा धरने के दौरान चीख-पुकार कर दर्शा देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे मन में जब भी भड़ास उत्पन्न होती है, तो उसे सरकारी वस्तुओं यथा बस, ट्रेन के शीशे, खंभे, ग्रिलों आदि पर इत्मीनान से निकाल देते हैं। अब आप ही बताएं, ऐसा क्या वहां संभव है। वहां के लोग घरों के अंदर दुबक कर सोते हैं। अपने यहां तो आम आदमी रात को चने चबाकर पानी का घूंट उड़ेल तसल्ली से ग्रहों से विचार-विमर्श कर सोता है। वहां पर लोग विकेंड सिस्टम से चलते हैं परन्तु अपने सरकारी कमर्चारी तो कार्यालय में रहकर भी विकेंड मनाते हैं। ऐसी विसंगतियों के चलते यदि वह यह भ्रम मन में पाल कर बैठे हैं कि वह विकसित है, तो मैं इस पर सिर्फ खिसयानी हंसी ही हंस सकता हूं।                                                                                               <strong> अरविन्द सारस्वत</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jul 2024 16:29:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>हिसाब बराबर</title>
                                    <description><![CDATA[Sahitya: दादाजी, पापा और मानी बाजार गए। मानी बोली, ‘‘पापा। भूख लगी है।’’ पापा बोले-‘‘घर जाकर खाना खाएँगे।’’ उसने पूछा, ‘‘घर कब जाएँगे?’’ दादा हँसे। बोले, ‘‘अभी तो आए हैं।’’ मानी उदास हो गई। बोली, ‘‘तेज भूख लगी है।’’ पापा समझाने लगे, ‘‘बाजार का नहीं खाते।’’ मानी ने इधर-उधर देखा। पूछा, ‘‘बाजार में बहुत कुछ […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/settle-accounts/article-59519"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/sahitya.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Sahitya:</strong> दादाजी, पापा और मानी बाजार गए। मानी बोली, ‘‘पापा। भूख लगी है।’’<br />
पापा बोले-‘‘घर जाकर खाना खाएँगे।’’<br />
उसने पूछा, ‘‘घर कब जाएँगे?’’<br />
दादा हँसे। बोले, ‘‘अभी तो आए हैं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">मानी उदास हो गई। बोली, ‘‘तेज भूख लगी है।’’<br />
पापा समझाने लगे, ‘‘बाजार का नहीं खाते।’’<br />
मानी ने इधर-उधर देखा। पूछा, ‘‘बाजार में बहुत कुछ बिक रहा है।’’<br />
दादा बोले, ‘‘बाजार की चीजें बेकार होती हैं!’’ मानी सोचते हुए बोली, ‘‘हम बाजार घूमने आए हैं?’’</p>
<p style="text-align:justify;">पापा ने दादाजी की ओर देखा। बोले, ‘‘मैं एक छोटा कुरकुरे का पैकेट लाता हूँ।’’<br />
मानी ने पूछा, ‘‘बड़ा नहीं मिलेगा?’’<br />
दादा बोले, ‘‘तुम छोटी हो न।’’<br />
मानी चुप नहीं रही। बोली, ‘‘उस छोटी लड़की के हाथों में दो बड़े पैकेट हैं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">दादाजी ने सिर पकड़ लिया। कहा, ‘‘एक बड़ा पैकेट लाना।’’<br />
मानी बोली, ‘‘दो लाना। छुटकी भी खाएगी।’’<br />
पापा ने हाँ में सिर हिलाया।<br />
दादाजी बोले, ‘‘बस, अब चुप रहना।’’</p>
<p style="text-align:justify;">पापा के हाथ में दो बड़े पैकेट थे। दादाजी बोले, ‘‘एक छुटकी का है।’’<br />
मानी बोली, ‘‘ठीक है। मेरा मुझे दे दो।’’<br />
पापा बोले, ‘‘घर पर ले लेना।’’<br />
मानी ने पूछा, ‘‘यहीं दे दो न।’’</p>
<p style="text-align:justify;">अब दादाजी बोले, ‘‘घर में आराम से खाना।’’<br />
मानी का गला भर आया। धीरे से बोली, ‘‘मुझे घर जाना है।’’<br />
पापा ने पूछा, ‘‘अब क्या हुआ?’’</p>
<p style="text-align:justify;">मानी ने दादाजी की ओर देखा। कहा, ‘‘कुरकुरा घर में आराम से खाना है न। तो घर जाना है।’’ दादाजी ने एक पैकेट खोला। थोड़े कुरकुरे पापा को दे दिए। कुछ कुरुकुरे अपनी जेब में डाल दिए। फिर पैकेट मानी को दे दिया। कहा, ‘‘अब ठीक है?’’ मानी ने कहा, ‘‘नहीं।’’ दादाजी ने हैरानी से पूछा, ‘‘अब तो कुरकुरे का पैकेट दे दिया। नहीं मतलब?’’ मानी कुरकुरे चबा रही थी। उसकी आँखें बंद थीं। बोली, ‘‘छुटकी के पैकेट से भी मैं कुरकुरे लूँगी। आप दोनों मेरे पैकेट से कुरकुरे खा रहे हैं। खा रहे हैं कि नहीं?’’ दादाजी और पापा हँसने लगे। Sahitya                                                                                                                                                                <strong>– मनोहर चमोली ‘मनु’</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="वेब वर्ल्ड रिकार्ड से नवाजी गईं नृत्यांगना डॉ. सुरभि काठपाल" href="http://10.0.0.122:1245/surbhi-kathpal-honored-with-web-world-record/">वेब वर्ल्ड रिकार्ड से नवाजी गईं नृत्यांगना डॉ. सुरभि काठपाल</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jul 2024 16:07:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कविता : राष्ट्र जीवंत</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्र जीवंत रहे दिल में अरमान है सब सुरक्षित रहें दिल में अरमान है देश ही के लिए हों सब अच्छे कर्म यह हर एक देशवासी की पहचान है। तुम ग़रीबी मिटाओगे यह वादा करो मुफ़लिसी को हराओगे वादा करो एकता तुम दिखाओगे यह वादा करो हर बुराई तुम मिटाओगे यह वादा करो गर कोई […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/national-life/article-31646"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/india-1.jpg" alt=""></a><br /><p>राष्ट्र जीवंत रहे दिल में अरमान है<br />
सब सुरक्षित रहें दिल में अरमान है<br />
देश ही के लिए हों सब अच्छे कर्म<br />
यह हर एक देशवासी की पहचान है।</p>
<p>तुम ग़रीबी मिटाओगे यह वादा करो<br />
मुफ़लिसी को हराओगे वादा करो<br />
एकता तुम दिखाओगे यह वादा करो<br />
हर बुराई तुम मिटाओगे यह वादा करो<br />
गर कोई ख़तरा भारत पे जो आएगा<br />
हर बच्चा यहाँ का फौलाद बन जाएगा।</p>
<p>भुखमरी से मरे है यहाँ पर कोई<br />
खुदकुशी भी करे है यहाँ पर कोई<br />
ऐसी हालत को तुम ही बदल पाओगे<br />
तुम ही भारत को ऊँचा उठा पाओगे।</p>
<p>दहशतों को मिटकाकर सुकूँ बख्शना<br />
सब को अपना बनाकर सुकूँ बख्शना<br />
तुम निभाना हर इक फ़र्ज इस देश का<br />
सब ग़रीबी मिटाकर सुकूँ बख्शना<br />
गर कोई ख़तरा भारत पे जो आएगा<br />
हर बच्चा यहाँ का फौलाद बन जाएगा।</p>
<p>मेरे भारत में जो लोग लाचार हैं<br />
दाने-दाने को तरसते, बेरोज़गार हैं<br />
उनको कुछ भी तकलीफ न देना कभी<br />
सब को अपना बनाकर सुकूँ बख्शना।</p>
<p>मेरे भारत की जो सच्ची तस्वीर है<br />
जो भी भारत के हुए वीर हैं<br />
उनके जैसा बनोगे यह वादा करो<br />
देश हित में मरोगे यह वादा करो।<br />
गर कोई ख़तरा भारत पे जो आएगा<br />
हर बच्चा यहाँ का फौलाद बन जाएगा।</p>
<p>टूट कर के न बिखरो मुसीबत में तुम<br />
रब से रिश्ता रखो अपना भरपूर तुम<br />
ज़िन्दगी में कभी हार भी हो जाए गए<br />
दु:खों से न होना कभी चूर-चूर तुम।</p>
<p>गर हो तूफ़ान से भी तेरा सामना<br />
हौसलों को जवाँ रखना हर हाल तुम<br />
बहन बेटी की इज्ज़त को समझोगे तुम<br />
उनके हक के लिए सदा ही लड़ोगे तुम<br />
गर कोई ख़तरा भारत पर जो आएगा<br />
हर बच्चा यहाँ को फौलाद बन जाएगा।</p>
<p>इस जहाँ से अँधेरा भगाओगे तुम<br />
शमां तालीम की भी जलाओगे तुम<br />
बे सहारे जो बच्चे हैं तुम देखना<br />
बूढ़ माँ-बाप को भी तुम देखना।</p>
<p>जिनका सिन्दूर तक भी उजाड़ा गया<br />
उनकी हालत भी जाकर के तुम देखना<br />
सब के हमदर्द बन जाओ फिर देखना<br />
मेरो भारत भी चमकेगा तुम देखना<br />
गर कोई ख़तरा भारत पे जो आएगा<br />
हर बच्चा यहाँ का फौलाद बन जाएगा।</p>
<p><strong>-राशिद अमीन मलाई, पलवल</strong><br />
<strong>हथीन, पलवल</strong></p>
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                <pubDate>Mon, 21 Mar 2022 12:41:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वो जलाकर बस्ती&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[वो जलाकर बस्ती आशियानें की बात करते हैं, मिटाकर हाथों की लकीरें मुक्कदर की बात करते हैं। नादान थे हम चालाकियाँ समझ ही ना पाए, अपना बनाकर हमें वो गैरों की बात करते हैं। छुपाते रहें उम्र भर जिनकी गलतियों को हम, वो महफ़िल में मेरी कमियों की बात करते हैं। गर इतने ही खफा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/that-township/article-31369"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/poem.gif" alt=""></a><br /><p>वो जलाकर बस्ती आशियानें की बात करते हैं,<br />
मिटाकर हाथों की लकीरें मुक्कदर की बात करते हैं।</p>
<p>नादान थे हम चालाकियाँ समझ ही ना पाए,<br />
अपना बनाकर हमें वो गैरों की बात करते हैं।</p>
<p>छुपाते रहें उम्र भर जिनकी गलतियों को हम,<br />
वो महफ़िल में मेरी कमियों की बात करते हैं।</p>
<p>गर इतने ही खफा रहते हो ‘साज’ हमसे,<br />
तो बात बात पर क्यूं हमसे वो बात करते हैं।</p>
<p>जलाते रहें जिन्दगी भर अरमानों को मेरे,<br />
अब हमसे वो मर जाने की बात करते हैं।</p>
<p>क्यूं समझ ना सके जज्बातों को वो मेरे,<br />
रुलाकर दिल को मेरे अब हंसी की बाते करते हैं।</p>
<p>बेवफाई हमसे की दगा हमीं को दिया,<br />
जमाने भर से अपनी वफ़ा की बाते करते हैं।</p>
<p>जब हो चुके जमाने से ही रुखसत हम,<br />
तब हमारी कमी की बातें करते हैं।</p>
<p><strong>रश्मि चिकारा, गुरुग्राम</strong></p>
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                <pubDate>Wed, 09 Mar 2022 12:11:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कमजोर तू नहीं, तेरा वक्त है</title>
                                    <description><![CDATA[कमजोर तू नहीं, तेरा वक्त है, व्यर्थ में ही यों न झिझक। मुश्किलें तो वक्त के साथ बदलती हैं, इन्हीं से तो जिन्दगी संवरती है। ग्रीष्म में सूरज का भी होता है तिरस्कार, शीत में उसका ही होता हैं इन्तजार। उजियाला तो हर अंधेरी रात बाद होता है, वक्त कहां किसी के लिए ठहरता है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/you-are-not-weak-your-time-is/article-25745"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/time.gif" alt=""></a><br /><p>कमजोर तू नहीं, तेरा वक्त है,<br />
व्यर्थ में ही यों न झिझक।</p>
<p>मुश्किलें तो वक्त के साथ बदलती हैं,<br />
इन्हीं से तो जिन्दगी संवरती है।</p>
<p>ग्रीष्म में सूरज का भी होता है तिरस्कार,<br />
शीत में उसका ही होता हैं इन्तजार।</p>
<p>उजियाला तो हर अंधेरी रात बाद होता है,<br />
वक्त कहां किसी के लिए ठहरता है।</p>
<p>अपने भूत को तुझे भुलाना होगा,<br />
भविष्य में तभी तो संघर्ष होगा।</p>
<p>जीवन बस हुनर का ही तो खेल है,<br />
बिना इसके सब बेमेल है।</p>
<p>सागर की अपनी क्षमता है,<br />
मांझी भी कब-कहां थकता है।</p>
<p>ग्रहण तो चन्द्र पर भी लगता है,<br />
फिर चांदनी रात भी वही करता है।</p>
<p>वर्षा भी सूखे में सयानी लगती है,<br />
बाढ़ में वहीं भयावह बनती है।</p>
<p>जीवन में कभी खुशी तो कभी गम है,<br />
टिकता वही है जिनके हौंसलों में दम है।</p>
<p><strong>-अवधेश माहेश्वरी</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/you-are-not-weak-your-time-is/article-25745</link>
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                <pubDate>Wed, 04 Aug 2021 16:30:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग़जल : तीरो-तलवार से नहीं होता</title>
                                    <description><![CDATA[तीरो-तलवार से नहीं होता काम हथियार से नहीं होता घाव भरता है धीरे-धीरे ही कुछ भी रफ्तार से नहीं होता खेल में भावना है ज़िंदा तो फ़र्क कुछ हार से नहीं होता सिर्फ़ नुक्सान होता है यारो लाभ तकरार से नहीं होता उसपे कल रोटियां लपेटे सब कुछ भी अख़बार से नहीं होता। -महावीर उत्तरांचली […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/ghazal-3/article-21273"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-01/arrow-sword.jpg" alt=""></a><br /><p>तीरो-तलवार से नहीं होता<br />
काम हथियार से नहीं होता</p>
<p>घाव भरता है धीरे-धीरे ही<br />
कुछ भी रफ्तार से नहीं होता</p>
<p>खेल में भावना है ज़िंदा तो<br />
फ़र्क कुछ हार से नहीं होता</p>
<p>सिर्फ़ नुक्सान होता है यारो<br />
लाभ तकरार से नहीं होता</p>
<p>उसपे कल रोटियां लपेटे सब<br />
कुछ भी अख़बार से नहीं होता।</p>
<h5><strong>-महावीर उत्तरांचली</strong></h5>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/ghazal-3/article-21273</link>
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                <pubDate>Mon, 25 Jan 2021 16:26:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भरया रहवै भंडार</title>
                                    <description><![CDATA[मरयादा कुल की रखै, जाण नहीं दे आण। तीन रूप नारी धरै, माँ, बेट्टी अर भाण।। बिजली पाणी मेह की, हर देखै बाट। अनदात्ता भूक्खा मरै, दुनिया करती ठाट।। जाड्डो-पालो-घाम-लू, बल्हद-खेत अर क्यार। बीज-दराती-हल-कस्सी, सब किसान का यार।। ज्यूं जवान सै सीम पै, खेत्तां रह्वै किसान। मिलकै राक्खैं देस की, आन-बान अर स्यान।। नसा करै […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/stock-up/article-21059"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-01/haryana-kisan.gif" alt=""></a><br /><p>मरयादा कुल की रखै, जाण नहीं दे आण।<br />
तीन रूप नारी धरै, माँ, बेट्टी अर भाण।।</p>
<p>बिजली पाणी मेह की, हर देखै बाट।<br />
अनदात्ता भूक्खा मरै, दुनिया करती ठाट।।</p>
<p>जाड्डो-पालो-घाम-लू, बल्हद-खेत अर क्यार।<br />
बीज-दराती-हल-कस्सी, सब किसान का यार।।</p>
<p>ज्यूं जवान सै सीम पै, खेत्तां रह्वै किसान।<br />
मिलकै राक्खैं देस की, आन-बान अर स्यान।।</p>
<p>नसा करै कोई भलै, इसमैं रोग हजार।<br />
घर तै, जग तै टूटकै, पावै कस्ट अपार।।</p>
<p>जात्ती-पात्ती न कर्यो, सामाजिक बिखराव।<br />
समरसता कै मन्तर सै, मन तै मिटे मुटाव।।</p>
<p>समझ सक्या ना मैं कदै, या जीवन की राह।<br />
आह कदे सै जिन्दगी, कदे जिन्दगी वाह।।</p>
<p>ग़जब रूप धर लीडरां, फूल्या नहीं समाय।<br />
वादां की लै पोटली, जनता लयी पटाय।।</p>
<p>भूल सै भी भूलां नहीं, सुणल्यो बात बिसेस।<br />
सदा सुदेसी ही रखां, भोजन, भासा, भेस।।</p>
<p>साफ रखां हम रोजना, तन-मन अर संसार।<br />
सेहत-यस-धन-धान का, भरया रहवै भंडार।।</p>
<p><strong>मुकुट अग्रवाल ‘भावुक’, अंसल टाऊन, रेवाड़ी</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Jan 2021 17:04:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसान</title>
                                    <description><![CDATA[करके मेहनत कड़ी किसान, देता सबको रोटी दान। गरमी-सरदी से कब डरता, खेतों की रखवाली करता। आँधी, वर्षा या तूफ़ान, निडर जुटा है सीना तान। मेहनत करना हमें सिखाए, सच्चाई की राह दिखाए। रहता उजले-उजले मन का, सच्चा सेवक यही वतन का। नरेन्द्र अत्री ‘संतोषी’ विश्वम्बर नगर, जीन्द अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/farmer/article-20132"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/farmer.jpg" alt=""></a><br /><p>करके मेहनत कड़ी किसान,<br />
देता सबको रोटी दान।</p>
<p>गरमी-सरदी से कब डरता,<br />
खेतों की रखवाली करता।</p>
<p>आँधी, वर्षा या तूफ़ान,<br />
निडर जुटा है सीना तान।</p>
<p>मेहनत करना हमें सिखाए,<br />
सच्चाई की राह दिखाए।</p>
<p>रहता उजले-उजले मन का,<br />
सच्चा सेवक यही वतन का।</p>
<p><strong>नरेन्द्र अत्री ‘संतोषी’</strong><br />
<strong>विश्वम्बर नगर, जीन्द</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/farmer/article-20132</link>
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                <pubDate>Wed, 25 Nov 2020 15:06:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लघुकथा: आभार</title>
                                    <description><![CDATA[हर की पैड़ी पर निरंतर बढ़ती भीड़ को देखते हुए भवगीत का ध्यान चौड़े पाट की ओर गंगा-स्नान करते भक्त पर गया तो वह भी उधर ही जा पहुंचा और घाट पर लगे एंगल को पकड़कर ज्यों ही गोता लगाने को हुआ ही कि उसके पाँव उखड़ गए। बस, फिर क्या था, बरबस ही जीवन-मृत्यु […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/thankfulness/article-18137"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-09/thankfulness.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हर की पैड़ी पर निरंतर बढ़ती भीड़ को देखते हुए भवगीत का ध्यान चौड़े पाट की ओर गंगा-स्नान करते भक्त पर गया तो वह भी उधर ही जा पहुंचा और घाट पर लगे एंगल को पकड़कर ज्यों ही गोता लगाने को हुआ ही कि उसके पाँव उखड़ गए। बस, फिर क्या था, बरबस ही जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष शुरू हो गया। पल बीतते पसलियां चरमरा उठीं। सांसें भी जवाब देने लगीं। देखते-देखते भीड़ जमा हो गई, असमंजस की स्थिति में और तमाशबीन की तरह भी। तभी झुंड को चीरता हुआ एक युवक आगे बढ़ा, एकदम फटेहाल… मगर उसने सूझ-बूझ दिखाई। तीन-चार लोगों को परस्पर बाहें पकड़ाकर चैन बनाई, खुद मचलती धारा में दूसरी-तीसरी सीढ़ी पर खड़ा हुआ और पलक झपकते भवगीत को बाहर खींच लिया। मगर वह संभल पाता, उससे पहले ही युवक भीड़ में ओझल हो गया।<br />
मौत के मुँह से लौटा भवगीत इधर-उधर दूर-दूर तक, फिर आसमान की ओर नजर दौड़ाता रहा और मन ही मन बुदबुदाता रहा, ‘‘भाई, तुम इन्सान हो, फरिश्ता हो, जो भी हो, जहां भी हो, तुम सचमुच जग-भाता हो, जीवन-दाता हो।…मेरा आभार स्वीकार कर लेना।’’</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भगवती प्रसाद गौतम, कोटा (राजस्थान)</strong></h5>
<p> </p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/thankfulness/article-18137</link>
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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2020 10:27:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समकालीन दोहे</title>
                                    <description><![CDATA[चलती चक्की देखकर, नहीं जागती पीर। दर्द जुलाहे का कहे, कोई नहीं कबीर।। महाकुंभ की गोद में, बच्चों सा उल्लास। सारी जनता लिख रही लहरों पर इतिहास।। गंगा के तट पर जगा, ऐसा जीवन-राग। तन तो काशी हो गया, मन हो गया प्रयोग।। अखबारों की आँख में, अफवाहों की आग, कदम-कदम पर जगता, जलियावालाबाग।। फँसी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/contemporary-couplets/article-18134"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-09/chakki.jpg" alt=""></a><br /><p>चलती चक्की देखकर, नहीं जागती पीर।<br />
दर्द जुलाहे का कहे, कोई नहीं कबीर।।</p>
<p>महाकुंभ की गोद में, बच्चों सा उल्लास।<br />
सारी जनता लिख रही लहरों पर इतिहास।।</p>
<p>गंगा के तट पर जगा, ऐसा जीवन-राग।<br />
तन तो काशी हो गया, मन हो गया प्रयोग।।</p>
<p>अखबारों की आँख में, अफवाहों की आग,<br />
कदम-कदम पर जगता, जलियावालाबाग।।</p>
<p>फँसी गले में रह गयी, कोेयलिया की कूक।<br />
दाएँ भी बंदूक थी, बाएँ भी बंदूक।।</p>
<p>केला, बिस्कुट, संतरा, गुड्डा, गुड़िया गेंद।<br />
सब कुछ गायब हो गया, किसने मारी सेंध।।</p>
<h5><strong>-यश मालवीय, इलाहाबाद</strong></h5>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/contemporary-couplets/article-18134</link>
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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2020 09:54:55 +0530</pubDate>
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                <title>अभिनय का उपहार</title>
                                    <description><![CDATA[उन्नीसवीं शताब्दी की घटना है। भारत पर अंग्रेजों का अधिपत्य था। बंगाल नील साहब के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। कलकत्ता के कुछ नवयुवकों ने इन अत्याचारों पर प्रकाश डालने के लिए एक नाटक का आयोजन किया। अन्य अतिथियों के अतिरिक्त प्रकाण्ड विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी नाटक देखने के लिए आए। नाटक में विभिन्न […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/acting-gift/article-17953"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/gift.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">उन्नीसवीं शताब्दी की घटना है। भारत पर अंग्रेजों का अधिपत्य था। बंगाल नील साहब के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। कलकत्ता के कुछ नवयुवकों ने इन अत्याचारों पर प्रकाश डालने के लिए एक नाटक का आयोजन किया। अन्य अतिथियों के अतिरिक्त प्रकाण्ड विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी नाटक देखने के लिए आए। नाटक में विभिन्न दृश्यों के माध्यम से नील साहब के अत्याचार प्रस्तुत किए गए।<br />
दृश्यों के प्रस्तुतीकरण में इतनी स्वाभाविकता थी कि दर्शकों की आँखों से आँसुओं की निर्झरणी बह निकली।<br />
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर क्रोध से लाल-पीले हो गए। उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाली और लोगों पर अत्याचार कर रहे नील साहब का अभिनय करने वाले नवयुवक को दे मारी। नाटक पूर्ण होने पर नील का अभिनय करने वाला नवयुवक तुरंत विद्यासागर के चरणों में गिर पड़ा। बड़े विनम्र भाव से वह बोला, ‘‘आपकी चप्पल से बड़ा उपहार हमें नहीं मिल सकता, हमारा नाटक सार्थक हुआ। अब हमें विश्वास हो गया कि सारा बंगाल हमारे साथ है।’’</h6>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>-तनसुखराम गुप्ता</strong></h5>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 30 Aug 2020 10:22:45 +0530</pubDate>
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                <title>कबीर दास जी के दोहे</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A5%87/article-17850"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/kabir-das-ji.jpg" alt=""></a><br /><p>निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय,<br />
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।</p>
<p>बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,<br />
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।</p>
<p>पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,<br />
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।</p>
<p>माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,<br />
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।</p>
<p>जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही।<br />
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।।</p>
<p>आछे/पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत।<br />
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।।</p>
<p>साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।<br />
मैं भी भूखा न रहूँ साधु ना भूखा जाया।।</p>
<p>माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।<br />
माँगन ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख।।</p>
<p>माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।<br />
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय।।</p>
<p>गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय।<br />
बलिहारी गुरु आपनों, गोविंद दियो मिलाय।।</p>
<p>बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।<br />
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।</p>
<p>तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय।<br />
कबहूँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होया।।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A5%87/article-17850</link>
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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2020 12:48:13 +0530</pubDate>
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