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                <title>Children's Corner - Sach Kahoon Hindi</title>
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                            <item>
                <title>Children&amp;#8217;s Mental Health Tips: माता-पिता की इन बातों से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है असर</title>
                                    <description><![CDATA[Children’s Mental Health Tips: हर पेरेंट्स को अपने बच्चे बहुत ही प्यारे होते हैं, और हर माता-पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं। हर पेरेंट्स यही चाहते हैं कि उनका लड़का या लड़की बड़े होकर एक सफर और जिम्मेदार इंसान बने। दरअसल यही वजह है कि वह अपने बच्चों को बचपन से ही तमीज […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/home-and-family/these-things-of-parents-affect-the-mental-health-of-children/article-74982"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-08/childrens-corner.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Children’s Mental Health Tips: हर पेरेंट्स को अपने बच्चे बहुत ही प्यारे होते हैं, और हर माता-पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं। हर पेरेंट्स यही चाहते हैं कि उनका लड़का या लड़की बड़े होकर एक सफर और जिम्मेदार इंसान बने। दरअसल यही वजह है कि वह अपने बच्चों को बचपन से ही तमीज और अनुशासन में रखने की कोशिश करते हैं और उन्हें अनुशासन में रहना सिखाते हैं। Children’s Corner</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन कई बार बच्चों को अनुशासन में रखने के चक्कर में पेरेंट्स काफी ज्यादा स्ट्रिक्ट हो जाते हैं। जब बच्चे आपकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं तो आप डांटने लगते हैं और चिल्लाने लगते हैं। लेकिन आपको बता दें कि बच्चों पर चिल्लाना भी उतना ही नुकसानदायक होता है जितना कि उन पर हाथ उठाना। जब पेरेंट्स काम पर से घर लौटते हैं और देखते हैं कि उनका बच्चा किसी से बदतमीजी से बात कर रहा है और घर में सामान फैला रखा है, तो अच्छे खासे शांत पेरेंट्स भी गुस्से में हो जाते हैं और बच्चों पर चिल्लाना शुरू कर देते हैं। वहीं अगर आप भी ऐसा करते हैं तो आप सावधान हो जाएं क्योंकि ऐसा करना आपके बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकता है और आपका बच्चा मानसिक रूप से बीमार हो सकता है। हां यह ध्यान रहे कि ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि एक स्टडी में ऐसा खुलासा हुआ है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बच्चों पर सख्ती बरतने पर मेंटल हेल्थ पर पड़ता है असर | Children’s Corner</h3>
<p style="text-align:justify;">दरअसल माता-पिता द्वारा बढ़ते जाने वाली सख्ती बच्चों की मेंटल हेल्थ को प्रभावित कर सकती है। आपकी जानकारी के लिए बता दे कि यूनिवर्सिटी आॅफ कैंब्रिज और डबलिन द्वारा हाल ही में की गई एक रिसर्च में इस बात का खुलासा हुआ है, कि पैरंट्स अगर अपने बच्चों से ज्यादा सख़्ती से बात करते हैं, तो उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है। बता दें कि इस शोध में 7500 से भी ज्यादा बच्चों को शामिल किया गया था। बच्चों के सामने सख़्ती से पेश आना मेंटल डिसआॅर्डर का कारण बन सकता है। इस शोध में शोधकर्ताओं ने बच्चों के समूह में यह देखा है कि इनमें से 10 फीसदी बच्चों में मेंटल हेल्थ खराब होने का खतरा अधिक था।</p>
<p style="text-align:justify;">इन बच्चों में पेरेंट्स द्वारा बरती जा रही सख्ती का सामना करने की आदत ज्यादा थी। हालांकि शोध में यह भी साबित हुआ है कि बच्चों की मेंटल हेल्थ बिगड़ने के पीछे पेरेंट्स की सख्ती ही नहीं बल्कि फिजिकल हेल्थ जेंडर या फिर सामाजिक स्थिति भी जिम्मेदार हो सकती है। दरअसल छोटे बच्चों की तुलना में 9 साल से ऊपर के बच्चों में पेरेंट्स द्वारा लगाए जाने वाले अनुशासन का मेंटल हेल्थ पर ज्यादा असर पड़ सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या है स्ट्रिक्ट पेरेंटिंग के साइड इफेक्ट</h3>
<p style="text-align:justify;">बच्चों के साथ जरूरत से ज्यादा दबाव डालने पर उनके विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में बच्चों में आत्मविश्वास की कमी हो सकती है, वह अपने हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगते हैं। Children’s Corner</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे बच्चे नई चीजें ट्राई नहीं कर पाते हैं, उन्हें हर वक्त इस बात का डर लगा रहता है कि अगर उनसे कुछ गलत हो गया तो उन्हें इसके लिए डांट पड़ेगी या फिर उन्हें पनिशमेंट दी जाएगी। अधिकतर बच्चे आत्मविश्वास की कमी होने के कारण नए-नए एक्सपेरिमेंट करने से हिचकिचाते हैं। स्ट्रिक्ट पेरेंटिंग की वजह से बच्चें अपने दिल की बात खोलकर नहीं जता पाते हैं। जिस वजह से अंदर ही अंदर घुटन महसूस करते हैं और कई बार वे डिप्रेशन तक के शिकार हो जाते हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Haryana News: हरियाणा में नये जिले बनने पर ब्रेक, सैनी सरकार ने लगाई रोक… जानें कारण" href="http://10.0.0.122:1245/saini-government-imposed-a-ban-on-the-creation-of-new-districts-in-haryana-know-the-reason/">Haryana News: हरियाणा में नये जिले बनने पर ब्रेक, सैनी सरकार ने लगाई रोक… जानें कारण</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>घर परिवार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Aug 2025 14:38:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सोने का खेत : अकबर और बीरबल की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[अकबर के महल में कई कीमती सजावट की वस्तुएं थीं, लेकिन एक गुलदस्ते से अकबर को खास लगाव था। इस गुलदस्ते को अकबर हमेशा अपनी पलंग के पास रखवाते थे। एक दिन अचानक महाराज अकबर का कमरा साफ करते हुए उनके सेवक से वह गुलदस्ता टूट गया। सेवक ने घबराकर उस गुलदस्ते को जोड़ने की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/the-field-of-gold-the-story-of-akbar-and-birbal/article-31652"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/akbar-and-birbal.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अकबर के महल में कई कीमती सजावट की वस्तुएं थीं, लेकिन एक गुलदस्ते से अकबर को खास लगाव था। इस गुलदस्ते को अकबर हमेशा अपनी पलंग के पास रखवाते थे। एक दिन अचानक महाराज अकबर का कमरा साफ करते हुए उनके सेवक से वह गुलदस्ता टूट गया। सेवक ने घबराकर उस गुलदस्ते को जोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। हार कर उसने टूटा गुलदस्ता कूड़ेदान में फेंक दिया और दुआ करने लगा कि राजा को इस बारे में कुछ पता न चले।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ देर बाद महराज अकबर जब महल लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनका प्रिय गुलदस्ता अपनी जगह पर नहीं है। राजा ने सेवक से उस गुलदस्ते के बारे में पूछा, तो सेवक डर के मारे कांपने लगा। सेवक को जल्दी में कोई अच्छा बहाना नहीं सूझा, तो उसने कहा कि महाराज उस गुलदस्ते को मैं अपने घर ले गया हूं, ताकि अच्छे से साफ कर सकूं। यह सुनते ही अकबर बोले, मुझे तुरंत वो गुलदस्ता लाकर दो।</p>
<p style="text-align:justify;">अब सेवक के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। सेवक ने महराज अकबर को सच बता दिया कि वो गुलदस्ता टूट चुका है। यह सुनकर राजा आग बबूला हो गए। क्रोध में राजा ने उस सेवक को फांसी की सजा सुना दी। राजा ने कहा, झूठ मैं बर्दाश्त नहीं करता हूं। जब गुलदस्ता टूट ही गया था, तो झूठ बोलने की क्या जरूरत थी ।</p>
<p style="text-align:justify;">अगले दिन इस घटना के बारे में जब सभा में जिक्र हुआ तो बीरबल ने इस बात का विरोध किया। बीरबल बोले कि झूठ हर व्यक्ति कभी-न-कभी बोलता ही है। किसी के झूठ बोलने से अगर कुछ बुरा या गलत नहीं होता, तो झूठ बोलना गलत नहीं है। बीरबल के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर अकबर उसी समय बीरबल पर भड़क गए। उन्होंने सभा में लोगों से पूछा कि कोई ऐसा है यहां जिसने झूठ बोला हो। सबने राजा को कहा कि नहीं वो झूठ नहीं बोलते। यह बात सुनते ही राजा ने बीरबल को राज्य से निकाल दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज दरबार से निकलने के बाद बीरबल ने ठान ली कि वो इस बात को साबित करके रहेंगे कि हर व्यक्ति अपने जीवन में कभी-न-कभी झूठ बोलता है। बीरबल के दिमाग में एक तरकीब आई, जिसके बाद बीरबल सीधे सुनार के पास गए। उन्होंने जौहरी से सोने की गेहूं जैसी दिखने वाली बाली बनवाई और उसे लेकर महाराज अकबर की सभा में पहुंच गए।<br />
अकबर ने जैसे ही बीरबल को सभा में देखा, तो पूछा कि अब तुम यहां क्यों आए हो। बीरबल बोले, जहांपनाह आज ऐसा चमत्कार होगा, जो किसी ने कभी नहीं देखा होगा। बस आपको मेरी पूरी बात सुननी होगी। राजा अकबर और सभी सभापतियों की जिज्ञासा बढ़ गई और राजा ने बीरबल को अपनी बात कहने की अनुमति दे दी।</p>
<p style="text-align:justify;">बीरबल बोले, आज मुझे रास्ते में एक सिद्ध पुरुष के दर्शन हुए। उन्होंने मुझे यह सोने से बनी गेहूं की बाली दी है और कहा कि इसे जिस भी खेत में लगाओगे, वहां सोने की फसल उगेगी। अब इसे लगाने के लिए मुझे आपके राज्य में थोड़ी-सी जमीन चाहिए। राजा ने कहा, यह तो बहुत अच्छी बात है, चलो हम तुम्हें जमीन दिला देते हैं। अब बीरबल कहने लगे कि मैं चाहता हूं कि पूरा राज दरबार यह चमत्कार देखे। बीरबल की बात मानते हुए पूरा राज दरबार खेत की ओर चल पड़ा।<br />
खेत में पहुंचकर बीरबल ने कहा कि इस सोने से बनी गेहूं की बाली से फसल तभी उगेगी, जब इसे ऐसा व्यक्ति लगाए, जिसने जीवन में कभी झूठ न बोला हो। बीरबल की बात सुनकर सभी राजदरबारी खामोश हो गए और कोई भी गेहूं की बाली लगाने के लिए तैयार नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">राजा अकबर बोले कि क्या राजदरबार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसने अपने जीवन में कभी झूठ न बोला हो? सभी खामोश थे। बीरबल बोले, जहांपनाह अब आप ही इस बाली को खेत में रोप दीजिए। बीरबल की बात सुनकर महाराज का सिर झुक गया। उन्होंने कहा, बचपन में मैंने भी कई झूठ बोले हैं, तो मैं इसे कैसे लगा सकता हूं। इतना कहते ही बादशाह अकबर को यह बात समझ आ गई कि बीरबल सही कह रहे थे कि इस दुनिया में कभी-न-कभी सभी झूठ बोलते हैं। इस बात का एहसास होते ही अकबर उस सेवक की फांसी की सजा को रोक देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>कहानी से सीख :</strong></em> बिना सोचे समझे किसी को बड़ा दण्ड नहीं देना चाहिए। हर काम को सोच-विचार कर ही किया जाना चाहिए। साथ ही एक छोटे से झूठ की वजह से किसी व्यक्ति का आंकलन भी नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि कुछ परिस्थितियां ऐसी होती है कि लोग झूठ बोल देते हैं।</p>
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                <pubDate>Mon, 21 Mar 2022 15:24:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बचपन</title>
                                    <description><![CDATA[मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी, नंदन-वन सी फल उठी वह छोटी-सी कुटिया मेरी। ‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी, कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने लाई थी। मैंने पूछा-यह क्या लाई? बोल उठी वह-‘माँ काओ’, फूल-फूल मैं उठी खुशी से मैंने कहा-‘तुम्हीं खाओ।’ […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/childhood/article-29344"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-12/betiya.jpg" alt=""></a><br /><p>मैं बचपन को बुला रही थी<br />
बोल उठी बिटिया मेरी,<br />
नंदन-वन सी फल उठी वह<br />
छोटी-सी कुटिया मेरी।<br />
‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी<br />
मिट्टी खाकर आई थी,<br />
कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में<br />
मुझे खिलाने लाई थी।<br />
मैंने पूछा-यह क्या लाई?<br />
बोल उठी वह-‘माँ काओ’,<br />
फूल-फूल मैं उठी खुशी से<br />
मैंने कहा-‘तुम्हीं खाओ।’<br />
<strong>-सुभद्राकुमारी चौहान</strong></p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Dec 2021 12:36:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>JOKS : चीनी घुल गई</title>
                                    <description><![CDATA[एक दिन मैंने अपने आठ साल के बेटे से नींबू का शरबत बना लाने को कहा। वही नींबू का शरबत तो बना लाया, लेकिन उसमें चीनी डालना भूल गया। मैंने उससे पूछा कि चीनी नहीं डाली। तभी उसने अपनी भूल छुपाने के लिए तपाक से जवाब दिया, ‘‘पापा! चीनी डाली तो थी, घुल गई होगी।’’ […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/joks/article-27154"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/joks.gif" alt=""></a><br /><p>एक दिन मैंने अपने आठ साल के बेटे से नींबू का शरबत बना लाने को कहा। वही नींबू का शरबत तो बना लाया, लेकिन उसमें चीनी डालना भूल गया। मैंने उससे पूछा कि चीनी नहीं डाली। तभी उसने अपनी भूल छुपाने के लिए तपाक से जवाब दिया, ‘‘पापा! चीनी डाली तो थी, घुल गई होगी।’’</p>
<p>एक बुजुर्ग- ‘बेटा कैसे हो?’<br />
बच्चा-जी, बिल्कुल ठीक हूँ…<br />
बुजुर्ग-‘पढ़ाई कैसी चल रही है?’<br />
बच्चा-‘जी, बिल्कुल आपकी ज़िंदगी की तरह…’<br />
बुजुर्ग-‘मतलब?’<br />
बच्चा-‘भगवान भरोसे!!!’</p>
<p>एक बच्चे ने पूछा, ‘‘पापा! मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है।’’<br />
पापा बोले, ‘‘बेटा, अच्छा मुझे बताओ क्या समझ नहीं आ रहा है?’’<br />
बेटा, ‘‘पहला, जिसने घड़ी बनाई, उसने टाइम कैसे मिलाया?’’<br />
पिता, ‘‘और।’’<br />
बेटा, ‘‘दूसरा, पहली बार दही जमाया तो जामण कहां से आया?’’<br />
पिता लाजवाब</p>
<p>टीचर ने बच्चों को क्रिकेट मैच पर निबंध लिखने के लिए कहा।<br />
सभी छात्र अपनी-अपनी कॉपी लेकर निबंध लिखने में जुट गए।<br />
मगर रूलदू चुपचाप बैठा था।<br />
टीचर ने उसकी कॉपी देखा तो उस पर सिर्फ एक ही लाइन लिखी थी, ‘‘बारिश की वजह से मैच स्थगित कर दिया गया है।’’</p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Sep 2021 16:08:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कविता : एक कहूँ एक, दो कहूँ दुआ</title>
                                    <description><![CDATA[एक कहूँ एक, दो कहूँ दुआ, रटवाती थी हमको बुआ। टू वन जा टू, टूटू जा फोर, लगता यारों कितना बोर। क से कबूतर, ख से खरगोश, पढ़कर हुआ गुड्डू बेहोश। ए फॉर एप्पल, बी फॉर बैट, मोटू नहीं सन्नी बोलो फैट। उतरी हिन्दी की पगड़ी, पहनी हमने अंग्रेजी तगड़ी। डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’ अन्य अपडेट हासिल […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/poem/article-27059"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/poem.gif" alt=""></a><br /><p>एक कहूँ एक, दो कहूँ दुआ,<br />
रटवाती थी हमको बुआ।</p>
<p>टू वन जा टू, टूटू जा फोर,<br />
लगता यारों कितना बोर।</p>
<p>क से कबूतर, ख से खरगोश,<br />
पढ़कर हुआ गुड्डू बेहोश।</p>
<p>ए फॉर एप्पल, बी फॉर बैट,<br />
मोटू नहीं सन्नी बोलो फैट।</p>
<p>उतरी हिन्दी की पगड़ी,<br />
पहनी हमने अंग्रेजी तगड़ी।</p>
<p>डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’</p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/children-corner/poem/article-27059</link>
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                <pubDate>Tue, 21 Sep 2021 15:49:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसान : Poem</title>
                                    <description><![CDATA[करके मेहनत कड़ी किसान, देता सबको रोटी दान। गरमी-सरदी से कब डरता, खेतों में रखवाली करता। आँधी, वर्षा या तूफ़ान, निडर जुटा है सीना तान। मेहनत करना हमें सिखाए, सच्चाई की राह दिखाए। रहता उजले-उजले मन का, सच्चा सेवक यही वतन का। नरेन्द्र अत्री ‘संतोषी’ जीन्द   अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter, Instagram, LinkedIn , YouTube  पर फॉलो करें।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/farmer-2/article-26662"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/farmer.gif" alt=""></a><br /><h5>करके मेहनत कड़ी किसान,<br />
देता सबको रोटी दान।</h5>
<h5>गरमी-सरदी से कब डरता,<br />
खेतों में रखवाली करता।</h5>
<h5>आँधी, वर्षा या तूफ़ान,<br />
निडर जुटा है सीना तान।</h5>
<h5>मेहनत करना हमें सिखाए,<br />
सच्चाई की राह दिखाए।</h5>
<h5>रहता उजले-उजले मन का,<br />
सच्चा सेवक यही वतन का।</h5>
<h5><strong>नरेन्द्र अत्री ‘संतोषी’ जीन्द</strong></h5>
<p> </p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/children-corner/farmer-2/article-26662</link>
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                <pubDate>Thu, 09 Sep 2021 16:31:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रोटी या पाप</title>
                                    <description><![CDATA[उगते सूरज की किरणें अभी समंदर की इठलाती लहरों को चूम भी नहीं पाई थीं कि फुटपाथ पर बैठे भिखारियों में आपा-धापी मच उठी। सेठ शांति लाल की मोटर वहां आकर रुक चुकी थी। उसकी आवाज उन्हें उसी तरह उद्वेलित कर देती थी, जैसे भोजन का समय होने पर गली में घुमने वाले जानवरों के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/bread-or-sin/article-22904"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/bread-or-sin.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">उगते सूरज की किरणें अभी समंदर की इठलाती लहरों को चूम भी नहीं पाई थीं कि फुटपाथ पर बैठे भिखारियों में आपा-धापी मच उठी। सेठ शांति लाल की मोटर वहां आकर रुक चुकी थी। उसकी आवाज उन्हें उसी तरह उद्वेलित कर देती थी, जैसे भोजन का समय होने पर गली में घुमने वाले जानवरों के मुँह से अपने आप ही लार टपकने लगती है। सदा की तरह सेठ जी के हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था। उसी से निकाल-निकाल कर वे डबल रोटी का एक-एक टुकड़ा एक-एक भिखारी पर फेंकने लगे। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में वे भिखारी उन टुकड़ों पर जानवरों की तरह झपटते। कुछ तो उन्हें छिपाकर आगे भी जा बैठते। सेठजी देखते रहते और घृणा से हँसते रहते। कभी-कभी बोल भी उठते-‘लोग कहते हैं कि गरीब बड़े ईमानदार होते हैं।’</h6>
<h6 style="text-align:justify;">
लेकिन एक दिन सब कुछ उलट-पुलट गया। उन्होंने देखा कि भीड़ से दूर एक भिखारी चुपचाप इस दृश्य को देख रहा है। उसने रोटी का वह टुकड़ा लेने के लिए हाथ तक नहीं हिलाया। सेठ जी ने उससे पूछा-‘तुझे रोटी मिली?’ उसने उत्तर दिया-‘रोटी है कहां, जो मिलती।’ ‘यह रोटी नहीं तो क्या है?’ सेठ जी बोले। ‘आपका पाप।’ आप रोटी नहीं, अपने पाप  (Sin) बाँट रहे हैं। मुझे पाप नहीं, ‘आप’ चाहिए। दे सकेंगे अपने आपको।’ सेठ जी सकते आ गए। हँसकर बोले-‘तू भूखा नहीं है।’ और वे रोटी (Bread) (पाप) बाँटने के लिए आगे बढ़ गए।<br />
<strong>-विष्णु प्रभाकर</strong></h6>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/children-corner/bread-or-sin/article-22904</link>
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                <pubDate>Wed, 14 Apr 2021 17:22:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Story : शेर, ऊंट, सियार और कौवा</title>
                                    <description><![CDATA[किसी वन में मदोत्कट नाम का सिंह (Lion)निवास करता था। बाघ (Tiger), कौआ (Crow) और सियार (Jackal), ये तीन उसके नौकर थे। एक दिन उन्होंने एक ऐसे ऊंट (Camel) को देखा जो अपने गिरोह से भटककर उनकी ओर आ गया था। उसको देखकर सिंह कहने लगा, ‘अरे वाह! यह तो विचित्र जीव है। जाकर पता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/lion-camel-jackal-and-crow/article-21648"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/lion.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">किसी वन में मदोत्कट नाम का सिंह (Lion)निवास करता था। बाघ (Tiger), कौआ (Crow) और सियार (Jackal), ये तीन उसके नौकर थे। एक दिन उन्होंने एक ऐसे ऊंट (Camel) को देखा जो अपने गिरोह से भटककर उनकी ओर आ गया था। उसको देखकर सिंह कहने लगा, ‘अरे वाह! यह तो विचित्र जीव है। जाकर पता तो लगाओ कि यह वन्य प्राणी है अथवा कि ग्राम्य प्राणी’ यह सुनकर कौआ बोला, ‘स्वामी! यह ऊंट नाम का जीव ग्राम्य-प्राणी है और आपका भोजन है। आप इसको मारकर खा जाइए।’ सिंह बोला, ‘मैं अपने यहां आने वाले अतिथि को नहीं मारता। कहा गया है कि विश्वस्त और निर्भय होकर अपने घर आए शत्रु को भी नहीं मारना चाहिए।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अत: उसको अभयदान देकर यहां मेरे पास ले आओ जिससे मैं उसके यहां आने का कारण पूछ सकूं।’ सिंह की आज्ञा पाकर उसके अनुचर ऊंट के पास गए और उसको आदरपूर्वक सिंह के पास ले लाए। ऊंट ने सिंह को प्रणाम किया और बैठ गया। सिंह ने जब उसके वन में विचरने का कारण पूछा तो उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह साथियों से बिछुड़कर भटक गया है। सिंह के कहने पर उस दिन से वह कथनक नाम का ऊंट उनके साथ ही रहने लगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उसके कुछ दिन बाद मदोत्कट सिंह का किसी जंगली हाथी के साथ घमासान युद्ध हुआ। उस हाथी के मूसल के समान दांतों के प्रहार से सिंह अधमरा तो हो गया किन्तु किसी प्रकार जीवित रहा, पर वह चलने-फिरने में अशक्त हो गया था। उसके अशक्त हो जाने से कौवे आदि उसके नौकर भूखे रहने लगे। क्योंकि सिंह जब शिकार करता था तो उसके नौकरों को उसमें से भोजन मिला करता था। अब सिंह शिकार करने में असमर्थ था। उनकी दुर्दशा देखकर सिंह बोला, ‘किसी ऐसे जीव की खोज करो कि जिसको मैं इस अवस्था में भी मारकर तुम लोगों के भोजन की व्यवस्था कर सकूं।’ सिंह की आज्ञा पाकर वे चारों प्राणी हर तरफ शिकार की तलाश में घूमने निकले। जब कहीं कुछ नहीं मिला तो कौए और सियार ने परस्पर मिलकर सलाह की। श्रृगाल बोला, ‘मित्र कौवे! इधर-उधर भटकने से क्या लाभ? क्यों न इस कथनक को मारकर उसका ही भोजन किया जाए?’</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सियार सिंह के पास गया और वहां पहुंचकर कहने लगा, ‘स्वामी! हम सबने मिलकर सारा वन छान मारा है, किन्तु कहीं कोई ऐसा पशु नहीं मिला कि जिसको हम आपके समीप मारने के लिए ला पाते। अब भूख इतनी सता रही है कि हमारे लिए एक भी पग चलना कठिन हो गया है। आप बीमार हैं। यदि आपकी आज्ञा हो तो आज कथनक को खाकर आपके खाने का प्रबंध किया जाए।’ पर सिंह ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसने ऊंट को अपने यहां पनाह दी है इसलिए वह उसे मार नहीं सकता।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">पर सियार ने सिंह को किसी तरह मना ही लिया। राजा की आज्ञा पाते ही श्रृगाल ने तत्काल अपने साथियों को बुलाया लाया। उसके साथ ऊंट भी आया। उन्हें देखकर सिंह ने पूछा, ‘तुम लोगों को कुछ मिला?’<br />
कौवा, सियार, बाघ सहित दूसरे जानवरों ने बता दिया कि उन्हें कुछ नहीं मिला। पर अपने राजा की भूख मिटाने के लिए सभी बारी-बारी से सिंह के आगे आए और विनती की कि वह उन्हें मारकर खा लें। पर सियार हर किसी में कुछ न कुछ खामी बता देता ताकि सिंह उन्हें न मार सके।<br />
अंत में ऊंट की बारी आई। बेचारे सीधे-साधे कथनक ऊंट ने जब यह देखा कि सभी सेवक अपनी जान देने की विनती कर रहे हैं तो वह भी पीछे नहीं रहा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उसने सिंह को प्रणाम करके कहा, ‘स्वामी! ये सभी आपके लिए अभक्ष्य हैं। किसी का आकार छोटा है, किसी के तेज नाखून हैं, किसी की देह पर घने बाल हैं। आज तो आप मेरे ही शरीर से अपनी जीविका चलाइए जिससे कि मुझे दोनों लोकों की प्राप्ति हो सके।’ कथनक का इतना कहना था कि व्याघ्र और सियार उस पर झपट पड़े और देखते-ही-देखते उसके पेट को चीरकर रख दिया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>सीख :</strong> धूर्तों के साथ जब भी रहें पूरी तरह से चौकन्ना रहें, और उनकी मीठी बातों में बिलकुल न आयें और विवेकहीन तथा मूर्ख स्वामी से भी दूर रहने में ही भलाई है।</h6>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/children-corner/lion-camel-jackal-and-crow/article-21648</link>
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                <pubDate>Wed, 10 Feb 2021 15:23:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Nature of saint: संत का स्वभाव</title>
                                    <description><![CDATA[एक संत गांव में प्रवेश कर रहे थे। सैकड़ों भक्त उनके पास थे। अचानक एक व्यक्ति संत के सामने आया। उसके हाथ में एक पात्र था। वह कोयले और राख से भरा हुआ था। संत के निकट आते ही उसने राख और कोयला संत के सिर पर फेंक दिया। संत के भक्त क्रोधित हो उठे। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/nature-of-saint/article-21497"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/saint.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक संत गांव में प्रवेश कर रहे थे। सैकड़ों भक्त उनके पास थे। अचानक एक व्यक्ति संत के सामने आया। उसके हाथ में एक पात्र था। वह कोयले और राख से भरा हुआ था। संत के निकट आते ही उसने राख और कोयला संत के सिर पर फेंक दिया। संत के भक्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा, ‘‘यह बदतमीजी है।’’ कुछ लोग उसे मारने के लिए आगे बढ़े। लेकिन संत ने कहा, ‘‘ शांत रहो।’’ लोग बोले, ‘‘महाराज, हमें मत रोकिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मूर्ख आदमी को सजा देना ही उचित है।’’ संत ने उत्तेजित लोगों को शांत करते हुए कहा, ‘‘यह आदमी मेरे लिए कितना अच्छा है। इसने मुझ पर जलते हुए अंगारे नहीं फेंके। बुझे हुए कोयले की राख फेंकी है। इससे मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ। स्नान करते ही राख का सारा मैल साफ हो जाएगा।’’ संत के समर्थक भौचक्क होकर उन्हें देखते रह गए।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/children-corner/nature-of-saint/article-21497</link>
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                <pubDate>Thu, 04 Feb 2021 16:27:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बाल कथा : संतोष की महत्ता</title>
                                    <description><![CDATA[जीवन में संतोष है तो सब कुछ है। संतोष नहीं तो सब कुछ होने पर भी मनुष्य के पास कुछ नहीं। जीवन को सुखमय बनाने के लिए संतोष आवश्यक है। जीवन का लक्ष्य भौतिकवाद नहीं है जबकि मनुष्य हमेशा भौतिक पदार्थों को इक्ट्ठा करने में ही लगा रहता है। भौतिकवाद तो एक अंधेरी गली की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/bal-katha-the-importance-of-satisfaction/article-20352"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/importance-of-satisfaction.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">जीवन में संतोष है तो सब कुछ है। संतोष नहीं तो सब कुछ होने पर भी मनुष्य के पास कुछ नहीं। जीवन को सुखमय बनाने के लिए संतोष आवश्यक है। जीवन का लक्ष्य भौतिकवाद नहीं है जबकि मनुष्य हमेशा भौतिक पदार्थों को इक्ट्ठा करने में ही लगा रहता है। भौतिकवाद तो एक अंधेरी गली की तरह है। एक बार घुसे तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। संतोषी जीव इन भौतिक पदार्थों से दूर ही रहता है। आचार्य चाणक्य की एक रोचक कथा से पता चलता है कि संतोष क्या है? चाणक्य के बारे में तो आप सब जानते हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">चाणक्य मगध देश के राजा चन्द्रगुप्त के मंत्री थे। वे बुद्धिमान, तपस्वी और राजनीतिज्ञ थे। चाणक्य मंत्री होते हुए भी बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते थे और शहर से बाहर एक झोंपड़ी में रहते थे। एक बार राजा चन्द्रगुप्त ने मंत्री चाणक्य को कुछ कंबल दिए और कहा-इन कम्बलों को शीत ऋतु में जो अभी पूरी तरह शुरू नहीं हुई है, गरीब लोगों के बीच बांट देना। चाणक्य ने वे कम्बल झोंपड़ी में रख दिए और सोचा-सुबह मैं इन कम्बलों को बांट दूंगा और सो गये। कुछ लोगों को इस बात का पता चल गया था कि सारे कम्बल चाणक्य की झोंपड़ी में रखे हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वे चोरी की नीयत से झोंपड़ी में कम्बल चुराने के लिए आए तो देखा कि चाणक्य चटाई पर ठंड में बिना कम्बल के सो रहे थे। चोर ठिठके और चाणक्य को जगा कर कहने लगे कि आपके पास कम्बलों का ढेर है, फिर भी आप बिना कम्बल के सो रहे हैं। चाणक्य ने बड़ी मधुरता से सहज होते हुये जवाब दिया, ये कंबल राजा ने गरीबों में बांटने के लिए मुझे दिए हैं जिनको मैं कल सुबह बांटूंगा। इन कंबलों पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">यह सुनकर चोरों को बहुत शर्म महसूस होने लगी। वे सोचने लगे कि एक यह हैं (चाणक्य) जो दूसरे के धन के प्रयोग को अधर्म समझते हैं और दूसरी ओर हम हैं जो हर रोज दूसरों का सामान चुराते हैं। हम कितने अधर्मी और असंतोषी हैं। यह कितने संतोषी और तृप्त हैं। यह सोचकर उन्होंने चाणक्य से क्षमा मांगी और कभी भी दूसरों की चीज न चुराने का वचन दिया। प्रत्येक इंसान को संतोष जैसे गुण को अपने जीवन में उतारना चाहिए। इससे वह स्वयं भी सुखी होगा और समाज भी।</h6>
<h6 style="text-align:right;"><span style="color:#99cc00;"><em><strong>-नीतू गुप्ता</strong></em></span></h6>
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                <pubDate>Sat, 05 Dec 2020 16:18:04 +0530</pubDate>
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                <title>Love Animals: पशुओं से प्यार</title>
                                    <description><![CDATA[तुम इस पिल्ले को मुझे दे दो, बदले में जो चाहो ले लो। मालिक की बात सुनकर रतन बोला, मालिक, यह पिल्ला तो मुझे जान से भी ज्यादा प्यारा है और मेरे परिवार का हिस्सा है
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/love-animals/article-20351"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/love-animals.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जंगल के पास एक गांव में रतन नाम का अनाथ लड़का रहता था। वह मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालता था। उसे कहीं भी कोई गिरा-पड़ा जानवर मिलता, वह उसे उठाकर अपने घर ले जाता। इस तरह उसके पास बहुत से पशु-पक्षी इक्ट्ठे हो गए। उनके लिए उसने एक सुंदर सा बाड़ा बनवा दिया था। एक दिन रतन काम से लौट रहा था तो उसने जंगल में सरोवर के पास एक पिल्ले को कराहते देखा। रतन उसे घर ले आया। रतन ने दूध गर्म करके बोतल में डाला और बाड़े में जाकर पिल्ले को पिलाने लगा। नन्हें मेहमान को देखकर बाड़े के सभी जानवर बहुत खुश हुए। रतन को वह पिल्ला बहुत प्यारा लगने लगा। जब भी उसे समय मिलता, वह पिल्ले के साथ खेलता रहता।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन रतन काम पर गया तो पिल्ला भी उसके साथ चला गया। खूबसूरत पिल्ले को देखकर उसके मालिक ने कहा, रतन, ऐसा सुंदर पिल्ला तो मैंने कभी देखा नहीं। तुम इस पिल्ले को मुझे दे दो, बदले में जो चाहो ले लो। मालिक की बात सुनकर रतन बोला, मालिक, यह पिल्ला तो मुझे जान से भी ज्यादा प्यारा है और मेरे परिवार का हिस्सा है। इसके अलावा मैं आपको अपना कोई और जानवर दे सकता हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">रतन की बात सुनकर उसके मालिक को बहुत गुस्सा आया। उसने उसे नौकरी से निकाल दिया। रतन पिल्ले को लेकर घर लौट रहा था कि एकाएक पिल्ला जंगल की ओर भागा। रतन भी उसके पीछे दौड़ पड़ा। पिल्ला ठीक उसी जगह रूका, जहां से रतन ने उसे उठाया था। तभी तेज रोशनी हुई और पिल्ला एक परी में बदल गया। उसने रतन की पशु सेवा को परखने के लिए उसकी यह परीक्षा ली थी। इसके बाद रतन कभी गरीब न रहा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong><em>-नरेंद्र देवांगन</em></strong></p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Dec 2020 15:58:54 +0530</pubDate>
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                <title>हुआ उजाला</title>
                                    <description><![CDATA[अंधकार की काली चादर, धरती पर से सरकी। हुआ उजाला जग में कोई, बात नहीं है डर की। चींचीं चींचीं चिड़िया बोली, डाली पर कीकर की। कामकाज बस शुरू हो गया, सबने खटर-पटर की। लाया है अखबार खबर सब, बाहर की, भीतर की। घंटी बजी, दूध मिलने में, देर नहीं पल भर की। मैं सुनता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/light-up-2/article-20271"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/light-up.gif" alt=""></a><br /><p>अंधकार की काली चादर,<br />
धरती पर से सरकी।</p>
<p>हुआ उजाला जग में कोई,<br />
बात नहीं है डर की।</p>
<p>चींचीं चींचीं चिड़िया बोली,<br />
डाली पर कीकर की।</p>
<p>कामकाज बस शुरू हो गया,<br />
सबने खटर-पटर की।</p>
<p>लाया है अखबार खबर सब,<br />
बाहर की, भीतर की।</p>
<p>घंटी बजी, दूध मिलने में,<br />
देर नहीं पल भर की।</p>
<p>मैं सुनता रहता आवाजें,<br />
सभी रसोईघर की।</p>
<p>मम्मी के जादू से लो जी,<br />
सीटी बजी कुकर की।</p>
<p><strong>डॉ. दिनेश दधीचि</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Dec 2020 21:27:31 +0530</pubDate>
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